परदेसियों से ना अखियां मिलाना…

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मोहम्मद रफ़ी की पुण्यतिथि पर विशेष

परदेसियों से ना अखियां मिलाना… फ़िल्म ‘जब-जब फूल खिले’ का यह गाना केवल मोहब्बत करने वालों को ही आगाह या सचेत नहीं करता, बल्कि आम मानव को भी सचेत करता है कि जीवन तो क्षणभंगुर है। शरीर नश्वर है। लिहाज़ा, इससे बहुत ज़्यादा मोहब्बत मत कर, क्योंकि यह परदेसी है, जो एक न एक दिन बेवफ़ाई करके चला ही जाएगा। इसलिए, हे इंसान इस जीवन को पाकर बहुत अंहकार मत पाल, तू बस इंसान ही बना रह, क्योंकि तू जीवन जीने के अलावा और कुछ नहीं कर रहा है। कहना न होगा कि कालजयी गायक मोहम्मद रफ़ी, जिन्हें दुनिया रफ़ी या रफ़ी साहब के नाम से बुलाती है, के शब्द रूपहले परदे पर शशि कपूर के लिए है, लेकिन आनंद बख्शी के लिखे इस गाने में मानव जीवन का फ़लसफा छुपा हुआ है।

हिंदी सिनेमा के श्रेष्ठतम गायकों की फ़ेहरिस्त में शीर्ष पर रखे जाने वाले मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ ऊंचाई और क्वालिटी का अहसास आसानी से कराती है। फ़िल्म ‘बैजू बावरा’ का गीत ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले को सुनकर मन यह कहने के लिए मजबूर हो जाता है कि उनके सुर में यह बुलंदी केवल ख़ुदा की नेमत ही हो सकती है जो हर किसी को मयस्सर नहीं होती। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण कतई नहीं होगा कि रफ़ी साहब जैसा दूसरा गायक न ही पैदा हुआ और न ही भविष्य में पैदा होगा। यही वजह है कि संगीत के कद्रदान आज भी उनकी कमी शिद्दत से महसूस करते हैं। जब भी कभी उनके गीत कानों में गुंजते हैं, तो आदमी मंत्रमुग्ध होकर शिद्द्ट से सुनने लगता है।

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आवाज़ की यही ख़ुमारी बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले गाने में भी मिलती है। रफ़ी साहब ने साहिर लुधियानवी के इस गाने को रवि की धुन पर दिल की गहराई से गाया है। फ़िल्म ‘नील कमल’ के इस गाने को सुनकर ऐसा लगता है कि आवाज़ रूपहले परदे पर बिल्कुल बलराज साहनी के गले से ही निकल रही है। बेटी को विदा करते समय बाप की भावनाओं को बयान करने के लिए यह दर्दभरी आवाज़ मिसाल बन चुकी है। बहुत बाद में रफ़ी साहब ने कहा था कि इसे गाते वक़्त उन्हें अपनी बेटी की विदाई याद आ गई थी, इसलिए इस गाने में उनकी आवाज़ में जो दर्द उभरा, वह बिल्कुल असली और नैसर्गिक था। गायकी की हर कसौटी पर उनकी आवाज़ एकदम खरी उतरती थी। ख़ुदा ने उन पर सुरों की नेमत दिल खोल कर बरसाई थी। उनकी आवाज़ के साथ नगमों की रवानगी और रूपहले परदे पर अदायगी का अंदाज़ बदलता चला गया। पहले जो गीत क्लासिकल म्यूज़िक से बोझिल लगते थे। वे रफ़ी साहब के सुरों के सांचे में ढल कर लोगों के दिलों में उतरने लगे थे।

