जब अनाथाश्रम में नवजात मीना कुमारी को चीटियां काट रही थीं

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ट्रैजेडी क्वीन के जन्मदिन पर विशेष

लाजवाब और अपने जीवंत अभिनय के लिए चार बार फिल्मफेयर पुरस्कार पाने वाली समर्थ अभिनेत्री मीना कुमारी का जीवन बचपन से जवानी तक संघर्ष भरा था। इसीलिए उनको दुखांत फ़िल्मों में यादगार किरदार निभाने के लिए याद किया जाता है। भारतीय सिनेमा का ट्रैजेडी क्वीन मीना कुमारी उम्दा शायर और सिंगर भी थीं। मीना पर किताब लिखने वाले विनोद मेहता के अनुसार, “एक फिल्मकार ने बताया था कि दिलीप कुमार जैसे अभिनेता को भी मीना कुमारी के सामने अभिनय करने में मुश्किल होती थी। मधुबाला ने कहा था कि उनकी जैसी आवाज़ दूसरी अभिनेत्री के पास नहीं है। राज कपूर तो उनके आगे अपने डायलॉग ही भूल जाते थे। सबसे बड़ी बात मीना डायलॉग याद नहीं करती थीं। लंबे-लंबे डायलॉग भी उन्हें सुनने से याद हो जाते थे। सत्यजीत रे ने एक बार मीना के बारे में कहा था कि निश्चित रूप से वह बहुत ऊंची योग्यता वाली समर्थ अभिनेत्री हैं।”

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बंबई में पहली अगस्त 1933 को पैदा हुई मीना कुमारी का असली नाम महजबीं बानो था। पिता अली बक्श पारसी रंगमंच के बड़े कलाकार थे और फ़िल्म ‘शाही लुटेरे’ में संगीत भी दिया था। माता प्रभावती देवी हिंदू थीं पर शादी के बाद इक़बाल बानो बन गईं। वह भी मशहूर नृत्यांगना-अदाकारा थीं। मीना की दोनों बहने ख़ुर्शीद (बड़ी) और बेबी माधुरी (छोटी) भी अभिनेत्री थीं। उनकी नानी हेमसुंदरी मुखर्जी भी पारसी रंगमंच से जुड़ी थीं। बंगाल के रवींद्रनाथ टैगोर परिवार के जदुनंदन टैगोर ने परिवार की मर्जी के विरूद्ध हेमसुंदरी से विवाह कर लिया। 1862 में जदुनंदन की मौत के बाद हेमसुंदरी बंगाल से मेरठ आ गईं और नर्स की नौकरी करते हुए उर्दू पत्रकार प्यारेलाल शंकर मेरठी से शादी कर लिया और ईसाई धर्म अपना लिया। हेमसुंदरी को प्रभावती समेत दो पुत्रियां हुईं।

कहा जाता है कि ग़रीबी के कारण मीना के पैदा होने पर पिता अली बक़्श घर लाने की बजाय उन्हें ऑर्फनेज में छोड़ दिया। जब वापस आने लगे तो नवजात शिशु के रोने की आवाज सुनाई दी। वह वापस आए तो देखा कि नन्ही मीना को चीटियां काट रहीं थीं। उन्होंने झट से बच्ची को साफ़ किया और सीने से लगा लिया। बहरहाल महजबीन पहली बार 1939 में निर्देशक विजय भट्ट की फिल्म ‘लैदरफेस’ में बाल कलाकार के रूप में नज़र आईं। 1940 की ‘एक ही भूल’ में उनका नाम बेबी महजबीं से बदलकर बेबी मीना कर दिया गया। 1946 में ‘बच्चों का खेल’ से बेबी मीना 13 वर्ष की आयु में मीना कुमारी बन गईं। इसी दौरान मार्च 1947 में लंबी बीमारी के बाद मां की मौत हो गई। उनकी शुरुआती फिल्में पौराणिक कथाओं पर आधारित थीं, जिनमें ‘हनुमान पाताल विजय’, ‘वीर घटोत्कच’ और ‘श्रीगणेश महिमा’ प्रमुख हैं। उन्हें पहचान में सुपरहिट फिल्म ‘बैजू बावरा’ से, जो 1952 में रिलीज़ हुई। इस फिल्म से मीना के अभिनय करियर में नए पंख लग गए। गौरी के किरदार ने तो मीना घर-घर पहुंच गईं। फिल्म 100 हफ्तों तक परदे पर रही और 1954 में उन्हें बेस्ट एक्ट्रेस का पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिला।

