चौरी-चौरा विद्रोह क्यों हुआ इतना चर्चित?

0
1302

महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन के शुरू होने के 20 महीने बाद गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में 2 फरवरी 1922 को चौरा थाना प्रभारी गुप्तेश्वर सिंह ने मुंडेरा बाज़ार में महंगाई का विरोध कर रहे कुछ किसानों को मारा-पीटा और लॉकअप में बंद कर दिया। लिहाज़ा, 4 फरवरी को किसानों का समूह पुलिस से भिड़ गया था। पुलिस ने थाने के बाहर भीड़ पर गोली चला दी। जिसमें तीन लोग मारे गए। इससे भीड़ हिंसक हो गई और थाने में ही आग लगा दिया, जिसमें 23 पुलिसकर्मी ज़िंदा जल गए। गांधी की जीवनी लेखक लुई फिशर के मुताबिक असहयोग आंदोलन शांति की दृष्टि से नकारात्मक रहा, लेकिन प्रभाव की दृष्टि से बहुत सकारात्मक था। इसके लिए प्रतिवाद, परित्याग और स्व-अनुशासन ज़रूरी थे। यह स्वशासन हेतु प्रशिक्षण था। 1857 की क्रांति के बाद पहली बार असहयोग आंदोलन के अंग्रेजी राज की नींव हिल गई।

दरअसल, अगर इतिहास की बात करें तो कभी चौरी और चौरा आसपास के दो अलग-अलग गांवों के नाम थे। 1880 के दशक में एक रेलवे के ट्रैफिक मैनेजर ने इन दोनों गांवों का नाम एक साथ कर दिया। जनवरी 1885 में यहां रेलवे स्टेश की स्थापना की गई और उसका नाम चौरा-चौरी रखा गया। शुरुआत में सिर्फ़ रेलवे प्लेटफॉर्म और मालगोदाम को चौरी-चौरा कहा जाता था। बाद में चौरा गांव में बाज़ार लगने शुरू हुए और पूरे इलाक़े को चौरा-चौरी कहा जाने लगा। जिस थाने को 4 फरवरी 1922 को जलाया गया था, वह भी चौरा में ही था। इस थाने की स्थापना अंग्रज़ों ने 1857 की क्रांति के बाद की थी। पहले उसका नाम चौरा पुलिस स्टेशन था और वह तीसरे दर्जे का थाना था।

इसे भी पढ़ें – क्या आप जानते हैं, क्या था काकोरी कांड?

अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1 अगस्त 1920 को महात्मा गांधी के नेतृत्व में रोलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में असहयोग आंदोलन शुरू किया। आंदोलन शुरू करते समय गांधी का मानना था कि अगर असहयोग आंदोलन के सिद्धांतों का सही ढंग से पालन किया गया तो एक साल के अंदर अंग्रेज़ भारत छोड़कर चले जाएंगे। उन्होंने उन सभी वस्तुओं, संस्थाओं और व्यवस्थाओं का बहिष्कार करने का आह्वान किया था, जिसके ज़रिए अंग्रेज़ यहां शासन कर रहे थे। उन्होंने विदेशी वस्तुओं, अंग्रेज़ी क़ानून, शिक्षा और प्रतिनिधि सभाओं के बहिष्कार की बात कही। गांधी ने असहयोग आंदोलन में भाग लेने के लिए खिलाफत आंदोलन के अली बंधुओं और दूसरे नेताओं को आमंत्रित किया।

वस्तुतः 1908 में खलीफ़ा का पद समाप्त करने और 1912 में तुर्की-इटली तथा बाल्कन युद्धों में ब्रिटेन का तुर्की का विरोध करने के क़दम को भारतीय मुसलमानों ने इस्लामी संस्कृति और सर्व इस्लामवाद पर प्रहार माना। हालांकि उस मुद्दे का भारत से कोई सरोकार नहीं था। इसके बावजूद भारतीय मुसलमान ब्रिटिश सरकार से नाराज़ हो गए। इस नाराज़गी को अबुल कलाम आज़ाद, ज़फ़र अली ख़ान और मोहम्मद अली जैसे नताओं ने व्यापक स्वरूप दिया। 1919 में अली बंधुओं ने अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी का गठन कर दिया। ख़िलाफ़त कमेटी ने जमियत-उल-उलेमा के सहयोग से ख़िलाफ़त आंदोलन का संगठन किया और 1920 में ख़िलाफ़त घोषणा-पत्र जारी किया गया।

इसे भी पढ़ें – क्या ‘अगस्त क्रांति’ ही देश के विभाजन की वजह बनी…?