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वर्ष 1944 से 1970 की अवधि को फ़िल्म के जानकार भारतीय सिनेमा का स्वर्ण युग मानते हैं। कमोबेश यही दौर भारतीय फ़िल्म संगीत के लिए भी स्वर्ण युग माना जा सकता है। इस दौर में एक से बढ़कर एक गायक, गीतकार और संगीतकार भारतीय फलक पर अवतरित हुए। उस ज़माने में संगीतकार नौशाद, गीतकार शकील बदायूंनी और गायक मोहम्मद रफ़ी की तिकड़ी सुर की दुनिया पर राज किया करती थी। इस तिकड़ी का साथ जिस भी फ़िल्म को मिल जाता था, उसकी सफलता उसी समय सुनिश्चित हो जाती थी। इसी तिकड़ी का भजन मन तड़पत हरि दर्शन को आज भी एक मिसाल बना हुआ है। शकील का लिखा ‘बैजू बावरा’ का यह भजन भक्ति संगीत में मील का पत्थर है।

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कहा जाता है कि रफ़ी साहब ने अपने गाए सभी गीतों में 517 तरह के मूड बयान किए हैं। नफ़रत की दुनिया में उनकी आवाज़ प्यार के साज से सजी रहती थी। उनकी तान में अगर हुस्न अंगड़ाई लेता था, तो उसमें दर्द के मारों का गम भी झलकता था। सच कहा जाए तो रफ़ी की आवाज़ की शबनम में धुली होती थी। यही वजह है, बॉलीवुड में जैसे लता मंगेशकर को सुर सामाग्री, नूरजहां को मलिका-ए-तरन्नुम, दिलीप कुमार को अभिनय सम्राट और अमिताभ बच्चन को महानायक कहा गया, उसी तरह रफ़ी को शहंशाह-ए-तरन्नुम कहा गया। हालांकि संगीत की बारीक़ियां समझने वाले रफ़ी को इस उपाधि से भी ऊपर रखते हैं। नौशाद ने संभवतः इसीलिए रफ़ी को ‘सुरों का पैगंबर’ की उपाधि दी थी। कई लोग उन्हें सुरों का शहंशाह भी कहते थे। जिस भी गाने को वह अपना सुर दे देते थे, वह अद्भुत हो जाता था। बेमिसाल हो जाता था। कर्णप्रिय हो जाता था। आम संगीतप्रेमी का गीत बन जाता था।

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फ़िल्म इंडस्ट्री में शायद ही कोई ऐसा रहा होगा, जो रफ़ी साहब के साथ काम करने के लिए लालायित और उत्साहित न रहा हो। नए गायक-गायिकाओं को उन्होंने ख़ुद प्रमोट किया। उनकी इसी आदत से एक बार लता मंगेशकर उनसे इतनी नाराज़ हुईं कि चार साल उनसे साथ गाना नहीं गाईं। दरअसल, साठ के दशक में रफ़ी सुमन कल्यानपुर और उषा टिमोथी जैसी नवोदित गायिकाओं को प्रमोट करने लगे। कई गाने रफ़ी ने इनके साथ रिकॉर्ड किए। अपने ज़माने की मशहूर गायिका उषा टिमोथी ने एक इंटरव्यू में लता-रफ़ी विवाद की असली वजह बताई। उषा टिमोथी कहा, “गाने की रॉयल्टी तो बहुत छोटा सा मामला था, हालांकि उसी के बहाने लता ने रफ़ी साहब अपनी भड़ास निकाल दी थी। इतनी बड़ी सिंगर होने के बाद भी लताजी दूसरों को प्रमोट नहीं करती थीं। उलटे जो लोग नए लोगों को मौक़ा देते थे, लता उन लोगों से नाराज़ हो जाती थीं।”