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1953 आते-आते मीना कुमारी की ‘दायरा’, ‘दो बीघा ज़मीन’ और ‘परिणीता’ जैसी हिट फिल्में प्रदर्शित हो चुकी थीं। परिणीता से मीना कुमारी ने अभिनय के एक नए युग की शुरुआत की। उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को ख़ासा प्रभावित किया। फिल्म में भारतीय नारी की आम ज़िंदगी की कठिनाइयों का चित्रण हुआ था। उनके अभिनय की ख़ास शैली और मोहक आवाज़ का जादू दर्शकों ही नहीं फिल्म समीक्षकों पर भी छाने लगा और लगातार दूसरी बार उन्हें बेस्ट एक्ट्रेस का पुरस्कार मिला। 1954 से 1956 के दौरान मीना कुमारी ने कई तरह के किरदार निभाया। जहां चांदनी चौक (1954) और एक ही रास्ता (1956) जैसी फिल्में समाज की कुरीतियों पर प्रहार करती थीं। वहीं अद्ल-ए-जहांगीर (1955) और हलाकू (1956) जैसी फिल्में ऐतिहासिक कथाओं पर आधारित थीं। आज़ाद मीना की दिलीप कुमार के साथ दूसरी फिल्म थी। ट्रेजेडी किंग और ट्रेजेडी क्वीन के नाम से प्रसिद्ध दिलीप-मीना के हास्य प्रधान फ़िल्म ने दर्शकों की खूब वाहवाही लूटी। इसके गाने अपलम चपलम और ना बोले ना बोले आज भी चाव से सुने जाते हैं।

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1957 में मीना कुमारी दो फिल्मों में रूपहले परदे पर नज़र आईं। ‘मिस मैरी’ में मीना ने तमिल अभिनेता जेमिनी गणेशन और किशोर कुमार के साथ काम किया, जबकि राज कपूर के साथ ‘शारदा’ ने उन्हें भारतीय सिनेमा का ट्रेजेडी क्वीन बना दिया। मज़ेदार बात थी कि सभी अभिनेत्रियों ने उस किरदार को निभाने से मना कर दिया था। लेकिन मीना ने चुनौती स्वीकार किया। 1958 में लेखराज भाखरी निर्देशित ‘सहारा’ और बिमल रॉय निर्देशित ‘यहूदी’ में मीना ने यादगार किरदार निभाया। यहूदी रोमन साम्राज्य में यहूदियों के उत्पीड़न के बारे में, पारसी-उर्दू रंगमंच में क्लासिक, आगा हाशर कश्मीरी कृत यहूदी लड़की की कहानी पर आधारित थी। फ़िल्म में मुकेश का गाया ये मेरा दीवानापन है गाना सुपरहिट रहा। इसी तरह ‘फरिश्ता’ और ‘सवेरा’ में मीना कुमारी अशोक कुमार के साथ थीं।

1959 में रिलीज देवेंद्र गोयल की ‘चिराग कहां रोशनी कहां’ में मीना कुमारी राजेंद्र कुमार के साथ दिखीं। ख्वाजा अहमद निर्देशित ‘चार दिल चार राहें’ में वह, राज कपूर, शम्मी कपूर और कुमकुम के साथ थीं। इसी साल ‘शरारात’ में किशोर कुमार, राज कुमार और कुमकुम के साथ काम किया। किशोर का यादगार गीत हम मतवाले नौजवान आज भी याद किया जाता है। 1960 में रिलीज ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ में मीना कुमारी ने नर्स का किरदार निभाया। यह मीना के करियर के चर्चित पात्रों में है। फिल्म का गाना अजीब दास्तान है ये बेहद चर्चित हुआ। इसे शंकर जयकिशन की धुन पर लता मंगेशकर ने गया है। 1961 के फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स में सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक की कैटेगरी में नौशाद के ‘मुग़ल-ए-आज़म’ को हराकर जीता। इसी तरह इस साल ‘बहाना’ और ‘कोहिनूर’ भी हिट रहीं।

