कहानी – हां वेरा तुम!

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
प्लेटफ़ॉर्म पर काफ़ी चहल-पहल थी। मैं तुम्हें तलाशता हुआ भागा जा रहा था। हर चेहरे को बग़ौर देखता हुआ। एक काया तुम्हारी जैसी लगी। मैं ठिठककर रुक गया। वह तुम ही थी। यक़ीनन!

–वेरा तुम! मेरे मुंह से अचानक निकल पड़ा।

–हां… बड़ी मासूमियत से मुझे देख रही थी तुम।

यह तो मुझे पता था। तुम कभी न कभी ज़रूर मिलोगी। मगर इस हाल में मिलोगी। इसकी तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी। मैं तुम्हें एकटक देखे जा रहा था।

–क्यों, क्या हुआ हमें?

बात करने का वही पुराना लहज़ा। तुमने हंसने का प्रयास किया। एक जबरी हंसी। एकदम फ़ीकी-सी। उसमें एक अव्यक्त पीड़ा साफ़ प्रतिबिंबित हो रही थी। हालांकि अपने दर्द को छुपाने का तुम भरसक प्रयास कर थी। परंतु तुम सफल नहीं हो सकी। तुम्हारी बेबसी को मैं पढ़ रहा था। उसी तरह तुम्हें देखे जा रहा था। देखे जा रहा था। अपलक, तुम्हारी आंखों में। नहीं-नहीं, मैं तुम्हें निहार रहा था। जैसे कोई चकोर, बस चांद को निहार रहा हो।

–कैसी हो? मैंने पूछा।

–ठीक हैं। बस मुंबई आए थे। सोचा, आप से मिल लें। इसीलिए फ़ोन कर लिया। बहुत बिज़ी थे?

–बिज़ी… कुछ भी बोलती हो। तुम बुलाओ और मैं बिज़ी रहूं। यह मुमकिन है क्या? तुम्हारी आंखों में झांकने लगा था मैं।

–थोड़ी देर यहीं रुकिए। हम काऊंटर से बर्थ नंबर पूछ कर आते हैं।

तुम अपना बैग वहीं छोड़कर सामने के काऊंटर की ओर बढ़ गई। मैं तुम्हें जाते हुए देखने लगा। उसी तरह एकटक।

तुमसे यह मेरी कुल छठवीं मुलाक़ात थी। इससे पहले की चार मुलाक़ातें बिहार में हुई थीं और पांचवी और अंतिम बार हम रांची में मिले थे। तुम्हारी शादी में। वैसे हमारा परिचय ही पटना के एक ग्रामीण इलाक़े में हुआ था।

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मुझे याद है, तुम्हारे कॉलेज का दौर था वह। तुम एमएससी पास कर चुकी थी और रिसर्च कर रही थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद मेरी भी केंद्र सरकार में दो साल पहले नौकरी लगी थी। तुम्हारी मौसेरी बहन जैती की शादी थी। तुम्हारा मौसेरा भाई सुधीर मेरा जिगरी दोस्त था। हम दोनों का अपॉइंटमेट साथ-साथ हुआ था। हम काम भी साथ में करते थे। उस बार पटना में पूरे छह दिन हम साथ-साथ रहे। चौबीसों घंटे साथ। देर रात तक हम लोग अंताक्षरी खेलते या गाना गाते थे। तुम हमेशा मेरी टीम में रहती थी। ख़ूब मज़ा आता था।

पहली मुलाक़ात में ही तुम मुझे जंच गई थी। तुम मुझे पसंद आ गई। तुम्हारे बोलने का लहजा। विचारों में गंभीरता। झील सी गहरी आंखें। नागिन जैसी लहराती जुल्फ़ें सब बेमिसाल थीं। मुझे बरबस आकर्षित कर रही थीं। कितनी कशिश थी तुम्हारी मुस्कराहट में। और चेहरे में जादू-सा आकर्षण। उस पहली मुलाक़ात में ही मुझे लगा- शायद तुम्हीं वह लड़की हो, जो मेरी जीवन-संगिनी बनेगी। या मैं ही वह लड़का हूं जो तुम्हारा हमसफ़र बनने जा रहा है। मैंने तय कर लिया था। तुमसे मन की बात ज़रूर कहूंगा।

