कैंसर को हराना मुमकिन है – युवराज सिंह

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कैंसर सरवाइवर – तीन

कल्पना कीजिए, आप करियर के पीक पर हों तभी किसी दिन यह फ़रमान आ जाए कि आपको पैकअप करना है, करियर से ही नहीं, बल्कि दुनिया से भी, तो कैसा लगेगा? ज़ाहिर सी बात है, पल भर में आप कोलैप्स्ड हो जाएगे। सब कुछ धराशाई हो जाएगा। आपका विलपावर जबाव दे जाएगा। तमाम सपने रेत के महल की तरह भरभरा कर गिर जाएंगे, क्योंकि आमतौर पर इंसान यह सोचता ही नहीं कि एक दिन इस दुनिया से उसे जाना भी है। इसलिए, अचानक मौत की बात या उसका आभास आदमी को तोड़ देती है। इसी तरह विचलित भारतीय क्रिकेटर युवराज सिंह भी हुए थे, जब लंदन के ऑनकोलॉजिस्ट डॉ. पीटर हारपर ने बताया कि उन्हें कैंसर है। दो दिन युवराज सदमे में ही रहे। बाद में हिम्मत जुटाई और कैंसर से लड़ने का संकल्प लिया।

युवराज सिंह ने ख़ुद अपनी कहानी ‘द टेस्ट ऑफ माइ लाइफ़’ नाम की किताब में क़लमबद्ध की है। उनके शब्दों में “मैं सदमे में था, समझ में ही नहीं आ रहा था, क्या करूं। मैं बार-बार भगवान से सवाल पूछ रहा था, क्यूं भगवान क्यूं? क्यूं मैं ही भगवान? दरअसल, जब आप बीमार होते हैं और आपको पता चलता है, आपको कैंसर है, लाइलाज़ कैंसर। तब पहले तो यक़ीन ही नहीं होता, लेकिन चंद पलों में लगने लगता है, सब कुछ ख़तम होने वाला है। आप पूरी तरह निराश होने लगते हैं, टूटकर बिखरने लगते हैं। ढेर सारे सवाल किसी भयावह सपने की तरह बार-बार परेशान करते हैं। यही मेरे साथ भी हुआ था। जब पता चला कि क्रिकेट ही नहीं, मेरा तो इस दुनिया से ही पैकअप होने वाला है।”

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विश्वकप 2011 के दौरान मैदान पर युवराज कभी-कभार हैमस्ट्रिंग के कारण मैदान से बाहर जाते थे, तो लगता था, वह थोड़े अस्वस्थ्य ज़रूर हैं, लेकिन उनकी तबीयत इतनी ख़राब है, उनके शरीर में कैंसरस सेल्स बन रही हैं, यह किसी को पता नहीं था। बहरहाल, आईपीएल 2011 के बाद दिल्ली में युवराज का मेडिकल टेस्ट हुआ तो पता चला चंद संदेहास्पद सेल्स उनके बाएं लंग के हार्ट से सटे हिस्से में बन रही हैं जो ट्यूमर की शक्ल ले रही हैं। दरअसल, इस संदिग्ध ट्यूमर के डिटेक्ट होने पर युवराज ज़्यादा परेशान नहीं हुए क्योंकि यह साफ़ नहीं था कि सेल्स कितनी हानिकारक हैं। लिहाज़ा, उन्हें लगा, छोटी-मोटी बीमारी है जो अच्छे इलाज से दूर हो जाएगी। वह खेलते रहे। विश्वकप में शानदार प्रदर्शन के दौरान उनको थोड़ी असहजता ज़रूर फ़ील होती थी, मगर उनको पता नहीं था कि उनके शरीर में क्या हो रहा है। इस बीच, वह टीम इंडिया के साथ इंग्लैंड टूर पर चले गए।

बहरहाल, टेंटब्रिज में दूसरे टेस्ट में उनकी एक उंगली फ्रैक्चर्ड हो गई और उन्हें भारत वापस आना पड़ा। यह ब्रेक युवराज के लिए वरदान साबित हुआ, क्योंकि इसी बहाने उनका दोबारा मेडिकल चेकअप हुआ। जिसमें पता चला कि डिटेक्टेड ट्यूमर बड़ा हो रहा है। कई डॉक्टर्स ने उसे कैंसरस सेल करार दिया तो कई ने कहा कि वह कैंसर नहीं है। बहरहाल, इस ख़ुलासे से मां शबनम और पिता योगराज सिंह बेहद चिंतित हुए। लिहाज़ा, दिल्ली के ऑनकोलॉजिस्ट डॉ. नीतेश रोहतगी की सलाह पर युवराज को लेकर लंदन चले गए। मशहूर कैंसर विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. पीटर हारपर ने ढेर सारे टेस्ट किए और संदेहास्पद सेल को जर्म-सेल ट्यूमर क़रार देते हुए पुष्टि कर दी कि आइडेटिफ़ाइड ऑब्जेक्ट कैंसरस ट्यूमर है जिसे ‘मीडियास्टाइनल सेमिनोमा’ कहा जाता है।

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डॉ. हारपर के निष्कर्ष से युवराज ही नहीं उनका पूरा परिवार सन्नाटे में आ गया। किसी ने सोचा भी नहीं था कि अभी विश्वकप में एक से एक धुरंधर गेंदबाजों के दांत खट्टे करके मैन ऑफ़ द सीरीज़ बनने वाला बहादुर बल्लेबाज ख़ुद कैंसर की गिरफ़्त में है। बहरहाल, अंग्रेज़ कैंसर चिकित्सक ने यह भी बताया कि कैंसरस ट्यूमर फिलहाल सर्जरी से नहीं निकाला जा सकता, उसे केवल कीमोथेरेपी से ही नष्ट किया जा सकता है क्योंकि कैंसरस सेल का ओरिजिन हार्ट में है।

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लिहाज़ा, डॉ. हारपर की सलाह पर युवराज मम्मी-पापा के साथ लंदन से सीधे अमेरिकी शहर इंडियानापोलिस चले गए और इंडियाना यूनिवर्सिटी ऐंड मेल्विन ऐंड ब्रेन सिमोन कैंसर सेंटर में एडमिट कराए गए। इलाज़ कर रहे थे नामचीन चिकित्सक डॉ. लॉरेंस ईनहोर्न। वहां युवराज का दोबारा चेकअप हुआ और संदेहास्पद सेल जर्म-सेल ट्यूमर के ‘मीडियास्टाइनल सेमिनोमा’ होने की पुष्टि कर दी गई। हालांकि बताया गया कि उसमें कैंसर का अंश एक फ़ीसदी ही है। बहरहाल, इलाज़ के लिए युवराज को फरवरी-मार्च 2012 के दौरान कीमोथेरेपी के कम से कम तीन साइकिल से गुज़रना पड़ा।

युवराज सिंह के मुताबिक कीमोथेरेपी बेहद कष्टकर प्रक्रिया होती है, यह इंसान को तोड़ देती है, निराश कर देती है। इस दौरान मन करता है कि आपका सबसे क़रीबी आपके पास आपके सिरहाने बैठा रहे। कीमो का असर पूरे शरीर पर होता है, सबसे पहले बाल गिर जाते हैं। मुंह का स्वाद ख़राब हो जाता, मितली जैसी लगती है। ऊपर से बेहद कमज़ोरी भी फ़ील होती है। युवराज मितली के कारण दिन में केवल एक बार दाल-चावल और दही लेते थे। युवराज के शब्दों में, “कीमोथेरेपी से इतना तंग आ चुका था, कि अगर चौथी बार कीमोथेरेपी कराने का कहा जाता तो मैं अस्पताल से ही भाग खड़ा होता। बहरहाल, दिल में तसल्ली थी कि सब कुछ ठीक रहा तो तीसरे कीमो के बाद अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी। यानी मैं कैंसर से मुक्त होकर दुनिया के सामने आने वाला था। इस बात का संतोष था मुझे और व्यग्रता भी थी।”

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इस दौरान युवराज का सिर पर बिना बाल वाला फोटोग्राफ रिलीज़ हुआ। इलाज़ के दौरान ही एक दिन इंडियानापुलिस में कैंसर को पराजित करने वाले दुनिया के मशहूर साइक्लिस्ट लैंस आर्ग्मस्ट्रॉंग का उपहार आया। उन्होनें एक मेमोपैड भेजा जिसमें रिकॉर्डेड संदेश था कि किस तरह उन्होंने 1996 में जानलेवा कैंसर को हरा दिया था। आग्मस्ट्रॉंग युवी के हीरो रहे हैं, उनकी ओर से आया उपहार भारतीय क्रिकेटर के लिए सोर्स ऑफ़ एनर्जी था। इसके अलावा युवराज के पास पूरी दुनिया से मित्रों और शुभचिंतकों के संदेश आ रहे थे, इससे कैंसर से उनकी लड़ाई आसान हो गई।