महात्मा गांधी के आग्रह पर असहयोग आंदोलन और उस आंदोलन में ख़िलाफ़त आंदोलन के नेताओं को साथ लेने का का प्रस्ताव भी पारित करने के लिए 4 सितंबर 1920 को कांग्रेस का कलकत्ता में विशेष अधिवेशन बुलाया गया। लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव भी पारित कर दिया गया। इस तरह अंग्रज़ों के ख़िलाफ़ संघर्ष में महात्मा गांधी ने ख़िलाफ़त आंदोलन‎ के नेताओं से हाथ मिला लिया। गांधी के क़दम से मोहम्मद अली जिन्ना हैरान हुए थे। कट्टरता को एकदम से नापसंद करने वाले जिन्ना ने ख़िलाफ़त आंदोलन में शामिल होने के गांधी के फ़ैसले का तीव्र विरोध किया। जिन्ना हैरान थे कि गांधी मुसलमानों के मामले में मुस्लिम नेताओं से भी ज़्यादा दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं।

बहरहाल, ख़िलाफ़त आंदोलन के मुद्दे पर जिन्ना का गांधी से मतभेद इस कदर बढ़ गया कि दोनों शीर्ष नेताओं के बीच फिर कभी सुलह न हो सकी। लेकिन गांधी ने जिन्ना के विरोध की बिल्कुल परवाह नहीं की और ख़िलाफ़त आंदोलन को असहयोग आंदोलन से जोड़ दिया। उनके इस क़दम का कांग्रेस के अंदर भी विरोध हुआ, लेकिन गांधी टस से मस नहीं हुए। दरअसल, कहा जाता है कि गांधी को उम्मीद थी कि असहयोग आंदोलन को खिलाफ़त आंदोलन के साथ मिलाने से भारत के दो प्रमुख समुदाय हिंदू और मुसलमान मिलकर औपनिवेशिक शासन का अंत कर देंगे। हालांकि उनकी उम्मीद पूरी नहीं हुई, क्योंकि देश को आज़ाद होने के लिए 15 अगस्त 1947 तक इंतज़ार करना पड़ा।

इसे भी पढ़ें – महात्मा गांधी की हत्या न हुई होती तो उन्हें ही मिलता शांति नोबेल सम्मान

महात्मा गांधी ने सभी देशवासियों से ब्रिटिश सरकार के साथ सभी तरह के संबंधों के परित्याग करने का आह्वान किया। जो लोग भारत से उपनिवेशवाद को ख़त्म करना चाहते थे उनसे गांधी आग्रह किया कि वे स्कूलों, कॉलेजों और न्यायालयों का बहिष्कार करें और सरकार को किसी तरह का कर न चुकाएं।  उन्होंने कहा कि अगर असहयोग आंदोलन का ठीक ढंग से पालन किया गया तो भारत एक वर्ष के भीतर स्वराज प्राप्त कर लेगा। महात्मा गांधी के जीवनी ‘स्टोरी ऑफ महात्मा गांधी’ के अमेरिकी लेखक-पत्रकार लुई फ़िशर ने लिखा है कि असहयोग आंदोलन से महात्मा गांधी की लोकप्रियता बहुत अधिक बढ़ गई। इस तरह असहयोग आंदोलन शांतिपूर्ण तरीक़े से पूरे देश में चलती रहा।

इतिहासकार शाहिद अमीन की किताब ‘इवेंट, मेटाफर, मेमोरी – चौरी-चौरा 1922-92’ (Event, Metaphor, Memory – Chauri Chaura 1922-92) इस बीच चौरा-चौरी की घटना के दो दिन पहले, 2 फरवरी 1922 को भगवान अहीर नामक रिटायर सैनिक के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाले किसानों ने बाजार में खाद्य पदार्थों की बढ़ी कीमतों के विरोध और शराब की बिक्री रोकने के लिए चौरी के निकट मुंडेरा बाजार में प्रदर्शन किया। चौरा थाने की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा था। कई स्थानीय नेताओं को गिरफ्तार कर चौरा पुलिस स्टेशन के लॉकअप में बंद कर दिया गया था। इस दुर्व्यवहार से वहां के लोग क्षुब्ध हुए और इस घटना के विरोध में 4 फरवरी को बाजार में विरोध प्रदर्शन करने का फ़ैसला किया गया था।