उषा टिमोथी कहती हैं, “नाराज़ लताजी अपनी भड़ास निकालने का कारण तलाश रही थी और 1961 में फ़िल्म ‘माया’ के गीत की रिकॉर्डिंग का मौक़ा मिल गया। रिकॉर्डिंग के बाद जब लताजी ने रॉयल्टी के बारे में रफ़ी साहब से उनकी राय पूछी, तो रफ़ी ने कहा कि रिकॉर्डिंग के बाद सिंगर्स को फीस का भुगतान हो जाता है। ऐसे में सिंगर को और पैसों की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। बस क्या था, लताजी ने रफ़ी साहब के साथ गाने से साफ़ मना कर दिया। वह नाराज होकर चली गईं। रफ़ी साहब थे कि बस मुस्कराकर रह गए थे। पूरे चार साल तक दोनों का कोई युगल गीत रिकॉर्ड नहीं हुआ।” बहरहाल, बाद में अभिनेत्री नरगिस की मध्यस्थता के बाद उनमें सुलह हो गई। दोनो ने दोबारा साथ गाना शुरू किया और फ़िल्म ‘ज्वैल थीफ’ में दिल पुकारे गाना रिकॉर्ड करवाया जो बहुत लोकप्रिय हुआ।

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उस विवाद को लेकर लता के बयान पर भी काफी विवाद हुआ था। 2012 में ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ छपे इंटरव्यू में लता ने कहा था कि रफ़ी मोहम्मद के साथ उनका विवाद रफ़ी के लिखित माफ़ीनामे के बाद ख़त्म हो गया था। लता के दावे पर रफ़ी के बेटे शाहिद रफ़ी ने तगड़ा विरोध जताया और कहा था, “लताजी झूठ बोल रही हैं, सच यह है कि मेरे वालिद (रफ़ी साहब) ने लताजी से कभी भी माफ़ी नहीं मांगी।” कहा जाता है कि लता दूसरी गायिकाओं को नापसंद करती थीं और उनके गाने छीन लेती थीं, यह ख़ुलासा एक बार मुबारक़ बेगम के इंटरव्यू में किया था। उन्होंने कहा था, ‘जब-जब फूल खिले’ का गाना परदेशियों से ना अंखियां मिलाना, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने 1964 में उनकी आवाज़ में रिकॉर्ड किया था, लेकिन जब दिसंबर 1965 में फ़िल्म रिलीज हुई तो, गाने में लता का स्वर सुन कर मैं हैरान रह गई।”

तेज़ गीतों में भी रफ़ी साहब की आवाज़ की रवानगी सुनते बनती थी। तेज़ गानों के उनके हीरो शम्मी कपूर थे। रफ़ी शम्मी के लिए गाने की बात सुनकर ख़ुश हो जाते थे। रफ़ी की आवाज़ शम्मी पर इतनी फ़बती थी कि वह अपनी हर फ़िल्म में अपने लिए रफ़ी की आवाज़ में गाना गवाने की ज़िद करते थे। शम्मी की दीवानगी इस कदर थी कि कभा-कभार फ़िल्म की शूटिंग को छोड़कर रिकॉर्डिंग स्टूडियो पहुंच जाते थे। सुन लो सुनाता हूं तुमको कहानी, रूठो ना हमसे ओ गुड़ियों की रानी। रे माम्मा रे माम्मा रे… इस गाने में रफ़ी साहब की आवाज़ की चंचलता, नटखटपन और बाल-सुलभ भावनाएं शम्मी कपूर जैसी ही हैं। शम्मी कपूर ही नहीं बल्कि जॉय मुखर्जी की पहचान रफ़ी का आवाज़ की ही बदौलत बनी थी।