बात ही बात में मुझे पता चल गया था कि तुम्हारे लिए भी लड़के की तलाश चल रही है। और, अपनी आकर्षक नौकरी की वजह से योग्यता के पैमाने पर मैं अपने को बीस मानकर चल रहा था। मुझे पक्का भरोसा था, अगर मैंने शादी का प्रस्ताव रखा, तो तुम्हारें घर वाले सहर्ष स्वीकार कर लेगें। बशर्ते मैं भी तुम्हें पसंद होऊं और तुम्हारा कोई अफ़ेयर वगैरह न हो।

तुम्हारी मौसी के घर में गुपचुप हमारी जोड़ी की चर्चा भी चल रही थी। इस चर्चा की जानकारी तुम्हें भी थी। संभवतः तुम्हारी मम्मी से सुधीर ने इस बारे में बात भी कर ली थी। एक तरह से उसी मकसद से मुझे जैती की शादी में बुलाया भी गया था। तुम्हारी मां की नज़रों में मुझे मां जैसी ममता और वात्सल्य दिखा था। बड़े अपनेपन से उन्होनें मेरे बारे में पूछा था। मुझे लगा था, मेरी अपनी ही मां मुझसे हालचाल पूछ रही है।

तुम्हें देखने के बाद मैंने अपने मन की बात सुधीर से कह दी थी। मतलब उसे बता दिया था कि तुम मुझे बहुत-बहुत बहुत पसंद हो। उसी ने मुझे सलाह दी थी कि मैं एक बार तुमसे भी पूछ लूं। और, मैं सही मौक़े की तलाश कर रहा था तुमसे बात करने का।

कुछ ही घंटे में अवसर मिल भी गया। मई की ख़ुशनुमा शाम थी वह। सूर्यास्त हो चुका था। हम लोग छत पर बैठे गपशप कर रहे थे। कुछ देर बाद सुधीर नीचे चला गया। उसके जाने के बाद अचानक वहां ख़ामोशी पसर गई। छत पर केवल हम दोनों ही थे। मेरे सामने वाली कुर्सी पर तुम बैठी थी। बग़ल में चल रहे टेबल फ़ैन से तुम्हारे इक्का-दुक्का बाल जो जूड़े से बाहर आ रहे थे और रह-रहकर तुम्हारे रुख पर फ़िसल रहे थे। उस दिन तुमने पहली बार अपने बालों को लपेट कर जूड़ा बनाया था। फिर अचानक पता नहीं क्यों, तुमने मेरे सामने ही अपने जूड़े को खोल दिया। मैंने तुम पर नज़र डाली। अब तुम्हारा गोल और सुंदर सा चेहरा बालों के बीच था।

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–एक बात कहूं? थोड़ी देर बाद मैंने ही मौन तोड़ा। तुम मेरी तरफ़ देखने लगी। लेकिन बोली कुछ नहीं। हल्की सी मुस्कराहट तैर रही थी तुम्हारें लबों पर। तुम कितनी अच्छी लग रही थी। मुझे वह पल जस का तस आज भी याद है।

तुमने इशारे में सहमति दी थी।

–तुम बुरा तो नहीं मानोगी? मैं झिझक रहा था।

–बोलिए न! बुरा क्यों मानेंगे हम। बुरा मानने वाली बात आप कह ही नहीं सकते। तुमने आग्रह किया। जैसे जल्द से जल्द तुम सुन लेना चाहती थी कि मैं कहना क्या चाहता हूं।

–तुम अपने केश इसी तरह खुले रखा करो।

–क्यों? तुम हलक़े से मुस्कराई थी।

–तुम्हारे खुले घुंघराले बाल बहुत अच्छे लगते हैं। सच्ची! खुली जुल्फ़ों की बीच तुम्हारा ख़ूबसूरत चेहरा, ऐसे लगता है जैसे बादलों की बीच चांद। बस, हर देखने वाला मंत्रमुग्ध होकर खिंचा चला आता है तुम्हारी ओर।

–अच्छा! तुम हंसने लगी थी।

सच! मुझे उस दिन, उस समय तुम दुनिया की सबसे सुंदर लड़की लग रही थी। तुम्हारी मुस्कराहट से मैंने यही समझा, मेरी बातें तुम्हें अच्छी लग रही हैं।

–कुछ और बोलू?