इसे भी पढ़ें – जाति बहिष्कृत होने के बाद जिन्ना के पिता हिंदू से मुसलमान बन गए

4 फरवरी को लगभग तीन हज़ार प्रदर्शनकारी संतबक्श सिंह के नेतृत्व में एकत्रित हुए और चौरी में बाजार की ओर मार्च करने लगे। वे बाजार में एक शराब की दुकान को बंद करवाने लगे तो उनके विरोध को कुचलने के लिए पुलिस ने दमनात्मक कार्रवाई शुरू की। उनके नेता को गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी पिटाई करके उन्हें भी जेल में डाल दिया गया। लिहाज़ा, प्रदर्शनकारियों ने चौरा-चौरी थाने के घेराव किया और अपने नेता की रिहाई की मांग करते हुए नारे लगाने लगे। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सशस्त्र पुलिस को भेजा गया, जबकि भीड़ ने बाजार की ओर मार्च किया और सरकार विरोधी नारे लगाने शुरू कर दिए। भीड़ को डराने और तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने हवा में गोलियां चलाई। पुलिस के इस क़दम से भीड़ उत्तेजित हो गई और पुलिस पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया।

स्थिति नियंत्रण से बाहर होने पर थाना प्रभारी गुप्तेश्वर सिंह ने पुलिस दल को गोली चलाने का आदेश दे दिया। पुलिस की गोली से तीन लोगों की मौत हो गई और दर्जन भर लोग घायल हो गए। हालांकि स्थानीय लोगों का मानना है कि पुलिस की दमनात्मक कार्रवाई में कई ग्रामीण मारे गए, पर ब्रिटिश रिकॉर्ड में महज तीन की ही मत्यु का नामोल्लेख है। इसके बाद गुस्साई भीड़ अनियंत्रित हो गई और गोलियों की आवाज़ से अप्रभावित थाने में आग लगा दी। जिससे कई पुलिसकर्मी और चपरासी अंदर फंस गए। पूरा थाना धू-धू कर जलने लगा। बाद में जलकर मरे 23 पुलिस वालों के शव निकाले गए। बुरी तरह जले दो पुलिस वालों की अस्पताल में मौत हो गई पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद सरकार ने चौरी-चौरा और उसके आसपास मार्शल लॉ घोषित कर दिया। कई छापे मारे गए और सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया। गांधी ने रक्तपात के लिए अपने आपको दोषी माना और पांच दिन के उपवास किया।

इसे भी पढ़ें – क्या सचमुच भारत गुलाम था, जो आजाद हुआ?

किसी भी तरह की हिंसा के सख़्त ख़िलाफ़ रहे गांधी ने इस आगजनी और मौत घटना के चलते 12 फरवरी 1922 को राष्ट्रीय स्तर पर असहयोग आंदोलन को रोकने की घोषणा कर दी। 16 फरवरी 1922 को गांधी ने अपने लेख ‘चौरी चौरा का अपराध’ में लिखा, अगर आंदोलन वापस नहीं लिया जाता तो दूसरी जगहों पर भी ऐसी घटनाएं होतीं। जल्दबाजी में अहिंसा के महत्व पर पर्याप्त जोर दिए बिना और लोगों को ब्रिटिश राज के खिलाफ विद्रोह करने के लिए मैंने उकसाने का काम किया। दरअसल, भारतीय जनता अभी स्वतंत्रता के लिए प्रशिक्षित और तैयार नहीं है। गांधी ने इस घटना के लिए एक तरफ जहां पुलिस को ज़िम्मेदार ठहराया, क्योंकि उकसाने पर ही भीड़ ने यह कदम उठाया था। उन्होंने कहा कि घटना में शामिल तमाम लोग अपने आपको पुलिस के हवाले कर दें, क्योंकि उन्होंने अपराध किया है।

ढेर सारे नेताओं को महात्मा गांधी का निर्णय उचित नहीं लगा। उनके फैसले से क्रांतिकारियों का दल नाराज़ हो गया था। यहां तक कि जेल में बंद जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाषचंद्र बोस और लाललाजपत राय समेत कांग्रेस के अधिकांश नेताओं को गांधी का क़दम जल्दबाजी में उठाया गया गलत क़दम लगा। जबकि भारत में ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ संपूर्ण राष्ट्र आखिरकार एकजुट हो रहा था। 1922 के गया कांग्रेस में कांग्रेस नेता प्रेमकृष्ण खन्ना और उनके साथियों ने रामप्रसाद बिस्मिल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर गांधी का विरोध किया। उधर असहयोग आंदोलन शुरू करने के लिए गांधी पर अंग्रज़ सरकार की ओर से राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया था और मार्च 1922 में गांधी को गिरफ़्तार कर लिया गया था। उन्हें छह साल कैद की सजा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में फरवरी 1924 में उनके बीमार स्वास्थ्य के आधार पर रिहा कर दिया गया था।

इसे भी पढ़ें – ‘वंदे मातरम्’ मत बोलें, पर शोर भी न मचाएं कि ‘वंदे मातरम’ नहीं बोलेंगे..

सुभाषचंद्र कुशवाहा की किताब ‘चौरी-चौरा’ के मुताबिक, चौरा-चौरी में पुलिस कर्मियों की हत्या के मामले में 228 लोग गिरफ़्तार किए गए और उनके ख़िलाफ़ दंगा और हत्या का मुक़दमा चलाया गया। छह आरोपियों की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई। 8 महीने बाद 9 जनवरी 1923 को गोरखपुर सेशन कोर्ट का फ़ैसला आया और 172 आरोपियों को फ़ांसी की सज़ा और शेष को 2 साल से लेकर आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई। इतनी बड़ी तादाद में लोगों को फ़ांसी देने के अदालत के फ़ैसले का पूरे देश में विरोध हुआ। कम्युनिस्ट नेता एम.एन रॉय ने इसे लीगलाइज़्ड मर्डर (legalised murder) कहा और इसके ख़िलाफ़ भारतीय कामगारों की सामान्य हड़ताल का आह्वान किया। इस फ़ैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

स्थानीय संत बाबा राघव दास के निवेदन पर महामना मदनमोहन मालवीय ने मुकदमे की पैरवी की और न्यायाधीश थियोडोर पिगॉट खे सामने अपनी जोरदार दलील दी। फिर भी हाईकोर्ट ने 20 अप्रैल 1923 को दिए अपने फ़ैसले में संपत चमार, अब्दुल्ला, विक्रम अहीर, लाल मोहम्मद, साहदेव कहार, मेघू तिवारी, तूफानी और लौटू समेत 19 लोगों की फ़ांसी की सज़ा बरक़रार रखी और 110 लोगों की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। 43 लोगों में से 19 लोगों को 8 साल की सश्रम कारावास और शेष को 2 से 5 साल की सज़ा हुई। फ़ासी की सज़ा पाने वाले 19 लोगों को 2 जुलाई 1923 से लेकर 11 जुलाई 1923 के बीच फ़ासी के फंदे पर लटका दिया गया।

1971 में गोरखपुर ज़िले के लोगों ने चौरी-चौरा शहीद स्मारक समिति का गठन किया। इस समिति ने 1973 में चौरी-चौरा में 12.2 मीटर ऊंचा मीनार के आकार का स्तंभ बनाया गया। इसके दोनों तरफ़ एक शहीद को फांसी से लटकते हुए दिखाया गया था। इसे लोगों के चंदे के पैसे से बनाया गया। उस समय इसकी लागत तब 13,500 रुपए आई थी। बाद में केंद्र रकार ने शहीदों की याद में अलग शहीद स्मारक बनवा दिया। इसे ही मुख्य शहीद स्मारक के तौर पर जाना जाता है। इस पर शहीदों के नाम खुदवा कर दर्ज किए गए हैं। बाद में भारतीय रेलवे ने दो ट्रेन भी चौरी-चौरा के शहीदों के नाम से चलवाई। इन ट्रेनों के नाम शहीद एक्सप्रेस और चौरी-चौरा एक्सप्रेस रखे गए हैं।

इसे भी पढ़ें – सरदार पटेल, जेपी व मोरारजी जानते थे कि महात्मा गांधी की हो सकती है हत्या

चौरी-चौरा घटना के सौ साल पूरे होने के मौके पर आयोजित समारोह का वर्चुअल उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार चौरी-चौरा की घटना के सौ साल पूरे होने पर इस शताब्दी समारोह का आयोजन कर रही है। इस मौके पर डाक टिकट का भी विमोचन किया जाएगा। यह कार्यक्रम उत्तर प्रदेश के सभी 75 ज़िलों में आयोजित किया जाएगा। चौरी-चौरा घटना की याद में पूरे साल आयोजन होंगे और 4 फरवरी 2022 को इसका समापन होगा। इस दौरान विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाएंगी।

इसे भी पढ़ें – सिर काटने वाली पाशविक-प्रवृत्ति के चलते वाकई संकट में है इस्लाम