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1961 में प्रदर्शित ‘भाभी की चूड़ियां’ पारिवारिक फिल्म थी। इसमें मीना कुमारी और बलराज साहनी हैं। यह मीना की यादगार फिल्म है। लता का गाया ज्योति कलश छलके गाना सुपरहिट रहा। यह फिल्म उस साल बॉक्स ऑफिस पर सबसे अधिक कमाई वाली फिल्म थी। उसी साल राजेंद्र कुमार के साथ उनकी फिल्म ‘ज़िंदगी और ख्वाब’ भी सफल रही। 1962 में रिलीज गुरु दत्त की बिमल मित्र के बंगाली उपन्यास पर आधारित ‘साहिब बीबी और गुलाम’ ने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिया। इसमें मीना के साथ गुरु दत्त और वहीदा रहमान भी थीं। गीता दत्त के गाए दो गाने ना जाओ सइयां छुड़ा के बइयां और पिया ऐसो जिया को आम लोग गुनगुनाने लगे थे। संगीत हेमंत कुमार मुखर्जी और गीत शकील बदायूंनी के थे। फिल्म को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री अवार्ड समेत चार फिल्म फेयर पुरस्कार मिले। इसे 13वें बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन बियर के लिए नामित किया गया, जहां मीना कुमारी प्रतिनिधि चुनी गईं थी। फिल्म ऑस्कर में भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में भी चुनी गई। इसी साल फणी मजूमदार निर्देशित ‘आरती’ में मीना कुमारी अशोक कुमार और प्रदीप कुमार के साथ और ए भीमसिंह निर्देशित ‘मैं चुप रहुंगी’ में  सुनील दत्त के साथ थीं।

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1963 में आई ‘दिल एक मंदिर’ और ‘किनारे किनारे’ में मीना के साथ देव आनंद थे। अगले साल रिलीज हृषिकेश मुखर्जी की ‘सांझ और सवेरा’ में मीना कुमारी ने गुरुदत्त के साथ अभिनय किया। यह गुरु दत्त की अंतिम फ़िल्म साबित हुई। उसी साल रिलीज मीना कुमारी की ‘बेनज़ीर’ और ‘चित्रलेखा’ हिट रहीं। चित्रलेखा का गाना मन रे तू कहे जन-जन तक चर्चित हुआ। उसी साल की उकी ‘गजल’ और ‘मैं भी लड़की हूं’ जैसी चर्चित फिल्में भी रहीं। 1965 में रिलीज ‘काजल’ में मीना ने बेमिसाल अभिनय किया, जिसके बाद उन्हें चौथी बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। फिल्म गुलशन नंदा के उपन्यास ‘माधवी’ पर आधारित थी। उस साल अशोक कुमार और प्रदीप कुमार के साथ उनकी फिल्म ‘भीगी रात’ सुपरहिट रही। इसी साल नरेंद्र सूरी निर्देशित ‘पूर्णिमा’ में मीना कुमारी और धर्मेंद्र थे। फिल्म का गाना तुम्हें ज़िंदगी के उजाले मुबारक अंधेरे हमें आज रास आ गए हैं, आज भी दिलजले सुनते हैं।

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1966 में प्रदर्शित ओपी रल्हन निर्देशित ‘फूल और पत्थर’ में मीना कुमारी और धर्मेंद्र ने यादगार अभिनय किया। फिल्म ने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। उसी साल ‘पिंजरे की पंछी’ में भी मीना अहम रोल में थीं। अगले साल आई हृषिकेश मुखर्जी की ‘मझली दीदी’ में मीना के साथ धर्मेंद्र थे। ‘बहू बेगम’, ‘नूरजहां’ और ‘चंदन का पलना’ में भी मीना ने बेमिसाल अभिनय किया। 1968 में सस्पेंस थ्रिलर ‘बहारों की मंज़िल’ मीना-धर्मेंद्र जोड़ी की सुपरहिट फिल्म रही। उसी साल अमित बोस की ‘अभिलाषा’ में भी मीना ने संजय खान और नंदा के साथ यादगार अभिनय किया। 1970 के दशक में मीना ने एक्टिंग और कैरेक्टर ओरिएंटेड भूमिकाओं पर ज़्यादा फोकस किया। यह उनकी अंतिम छह फिल्मों में साफ़ नज़र आता है। ‘जबाव’, ‘सात फेरे’, ‘मेरे अपने’, ‘दुश्मन’, ‘पाकीज़ा’ और ‘गोमती के किनारे’ में से केवल पाकीज़ा में उन्होंने मुख्य किरदार निभाया। मेरे अपने और गोमती के किनारे में तो यादगार रोल में दिखीं। जवाब में जीतेंद्र, लीना चंदावरकर और अशोक कुमार, तो सात फेरे में प्रदीप कुमार और मुकरी के साथ थीं। 1971 में निर्देशक-लेखक गुलज़ार की ‘मेरे अपने’ में मीना विनोद खन्ना और शत्रुघ्न के साथ थीं, जबकि ’दुश्मन’ में उनके साथ मुमताज और राजेश खन्ना थे। यह फिल्म सुपरहिट रही। अगले साल सावन कुमार टाक की ‘गोमती के किनारे’ में उन्होंने संजय खान और मुमताज़ के साथ अभिनय किया। यह फ़िल्म मीना कुमारी की मृत्यु के बाद रिलीज़ हुई थी। अपने क़रीब 33 साल के करियर में उन्होंने 90 से ज्यादा फिल्मों में काम किया।