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बहरहाल, एक दिन युवराज को डॉक्टर का संदेश मिला, “तुम्हारा कीमोथेरेपी पूरा हो गया, अब तुम कैंसर से पूरी तरह मुक्त हो।” यह ख़बर सुनते ही अब तक पत्थर की मूरत की तरह चुप रहने वाली उनकी मां सचमुच फूट पड़ी, हालांकि उनके आंसू ख़ुशी के थे, शायद वह जी भर कर रो लेना चाहती थी, क़रीब तीन महीने से जमा दर्द को आंसुओं से बहा देना चाहती थीं। तीन महीने का वक़्त बहुत त्रासदपूर्ण था जिसे उन्होंने बेटे के साथ जिया था। इसीलिए, उस दिन युवी ने उन्हें नहीं रोका। वह जानते थे, मां का कर्तव्य निभाते हुए उनकी मां हमेशा उनके सामने मुस्कराती ही रहीं हालांकि उनका दिल रो रहा था। बहरहाल, कीमो के दौरान युवराज बेहद कमज़ोर हो गए थे लिहाज़ा, अस्पताल से वापस आकर ख़ूब आराम करने लगे और डॉक्टर के बताए निर्देश के मुताबिक व्यायाम करते रहे। धीरे-धीरे रिकवरी हो रही थी। उनके बाल दोबारा उगने लगे थे। अप्रैल में वह स्वदेश वापस लौट आए। डॉक्टर्स की नियमित देखरेख में युवराज की सेहत में चमत्कारिक ढंग से सुधार हुआ। आराम के इन पलों में युवराज ने ‘द टेस्ट ऑफ माइ लाइफ़’ नामक की किताब लिख डाली।

युवराज ने अपने अनुभवों को विस्तार से लिखा है। दिल्ली आने का बाद उनकी मुलाकात इंडियन कैंसर सोसाइटी के एक पदाधिकारी से हुई। उन्होंने युवराज के संघर्ष की सराहना की। उन्होंने कहा, “आप जाने अनजाने कैंसर से बचने वाले लोगों के लिए एंबेसडर बन गए हैं। इस देश में कैंसर के पचास लाख मरीज़ हैं।” युवराज ने लिखा, “कालजयी अदाकार नरगिस के कैंसर से बीमार होने के बाद देश में संभवतः मैं पहला सेलिब्रेटी था, जिस पर कैंसर ने धावा बोला। बहरहाल, कैंसर के साथ जीने और इसके बारे में बात करने, इसे अपनाने, इसकी वजह से बाल चले जाने और इससे लड़ने से मुझे डर नहीं लगता है।” युवराज ने लिखा है, “जिस तरह सुख दूसरों से बांटते हैं, उसी तरह हमें अपना दुख भी शेयर चाहिए ताकि जो लोग दुख झेल रहे हैं, उनको लगे कि लड़ाई में वे अकेले नहीं हैं।”

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बहरहाल, किताब पूरी होते-होते युवराज पूरी तरह फ़िट हो गए और क्रिकेट की प्रैक्टिस करने के योग्य घोषित कर दिए गए। यह उनके लिए दूसरे जन्म की तरह था। बहरहाल, नेट प्रैक्टिस में बहुत जल्द युवी ने अपनी पुरानी लय हासिल कर ली। 11 सितंबर 2012 को न्यूजीलैंड के ख़िलाफ़ चेन्नई टी-20 मैच में युवराज की भावनात्मक वापसी हुई। जब युवराज बाक़ी खिलाड़ियों के साथ मैदान में उतरे तो दर्शकों ने खड़े होकर अपने हीरो का स्वागत किया। फ़ील्डिंग के दौरान उन्हें दो ओवर गेंदबाजी मिली और 14 रन दिए। शॉर्ट फ़ॉर्मेट के खेल में यह बहुत बुरी गेंदबाजी नहीं थी। बल्लेबाजी में युवराज 86 रन पर सुरेश रैना के आउट होने के बाद मैदान में उतरे। भारत को जीत के लिए 82 रनों की दरकार थी।

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युवराज जल्दी ही लय में आ गए। ऐसा लगा वह हमेशा की तरह मैच जीताकर लौटेंगे। तभी 26 गेंद पर एक चौके और दो छक्के की मदद से 34 रन बनाने के बाद जे फ्रैंकलिन की गेंद पर प्लेड ऑन हो गए और भारत यह रोमांचक मैच केवल एक रन से हार गया। युवराज ने कहा, “अगर जीतते तो और अच्छा लगता लेकिन देश की ओर से दोबारा खेलना मेरे लिए बड़ा भावुक क्षण रहा।” इसके बाद युवराज ने श्रीलंका में टी-20 वर्ल्ड कप में हिस्सा लिया और नियमित रूप से भारतीय टीम में खेलने लगे।

अब युवराज कहते हैं, मैं एकदम फ़िट हूं। न तो शरीर में कोई परेशानी है न ही दिमाग़ में कोई तनाव। मैं ख़ुश हूं, बस विश्वकप क्रिकेट में देश के लिए खेलने का मौक़ा नहीं मिल पाया, इससे थोड़ी सी निराशा थी, मगर कोई बात नहीं, फिलहाल मैं क्रिकेट इंज्वाय कर रहा हूं। युवराज भारत के सर्वश्रेष्ठ फिनिशर में से एक रहे हैं। तभी तो पूर्व भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी कहते हैं कि कैंसर से लड़ाई जीतकर शानदार वापसी करने वाले युवराज अपनी फिटनेस के श्रेष्ठ जज हैं। 2016 में उन्होंने मंगेतर हेज़ल कीच शादी कर ली। 10 जून 2019 को युवरात सिंह ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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