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रफ़ी साहब की आवाज़ ने उस दौर के हर स्टार को सुपरस्टार बना दिया। हिंदी फिल्मों में जब रोमानी गीतों का चलन बढ़ा तो संगीतकारों को रफ़ी की आवाज़ से ज़्यादा मुफ़ीद किसी और गायक की आवाज़ नहीं लगती थी। राजेंद्र कुमार के क़रीब-क़रीब सभी गाने रफ़ी ही गाते थे। कहा तो यह भी जाता है कि राजेंद्र कुमार रूपहले परदे पर रफ़ी की आवाज़ में गाते हुए इतने हिट हुए, कि जुबली कुमार का टाइटिल पा गए। कई समीक्षक कहते हैं, ‘गीत’ फ़िल्म की सफलता में गानों का बड़ा योगदान था और गाने इसलिए हिट हुए कि उनमें आवाज़ रफ़ी की थी। तभी तो आनंद बख्शी के बोल कल्यानजी आनंदजी की धुन और रफ़ी की आवाज़ पाकर आ जा तुझको पुकारें मेरे गीत रे, मेरे गीत रे गीत में इतनी कशिश पैदा हुई कि यह गीत मोहब्बत करने वालों का सीधे दिल की टच करता है।

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मोहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसंबर 1924 को अमृतसर के पास कोटला सुल्तान सिंह में मध्यवर्गीय और इस्लाम के प्रति बहुत ही समर्पित मुस्लिम परिवार में हाजी अली मोहम्मद और अल्लाग राखी के यहां हुआ था। वह छह भाइयों मोहम्मद सफी, मोहम्मद दीन, मोहम्मद इस्माइल, मोहम्मद इब्राहिम और मोहम्मद सिद्दीकी में पांचवें नंबर पर थे। उनकी चिराग बीबी और रेशमा बीबी नाम की दो बड़ी बहनें भी थीं। उनकी स्कूल की पढ़ाई कोटला गांव में ही हुई। वह बचपन से ही बहुत शर्मीले स्वभाव के थे। करीब सात साल की उम्र में उनका परिवार रोज़गार के सिलसिले में अमृतसर से लाहौर आ गया। केश कर्तन से आजीविका चलाने वाले परिवार का संगीत से कोई सरोकार न था। जब रफ़ी छोटे थे तब बड़े भाई के हेयर कटिंग सैलून में ही उनका ज़्यादा वक्त गुज़रता था। उन्हें गाने की प्रेरणा एक फ़कीर से मिली थी। कहा जाता है कि दुकान से एक फ़कीर गाते हुए गुजरता था। रफ़ी उसे सुनते हुए उसके पीछे-पीछे दूर तक चले जाते थे। बाद में वह भी फ़कीर की नकल करके गाने लगे। उनकी नकल में अव्वलता को देखकर लोगों को उनकी आवाज़ भी पसंद आने लगी। सैलून में उनके गाने की तारीफ़ होती थी। लेकिन इससे रफ़ी को ख्याति के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिला।

दरअसल, रफ़ी की गायक बनने के सपने के साकार होने में उनके बड़े भाई का बहुत बड़ा योगदान रहा। उन्होंने रफ़ी के मन में संगीत के प्रति गहरी रूझान को पहचान लिया था और संगीत की ओर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। वह रफ़ी को उस्ताद अब्दुल वाहिद खान के पास ले गए और उनसे रफ़ी संगीत की तालीम देने की गुजारिश की। इसके बाद रफ़ी संगीत की शिक्षा उनसे लेने लगे। साथ ही ग़ुलाम अली ख़ान से भारतीय शास्त्रीय संगीत भी सीखना शुरू कर दिया। चंद साल में ही रफ़ी परिपक्व गायक बन गए। लेकिन कई साल तक कामयाबी के नाम पर सिफ़र ही रहे। इस बीच 1937 में रफ़ी का निकाह हो गया। रफी का पहला निकाह लाहौर में उनके चाचा की बेटी बशीरन बीबी से महज 13 साल की उम्र में हुआ था। दरअसल, देश के विभाजन की चर्चा 1940 के दशक में ही शुरू हो गई हुई थी। उनकी पत्नी चाहती थीं कि रफ़ी बंबई की बजाय लाहौर में सेटल हों, ताकि विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान में ही रहे।लेकिन रफ़ी साहब को हिदुस्तान और संगीत से बेपनाह मोहब्बत थी। लिहाज़ा, उन्होंने मुंबई को ही कर्मस्थली के रूप में चुना। लिहाज़ा, भारत नहीं छोड़ा, लेकिन उनकी बीवी उन्हें तलाक़ देकर चली गई। पहली पत्नी से रफ़ी को एक बेटा मोहम्मद सईद भी है। बाद में उनका दूसरा निकाह बिलकिस बानो के साथ हुआ और उनसे छह बच्चे हुए। बेटे खालिद, हमीद और शाहिद और बेटियां परवीन, यास्मिन और नसरीन हैं।