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मीना कुमारी की कमाल अमरोही से मुलाकात 1951 में तमाशा के सेट पर हुई। अमरोही के बारे में उन्होंने एक बार अंग्रेजी मैगजीन पढ़ा था। ‘महल’ जैसी सुपरहिट फिल्म बनाने वाले अमरोही तब हिंदी सिनेमा के जाने-माने राइटर-डायरेक्टर थे। मीना उनके व्यक्तित्व, पढ़ाई-लिखाई और सोच से प्रभावित थी। अमरोही ने भी मीना के बारे में सुना था। वह अपनी प्रस्तावित फिल्म ‘अनारकली’ की नायिका तलाश रहे थे। मीना अभिनय के लिए तैयार हो गईं। शूटिंग शुरू होने से पहले महाबलेश्वरम के पास सड़क हादसे में उनकीछोटी अंगुली सदा के लिए मुड़ गई। वह दो महीने अस्पताल में रहीं। अमरोही हालचाल पूछने रोज़ पहुंचते थे। दोनों के बीच पहले आकर्षण हुआ। एक-दूसरे को ख़त लिखने लगे। पूरी-पूरी रात फोन पर बातें करने लगे। लेकिन मीना उनसे शादी नहीं कर सकती थीं, क्योंकि उम्र में दोगुने अमरोही शादीशुदा और दो बच्चों के बाप थे। उनकी दो-दो शादियां हो चुकी थीं। इसके बावजूद उन्होंने गुपचुप शादी करने का फैसला किया। मीना के पिता अली बख़्श उन पर सख्त नज़र रखते थे। 1952 में वेलेंटाइन डे के दिन वह मीना कुमारी को रात साढ़े आठ बजे को फिजियोथेरेपी क्लीनिक पर छोड़ा। माधुरी को भी क्लीनिक में बैठा दिया। लेकिन उनके जाते ही अमरोही अपने मित्रों के साथ आए और 19 वर्षीय मीना कुमारी के साथ गोपनीय तरीक़े से निक़ाह कर लिया।

निकाह की ख़बर किसी को नहीं लगी। लेकिन जब अली बख़्श को पता चला तो उन्होंने मीना पर तलाक के लिए दबाव डाला और कहा, “अमरोही जब तक दो लाख रुपए नहीं देंगे, तुम उनके साथ बीवी के रूप में नहीं रह सकोगी।” अली बक़्श ने महबूब खान की फिल्म ‘अमर’ की शूटिंग के लिए डेट्स दे दीं, परंतु मीना पति अमरोही की फिल्म ‘दायरा’ में काम करना चाहतीं थीं। पिता ने चेतावनी दी, अमरोही की फिल्म में काम किया तो नाता तोड़ लेंगे। बहरहाल, मेहबूब के साथ पांच दिन शूटिंग के बाद मीना दायरा की शूटिंग करने चलीं गईं। उस रात पिता ने उन्हें घर में घुसने नहीं दिया। मजबूरी में वह अमरोही के घर चली गईं। दो दिन बाद उनकी शादी की ख़बर मीडिया में लीक हो गई। शादी के बाद अमरोही ने उन पर तरह तरह की बंदिशें लगा दी। पुरुषों से मिलने पर रोक लगा दी। किसी भी क़ीमत पर शाम साढ़ें छह बजे तक अपनी कार से घर लौटने को कहा। मीना को यह बंधन रास नहीं आया, सो शर्ते टूटती रहीं। ‘साहिब बीबी और गुलाम’ के निर्देशक अबरार अल्वी के अनुसार कमाल अमरोही मीना कुमारी की जासूसी भी करवाते थे।