–बोलो न। तुमने इजाज़त दे दी।

–तुम्हारी आंखें बहुत अच्छी हैं। झील सी गहराई है इनमें। तुम्हारे व्यक्तित्व की दर्पण हैं ये आंखें। इनमें झांककर कोई बता सकता है। तुम कैसी हो। मैं तो इन आंखों के सहारे तुम्हारे दिल में उतर जाता हूं। सच वेरा! मैं सुध-बुध खो बैठता हूं। याद रहती हैं तो बस तुम्हारी आंखें। इतनी सुंदर आंखें आज तक मैंने देखी ही नहीं, तुम इतनी खूबसूरत क्यों हो? एक अजीब सी कशिश क्यों है तुम्हारे चेहरे में? तुम्हारा व्यक्तित्व मुझे तो बरबस खींचता है, चुंबक की तरह। मन करता है, पूरी ज़िंदगी तुम्हें निहारता रहूं।

–अच्छा। तुम खिलखिला पड़ी थी। फिर बोली –तुम्हें तो कवि या शायर होना चाहिए था। रूप-सौंदर्य की व्याख्या करने में तुम हिंदी कवियों को पीछे छोड़ रहे हो।

ये तुम्हारे ही अल्फ़ाज़ थे वेरा। मुझे लग रहा था, तुम्हें देख-देख कर मैं सचमुच कवि बनता जा रहा हूं।

–एक बात पूछूं। थोड़ी देर चुप रहकर मैंने फिर ख़ामोशी तोड़ी थी।

–पूछो।

–तुम किसी को पसंद करती हो?

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तुम अचानक चौंककर मेरी तरफ़ देखने लगी। शायद तुम इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं थी। थोड़ी देर बाद मैं तुम्हारी आंखों में झांका था। सच वेरा, तुम्हारी आंखों में मुझे अपनी तस्वीर नज़र आयी।

लंबे समय तक हमारे बीच एक लंबा मौन पसरा रहा। मौन के उस दायरे को लांघने से हम बड़ी देर तक कतराते रहे।

–नहीं। बहुत देर बाद तुमने कहा था। बहुत धीरे से।

–कहीं तुम्हारे रिश्ते की बात चल रही है? मैंने तुम्हें फिर कुरेदा था।

तुम कुछ बोली नहीं। बस मेरी तरफ देख रही थी अपलक। सहसा आंखों से दो मोती लुढ़क पड़े।

–अरे तुम रो रही हो? मैं चौंक पड़ा था।

मेरी बात सुनते ही और फूट पड़ी थी तुम वेरा। मुझे लगा मैंने ग़लत सवाल कर दिया दिया। थोड़ी देर बाद तुमने अश्क पोंछ लिए। हम दोनों चुप थे। ख़ामोशी की एक कनात-सी खिंच गई थी हमारे बीच। मुझे याद आया कि तुम जैती से दो-तीन साल बड़ी थी। इसलिए पहले तुम्हारी शादी होनी चाहिए थी, लेकिन हो रही थी छोटी बहन की शादी।

–सॉरी। मुझे ऐसा सवाल नहीं करना चाहिए था। माफ़ कर दो न वेरा, प्लीज़! मैं अपराधबोध से ग्रस्त हो उठा। दरअसल, मैं एक बहुत महत्वपूर्ण बात करने के लिए भूमिका बना रहा था और ग़लती कर बैठा। मैंने सफ़ाई दी।

तुम्हारी वही ख़ामोशी और अंगूठे से फ़र्श को कुरेदने का वही प्रयास।

–तुम मुझसे शादी करोगी वेरा? मैं अचानक कह गया पता नहीं कैसे…

इसके बाद तो मुझे सब कुछ हिलता सा नज़र आया। कुछ मिनट ऐसे ही गुज़र गए।

–हां, तुम मुझे भा गई हो वेरा, मैंने साहस जुटाकर कहा, –मैं.. मैं तुम्हारा हमसफ़र, तुम्हारा जीवनसाथी बनना चाहता हूं। हां, अगर मैं तुम्हें पसंद होऊं तब।

मेरी आवाज़ लरज़ रही थी। मैं नर्वस हो गया था। पता नहीं तुम्हारा रिस्पॉन्स कैसा होने वाला था।

कुछ देर बाद मैंने फिर सफ़ाई दी –इन केस, अगर तुम मुझे लाइक न करती हो या तुम्हें कोई और पसंद हो तो कोई बात नहीं। मुझे पसीना छूटने लगा।

तुमने अचानक हंस दिया था। ठीक रोते हुए उस बालक की तरह, जो रोते-रोते किसी बात पर अचानक खिलखिलाकर हंसने लगे।

–नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। डोन्ट वरी। न तो रिश्ते की बात चल रही है, न अभी तक कोई मुझ पसंद आया है। हां, आज के बाद का तो दावा नहीं कह सकती। यह तुम्हारी आवाज़ थी।

मुझे तुममें उम्मीद नज़र आने लगी। मुझे यक़ीन हो गया कि तुम मेरी हो जाओगी। सिर्फ़ मेरी और मैं तुम्हारा।

–आप पप्पा से बात करिए न। बहुत देर बाद तुम फिर बोली थी। सहसा तुम्हारी आवाज़ बदल गई –नहीं-नहीं, आपको हमारे दादाजी से बात करनी होगी, उनकी इजाज़त लेनी होगी। तुम्हारा चेहरा सहसा बुझ-सा गया। लाचारी एवं पीड़ा साफ़ झलक रही थी तुम्हारी आंखों में।

–उन लोगों को तो मैं चुटकी में मना लूंगा। मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया था।

–सच्ची… तुम्हारे चेहरे पर एक मुस्कान थिरक उठी थी। बड़ी दिलकश मुस्कान थी, हसरत भरी। तुम्हारा चेहरा खिल उठा था, किसी शबनमी फूल की तरह। जैसे कोई किसी बोझ से दबा जा रहा हो और अचानक कोई साथी उसका सारा बोझ अपने कंधे पर लेकर उसे सुस्ताने का मौक़ा दे दे। या फिर, कोई मांझी अपनी नाव समेत बीच भंवर में फंस गया हो और सहसा कोई दूसरा कुशल मांझी उसकी नाव को उबार कर उसे साहिल तक पहुंचा दे।

अब उस दिन की बात सोचकर हंसी आती है मुझे। तुमने उस दिन मेरी ग़ुस्ताखी या फिर कहो दुस्साहस का बुरा क्यों नहीं माना वेरा? आख़िर क्यों वेरा? काश! तुम उसी समय मेरा प्रस्ताव ठुकरा देती। तो आज ये वक़्त ही न आता। लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया। तुमने ही मुझे रास्ता दिखा दिया था आगे बढ़ने का। सपने में देखने का और फिर उन सपनों को साकार करने का।

तुम अभी भी इंक्वायरी काउंटर के क्यू में ही थी। अपनी बारी का इंतज़ार करती हुई।

मैं उन मीठी स्मृतियों में फिर से गोता लगाने लगा। जो तुमसे और केवल तुमसे जुड़ी हुई थीं। उन दिनों दुनिया अचानक बेहद हसीन लगने लगी थी। एकदम सपने जैसी। ख़ुशी पोर-पोर से टपक रही थी। दुनिया इतनी सुंदर तो कभी नहीं लगी थी मुझे। मैं समझ नहीं पा रहा था, अचानक क्या हो गया। ज़िंदगी इतनी हसीन हो सकती है, मैंने कभी सोचा भी नहीं था। ताड़ के लंबे सूखे वृक्ष जो पटना के उस देहात में पहुंचते समय नीरस और खूसट लगे थे, अब अतीव सौंदर्य बरसा रहे थे। तसब्बुर इतना मीठा, इतना मधुर कभी नहीं लगा था। हे भगवान! तुमसे जुड़ी हुई हर चीज़ से एक अपनापन महसूस कर रहा था मैं। सभी से एक लगाव सा महसूस हो रहा था।

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मुझे याद है वेरा। शादी के पहले वाले दिन सुबह तुम जैती को मेंहदी लगा रही थी। तुम्हारी मम्मी, मौसी और परिवार की कई महिलाएं, लड़कियां एवं रिश्तेदार वहां मौजूद थे। मैं भी सुधीर के साथ वहीं चारपाई पर बैठा था। नज़र चुराकर तुम्हें निहार रहा था। बीच-बीच में तुम मेरी जानिब देख लेती थी। जैती को मेहंदी लगाने के बाद तुम कोन और नींबू का पानी समेटने लगी। अचानक मै चारपाई से उठकर तुम्हारे पास पहुंच गया।

–मुझे भी मेंहदी लगा दो वेरा! मैंने तुमसे आग्रह किया।

मुझे नहीं पता कि मैं कब बिजली की सी गति से चारपाई से उठा और तुम्हारे सामने आकर बैठ गया। सच वेरा! पता नहीं यह सब कैसे हो गया?

–अरे! देख नहीं रहे हैं आप। मम्मी, मौसी देख रही हैं। लोग क्या कहेंगे? तुमने फुसफुसाया था।

मुझे तुम्हारा यह संबोधन बड़ा अच्छा लगा था। वहां बैठे सभी लोग मेरी नादानी पर हंसने लगे थे।

मुझे अपनी अज्ञानता और नादानी का अहसास हुआ।

–सॉरी। ग़लती हो गई। जाने दो। मेरे मुंह से निकला।

मैं बुझ-सा गया। मैं उठने ही वाला था कि तुमने मेरा हाथ पकड़ लिया। हां वेरा, सचमुच तुमने मेरा हाथ पकड़ कर रोक लिया था। मुझे तो यक़ीन ही नहीं हुआ कि सबके सामने तुम मेरा हाथ भी पकड़ सकती हो।

–अच्छा लाइए, आपको भी मेंहदी लगाकर लड़की बना दूं।

और तुम सबसे बेख़बर होकर मेरी हथेली में कोन से एक फूल रचने लगी। सहसा वहां लोगों को विश्वास नहीं हुआ, यह तुम क्या कर रही हो। एक पराये युवक को इस तरह? लेकिन वहां लोग जो कुछ देख रहे थे, वह सच था। हां वेरा! वह सच था। तुम मेंहदी लगा रही थी मेरी हथेली पर। तुम्हारी नज़र मेरी हथेली पर थी। सच, उस समय तुम कितनी सुंदर लग रही थी। तुम्हारे केश भी खुले थे। मैं कभी हथेली को, तो कभी तुम्हें देख रहा था। और कामना कर रहा था, काश! यह समय ठहर जाता सदा के लिए। अंत में तुमने हथेली में एक गोला बनाया और उसमें ‘वी’ लिख दिया। तुमने ‘वी’ क्यों लिखा था वेरा?

–लाइए आपका नाखून रंग दें, मेंहदी के रंग में। यह लंबे समय तक आपको हमारी याद दिलाएगा। तुमने फुसफुसा कर कहा और बाएं हाथ के अंगूठे के नाखून पर मेंहदी लगा दी।

सचमुच मेंहदी के वे रंग लंबे समय तक तुम्हारी याद दिलाते रहे। मैं न तो बायां हाथ धोता था, न अंगूठे का नाखून काटता था। मैं दिन रात हथेली और अंगूठे को निहारता रहता था। उसमें मुझे तुम दिखाई देती थी वेरा। मैं तुम्हारे प्यार के रंग में पूरी तरह से सराबोर हो गया था। मैं उठकर अपने कमरे में चला आया। मेरी आंखें उस ख़ुशी को संभाल नहीं पाईं और छलक पड़ी थी। मैं मुंह के बल बिस्तर पर पड़ गया।

–अरे आप रो रहे हैं? तुम मेरे पीछे-पीछे कमरे में आ गई थी।

–पता नहीं क्यों?

–अरे हुआ क्या… बोलोंगे कुछ?

–रो कहां रहा हूं मैं। ये तो ख़ुशी के आंसू हैं। मैंने अपने को संभाला और बोल पड़ा था। मुंह छुपाते हुए।

–सचमुच आप एकदम बच्चे हैं। तुम हंस रही थी।

अचानक तुम लरज पड़ी। एक याचक की तरह –प्लीज़! आप बच्चा मत बनिए। बड़े हो जाइए। आपके अंदर के बालक से डर लग रहा है मुझे। कहीं वह बालक… सहसा चुप हो गई थी तुम।

मैं भी कुछ नहीं बोला। कमरे में बहुत देर तक नीरवता ही पसरी रही।

–आपको ऐसे आना चाहिए था क्या मेरे सामने? लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं हमारे बारे में। बात दादाजी तक चली गई है। शिकायती लहज़ा था तुम्हारे स्वर में, लेकिन मुझे तुम्हारी आवाज़ में अपनापन दिख रहा था।

–एक बात कहूं। मैंने सिर उठा कर तुम्हें देखा। मेरी आंखों को निहार रही थी तुम भी। –मुझे अपना लो वेरा। तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊंगा। बिल्कुल नहीं… प्लीज़, अब मुझे अकेला ना छोड़ना।

मैं भावुक हो उठा था। एकदम निरीह। एक छटपटाहट महसूस करता हुआ जिससे मुझे केवल तुम ही मुक्त कर सकती थी।

तुम सहसा चुप हो गई थी और गंभीरता की चादर ओढ़ ली थी। तुम्हारी चुप्पी ने मुझे हताश कर दिया। पटना छोड़ने से एक दिन पहले तुम्हारे दादाजी ने मेरी हसरतों को दफ़न कर दिया।

सुधीर ने बताया कि दादा को मेरा प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं था। दूसरी जाति का लड़का उन्हें स्वीकार्य नहीं था। उन्हें मेंहदी वाली बात भी बहुत बुरी लगी थी। परिवार के लोगों ने उन्हें मनाने की लाख कोशिश की, पर वे टस से मस ही नहीं हुए। वह परिवार के बुजुर्ग थे और मुखिया भी। लिहाज़ा, उनके फ़ैसले को मानने के लिए तुम्हारे घर के सभी लोग बाध्य थे। तुम भी वेरा! फिर तुम घर की बेहद ज़िम्मेदार लड़की थी। कैसे इनकार कर सकती थी।

सच, उस समय तुमने साथ दिया होता तो मैं बग़ावत कर देता। हम कहीं भाग जाते। या उसी समय शादी कर लेते। लेकिन तुम तो जैसे अज्ञातवास में चली गई। लाख खोजने पर भी सामने नहीं आई। मैं तड़पता रहा, तुम्हें देखने के लिए। पता नहीं, मैं ख़ुद को बड़ा ग़ुनाहगार महसूस कर रहा था। असह्य वेदना से छटपटा रहा था।

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पटना छोड़ते समय तुम फिर प्रकट हो गई थी। मैं तुमसे नज़र नहीं मिला पा रहा था। हालांकि अब सोचता हूं, अगर तुमने साथ दिया होता तो आज यह एकांकी जीवन जीने के लिए हम अभिशप्त न होते।

संभवतः इस कहानी का प्लॉट ही न बनता तब। तुम्हें अपना न बना पाने की पीड़ा जो मेरी धरोहर बन गई, शायद मेरे पास न होती, तब इस दुनिया को, रिश्तों को इतने क़रीब से देखने की समझ भी न आती मुझमें। मैं एक बहुत अच्छा वैज्ञानिक ज़रूर हो जाता, लेकिन मेरी भाषा, मेरे शब्द में इतना दर्द, इतनी टीस कभी न उभर पाती। संवेदनाएं इस तरह मेरे व्यक्तित्व पर हावी नहीं हो पातीं।

कभी-कभी सोचता हूं, तुम्हें न अपना पाने की कीमत क्या इन उपलब्धियों से चुकाई जा सकती है?

ऐसे में मुझे एक ही जवाब मिलता है –नहीं।

हां वेरा, हम दोनों के एक दूसरे को पसंद करने और जीवन भर साथ रहने की प्रबल इच्छा के बावजूद तुम्हारा सानिध्य न पाने के बाद पैदा हुई पीड़ा ने ही मुझे लेखन के क्षेत्र में बड़ी ऊंचाई तक पहुंचा दिया। बतौर लेखक बहुत कामयाबी दी। लेकिन अगर इस कामयाबी और उस उपलब्धि को तराजू के एक पलड़े पर रखूं और तुमसे मिल पाने की ख़ुशी को दूसरे पलड़े पर रखूं, तो यक़ीन मानो तुमसे मिल पाने की ख़ुशी वाला पलड़ा हमेशा भारी, क्या बहुत रहता। हां, यार.. सच में, मैंने तुम्हारी ही आरजू की थी, इन सफलताओं या उपलब्धियों की नहीं। मुझे तुम्हारा साथ और सानिध्य चाहिए था, सफलताओं या उपलब्धियों का नहीं।

दरअसल, तुम्हें न अपना पाने के बाद मुझे लगा, मेरे पास कुछ है ही नहीं। मैं अचानक से कंगाल हो गया। एक निर्वात, एक ख़ालीपन पसर गया मेरे जीवन में। उसका दायरा दिनोंदिन बढ़ता गया। तुमने हालांकि ऐसा कोई आश्वासन या भरोसा या दिलासा नहीं दिया था, जिससे लगे कि मेरे लिए तुम भी उतनी ही बेक़रार हो जितना तुम्हारे लिए मैं। इसके बावजूद मुझे लगता था, तुम भी मुझे पसंद करने लगी थी। तुम्हारे दिल में भी मेरे लिए जगह बन गई थी। अन्यथा तुम मेरी हथेली पर मेंहदी से ‘वी’ क्यों लिखती?

तुम्हारे विरह में मैं सलीके से कभी जी ही नहीं पाया। सदा दर्द टपकता रहा और मैं कराहता रहा। अंदर से अकेलेपन का एहसास सताता रहा। यह जीवन घाटे के सौदे जैसा लगता रहा। सचमुच, मैं ख़ुद से ही भागता रहा ज़िंदगी भर। इसके बावजूद तुम्हारे तसव्वुर से कभी उबर ही नहीं पाया।

दो साल बाद एक दिन सुधीर ने बताया था। तुम्हारी भी शादी तय हो गई। निमंत्रण-पत्र मेरे सामने रखा था। तुमने ख़ुद मेरा नाम लिखकर कार्ड भेजा था। आने के लिए लिखा था तुमने। वेरा! तुम बुलाओ और मैं न आऊं, यह तो हो ही नहीं सकता था। तुम्हें ना तो कह ही नहीं सकता था।

मैं सुधीर के साथ रांची आ गया था। वहां तुमने स्वागत किया था, लेकिन वह मुझे बहुत औपचारिक लगा था। बाद में तुम दिखी ही नहीं। न मालूम कहां छुप गई। तुम्हारी शादी हो रही थी, लेकिन मुझसे नहीं, किसी और से। तुम किसी और की होने वाली हो, यह पीड़ा मुझ पर इस कदर हावी थी कि कह नहीं सकता था। एकदम लाचारी थी। संभवतः इसीलिए रांची का सुहाना मौसम मुझे बिल्कुल नहीं जम रहा था। मेरा दम-सा घुटने लगा था। दूसरे ही दिन मैंने वापसी का मन बना लिया।

सब लोगों ने रुकने के लिए कहा, लेकिन मैंने किसी की बात नहीं मानी। रवाना होने से कुछ समय पहले तुम आ गई वेरा। हां, तुम। मुझे तो उस समय यक़ीन ही नहीं हुआ। भौचक रह गया था।

–आप जा रहे हैं? तुमने पूछा था।

–हां। मैं तुमसे नज़र नहीं मिला पा रहा था।

–आप नहीं समझेंगें। हम कितने मजबूर हैं। आप क्या, कोई नहीं समझ सकता हमारी लाचारी को। हम भी आपसे अपेक्षाएं पाल लिए थे। ख़ैर छोड़िए। आप नहीं समझेंगे कि लड़की होना.. वह भी परंपरावादी परिवार की लड़की होना, किस मजबूरी का नाम है। यह तुम्हारी आवाज़ थी वेरा।

तुमने आगे कहा था –आपको रोकने का कोई हक़ नहीं है हमें। फिर भी अगर आप शादी तक रुक जाएं, तो अच्छा लगेगा हमें। हम पति-पत्नी नहीं बन सके तो क्या हुआ, दोस्त तो बने रह सकते हैं और आप मेरे सबसे क़रीबी दोस्त हमेशा रहेंगे। मेरे भावी पति से भी ज़्यादा क़रीबी दोस्त। हम जा रहे हैं। अगर आप नहीं रुकना चाहते हैं तो हम क्या कर सकते हैं।

और तुम चली गई वेरा।

पता नहीं क्यों, मैंने पैक्ड सामान खोल दिया और उसी कपड़े में बिस्तर पर सो गया और उस दिन बहुत गर्मी थी। संभवतः टेंपरेचर चालीस डिग्री सेल्सियस के ऊपर ही रहा होगा। इसके बावजूद बावजूद मैं सात-आठ घंटे सोता रहा। शाम को तुम्हीं ने आकर जगाया था।

–चाय लीजिए। हम आपके लिए चाय बनाकर लाए हैं।

मैंने देखा तुमने अपने बाल खोल रखे थे। तुम्हारा गंभीरता का जामा उतार फेंकना मेरे गले नहीं उतर रहा था। मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा था वेरा। हम दोनों चुपचाप चाय पीते रहे।

–तुम्हारे पति.. मतलब जिनसे शादी हो रही है, क्या करते हैं? मैंने ही पूछा था।

–सिविल इंजीनियर है। जबलपुर में पोस्टिंग है। तुमने बताया था।

लेकिन चेहरे पर भी शादी को लेकर कोई उत्साह मुझे नहीं दिख रहा था।

तो तुम भी जबलपुर में सेटल्ड हो जाओगी।

हां..