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सन् 1943 में एक बार ऑल इंडिया रेडियो लाहौर ने तब के मशहूर गायक-अभिनेता कुंदनलाल सहगल को गाना गाने के लिए आमंत्रित किया। सहगल को सुनने के लिए रफ़ी अपने भाई के साथ स्टूडियो में पहुंच गए। परंतु उसी समय बिजली चली गई। इससे माइक बंद हो गया। सहगल ने बिना माइक गाने से इनकार कर दिया। लिहाज़ा, उस समय रफ़ी के भाई ने फंक्शन प्रभारी से आग्रह किया कि दर्शकों की नाराज़गी से बचने के लिए रफ़ी को गाने का मौक़ा दिया जाए। इस तरह रफ़ी ने 13 वर्ष की आयु में पहली बार सार्वजनिक मंच पर गाना गाया। रफ़ी का गाना ख़त्म होते ही बिजली आ गई और गाने के लिए सहगल साहब मंच पर आ गए। लेकिन भीड़ वन्स मोर वन्स मोर चिल्लाती रही। यह देखकर सहगल साहब भी हैरान हुए और रफ़ी को शानदार गायन के लिए शाबासी दी।

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उस समय सहगल की शाबासी पाकर रफ़ी पूरे लाहौर में मशहूर हो गए और उन्हें लाहौर रेडियो स्टेशन में गाने का मौका मिलने लगा। संयोग से उस समय दर्शक दीर्घा में नामचीन संगीतकार श्यामसुंदर भी बैठे थे। वह रफ़ी की गायन शैली से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें अपनी फिल्मों में गाने का न्यौता दिया। 1944 में रफ़ी ने पंजाबी फ़िल्म ‘गुल बलोच’ में श्याम सुंदर के संगीत निर्देशन मे रफ़ी ने अपना पहला गाना सोनियेनी हिरीये नी पार्श्व गायिका जीनत बेगम के साथ के साथ गाया। रफ़ी साल 1944 में अपने बड़े भाई के साथ मुंबई चले आए। उसी साल नौशाद के संगीत निर्देशन में उन्होंने अपना पहला हिंदी गाना पहले आप फ़िल्म ‘हिंदुस्तान के हम हैं’ में गाया। लेकिन कुछ अच्छा नहीं होता देख रफ़ी साहब वापस लाहौर लौट गए। लेकिन रफ़ी फिर मुंबई आए इस बार उनकी मुलाकात संगीतकार नौशाद हुई।

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सुरों की कसौटी पर खरे पाकर नौशाद ने उन्हें अपनी कोरस टीम में रख लिया। नौशाद ने उनकी आवाज़ में मौशकी का नाज देखा। लिहाज़ा, रफ़ी के बाद नौशाद दूसरे गायकों को बिसार दिए। उसी साल उन्हें संगीतकार नौशाद ने पहले आप नाम की फ़िल्म में गाने का मौका दिया। नौशाद का ही सुरबद्ध गीत तेरा खिलौना टूटा  से रफ़ी को प्रथम बार हिंदी जगत में ख्याति मिली। यह गाना 1946 में रिलीज़ फ़िल्म अनमोल घड़ी का था। वर्ष 1949 मे नौशाद के ही संगीत निर्देशन में दुलारी फ़िल्म मे गाए गीत सुहानी रात ढल चुकी के जरिए वह सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंच। कहा जाता है कि 1951 में जब नौशाद ‘बैजू बावरा’ के लिए गाने बना रहे थे, तो अपने पसंदीदा गायक तलत महमूद से गवाने की सोची थी, लेकिन कहीं उन्होंने तलत को धूम्रपान करते देखकर मन बदल लिया और स्टूडियों में रफ़ी को बुलवा लिया। ‘बैजू बावरा’ के गीत रफ़ी की आवाज़ में सबकी ज़बान पर चढ़ गए। रफ़ी की सहज आवाज़ के सहारे शास्त्रीय संगीत को आम दर्शकों के लायक बनाना उनके लिए आसान हो गया। गायकी की काम चलाऊ शिक्षा से ही रफ़ी की आवाज़ लोगों को भाने लगी। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बैजू बावरा के गानों ने रफ़ी को गायक के रूप में स्थापित कर दिया। इसके बाद रफ़ी ने नौशाद का साथ अनगिनत गीत गाए।

इस तरह 1950 के दशक में ही संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन को उनकी आवाज़ पसंद आई। रफ़ी उनके लिए भी गाने लगे। शंकर जयकिशन तब राजकपूर के पसंदीदा संगीतकार थे, पर राज सिर्फ़ मुकेश की आवाज़ पसंद करते थे। इसके बावजूद उन्होंने कई बार राज के गाने को रफ़ी से गवाया। जल्द ही रफ़ी की आवाज़ सचिन देव बर्मन और ओपी नैय्यर रास आने लगी। नैय्यर का नाम स्मरणीय रहेगा क्योंकि उन्होने अपने निराले अंदाज में रफ़ी के साथ आशा भोसले का किया और उनकी खनकती धुनें अन्य संगीतकारों से अलग एहसास देती हैं। ओपी के साथ रफ़ी को बहुत नाम मिला। इसके बाद रफ़ी साहब मदन मोहन, रवि, गुलाम हैदर, सलिल चौधरी और जयदेव जैसे दिग्गज संगीतकारों की पहली पसंद बन गए।

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मोहम्मद रफ़ी के शहीद, मेला और दुलारी जैसे यादगार फिल्मों में गाए नगमें आज भी लोगों की ज़बान पर रहते हैं। कई गानों को संगीत कभी ओपी नैय्यर ने दिया तो कभी शंकर जयकिशन ने पर आवाज़ हमेशा रफ़ी की ही रही। चाहे कोई मुझे जंगली कहे (जंगली), एहसान तेरा होगा मुझ पर (जंगली), ये चांद सा रोशन चेहरा (कश्मीर की कली), दीवाना हुआ बादल (आशा भोंसले के साथ, कश्मीर की कली) शम्मी कपूर के ऊपर फिल्माए गए लोकप्रिय गानों में शामिल हैं। धीरे-धीरे इनकी ख्याति इतनी बढ़ गई कि अभिनेता इन्हीं से गाना गवाने का आग्रह करने लगे।

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देश के विभाजन के समय रफ़ी ने भारत में ही रहना पसंद किया। उन्होने बेग़म विक़लिस से शादी की और उनकी चार बेटे तथा तीन बेटियां के रूप में सात संतान हुईं। रफ़ी व्यसनों से दूर रहने वाले आदमी थे। उनको उनके परमार्थो के लिए भी जाना जाता है। बेहद हंसमुख और दरियादिल रफ़ी हमेशा सबकी मदद के लिए तत्पर रहा करते थे। कई फिल्मी गीत उन्होंने बिना पैसे या कम पैसे लेकर गाए। अपने शुरुआती दिनों में संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए बहुत कम पैसों में गाया। मुख्य धारा हिंदी गानों के अतिरिक्त रफ़ी ने ग़ज़ल, भजन, देशभक्ति गीत, क़व्वाली तथा अन्य भाषाओं में गीत गाए।

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गायन का सिलसिला 1960 के दशक में भी चलता रहा। संगीतकार रवि ने रफ़ी का इस्तेमाल ख़ूब किया। 1960 में फ़िल्म ‘चौदहवीं का चांद’ के शीर्षक गीत चौदहवीं का चां हो के लिए रफ़ी को पहला फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद ‘घराना’ (1961), काजल (1965), दो बदन (1966) तथा नीलकमल (1968) जैसी फिल्मो में इन दोनो की जोड़ी ने कई यादगार नगमें दिए। 1961 में रफ़ी को दूसरा फ़िल्मफेयर आवार्ड फ़िल्म ‘ससुराल’ के गीत तेरी प्यारी प्यारी सूरत को के लिए मिला। संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने अपना आगाज़ ही रफ़ी के स्वर से किया और 1963 में फ़िल्म ‘पारसमणि’ के लिए बहुत सुंदर गीत बनाए। 1965 में ही फ़िल्म ‘दोस्ती’ का गाना चाहूंगा मै तुझे सांझ सवेरे के लिए रफ़ी को तीसरा फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसी दौरान 1965 में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया। 1965 में ‘जब-जब फूल खिले’ का कल्यानजी-आनंदजी का स्वरबद्ध रफ़ी का गाया गाना परदेसियों से ना अखियां मिलाना लोकप्रियता के शीर्ष पर पहुंच गया था। 1966 में फ़िल्म ‘सूरज’ के गीत बहारों फूल बरसाओ बहुत प्रसिद्ध हुआ और इसके लिए रफ़ी को चौथा फ़िल्मफेयर अवार्ड मिला। 1968 में शंकर जयकिशन की धुन पर फ़िल्म ब्रह्मचारी के गीत दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर के लिए उन्हें पाचवां फ़िल्मफेयर अवार्ड मिला।

1960 के दशक में अपने करियर के शीर्ष पर पहुंचने के बाद दशक का अंत उनके लिए सुखद नहीं रहा। 1969 में शक्ति सामंत अपनी फ़िल्म ‘आराधना’ बना रहे थे। संगीत का दायित्न दादा (सचिन देव बर्मन) को दिया था। परंतु सचिन दादा अचानक बीमार पड़ गए और उन्होने अपने पुत्र राहुल देव बर्मन (पंचमदा) से गाने रिकार्ड करने को कहा। उस समय रफ़ी हज करने गए थे। पंचमदा को किशोर कुमार से गवाने का अवसर मिल गया। फ़िल्म के दौ गाने रूप तेरा मस्ताना और मेरे सपनों की रानी गाने बहुत लोकप्रिय हुए और राजेश खन्ना की लोकप्रियता आसमां छूने लगी। साथ ही बतौर गायक किशोर कुमार संगीतकारों की पहली पसंद बन गए। रफ़ी के गायन का अवरोह यहीं से शुरू हुआ। हालांकि इसके बाद भी रफ़ी ने ये दुनिया ये महफिल, ये जो चिलमन है और तुम जो मिल गए हो जैसे कई हिट गाने दिए। 1977 में फ़िल्म ‘हम किसी से कम नहीं’ के गाना क्या हुआ तेरा वादा के लिए उन्हे छठां फ़िल्म फेयर एवॉर्ड मिला।

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रफ़ी की आवाज़ दुनिया को भले ही जादुई लगे लेकिन ख़ुद रफ़ी साहब के लिए इबादत की इल्तजा थी। इतने बड़े सिंगर बनने के बावजूद भी शोहरत का ग़ुमान रफ़ी को कभी नहीं रहा। कहते हैं कि अपने हर नए गीत की रिकॉर्डिंग से पहले किसी नौसिखिए की तरह रियाज़ किया करते थे, इसीलिए जब रिकॉर्डिंग स्टूडियों पहुंचते तो एक ही टेक में पूरा गीत रिकॉर्ड हो जाता था। बहुत कम लोगों को पता है कि रफ़ी पतंगबाज़ी के दीवाने थे। यह शौक उन्हें बचपन से था, जब वह लाहौर की गलियों में घूमा करते थे। पतंग उड़ाना उन्हें कितना प्रिय था, कि गानों की रिकार्डिंग के बीच थोड़ी सी भी मोहलत मिलती, तो वह छत पर चले जाते थे और वहां उड़ाने लगते थे।

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जब कोई यह प्रश्न करता है कि आपको रफ़ी का कौन सा गाना सबसे ज़्यादा पसंद है तो एक धर्मसंकट सा खड़ा हो जाता है। उनके गाए हज़ारों गानों में से किसी एक गाने को सबसे ज़्यादा अच्छा कहना वाक़ई मुमकिन नहीं है। रफ़ी साहब ने अपने संपूर्ण सिने कैरियर मे क़रीब 700 फिल्मों में लगभग 26 हज़ार गाने गाए जिनमें हर रंग, मिज़ाज़, मूड को उन्होंने इस बख़ूबी से अपनी आवाज़ में उतारा कि कोई भी संगीत प्रेमी बरबस उनकी आवाज़ के जादू में घिरा रह जाता है। आजकल भले ही कई गायक उनकी आवाज़ में गाते हों लेकिन उनकी आवाज़ का नकल कर पाना बहुत मुश्किल है। उनके गाए गीत आज भी लोग काफी पसंद करते हैं। लोगों के दिलों में उनके गाए गानों की रूमानियत आज भी बनी हुई है। उनकी गायकी का चमत्कार ही माना जाएगा कि उन्हें अब भी उसी शिद्दत से याद किया जाता है और उनके गाने को सुना जाता है जैसे उनका बिछड़ना अभी कल की ही बात हो।

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मोहम्मद रफी, सात सुरों के बादशाह, एक ऐसे गायक जिन्होंने अपनी रूहानी आवाज से लोगों के दिलों में सुकून भर दिया। वे जब गाते थे, तो मानो ये भागती-दौड़ती दुनिया थम सी जाती थी और एक चिर आनंद में डूब जाती थी। हज़ारों गीतों को अपने सुरों से सजाने वाले रफ़ी के लिए ‘आस पास’ फ़िल्म का गाना आख़िरी गीत साबित हुआ। संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल थे। लक्षीकांत ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि वह तीन दशक से रफ़ी साहब के साथ काम कर रहे थे, लेकिन उन्होंने कभी जाते वक़्त नहीं बोला था कि जा रहा हूं। लेकिन इस गीत की रिकॉर्डिंग के बाद जाते समय यह बोलकर गए कि अब मैं चलता हूं। उनकी तबीयत 31 जुलाई की सुबह से ही खराब थी। रात आठ बजे अचानक सीने में तेज दर्द हुआ माहिम के पीडी हिंदुजा नेशनल अस्पताल में लाया गया। मगर उनकी दिल की धड़कनें थमने लगी थीं। उनको बॉम्बे अस्पताल ले जाया गया। वहां पेसिंग से राहत मिली, हालत में सुधार के लक्षण दिखने लगे थे, लेकिन रात में तीसरा दौरा पड़ा और रफ़ी साहब हमेशा के लिए ख़ामोश हो गए। आवाज़ की दुनिया हमेशा के लिए सूनी हो गई। कहते हैं उस रात रात भर मुंबई का आसमान आंसू बहाता रहा। बहरहाल, रफ़ी साहब की जादूई आवाज़ हिंदुस्तान के करोड़ों दिलों में आज भी बसती है। उनके तराने जेहन में आज भी गूंजते हैं। दरअसल, रफ़ी साहब अपने पीछे गीतों का एक गुलिस्तां छोड़कर गए हैं, जो हिंदी सिनेमा को सदियों तक महकाता रहेगा।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा