मौत आई और मुझसे मिलकर वापस चली गई – अनिता मूरजानी

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कैंसर सरवाइवर – चार

न्यूयॉर्क टाइम्स की बेस्टसेलर लेखक अनिता मूरजानी की इस उम्दा कहानी को पढ़िए। आपको एकदम अविश्वसनीय लगेगी, लेकिन मज़ा आएगा। अनिता उन बहादुर लोगों में से हैं जिन्होंने कैंसर को मात देकर नए सिरे से ज़िंदगी की शुरुआत की। उनकी कैंसर से मरकर जीने की कहानी ‘डाइंग टू बी मी’ पूरी दुनिया में बहुत ज़्यादा पढ़ी जा रही है।

“लोग कहते हैं, मैं कोमा में थी, लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे कोई अदृश्य शक्ति मुझे घुमा रही है। मैं दूर जा रही हूं, बहुत दूर। रास्ते में एक जगह मुझे पिताजी मिलते हैं, जिनकी बहुत साल पहले मौत हो गई थी। उन्होंने प्यार से मुझे लगे लगा लिया। बाद में कहने लगे, ‘कहां जा रही हो, अभी तुम्हें जीना है, अपने पति के साथ रहना है। इसलिए वापस जाओ।’ पिताजी की बात सुनकर मैं हैरान हुई। तभी वहीं मेरा बेस्ट फ्रेंड भी पहुंच गया, जो कुछ साल पहले कैंसर से मर गया था। उसने भी कहा, ‘अन्नू प्लीज़ जाओ… अपना जीवन जीयो।’ लिहाज़ा, अपने शरीर में वापस लौटने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प ही नहीं था। मैं लौट आई। मैंने आंखे खोल दी, लेकिन लोग हैरान हुए, क्योंकि सब लोग मुझे कैंसर से मरा हुआ मान चुके थे…”

अनिता मूरजानी की कहानी पढ़कर आपको यही लगेगा कि अगर इंसान के अंदर जीने की इच्छाशक्ति है, तो कोई भी ताक़त उससे उसका जीवन नहीं छीन सकती। यहां तक कि मौत भी नहीं। दरअसल, मौत से मुलाक़ात करने का दावा करने वाली अनिता की कहानी बड़ी चमत्कारिक और दिलचस्प है। यमराज से सीधे साक्षात्कार करके लौटकर अपने अनुभव को अनिता ने क़िताब का रूप दिया है। जो ‘डाइंग टू बी मी’ शीर्षक से प्रकाशित हुई और दो हफ़्ते के अंदर ही न्यूयॉर्क टाइम्स की बेस्टसेलर क़िताबों की लिस्ट में शामिल हो गई।

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चार साल कैंसर से संघर्ष करने के बाद अनिता के अंग 2006 में बंद पड़ गए थे। वह कोमा चली गईं, जैसा कि अनिता दावा करती हैं, वह जीवन से बहुत दूर चली गई थीं, लेकिन लिंफोमा के अंतिम चरण से तीन दिन बाद अचानक उनके शरीर में हरकत हुई और उनका रिकवरी प्रॉसेस शुरू हो गया। महीने भर में चमत्कारिक ढंग से वह पूरी तरह कैंसर मुक्त घोषित कर दी गईं। अपने इस रोमांचक अनुभव को अनिता ने क़िताब के रूप में मौत के क़रीब पहुंचने के अपने निजी अनुभव को शेयर किया है।

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अनिता का जन्म सिंगापुर में हरगोबिंद शमदासानी और नीलू के घर हुआ। जन्म के बाद परिवार श्रीलंका चला गया और दो साल बाद हॉन्गकॉन्ग शिफ़्ट हो गया। हॉन्गकॉन्ग में ही अनिता और उनके बड़े भाई अनूप पले-बढ़े। स्कूलिंग के लिए दोनों का दाखिला ब्रिटिश स्कूल में कराया गया। अल्पसंख्यक होने के कारण उन्हें स्कूल में पक्षपात, उपेक्षा और प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता था। माता-पिता के भारतीय मूल के थे, इसलिए उनकी परवरिश विविध संस्कृति और बहुभाषाई माहौल में हुई। घर में लोग अंग्रेज़ी के अलावा भारतीय शैली की सिंधी और चाइनीज़ शैली की कैटोनीज़ भाषा बोलते थे। बहरहाल, डैनी मूरजानी से अनिता वहीं मिलीं। दोनों क़रीब आए और दिसंबर 1995 में परिणय-सूत्र में बंध गए।

अनिता हॉन्गकॉन्ग में रहकर काम में बिज़ी थीं कि 2002 में एक दिन उनकी गर्दन में गांठ दिखी। जांच करने के बाद पता चला कि वह लिंफोमा कैंसर है। आरंभ में अनिता ने परंपरागत औषधियां लेने से इनकार किया, क्योंकि मंहगी परंपरागत दवाइयों के सेवन के बावजूद उन्होंने अपने रिश्तेदारों और बेस्ट फ्रेंड समेत अपने कई क़रीबी लोगों को कैंसर से दम तोड़ते हुए देखा था। ऐसे में कई महीने अनिता ने कई वैकल्पिक दवाओं से उपचार का प्रयोग किया, लेकिन उसका कोई लाभ नहीं हुआ। लिहाज़ा, दूसरी दवाओं के साथ उन्होंने परंपरागत दवाओं को भी लेना शुरू किया, लेकिन तमाम उपचार के बावजूद डॉक्टरों ने अनिता और उनके परिजनों से कहा कि बहुत देर हो चुकी है। अब अनिता का जीवन नहीं बचाया जा सकता।

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लिंफोमा पूरे शरीर में फैल चुका था और वह टर्मिनल स्टेज में आ गईं। गले और सीने के बीच नींबू के आकार की गांठे (ट्यूमर्स) बन गई थी। उनका शरीर भोजन या दवा स्वीकार ही नहीं कर रहा है। उनके फेफड़े में पानी भर गया था, उसे बराबर बाहर निकालने की ज़रूरत थी। उन्हें ऑक्सीजन की पाइप लगाई गई थी। बाद में निराश होकर डॉक्टरों ने उनके पति को उन्हें घर ले जाने की सलाह दी, क्योंकि उनके शरीर पर दवाओं का असर होना बंद हो गया था। दो फरवरी 2006 को अनिता गहन कोमा में चली गईं। फौरन उन्हें अस्पताल ले जाया गया। हालांकि डॉक्टर ने उनके पति से कहा, “आख़िरी वक़्त है। इनके एक-एक करके अंग निष्क्रिय होते जा रहे हैं। आप किसी अप्रिय ख़बर के लिए तैयार रहिए, क्योंकि इसके दिल की धड़कन कभी भी थम सकती है।”

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अनिता अपने जीवन के अंतिम घंटे में पहुंच गईं थी। चूंकि उनकी बायोलॉजिकल डेथ नहीं हुई थी, इसलिए उन्हें उसी अवस्था में रखा गया। रोज़ डॉक्टर चेक करते रहे और बताते रहे कि अभी बायोलॉजिकल डेथ नहीं हुई है। तीन दिन बाद अचानक चमत्कार हुआ। अनिता अचानक कोमा से बाहर आ गईं और आसपास देखने लगीं। उन्हें होश आ गया था। वह बेहतर भी दिख रही थीं यानी कैंसर का असर कम हो रहा था।

पति और अन्य परिजनों से मौत से अपनी मुलाक़ात की चर्चा करते हुए अनिता ने कहा, “मैं बेहोश थी, लेकिन बेहोशी में मुझे महसूस हो रहा था मैं किसी दूसरी दुनिया में दूर जा रही हूं। मेरे अंदर पूर्ण चेतना थी। मुझे लग रहा था, मैं अपने शरीर महज 35-40 फीट दूर हूं। मैं अपने शरीर के पास अपने पति और डॉक्टर को आपस में बातचीत करते देख रही थी। मैं उनकी आवाज़ भी सुन रही थी। मैं एक ऐसी अनोखी दुनिया में पहुंच गई थी, जहां मैं प्यार से लबालब थी। इतना प्यार कभी महसूस नहीं किया था। मैंने वहां से मानव की अपार शक्ति को देखी और महसूस किया कि मैं भी बहुत ज़्यादा ताक़तवर हूं। मैं कैंसर से भी ज़्यादा ताकतवर हूं। जी हां, उस समय मेरे पास दो विकल्प थे- मैं चाहूं तो ज़िंदगी को पूरे आनंद के साथ जी सकती हूं या फिर मौत का आलिंगन कर सकती हूं। मैं भलीभांति समझ रही थी कि अगर मैंने जीवन का चयन किया, तब मेरा शरीर फौरन कैंसर से मुक्त हो जाएगा और मैं स्वस्थ हो जाऊंगी और अगर मैंने मौत का चुनाव किया, तब मैं ठीक नहीं हो पाऊंगी। मैं मर जाऊंगी और मेरा शरीर नष्ट कर दिया जाएगा।”

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अनिता ने बताया कि उनके स्वर्गीय पिता और स्वर्गीय दोस्त ने उनका स्वागत किया और कहा कि अभी उनके मरने का वक़्त नहीं आया है। उन 36 घंटे के दौरान अनिता ने बहुत अद्भुत महसूस किया। मौत के क़रीब जाने का उनका यह विलक्षण अनुभव था। उन्होंने अपने को अपने शरीर से बाहर पाया और उस समय वह अपने आसपास की चीज़ों को महसूस कर रही थीं। बहरहाल, वह पिता और बेस्ट फ्रेंड की सलाह पर अंततः वह वापस लौट आईं। वे लोग उनसे कह रहे थे कि वह अपने शरीर में वापस जाएं और निडर होकर अपनी ज़िंदगी के बाक़ी समय गुज़ारें।

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कोमा से बाहर आते ही अनिता की सेहत तेज़ी से सुधरने लगी। उन्होंने कीमोथेरपी करवाया, जिसे कराने से पहले वह इनकार कर चुकी थीं। अनिता का कहना है कि उनकी सेहत में सुधार कीमोथेरेपी से पहले ही शुरू हो गया था। उनके ट्यूमर्स चार दिन में क़रीब 70 फ़ीसदी तक सिकुड़ गए और पांचवें दिन उन्हें कैंसर मुक्त घोषित कर दिया गया और वह अस्पताल से डिस्चार्ज कर दी गईं। हालांकि ताक़त वापस पाने और टिश्यूज़ और शरीर के अंग को दुरुस्त करने के लिए उन्हें कई महीने फिज़ियोथेरेपी करवानी पड़ी।

पूरी तरह ठीक होने के बाद अनिता ने अपने चमत्कारिक अनुभव और मौत से मुलाक़ात को इंटरनेट पर शेयर करना शुरू किया। उस पर ‘नियर डेथ एक्सपीरिएंस रिसर्च फाउंडेशन’ के संचालक कैंसर एक्सपर्ट डॉ. जाफरी लॉन्ग और उनकी पत्नी जोडी लॉन्ग की नज़र गई। उन्होंने अनिता से संपर्क किया और इस दुर्लभ अनुभव को क़िताब का रूप देने के लिए एनडीईआरएफ की वेबसाइट के लिए भेजने को कहा। लॉन्ग दंपति ने अनिता के दावे की गहन जांच की तो वह सच निकली। लिहाज़ा, उनकी कहानी वायरल हो गई और पूरी दुनिया में पढ़ी गई। करोड़ों लोगों ने एनडीईआरएफ की वेबसाइट के ज़रिए उन्हें सवाल भेजे। वह अचानक चर्चित हो गईं।

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अनिता की ख़बर यूनिवर्सिटी ऑफ़ हांगकांग पहुंची। यूनिवर्सिटी ने उन्हें कैंसर पर लेक्चर के लिए बुलाया। वह छात्रों को रोमांचक अनुभव बताने लगीं। उन्होंने अपनी वेबसाइट बनाई। उनकी चमत्कारिक कहानी जानने-सुनने के लिए रोज़ाना हज़ारों लोग वेबसाइट को विज़िट करने लगे। उनकी कहानी मशहूर अमेरिकी लेखक डॉ. वायने डायर के संज्ञान में आई। डायर ने प्रकाशक ‘हे हाउस’ को अनिता से संपर्क करने और उनकी क़िताब प्रकाशित करने को कहा। अंततः ‘डाइंग टू बी मी’ मार्च 2012 में प्रकाशित हुई और दो हफ़्ते में ही न्यूयॉर्क टाइम्स की बेस्टसेलर की लिस्ट में आ गई। सीएनएन, बीबीसी और फॉक्स समेत दुनियाभर के टीवी चैनल्स पर उनके इंटरव्यू आने लगे। अपने प्रकाशक के आग्रह पर अनिता दुनिया के कोने-कोने में घूमकर मौत से अपने साक्षात्कर को शेयर करने लगी।

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अपने अनुभव को शेयर करते हुए अनिता ने कहती हैं, “कैंसर उनकी भावनात्मक अवस्था के कारण बढ़ रहा था। दरअसल, इंसान की भावनात्मक अवस्था का पूरा असर उसकी सेहत पर पड़ता है। यानी आदमी का शरीर भावनाओं से मज़बूती से जुड़ा रहता है। इसीलिए, अगर आदमी एक बार दृढ़ प्रतिज्ञा कर ले कि उसे नहीं मरना है तो कोई भी बीमारी यहां तक कि कैंसर भी उसे नहीं मार सकती।

अनिता के दावे पर लोग संदेह करने लगे। द हेराल्ड स्कॉटलैंड के विकी एलन ने कहा, “ये लोग बीमारी, ख़ासकर, कैंसर के केंद्र में बीमार दिमाग़ के साथ रहते हैं। इसलिए उन्हें लगता है कि बीमारी दिमाग़ और सकारात्मक सोच के साथ कैंसर को ठीक किया जा सकता है। इस तरह की विचारधारा को चिकित्सकीय संस्थानों में ख़तरनाक माना जाता है।” ‘अ क्रिटिक ऑफ पॉज़िटिव थिंकिंग इन कैंसर केयर’ के लेखक और शेफींल्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. पीटर ऑलमार्क तो अनिता के दावे को नीम-हकीमी करार देते हुए सिरे से ख़ारिज़ करते हैं।

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हालांकि अपनी क़िताब में अनिता ख़ुद कहती हैं कि यह सकारात्मक सोच की तरह आसान नहीं है। मेरा मौत के क़रीब जाना, उससे साक्षात्कार करना और कैंसर के लाइलाज स्टेज से ठीक हो जाना, इस बात का जीता जगता प्रमाण है कि हर इंसान के अंदर एक इनर पावर यानी अज्ञात शक्ति और विज़डम होता है, जो किसी भी परिस्थिति, चाहे वह मौत ही क्यों न हो, से वापस आने में सक्षम होता है। अगर आप अपने अंदर की अज्ञात शक्ति को पहचान गए तो कोई बीमारी आपको मार नहीं सकती। बस आपको निर्भय होकर उस पर भरोसा करना होगा। जैसा कि अनिता कहती है, आप अपने को ऊर्जावान महसूस करेंगे, मन पर समय का नियंत्रण ख़त्म हो जाएगा।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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