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शादी के बाद तुम ससुराल चली गई। मुझे लगा, मेरे शरीर में प्राण ही नहीं रहा। दम घुट रहा था। मन कहीं समा ही नहीं रहा था। एक अव्यवक्त पीड़ा, एक लाचारी उभर रही थी जेहन में। तुम्हारी शादी के दो साल बाद ही सुधीर ने बताया कि विराग को कैंसर हो गया। टर्मिनल स्टेज में हैं। और उसके चार महीने बाद वह हुआ, जिस ख़बर को सुनकर मैं तो स्तब्ध रह गया।

–क्या सोच रहे हैं? अचानक तुमने आकर मेरी स्मृतियों की श्रृंखला तोड़ दी।

–कुछ नहीं। मैं चौक सा पड़ा, –तुम आ गई? चाय पिओगी? चलो न, सामने के रेस्तरां में चलते हैं।

तुम ख़ामोशी ओढ़े रही। हम लोग रेस्तरां में आ गए। रास्ते में भी हमारे बीच ख़ामोशी रही।

मैंने बेयरा को दो लस्सी का ऑर्डर दे दिया।

–क्या कर रही हो आजकल? मैंने बहुत देर बाद तुम्हें फिर कुरेदा।

–कुछ ख़ास नहीं। जबलपुर में ही एक कॉलेज में पढ़ाते हैं। तुम नीचे देखने लगी। एमएससी-पीएचडी करने के बाद रीडर की पोस्ट मिल गई।

–मन लगता है? मेरे मुंह से फिर सवाल निकला। तुमने मुझे देखा फिर नज़रें झुका लीं।

बड़ी देर बाद बोली –नहीं।

सहसा तुम रुक गई। तुम्हारे चेहरे पर पश्चाताप और मजबूरी मैं साफ़ पढ़ रहा था। अपराधबोध की एक परत भी जमी थी।

मुझे लग रहा था, तुम अंदर ही कहीं डूबी हुई हो। तुम्हारे होंठ थरथरा रहे थे वेरा। शायद कुछ कहने के लिए। लेकिन तुम कह नहीं पा रहीं हो।

–आप ठीक हैं? तुमने पूछा, –चेहरे से नहीं लग रहे हैं।

–नहीं-नहीं, मैं ठीक हूं। एकदम ठीक हूं। ख़ुश हूं। तुम नाहक पाल रही हो अपराधबोध। मैंने मन ही मन तुम्हारे न पूछे गए सवालों का जवाब दे दिया।

कुछ देर ख़ामोश रह कर पूछा –कहां जा रही हो?

–वापस जबलपुर, तुम मुझे देख रही थी। फिर लस्सी का पाइप मुंह से लगा लिया।

एक दिन रुक नहीं सकती? मैं बड़ी मुश्किल से कह पाया था।

मुझे भरपूर नज़र देखकर तुमने पलक झपका ली। बहुत देर तक कुछ बोली नहीं। फिर बोली, –कॉलेज में ज़रूरी काम है। एक सेमिनार है। इसलिए रुकना संभव नहीं हो पाएगा। तुम प्लेटफ़ार्म की ओर देखने लगी।

मैंने कहना चाहा –क्या तुम्हारा काम मुझसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है। लेकिन होंठ ही नहीं खुले।

–ट्रेन का समय हो गया। तुमने फिर मुझे देखा।

हम रेस्तरां से बाहर आ गए। प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी गाड़ी सचमुच छूटने वाली थी। हम चलते हैं। अपना ख़याल रखना। कॉल ज़रूर करना। हम भी कॉल करेंगे। यह तुम्हारी आवाज़ थी टेपरिकॉर्डर जैसी।

तुम लपककर कोच बी-टू में घुस गई।

–अच्छा, तुमने मेरी ओर देखकर हाथ हिलाया।

मैंने देखा, तुम बोल नहीं पा रही थी। आंख भी भर आई थीं तुम्हारी। आवाज़ बेतरह गले में फंस गई थी।

ट्रेन भी धीरे-धीरे रेंगने लगी। धीरे-धीरे ओझल हो गई, लेकिन मेरे मन को बोझिल कर गई। मैं वापस हो लिया चुपचाप।  आंसुओं को रोकने का असफल प्रयास कर रहा था।

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