‘अगस्त क्रांति’ ही बनी देश के विभाजन की वजह

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मोहनदास करमचंद गांधी के आह्वान पर द्वितीय विश्वयुद्ध के समय 9 अगस्त 1942 को शुरू हुए भारत छोड़ो आंदोलन को ‘अगस्त क्रांति’ के नाम से भी जाना जाता है। इस आंदोलन का लक्ष्य भारत से ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकना था। भारत छोड़ो आंदोलन सही मायने में जन-आंदोलन था जिसमें लाखों आम हिंदुस्तानी शामिल थे। इस आंदोलन ने युवाओं को बड़ी संख्या में अपनी ओर आकर्षित किया। उन्होंने अपने कॉलेज छोड़कर जेल का रास्ता अपनाया। जहां इस आंदोलन से देश के लोगों को अंग्रज़ों से लड़ने की प्रेरणा मिली वहीं, इस आंदोलन का नतीजा बहुत भयावह हुआ, जो 1947 में देश के विभाजन का कारण बना।

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क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद गांधी जी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ तीसरा बड़ा आंदोलन छेड़ने का फ़ैसला लिया। उनके नेतृत्व में हुए इस आंदोलन से ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिल गईं। यह आंदोलन अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के बंबई अधिवेशन में शुरू किया गया। गांधी जी के आह्वान पर ग्वालिया टैंक मैदान पर अखिल भारतीय कांग्रेस महासमिति ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ का प्रस्ताव पारित किया। यह भारत को तुरंत आजाद करने के लिए अंग्रेजी शासन के विरुद्ध एक सविनय अवज्ञा आंदोलन था। भारत छोड़ो आंदोलन का आगाज दरअसल, अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ जनभावना का प्रतीक था।

ग्वालिया टैंक मैदान में गांधी जी का भाषण यादगार रहा। उन्होंने पहली बार आजादी के लिए कोशिश करने या फिर मर जाने की बात कही थी। गांधीजी ने कहा था, “मैं एक मंत्र देना चाहता हूं, जिसे आप सभी लोग अपने दिल में उतार लें और वह मंत्र ‘करो या मरो’ का है।” वहां मौजूद हर एक देशप्रेमी के दिल में भारत देश को आजाद कराने की भावना सातवें आसमान पर पहुंच गई थी। यहीं से सविनय अवज्ञा की शुरुआत हुई। लोग इस बात पर राजी हो गए कि अगर अंग्रेजी हुकूमत हमारी शर्तें नहीं मानेगी तो हम उसका ऑर्डर नहीं मानेंगे। यहां मुख्य शर्त ही सत्ता भारत के लोगों को सौंपने की थी, जो अंग्रेज करना नहीं चाहते थे।

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दरअसल, विश्व युद्ध में इंग्लैंड को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज को ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया। गांधी जी ने मौके की नजाकत को भांपते हुए 8 अगस्त की शाम ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ व भारतीयों को ‘करो या मरो’ का नारा दिया। वस्तुतः 9 अगस्त 1925 को ब्रिटिश सरकार का तख्ता पलटने के उद्देश्य से रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के नेतृत्व में काकोरी की घटना हुई थी। उसकी यादगार ताजा रखने के लिए पूरे देश में हर साल 9 अगस्त को काकोरी कांड स्मृति-दिवस मनाने की परंपरा भगत सिंह ने शुरू की थी, क्योंकि इस दिन बिना बुलाए ही बहुत बड़ी संख्या में नौजवान एकत्र हो जाते थे। गांधी जी ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत 9 अगस्त का दिन चुना था।

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बहरहाल, 9 अगस्त से भारत छोड़ो आंदोलन के शुरू हो गया। बड़ी संख्या में लोग गवालिया टैंक मैदान पर इकट्टा हुए। अंग्रेजों ने आंदोलन को दबाने के लिए गिरफ्तारियां कीं। हजारों लोगों को जेल में डाल दिया। कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य 9 अगस्त को सुबह से पहले ही गिरफ्तार हो चुके थे। कांग्रेस को गैरकानूनी संस्था घोषित कर दी गई। गांधी जी के साथ सरोजिनी नायडू यरवदा पुणे के आगा खान पैलेस, डॉ राजेंद्र प्रसाद पटना जेल और जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और मौलाना अबुल कलाम आजाद समेत अन्य सभी सदस्यों को अहमदनगर के किले में नजरबंद किया गया था।

अंग्रेजी हुकूमत इतना डर गई थी कि उसने एक भी नेता को जेल से बाहर नहीं रहने दिया। अंग्रेजों की सोच थी कि बड़े नेताओं की गिरफ्तारी से आंदोलन ठंडा पड़ जाएगा। लेकिन नेताओं की गिरफ्तारी के बाद लोगों ने ख़ुद आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। कांग्रेस में जयप्रकाश नारायण भूमिगत रहकर आंदोलन की गतिविधियों में सबसे ज्यादा सक्रिय थे। इस आंदोलन को लालबहादुर शास्त्री सरीखे एक छोटे से व्यक्ति ने प्रचंड रूप दे दिया। आंदोलन देश के अलग अलग हिस्सों में फैलता गया। हालांकि यह आंदोलन पूरी तरह अंहिसक था, लेकिन आंदोलन के दौरान कई जगह आंदोलनकारियों ने रेलवे स्टेंशनों, पुलिस स्टेशनों सरकारी भवनों को निशाना बनाया गया।

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देश भर के युवा कार्यकर्ता हड़तालों और तोड़फ़ोड़ की कार्रवाइयों के ज़रिए आंदोलन चलाते रहे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस आंदोलन के दौरान हुई झड़प और गोलीबारी में 940 लोग मारे गए, 1630 लोग घायल हुए, 1800 लोग डीआईआर में नजरबंद हुए और 60229 लोग गिरफ्तार किए गए। ब्रिटिश सरकार ने हिंसा के लिए कांग्रेस और गांधी जी को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन पर लोग अहिंसक तौर पर भी आंदोलन करते रहे। 19 अगस्त,1942 को शास्त्री भी गिरफ्तार कर लिए गए।

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कई जगह तो आंदोलन में शामिल लोगों ने स्वतंत्र सरकार, प्रतिसरकार का गठन कर लिया। उत्तर प्रदेश का बलिया, महाराष्ट्र का सतारा और अविभाजित बंगाल का हजारा आंदोलन के अहम केंद्र थे। बलिया में चित्तू पांडे की अगुवाई में स्वतंत्र सरकार का गठन हुआया। मेदिनीपुर और सतारा जिले में भी प्रतिसरकार की स्थापना कर दी गई थी। अंग्रेजों ने आंदोलन के प्रति काफ़ी सख्त रवैया अपनाया फ़िर भी इस विद्रोह को दबाने में सरकार को साल भर से ज्यादा समय लग गया।

इस आंदोलन का नकारात्मक पहलू यह रहा कि जब कांग्रेस नेता दो से तीन साल के लिए नजरबंद हुए तो मुस्लिम लीग को अपना जनाधार बड़ाने के मौका मिल गया। जो अंततः विभाजन का कारण बना। जिस दौरान कांग्रेस के नेता जेल में थे उसी समय मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग के उनके साथी अपना प्रभाव क्षेत्र फ़ैलाने में लगे थे। इसी दौरान लीग को पंजाब और सिंध में अपनी पहचान बनाने का मौका मिला जहां तब तक उसका कोई खास वजूद नहीं था। कुल मिलाकर मुस्लिम लीग ने इस अवसर को ज़बरदस्त तरीक़े से भुनाया और लोगों, खासकर मुसलमानों को समझाने में सफल रही कि उनका हित पाकिस्तान बनने पर ही सुरक्षित रहेगा। बहरहाल, जून 1944 में जब विश्व युद्ध समाप्ति की ओर था तो गांधी जी को रिहा कर दिया गया। जेल से निकलने के बाद उन्होंने कांग्रेस और लीग के बीच फ़ासले को पाटने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना के साथ कई बार बातचीत की। लेकिन जिन्ना ने उनकी एक नहीं सुनी।

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पूरे देश में ऐसा माहौल बन गया कि भारत छोड़ो आंदोलन अब तक का सबसे विशाल आंदोलन साबित हुआ। भारत छोड़ो आंदोलन का असर यह हुआ कि अंग्रेजों को लगने लगा कि अब उनका सूरज अस्त होने वाला है। पांच साल बाद 15 अगस्त 1947 को वो दिन आया जब अंग्रजों का प्रतीक यूनियन जैक इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है। बाद में ग्वालिया टैंक मैदान को अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाने लगा। 1945 में ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बनी। यह सरकार भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में थी। उसी समय वायसराय लॉर्ड वावेल ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों के बीच कई बैठकों का आयोजन किया।

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1946 की शुरुआत में प्रांतीय विधान मंडलों के लिए नए सिरे से चुनाव कराए गए। सामान्य श्रेणी में कांग्रेस को भारी सफ़लता मिली। मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर मुस्लिम लीग को भारी बहुमत मिला। राजनीतिक ध्रुवीकरण पूरा हो चुका था। 1946 की गर्मियों में कैबिनेट मिशन भारत आया। इस मिशन ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को ऐसी संघीय व्यवस्था पर राज़ी करने का प्रयास किया जिसमें भारत के भीतर विभिन्न प्रांतों को सीमित स्वायत्तता दी जा सके।

कैबिनेट मिशन का यह प्रयास भी विफ़ल रहा। वार्ता टूट जाने के बाद जिन्ना ने पाकिस्तान की स्थापना के लिए लीग की मांग के समर्थन में 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एंक्शन डे का आह्वान किया। उसी दिन कलकत्ता में खूनी संघर्ष शुरू हो गया। हिंसा कलकत्ता से ग्रामीण बंगाल, बिहार और संयुक्त प्रांत और पंजाब तक फ़ैल गई। फ़रवरी 1947 में वावेल की जगह लॉर्ड माउंटबेटन वायसराय बनाए गए। उन्होंने सुलह कराने की कोशिश की लेकिन विफल रहे। लिहाज़ा, उन्होंने ऐलान कर दिया कि ब्रिटिश भारत को स्वतंत्रता दे दी जाएगी लेकिन उसका विभाजन भी होगा। औपचारिक सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त का दिन नियत किया गया। उस दिन भारत के विभिन्न भागों में लोगों ने जमकर खुशियां मनायीं। दिल्ली में जब संविधान सभा के अध्यक्ष ने गांधी जी को राष्ट्रपिता की उपाधि देते हुए संविधान सभा की बैठक शुरू की तो बहुत देर तक करतल ध्वनि होती रही। असेंबली के बाहर भीड़ महात्मा गाँधी की जय के नारे लगा रही थी।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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