‘हम दो हमारे दो’ के दौर में चौथी बार पिता बने सैफ अली खान

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शाहरुख खान, आमिर खान के भी हैं तीन-तीन बच्चे

52 वर्षीय सैफ़ अली ख़ान पटौदी चौथी बार पिता बन गए हैं। उनकी दूसरी पत्नी करीना कपूर ख़ान ने 21 फरवरी को एक अस्पताल में अपने दूसरे बेटे और पति की चौथी संतान को जन्म दिया। यहां यह बताना ज़रूरी है कि महान क्रिकेटर और पूर्व कप्तान मंसूरअली ख़ान पटौदी और अपने ज़माने की मशहूर अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ख़ान पटौदी के पुत्र सैफ़ अली हम दो हमारे दो के दौर में चौथी बार पिता बन गए हैं। ऐसे समय जब इंसान अपनी जवान बेटी की शादी करता है तब सैफ़ अली का बाप बनना दुर्भाग्यपूर्ण है। और अधिक हैरान करने वाली बात यह भी है कि युवाओं ही नहीं, बल्कि आम लोगों के आदर्श अभिनेता शाहरुख ख़ान और आमिर ख़ान भी तीन-तीन संतानों के पिता हैं। यानी हम दो हमारे दो के युग में दोनों सुपरस्टार अभिनेता अब तक तीन-तीन संतानों के पिता बन चुके हैं।

इसमें दो राय नहीं कि पहले से ही जनसंख्या वृद्धि के बोझ तले दबा यह देश अब और जनसंख्या वृद्धि झेलने की स्थिति में नहीं है। देश की हर योजना एवं कार्यक्रम जनसंख्या विस्फोट की भेंट चढ़कर टांय-टांय फिस्स हो जाता है। निःसंदेह आज देश के समक्ष जितनी भी समस्याएं हैं, सब की सब जनसंख्या की ही नाभि से निकल रही हैं। हालांकि यह भी बात है कि जनसंख्या नियंत्रण को लेकर अभी तक कोई क़ानून नहीं बनाया गया है। ऐसे में कौन कितने बच्चे पैदा करे या कर रहा है, यह उसका जातीय मामला है, परंतु जैसे अन्य मुद्दों को हल करने की पहल हो रही है, वैसे आबादी नियंत्रण पर भी वैधानिक पहल करने की ज़रूरत है।

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सामाजिक चेतना के अभाव में पुराने दौर में लोग दर्जन भर या उससे अधिक बच्चे पैदा कर देते थे। 1970 के दशक के मध्य में राष्ट्रीय राजनीति में संजय गांधी के उदय के बाद जनसंख्या नियंत्रण की चर्चा शुरू हुई। हालांकि संजय गांधी की शैली से लोग सहमत नहीं हुए। यही वजह है कि 1977 में कांग्रेस की पराजय के लिए इमरेंसी के अलावा संजय की जनसंख्या नियंत्रण नीति को भी ज़िम्म्दार माना जाता है। बहरहाल, उसके बाद भी जनसंख्या नियंत्रण का मुद्दा सीरियसली नहीं लिया गया और लोग चार-चार, पांच-पांच और छह-छह बच्चे पैदा करते रहे। लेकिन 1990 और 2000 के दशक में बच्चे पैदा करने के मामले में संयम दिखने लगा। अब तो लोग हम दो हमारा एक की भी बात करने लगे हैं। अनगिनत लोग मिल जाएंगे, जिनके एक ही संतान हैं।

लोगों की शिक्षा का दायरा बढ़ने के साथ देश में जनसंख्या नियंत्रण की बात खुलकर होने लगी है। अगर गंवारों को छोड़ दें, तो आम आदमी महसूस करने लगी है कि जनसंख्या पर अंकुश लगना ही चाहिए। इसीलिए, इन दिनों अमूमन लोग एक या दो से अधिक बच्चे पैदा भी नहीं कर रहे हैं। यानी बहुमत में जनता केंद्रीय परिवार कल्याण मंत्रालय के बहुचर्चित नारे ‘हम दो हमारे दो’ का पालन भी कर रही हैं। ऐसे में ‘हम दो हमारे दो’ के इस दौर में जिन्हें लोग अपना आदर्श मानते हैं, अगर वे ही दो से अधिक बच्चे पैदा करने लगें तो इसे बिडंबना ही कहा जाएगा, क्योंकि ऐसे लोगों को गंवार तो कहा नहीं जा सकता है।

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2010 में कांग्रेस सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित हो चुके सैफ़ अली ख़ान का 1990 के दशक में अभिनेत्री अमृता सिंह से अफेयर हुआ। यह अफेयर इतना सीरियस था कि सैफ़ अली ने अपने से 12 साल बड़ी अमृता से 1992 में निकाह कर लिया। अमृता निकाह के बाद अमृता ख़ान पटौदी बन गईं। सैफ़ अली और अमृता से 1995 में बेटी अभिनेत्री सारा अली ख़ान पटौदी और 2001 में बेटा इब्राहिम अली ख़ान पटौदी पैदा हुए। इबाहिम के जन्म के बाद, जैसा कि फिल्मों में होता है, दोनों को मन एक दूसरे से भर गया और उनमें अनबन होने लगी। इस वजह से सैफ़ अली ख़ान और अमृता सिंह ख़ान ने 2004 में संबंध विच्छेद करते हुए तलाक़ ले लिया।

2007 में सैफ़ अली ख़ान का अफेयर लंबे समय तक शाहिद कपूर की गर्लफ्रेंड रहीं करीना कपूर से शुरू हो गया। पहले तो दोनों अपने संबंध से इनकार करते रहे, लेकिन 2009 में उन्होंने अपने संबंधों की घोषणा कर दी और कुछ साल के अफेयर के बाद 2012 में सैफ़ अली ने अपने से 12 साल छोटी करीना कपूर से इस्मालिक रिति-रिवाज़ से निकाह कर लिया। करीना कपूर का करीना कपूर ख़ान बनने की कहानी और उनकी शादी ख़ासी चर्चा में रही। शादी के कुछ साल बाद सैफ़ अली ख़ान तीसरी बार तब पिता बने जब 2016 में उनकी बीवी करीना कपूर ख़ान ने एक बेटे को जन्म दिया।

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सैफ़ अली ख़ान ने अपनी तीसरी संतान का नाम ने तैमूर अली ख़ान पटौदी रखा, जिसे लेकर भी खासा बवाल हुआ था, क्योंकि भारत पर आक्रमण करने वाला तैमूर लंग चौदहवीं सदी का शासक था। उसे भारतीय इतिहास का खलनायक माना जाता है, क्योंकि उसकी गणना संसार के सबसे क्रूर, हत्यारे, लुटेरे और दंगाई के रूप में की जाती है। बहरहाल, बाद में यह विवाद शांत हो गया और सैफ़ अली और करीना वैवाहिक जीवन इन्जॉय करने लगे। इसके बाद कोरोना संक्रमण काल में ख़बर आई कि करीना कपूर ख़ान फिर से उम्मीद से हैं और 21 फरवरी को सैफ़ अली ख़ान और अपने दूसरे बच्चे को जन्म दिया।

सैफ़ अली ख़ान के अलावा किंग ख़ान कहे जाने वाले शाहरुख ख़ान और मिस्टर परफेक्ट आमिर ख़ान भी तीन-तीन संताने पैदा कर चुके हैं। बुद्धू बक्शे से अभिनय की शुरुआत करने वाले शाहरुख का दिल्ली की रमेश चंद्र छिब्बर और सविता छिब्बर की बेटी गौरी छिब्बर से 1983 में अफेयर हुआ। आठ साल बाद दोनों ने निकाह कर लिया और गौरी ने धर्म परिवर्तन करते हुए इस्लाम कुबूल कर लिया और गौरी ख़ान बन गईं। 1997 में इनका बेटा आर्यन ख़ान और 2000 में बेटी सुहाना ख़ान पैदा हुई। 2013 में ख़ान दंपति ने सरोगेसी से तीसरा बच्चा अबराम ख़ान को पैदा किया।

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इसी तरह मिस्टर परफेक्ट कहे जाने वाले आमिर ख़ान ने कयामत से कयामत की अभिनेत्री रीना दत्ता से 1986 में निकाह कर लिया। आमिर ख़ान और रीना दत्ता ख़ान से 1993 से जुनैद ख़ान और 1997 में इरा ख़ान पैदा हुई। इसी बीच आमिर के जीवन में सहायक निर्देशक किरण राव ने दस्तक दे दी। जिससे 2002 में आमिर और रीना में अनबन हुई और तलाक लेने का फैसला किया। तलाक़ मिलने के बाद 2005 आमिर ने किरण राव से निकाह कर लिया। 2011 में आमिर ख़ान की तीसरी संतान किरण राव ख़ान से पुत्र आज़ाद राव ख़ान के रूप में पैदा हुई। इसी तरह 1996 में श्रीदेवी से विवाह करने वाले बोनी कपूर भी तीन संतानों के पिता बने थे। पहली बीवी से बेटा अर्जुन कपूर और श्रीदेवी से दो बेटियां जान्ह्वी और खुशी हुईं।

इसके विपरीत कई सुपर हिट फिल्में देने वाले अभिनेता अक्षय कुमार और अजय देवगन के दो-दो संतानें हैं। अक्षय कुमार ने अभिनेत्री ट्विंकल खन्ना से शादी की और इस दंपति को बेटा अर्नव कुमार 2002 और बेटी नितारा कुमार 2012 में पैदा हुई। इसी तरह सिंघम-फेम अभिनेता अजय देवगन ने सुपरस्टार अभिनेत्री काजोल से शादी की। उनके यहां भी 2003 में बेटी न्यासा और 2010 में बेटा युग पैदा हुआ। इन चारों अभिनेताओं के समकक्ष सनी देओल और बॉबी देओल भी हैं और इन दोनों को भी दो-दो संतान हैं।

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ऐसे में सवाल यह है कि अगर भविष्य में सैफ़ अली ख़ान का करीना कपूर ख़ान से तलाक़ हो गया, जैसे दो बच्चों के बाद अमृता सिंह ख़ान से उनका तलाक़ हो गया था, तो क्या वह तीसरी बार शादी करेंगे और पांचवीं या छठवी बार पिता बनेंगे? ज़ाहिर है, इस तरह की प्रवृत्ति लोगों, ख़ासकर उन लोगों में जिन्हें बड़ी संख्या में लोग अपना आदर्श मानते हैं, नहीं होनी चाहिए। उलटे जनसंख्या नियंत्रण के प्रति उन्हें ख़ुद ही सचेत रहना चाहिए और एक या दो से अधिक बच्चे नहीं पैदा करना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जनसंख्या नियंत्रण का दायित्व सरकार से ज़्यादा इस देश के नागरिकों की होनी चाहिए।

जनसंख्या भारत जैसे देश के लिए नासूर बन गई है। हर जगह इंसानों की भीड़ बढ़ रही है। इस देश में इतने लोग पैदा हो रहे हैं कि संसाधन कम और धरती छोटी पड़ने लगी है। ग़रीबी, कुपोषण, बेरोज़गारी, निरक्षरता, अपराध, नक्सलवाद, आतंकवाद, आवासहीनता, अपर्याप्त स्वास्थ सेवा, धार्मिक उन्माद और कट्टरता जैसी समस्याओं की जननी जनसंख्या विस्फोट ही है। आबादी फ़िलहाल सुरसा बन गई है जो सब कुछ निगलती जा रही है। बढ़ती आबादी की भयावहता कोरोना संक्रमण काल में देखने को मिली, जब अस्पतालों में बेड के अभाव में बड़ी संख्या में लोगों ने दम तोड़ दिया।

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जहां दुनिया के बाक़ी देशों में लोग बेहतर जीवन जी रहे हैं, वहीं भारत में लोग थोक के भाव बच्चे पैदा करके ख़ुद तो परेशान हो ही रहे हैं, दूसरों को भी परेशान कर रहे हैं। आबादी पर नज़र रखने वाली भारत सरकार की बेवसाइट सेंसस इंडिया के मुताबिक़ देश में हर घंटे 3080 से ज़्यादा बच्चे पैदा होते हैं, जबकि मृत्यु दर प्रति घंटे 1099 से भी कम है। यानी लोगों की भीड़ में क़रीब दो हज़ार लोग हर घंटे बढ़ जाते हैं, जो किसी बड़ी कंपनी में कर्मचारियों की संख्या के बराबर है। हर घंटे पैदा हो रहे बच्चों के लिए भविष्य में रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ, शिक्षा और रोज़गार की व्यवस्था करना बहुत बड़ी गंभीर समस्या बन रही है।

जनसंख्या विस्फोट को देखकर ही वर्ल्‍ड हेल्‍थ ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट ‘वर्ल्ड पॉप्युलेशन प्रोस्पेक्ट्स-दी 2012 रिवाइज्ड’ में कहा गया है कि जन्म दर ऐसे ही बनी रही तो 2028 तक भारत की आबादी चीन से ज़्यादा हो जाएगी। भारत के पास विश्व की समस्त भूमि का केवल 2.4 फ़ीसदी हिस्सा है, जबकि विश्व जनसंख्या का 16.7 फ़ीसदी हिस्सा यहां रहता है। आबादी 1.38 अरब तक पहुंच चुकी है। भारतीय राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक़ आबादी पर अंकुश लगाने की कोई युक्ति कारगर नहीं हो रही है।

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1991-92 में मुस्लिम महिलाओं की कुल प्रजनन दर 4.41 थी तो हिंदू महिलाओं की 3.31 थी। 1998-99 और 2005-06 में मुस्लिमों की प्रजनन दर 3.4 थी तो हिंदुओं की प्रजनन दर 2.59 दर्ज की गई। आबादी वृद्धि का राष्ट्रीय फीगर 18 फ़ीसदी है, परंतु मुस्लिमों की आबादी 24 फ़ीसदी की दर से बढ़ रही है। आईएनएफएचएस की रिपोर्ट के मुताबिक मुस्लिम महिलाएं औसतन 3.6 बच्चे पैदा कर रही हैं, जबकि हिंदू महिलाएं औसतन 2.1 बच्चे पैदा कर रही हैं।

ऐसे में जो लोग हमारे आदर्श हैं या पब्लिक फीगर हैं, उन्हें केवल एक बच्चे पैदा करके समाज के सामने उदाहरण पेश करना चाहिए, ताकि लोग उनसे प्रेरित होकर थोक के भाव बच्चे पैदा करने में शर्म महसूस करें, लेकिन जब सुपरस्टार ही तीन-तीन, चार-चार बच्चे पैदा करेंगे तो आम आदमी को रोकना असंभव हो जाएगा।

लेखक- हरिगोविंद विश्वकर्मा

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