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मीना कुमारी को 1963 में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में जाना था। तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री सत्य नारायण सिन्हा ने पति-पत्नी के लिए दो टिकटों की व्यवस्था की। लेकिन अमरोही ने उनके साथ जाने से इनकार कर दिया। तब मीना भी कभी गईं। एक बार इरोस सिनेमा में प्रीमियर के दौरान सोहराब मोदी ने मीना कुमारी और कमाल अमरोही को राज्यपाल से परिचय करवाते हुए कहा, ‘ये मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी हैं और ये उनके पति कमाल अमरोही हैं।’ लेकिन अमरोही तुरंत बोल, ‘नहीं, मैं कमाल अमरोही हूं और यह मेरी पत्नी मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी हैं।’ इसके बाद वह हाल से निकल गए। कहा जाता है कि इसके बाद अमरोही मीना कुमारी को टॉर्चर करने लगे। उनकी जीवनी लेखक विनोद मेहता के अनुसार, मीना कुमारी वाक़ई में पति के अत्याचार से पीड़ित थीं।

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दरअसल, मीना कुमारी की मौत के बाद नरगिस ने एक उर्दू पत्रिका में लेख लिखा। जिसमें बताया कि ‘मैं चुप रहूंगी’ के आउटडोर शूट पर जब मीना ने मेकअप रूप में गुलज़ार को आने की अनुमति दे दी तो अमरोही के सहायक बाकर अली ने उनको थप्पड़ मार दिया और उनका चेहरा सूज़ गया। इसके बाद उनके संबंध ख़राब हो गए। वह सीधे अपनी बहन माधुरी के घर चली गईं। जब अमरोही लेने गए, उनसे बात भी नहीं की। वह 1964 में अमरोही से अलग हो गईं। अपनी असफल वैवाहिक जीवन की वजह से वह काफी ड्रिंक करने लगी थीं। इससे उनका स्वास्थ बिगड़ता चला गया।

पाक़ीज़ा में उनके किरदार को लोग आज भी सराहते हैं। शर्मीली मीना की लिखी कुछ उर्दू की कविताएं नाज़ के नाम से बाद में छपी थीं। बहरहाल, पाक़ीज़ा के रिलीज़ होने के तीन हफ़्ते बाद उनकी तबीयत ख़राब हो गई। 28 मार्च 1972 को सेंट एलिज़ाबेथ अस्पताल में भर्ती कराया गया। 31 मार्च 1972 को गुड फ्राइडे के दिन महज़ 38 वर्ष की आयु में मीना कुमारी ने इस दुनिया को अलविदा कर दिया। 1979 में ‘मीना कुमारी की अमर कहानी’ फिल्म बनी जिसका निर्देशन सोहराब मोदी ने किया। फिल्म का संगीत खय्याम ने बनाया। अगले वर्ष शायरा शीर्षक से मीना कुमारी पर लघु वृत्तचित्र बनी। मीना कुमारी के सम्मान में भारतीय डाक ने पांच रुपए का डाक टिकट 13 फरवरी 2011 को जारी किया। मीना कुमारी के जीवन पर विनोद मेहता ने उनकी मृत्यु के बाद मीना कुमारी – द क्लासिक बायोग्राफी नाम की किताब लिखी। जो 2013 में फिर से प्रकाशित हुई।

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कहा जाता है कि उर्दू सीखने के अलावा उनकी औपचारिक स्कूली पढ़ाई नहीं हुई थी, इसके बावजूद वह कई भाषाएं जानती थीं और बहुत सारी किताबें पढ़ती थीं। उन्हें शायरी और कविताएं लिखने का बहुत शौक था। कैफ़ी आज़मी से भी उन्होंने लेखन सीखा। वह गुलज़ार के लेखन की मुरीद थीं, अपने इंतकाल के बाद वह अपनी लेखनी और बहुत सी कविताएं और दूसरे कंटेंट गुलज़ार के पास छोड़ गईं थीं। मीना कुमारी के धर्मेंद्र के साथ रोमांस की ख़बरें आए दिन मीडिया की सुर्खियां बनती थीं। कहा जाता है कि धर्मेंद्र का करियर बनाने में मीना कुमारी का अहम किरदार रहा है। बहरहाल, बेमिसाल अदाकार मीना कुमारी श्रद्धांजलि।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा