भारत में कोरोना से चार गुना अधिक जानें लेता है कैंसर

0
963

विश्व कैंसर जागरूकता दिवस पर विशेष

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस से भारत में 2020 में क़रीब डेढ़ लाख लोगों की मौत हुई, लेकिन नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट के अनुसार भारत में हर साल पांच लाख से अधिक लोग कैंसर से असमय दम तोड़ देते हैं। इस तरह कैंसर देश में सबसे अधिक जान लेने वाली बीमारी है। आईसीएमआर (ICMR) के राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम (National Cancer Registry Progrma) के रिपोर्ट्स के अनुसार, देश में किसी भी समय पर कैंसर के क़रीब 28 लाख मामले रहते ही हैं। क़रीब 11 लाख कैंसर के नए मामले हर साल आते हैं। इसमें से 5 लाख से अधिक रोगी इस बीमारी के कारण प्रतिवर्ष मर जाते हैं। यह आंकड़ा धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है।

इसे भी पढ़ें – कैंसर को हराना मुमकिन है – युवराज सिंह

कहने का मतलब दुनिया में सबसे ज़्यादा मौतें फ़िलहाल कैंसर से हो रही हैं, लेकिन दुखद पहलू यह है कि अभी तक इस जानलेवा बीमारी की कोई कारगर दवा नहीं खोजी जा सकी है। इस समय विश्व में सबसे ज़्यादा लोग कैंसर से ही पीड़ित हैं। यह भयावह बीमारी लोगों के मन में मौत का पर्याय बन चुकी है। जागरूकता के अभाव में दरअसल इस बीमारी का प्रायः लोग समय रहते पता नहीं लगा पाते हैं और जब तक यह डिटेक्ट होती है, बहुत देर हो चुकी होती है और रोगी साल दो साल से ज़्यादा ज़िंदा नहीं रह पाता। इस बीमारी की भयावहता और इससे निपटने के बारे में चेतना लाने के लिए हर साल 4 फ़रवरी को विश्व कैंसर जागरूकता दिवस मनाया जाता है।

इसे भी पढ़ें – मि. कैंसर योर चैलेंज इज़ ऐक्सेप्टेड! – लीज़ा रे

भले कैंसर का इलाज अभी तक मुमकिन नहीं हो पाया है या तमाम प्रयासों के बावजूद कैंसर के मरीजों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही है, लेकिन इसे क़ाबू करना और इससे बचाव मुमकिन है। वर्ल्ड हेल्थ र्गनाइज़ेशन ने हर साल विश्व कैंसर डागरूकता दिवस इसी लिए मनाता है, ताकि लोगों को इस भयानक बीमारी से होने वाले नुकसान के बारे में बताया जा सकें और उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा जागरूक किया जा सके। विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) के अनुसार, कैंसर मृत्यु का विश्व स्तर पर प्रमुख कारण है, जो 2008 में 76 लाख मौतों (सभी मौतों का लगभग 13 फ़ीसदी) के लिए ज़िम्मेदार है। 2008 में कैंसर से होने वाली मौतों का क़रीब 70 फ़ीसदी कम और मध्यम आय वाले देशों में हुआ। विश्व स्तर पर कैंसर से होने वाली मौतों के बढ़ते रहने, 2030 में अनुमानित 1.31 करोड़ मौतों के साथ, का अनुमान किया गया है।

इसे भी पढ़ें – फ़िटनेस ज़िंदगी का सबसे बड़ा तोहफ़ा – मनीषा कोइराला

बदलती जीवनशैली मुख्य वजह

भारत में लोगों को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि कैंसर उनका बाल बांका नहीं कर सकता, क्योंकि यह लाइलाज बीमारी देश में बड़ी तेज़ा से पांव पसार रही है। इसकी मुख्य वजह जीवनशैली में बदलाव बतायाजा रहा है। एक रिसर्च के मुताबकि भारत में हर साल क़रीब दस लाख लोगों को कैंसर डंस रहा है। महिलाओं स्तन कैंसर और गर्भाशय कैंसर आम हो चला है। जबकि पुरुषों में गला, गर्दन और प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित हो रहे हैं। दरअसल, नए ज़माने के साथ जीवनशैली में आए बदलाव ने मांनव की रोग से लड़ने की क्षमता यानी इम्यून सिस्टम को कमज़ोर कर दिया है।

इसे भी पढ़ें – मौत आई और मुझसे मिलकर वापस चली गई – अनिता मूरजानी

स्तन कैंसर का का आक्रमण बढ़ी

तंबाकू के सेवन से गर्दन, लगा और फेफड़े कैंसर बढ़ रहा है। महिलाओं में देर से शादी, जल्दी पीरियड और देर से मेनोपॉज़ के चलते ब्रेस्ट कैंसर बढ़ रहा है। महिलाओं में हार्मोंन्स का कम उम्र विकसित होना स्तन कैंसर के ख़तरे को बढ़ा रहा है। महानगरों में इस तरह के केसेज़ बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं। दिल्ली के लोकनायक अस्पताल के रेडियोलॉजी के विभागाध्यक्ष किशोर सिंह के मुताबिक भारत में हर साल स्तन कैंसर के 115000 मामले सामने आ रहे थे, लेकिन इसके 250000 तक पहुंचने की आशंका है। वह कहते हैं, “लोग करसत करते नहीं, प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है, ऊपर से अनहेल्दी खाना और बदलती सेक्सुअल हैबिट कैंसर का ख़तरा बढ़ा रही है।”

इसे भी पढ़ें – मोटापा : गलत लाइफ़स्टाइल का नतीजा

आख़िर क्या है कैंसर?

दरअसल, शरीर में सेल्स समूह में अनियंत्रित बढ़ोतरी कैंसर है, यानी किसी हिस्से में असामान्य रूप से किसी सेल्स का बनना ही कैंसर कहलाता है। यह असामान्य सेल्स लिविंग सेल्स को मारने लगता है और ट्यूमर के रूप में उभरता है। सेल्स को ऑक्सीजन व ग्लूकोज़ (शुगर) जैसे न्यूट्रिएंट्स की स्थाई सोर्स की ज़रूरत होती है। सेल्स इसे ख़ून से लेती हैं। रक्त प्रवाह के ज़रिए न्यूट्रिएंट्स व ऑक्सीजन शरीर में पहुंचते हैं, जिससे कई कारण से असामान्य गतिविधियां होने लगती हैं। ये बढ़ने लगती हैं और ट्यूमर का शक्ल लेने लगती हैं। जिन्हें कैंसर कहा जाता है। यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकता है। लेकिन अगर इसका सही समय पर पता ना लगाकर उपचार नहीं किया गया, तो मौत का जोखिम बढ़ जाता है।

इसे भी पढ़ें – योगासन से रखें मोटापे पर अंकुश

कैंसर के लक्षण

पाचन में दिक्कत
अगर खाना पचाने में दिक्कत हो रही है तो फौरन डॉक्टर से मिलें। दरअसल, कैंसर उन कारकों की वजह से पैदा होता है जिनके कारण पाचन तंत्र ख़राब होता हैं।

गले में खिचखिच
अगर खांसी है या गले में खराश लंबे समयसे है। खांसी में खून निकले, तो लापरवाही न करें। तुरंत डॉक्टर से चेकअप करवाएं। सावधानी बरतना बहुत ज़रूरी है।

यूरिन में ख़ून
अगर यूरिन के साथ ख़ून निकले तो फ़ौरन डॉक्टर को बताएं। पेशाब के साथ ख़ून इंफेक्शन के कारण भी हो सकता है, लेकिन ब्लैडर या किडनी के कैंसर में भी पेशाब में ख़ून आता है।

लगातार दर्द होना
हर तरह का दर्द कैंसर की निशानी नहीं होती, लेकिन दर्द बना रहे, तो बेशक कैंसर संभव है। इसलिए बिना देर किए डॉक्टर से मिलें और शंका का समाधान करें।

शरीर पर मोल
अगर शरीर पर कहीं भी मोल जैसा दिखने वाला निशान बनने लगे तो डॉक्टर को ज़रूर दिखाएं और ज़रूरी टेस्ट करवाएं। यह स्किन कैंसर की शुरुआत हो सकती है।

ज़ख़्म न भरना
ज़ख़्म अमूमन दो-तीन हफ़्ते में भर जाते हैं। अगर घाव तीन हफ्ते तक न भरे तो डॉक्टर ज़रूर दिखाएं। कैंसर वायरस के अटैक में घाव बहुत देरी से भरते हैं।

ज़्यादा ब्लीडिंग
अगर पीरियड में चार दिन बाद भी ब्लीडिंग नहीं रुके, तो विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है। यह सरवाइकल कैंसर की शुरुआत हो सकती है। फौरन गायनाकोलॉजिस्ट से सलाह लें।

बेवजह वज़न घटना
आमतौर पर वजन बिना ख़ास वजह के नहीं घटता, लेकिन अगर वेट कम होने लगे, तो सावधान हो जाएं। यह कैंसर का लक्षण हो सकता है। तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।

शरीर पर गांठ
शरीर के किसी हिस्से में गांठ जैसा महसूस हो तो उसका उचित जांच कराएं। हालांकि हर गांठ ख़तरनाक नहीं होती, लेकिन डॉक्टर की सलाह ज़रूरी है।

गले में तकलीफ़
अगर कुछ खाते समय निगलने में दर्द हो, बिना देरी के डॉक्टर से मिले, क्योंकि यह गले के कैंसर का लक्षण भी है। इसकी सही जांच कराना ज़रूरी है।

इसे भी पढ़ें – क्या पुरुषों का वर्चस्व ख़त्म कर देगा कोरोना?

इलाज से बेहतर बचाव

दुनिया में कैंसर के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए सन् 2005 से विश्व कैंसर जागरूकता दिवस मनाने की शुरूआत हुई और तब से इस दिन को कैंसर के प्रति जागरूकता करने के लिए मनाया जाता है। भारत में तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों की वजह से कैंसर मरीज़ों की तादाद बहुत ज़्यादा है। कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसका इलाज तो फ़िलहाल नहीं खोजा जा सका है, लेकनि पर इस पर क़ाबू करना और इससे बचाव मुमकिन है। मरीज़ में अगर मज़बूत विलपावर है तो वह इसे हरा भी सकता है। इसके लिए सही समय पर सही इलाज मुहैया होना ज़रूरी है। यह भी माना जाता है कि कैंसर के उपचार से बेहतर है उससे बचाव।

इसे भी पढ़ें – क़ुदरत की नेमत है शरीर, इसे स्वस्थ रखें, बस रोज़ाना 30 मिनट योग करें…

कैंसर से बचने की सतर्कता

-हेल्थ को अपनी तमाम प्राथमिकता में सबसे ऊपर रखें।
-तंबाकू से बने किसी भी उत्पाद का सेवन बिल्कुल न करें।
-कैंसर का ख़तरा बढ़ाने वाले संक्रमणों से हमेशा बचकर रहें।
-अगर कहीं चोट लगी है तो उसका उचित उपचार करवाएं।
-अपनी दिनचर्या को स्वस्थ और अनुशासन में रखे।
-नियमित कसरत करें ताकि मौटापे के शिकार न हो सकें
-समय पर पौष्टिक भोजन करें और वजन क़द के अनुसार रखें।
-शराब या दूसरे नशीले पदार्थों का अधिक सेवन न करे।

इसे भी पढ़ें – डायबिटीज़ मरीज़ होंगे केवल छह महीने में पूरी तरह से शुगर फ्री

कितने तरह के कैंसर?

भारत में सौ से भी अधिक तरह की कैंसर बीमारियां हैं। मसलन- स्तन कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, ब्रेन कैंसर, बोन कैंसर, ब्लैडर कैंसर, पेंक्रियाटिक कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर, गर्भाशय कैंसर, किडनी कैंसर, लिवर कैंसर, लंग कैंसर, त्वचा कैंसर, स्टमक कैंसर, थायरॉड कैंसर, मुंह का कैंसर, गले का कैंसर, गरदन का कैंसर, कोलेस्ट्रॉल कैंसर और ब्लड कैंसर। गर्भाशय-ग्रीवा (गर्भाशय) और स्तन कैंसर महिलाओं में सर्वाधिक सामान्य कैंसर है जबकि पुरुषों में, मुख-विवर, ग्रसनी और जठरांत्र पथ (पेट, इत्यादि) का कैंसर सामान्य हैं। स्तन कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। दिल्ली एवं मुंबई में स्तन कैंसर महिलाओं में सर्वाधिक सामान्य कैंसर है।

फ़िलहाल दुनिया भर में हर साल 76 लाख लोग कैंसर से दम तोड़ देते हैं, जिसमें से 40 लाख लोग 30 साल के ऊपर होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ कैंसर से 30 फ़ीसदी मौत तंबाकू सेवन, एल्कोहल, अनियमित आहार और मोटापे पर अंकुश में रखकर किए जा सकता है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 2005-2015 के बीच 8।4 करोड़ लोग कैंसर का शिकार होकर जान गंवा चुके हैं। भारत में प्रतिवर्ष कैंसर के 11 लाख नए मामले सामने आते हैं, जो दुनिया का 7।8 फ़ीसदी है।

इसे भी पढ़ें – डायबिटीज़ क्यों है लाइलाज बीमारी? कैसे पाएं इससे छुटकारा?

कैसा हो कैंसर में आहार

कैंसर के मरीज़ के आहार का इलाज पर असर होता है। मरीज़ का इलाज असरदार हो, इसके लिए आहार में सावधानी बरतना ज़रूरी है। रोगियों की डाइट उनके स्वास्थ्य के हिसाब से ऐसी होनी चाहिए-

पोषण की कमी
अमूमन कैंसर मरीज़ों की भूख मर जाती है। यह सबसे सामान्य समस्या है, जिससे शरीर में पोषक तत्वों जैसे कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा और खनिज लवण की कमी आ जाती है। कैंसर के मरीजों का आहार इसलिए कम हो जाता है, क्योंकि बीमारी उनके पाचन तंत्र के विभिन्न अंगों जैसे इसोफैगस, पेट, छोटी या बडी आंत, लिवर, गालब्लैडर या पैंक्रियाज पर असर करती है।

पोषक आहार
मरीज पौष्टिक आहार ही लें, जिनसे ज़रूरी तत्व मिलें। कार्बोहाइड्रेट वाला आहार अच्छा विकल्प है, लेकिन डायबिटिक सावधानी बरते। इससे फ़ौरन ऊर्जा देता है,जिससे पाचन सही रहता है। टिश्यूज़ के विकास व ऊर्जा के लिए ज़रूरी प्रोटीन अंडा, मीट, मसूर दाल, मटर, बींस, सोयाबीन व नट्स से मिल जाता है। मरीज़ में विटामिन व मिनरल्स भी कम हो जाता है, क्योंकि इनकी मांग ज़्यादा व सप्पाई कम होती है।

तरल पदार्थ
कैंसर मरीज़ो को तरल पदार्थ का ख़ूब सेवन करना चाहिए। इससे डिहाइड्रेशन का ख़तरा नहीं रहता और स्वास्थ्य बेहतर रहता है। ज़्यादा तरल भोजन से यूरिन ख़ूब लगती है, जिससे टॉक्सिक पदार्थ शरीर से बाहर निकल जाते हैं। जल्दी पचने वाले आहार लें। मसालेदार, तला हुआ या अधिक ठोस आहार न लें।

क्या आपको पता है, अगर आप लंदन में मालबरो सिगरेट ख़रीदेंगे तो आपको केवल एक पैकेट का 10 पाउंड यानी 800 रुपए में देने होंगे, लेकिन भारत में आप महज तीन सौ रुपए में धह पैकेट मिल जाएंगे।
दरअसल, ब्रिटेन में सिगरेट पर इतना ज़्यादा टैक्स इसलिए लगाया गया है, ताकि लोग हतोत्साहित होकर कम सिगरेट पीएं, लेकिन भारत में सूरत-ए-हाल एकदम अलग है।

इसे भी पढ़ें – बुज़ुर्गों के गुणवत्ता जीवन के लिए समर्पित प्रो नसरीन रुस्तमफ्राम

पर्यावरण बन सकता है कैंसर की वजह

अमेरिका में एक रिसर्च में पता चला है कि सेल्स में बदलाव बमुश्किल कैंसर में बदलते हैं जब तक कि ज़हरीले केमिकल या रेडिएशन उसमें न हों। नब्बे फ़ीसदी कैंसर के मामले पर्यावरण व आदतों की देन हैं। अगर पर्यावरण में प्रतिकूल बदलाव न हो तो कैंसर का ख़तरा कम हो सकता है। ‘नेचर’ में छपे स्टडी में उन पुराने स्टडीज़ को चुनौती दी गई है, जिनमें कहा गया था कि ज़्यादातर कैंसर सेल्स में बदलाव से होते हैं। इस खुलासे के बाद कैंसर के बचाव की रणनीति फिर से तैयार की जा सकती है। सूरज की रोशनी में कम रहने और खानपान में लापरवाही कैंसर का ख़तरा बढ़ाता है।

इसे भी पढ़ें – क्या पुरुषों का वर्चस्व ख़त्म कर देगा कोरोना?सहाना शेट्टी ने पांच महीने में 40 किलो वजन घटाया

क्या है कैंसर फोबिया

जैसे-जैसे कैंसर अपना दायरा बढ़ा रहा है, वैसे-वैसे कैंसर फोबिया से ग्रस्त लोगों की तादाद भी बढ़ रही है। यह कैंसर फोबिया का ही असर है कि कई लोग सामान्य बीमारी होने को भी लोग कैंसर से जोड़ देते हैं और अनावश्यक रूप से कैंसर की जांच कराते रहते हैं। उनके परिवार में किसी को कैंसर होने के कारण उनको लगता है, देर-सबेर वे भी कैंसर की चपेट में आएंगे। कैंसर फोबिया के शिकार लोग मनोचिकित्सक के पास इलाज कराने जाते हैं। दरअसल, डरने वाली ग्रंथि को फोबिया कहा जाता है। आम बोलचाल डर या भय को फोबिया कहते हैं। यह मन की एक अवस्था है, जहां मरीज़ किसी भविष्य की अनहोनी से भयाक्रांत रहता है, जबकि वह अनहोनी होने वाली नही है, फिर भी उसे लगता है कि वह अनहोनी होने वाली है। वह उस चीज़ डरने लगता है, जो उसे होने वाली ही नहीं है। व्यक्ति को लगता है, उस पर कैंसर का हमला होने वाला है और वह उससे निपटने की तैयारी शुरू कर देता है।

कई लोग ऐसे मिल जाएंगे, जिनके परिवार में किसी को कैंसर हुआ था या है तो वे भी कैंसर से ग्रसित होने से घबराने लगते हैं और होने वाली मामूली बीमारी से भी उन्हें लगता है कि उन्हें कैंसर होने वाला है। जबकि उनमें कैंसर के कोई लक्षण नहीं होतो। ऐसे में कैंसर से घबराने की उनके पास कोई वजह होती है और न ही कोई ज़रूरत। फिर भी कैंसर को लेकर उनके मान में डर घर कर जाता है।

चेतना मुख्य वजह

कई प्रमुख डॉक्टर मानते हैं कि लोगों की कैंसर के प्रति अचानक बढ़ी जागरूकता ही कैंसर फोबिया की मुख्य वजह है। लोगों के जेहन में बैठ गया है कि कैंसर बहुत ही ख़तरनाक बीमारी है और जिसे भी कैंसर का पता चलता है साल दो साल में उसकी मौत हो जाती है। इधर कैंसर के बार में बहुत तरह की बाते सुनने को मिलती है। खानपान, मोबाइल या मामूली बीमारी से भी कैंसर होने की आशंका रहती है। इससे लोग अतिरिक्त सावधान हो गए हैं और कैंसर के बारे में ख़ूब जानकारी रखते हैं। इतना ही नहीं अपने शरीर के सामान्य बीमारियों के लक्षण से भी उन्हें लगने लगता है, कहीं यह कैंसर का लक्षण तो नहीं है। इसमें उनका भी दोष नहीं। दरअसल, टेलीविज़न, अख़बार या होर्डिंग के इश्तिहार में लोग अक्सर देखते, सुनते या खबर पढ़ते हैं कि मोबाइल प्रयोग से कैंसर हो सकता है, फास्ट फूड और जंक फूड खाने से कैंसर हो सकता है। लोगों को लगने लगता है कि उनको भी कैंसर हो गया है और बेवजह कैंसर की जांच कराते हैं।

हरिगोविंद विश्वकर्मा

इसे भी पढ़ें – कहानी कैंसर एक्सप्रेस की