मुंबई से केवल सौ किलोमीटर दूर ‘महाराष्ट्र का कश्मीर’

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कभी-कभी हम जीवन की आपाधापी, व्यस्त दिनचर्या, भागम-दौड़, वर्क प्रेशर से बहुत ज़्यादा ऊब जाते हैं। एकदम से ऊर्जाहीन हो जाते हैं और थकान महसूस करने लगते हैं। तब हम ब्रेक चाहते हैं और हम ऐसी जगह की तलाश करने लगते हैं या जाने की सोचने लगते हैं, जहां सुकून हो, शांति हो और सहजता हो। हां, ऐसी जगह जहां कोई बनावटी या कृत्रिम चीज़ न हो, जो हो सब अपने मूल रूप में हो, जिससे हम एकदम सहज होकर अपने आपका होकर रह जाएं। अगर आप भी वाक़ई ब्रेक लेने वाली इस तरह की मनःस्थिति से गुज़र सकते हैं तो निश्चित रूप से आपके लिए पुणे से सटा हुआ पावना लेक (Pawna Lake) का कई किलोमीटर में फैला विशाल किनारा शानदार विकल्प है। इसीलिए इस जगह को ‘महाराष्ट्र का कश्मीर’ (Kashmir of Maharashtra) कहें तो अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा।

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यह जगह इतनी प्यारी और रमणीय है कि यहां पहुंच पर हर इंसान प्रकृति के साथ पूरी तरह घुल मिल जाता है। वह अपने नैसर्गिक रूप में आ जाता है। बालक बन जाता है, प्रकृति का बच्चा। वह इधर-उधर घूमता है। पानी में तैरता है। बोटिंग करता है। पहाड़ चढ़ता है और पहाड़ उतरता है। पहाड़ के शीर्ष से सूर्योदय और सूर्यास्त का दीदार करता है। वह प्रकृति के साथ अठखेलियां करता हुआ बहुत ख़ुश और एकदम से बिंदास हो जाता है। थोड़े समय में ही इतना प्रसन्न हो जाता है कि जीवन के सारे तनावों से बहुत दूर हो जाता है और अचानक से अपने को तंदुरुस्त, ऊर्जावान और जोश से भरपूर महसूस करने लगता है।

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यहां कई किलोमीटर के दायरे में फैली शांत, शीतल, निर्मल, विशाल और गहरी झील है। इस ठहरी हुई ख़ूबसूरत और मनोहारी झील को चारों ओर से पश्चिमी घाट (Western Ghat) के विशाल सह्याद्रि पर्वतमाला (Sahyadri mountain ranges) के पथरीले पहाड़ों ने घेर रखा है। ये छोट-बड़े पहाड़ विविध प्रकार के फलदार वृक्ष और वनस्पतियों से ढंके हुए रहते हैं। यह रमणीय इलाक़ा कई दुर्लभ हानिरहित वन्य जीवों का बसेरा भी बना हुआ है। इन सबका संगम इस जगह पहुंचने वाले को धरती के स्वर्ग कश्मीर जैसी अनुभूति प्रदान करता है। यहां मन इस तरह रम जाता है कि एक बार तो मन करता है कि यहां बस जाएं। यहीं के होकर रह जाएं।

केवल इस इलाक़े का नाम कश्मीर नहीं है, वरना कश्मीर जो भी प्राकृतिक खूबसूरती हमें मिलती है, कुदरत ने उन सबका इंतज़ामात यहां भी कर रखा है। इसीलिए यहां भी कश्मीर जैसी प्राकृतिक खूबसूरती और आबोहवा का दीदर होता है। सबसे बड़ी बात यहां का गुलाबी मौसम हलका सा सर्द तो है लेकिन कश्मीर जैसी हांड़ कंपा देने वाली ठंड बिल्कुल भी नहीं है। पावना बांध क्षेत्र के इस जगह को महाराष्ट्र का कश्मीर कहें तो तनिक भी अतिरंजनापूर्ण नहीं होगा। प्रदूषण में सांस लेने वाले मुंबई और आसपास के लोगों के लिए घूमने-फिरने का यह सर्वोत्तम जगह है। सबसे बड़ी बात यह मुंबई से महज सौ किलोमीटर दूर है। लोनावला से तो यह केवल 20 किलोमीटर की दूरी पर है।

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पावना झील (Pawna Lake) के किनारे और आसपास के पहाड़ों पर की यह ज़मीन एक ज़माने में पथरीली और बंजर हुआ करती थी, लेकिन जबसे समाज के प्रकृति- प्रेमी संभ्रांत तबक़े के लोग यहां आकर एक-दो दिन गुज़ारने लगे हैं। यहां फार्महाऊस बना लिया है, तब से यह इलाका एकदम से गुलज़ार हो गया है। इन निजी प्रयासों से यहां की पथरीली और बंजर ज़मीन को पर विविध प्रकार के पेड़ और वनस्पतियां लगाकर इस पूरे क्षेत्र को हरियाली से भर दिया गया है। अगर यह एक प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है तो इसका श्रेय इन संभ्रांत लोगों को ही जाता है, जिन्होंने एक तरह से जंगल में मंगल कर दिया।

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प्रकृति प्रेमी संभ्रांत लोगों ने यहां के किसानों से अनुपयोगी और अनऊपजाऊ ज़मीन लेकर उस ज़मीन को कड़ी मेहनत करके विकसित किया और उसे ऊपजाऊ बनाया। उस पर तरह तरह के आम, अमरूद, चीकू, स्ट्राबेरी, पपीता जैसे फलदार वृक्ष लगाकर यहां आबोहवा और पर्यावरण महफ़ूज ही नहीं किया बल्कि उसे और नैसर्गिक बना दिया है। गर्मियों यहां गेहूं, मूंगफली, दलहन, बाजरा, ज्वार, टमाटर और ककड़ी जैसी मौसमी फसलें उगाई जाती हैं। मानसून में व्यापक पैमाने पर चावल की फसल उगाई जाती है। गन्ना भी बड़े पैमाने पर ली जाने वाली फसल है। कई लोगों ने यहां देसी गाय का पालन कर रखा है। फार्महाऊस की देख-रेख करने वालों के लिए स्थानीय प्रशासन से विधिवत अनुमति लेकर कुछ छोटे-मोटे निर्माण भी किए गए हैं। कुछ लोगों ने निजी इस्तेमाल के लिए अधिनियम के दायरे में रहते हुए छोटे बंगले भी बनवाए है। जहां रात को ठहर भी सकता है। कुल मिलाकर इन इंसानी गतिविधियों के चलते इन दिनों पूरे पावना क्षेत्र का आकर्षण बहुत बढ़ गया है।

घूमने-फिरने और अच्छा समय गुज़ारने के लिए पावना बांध क्षेत्र शानदार है। पावना की पहाड़ियों से पैराग्लाइडिंग करने की सुविधा है। जहां धरती से ऊपर उठकर आसमान में उड़ते हुए बांध के ऊपर से सूर्यास्त का ख़ूबसूरत नज़ारा देखा जा सकता है। यहां ऊपर पहाड़ पर लोहागड़ किला (Lohagad Fort), विसापुर किला (Visapur Fort), कोरीगड़ किला (Korigad Fort), तुंग किला (Tung Fort) और तिकोना किला (Tikona Fort) जैसे दर्शनीय स्थल हैं। जहां पहुंचने के लिए पहाड़ पर ट्रेकिंग भी करते हैं। इनमें से कई जगह पहुंचने के लिए समुद्र तल से 3500 फीट से भी अधिक की ऊंचाई तक ट्रेकिंग (trecking) करनी पड़ती है। यहां दूधिवारे वाटरफॉल (Dudhiware Waterfall) का दीदर करते हुए कई लोग गिरते पानी के नीचे स्नान भी करते हैं। पावना बांध के किनारे पर 70 से अधिक कैंपसाइट्स (Campsites) हैं, जिनका प्रबंधन विभिन्न कंपनियां करती हैं। यहां रात में ठहर कर प्रकृति से साक्षात्कार किया जा सकता है। यहां से कुछ दूर त्रिंबकेश्वर महादेव मंदिर (Trimbakeshwar Mahadev Temple), सप्त जलकुंड (Seven Water Tanks) और सातवाहन गुफाएं (Satvahan caves) जैसे दर्शनीय स्थल हैं।

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अगर कुछ स्थानीय लोगों को छोड़ दें तो पावना बांध क्षेत्र का पूरा इलाक़ा आबादी-रहित ही कहा जाएगा। यहां जिन लोगों के फार्महाऊस हैं, उन्होंने उसकी देख-रेख को लिए कुछ कर्मचारियों को रखा है। जिससे यहां बड़ी संख्यां में कोई कौशल न जानने वालों को रोज़गार मिला हुआ है। कुल मिलाकर पावना क्षेत्र में महाराष्ट्र का प्रमुख पर्यटन स्थल बनने की पूरी संभावना है। अगर राज्य सरकार चाहे तो यहां पर्यटकों को लुभाने के लिए इसे और भी अधिक खूबसूरत और दर्शनीय बनाकर यहां से राजस्व कमा सकती है। अभी तो यहां के संपर्क मार्गों की दशा ठीक नहीं है। हालांकि सरकार की ओर से सड़क निर्माण का कार्य चल रहा है।

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अगर पावना क्षेत्र की बात करें तो पुणे के मावल तालुका का यह पहाड़ी इलाक़ा सदियों से उपेक्षित था और वीरान पड़ा था। 1960 में देश के मानचित्र पर महाराष्ट्र राज्य के अस्तित्व में आने के बाद दूरदर्शी मुख्यमंत्री यशवंतराव चव्हाण की सरकार ने राज्य में कई जगह बांधों के निर्माण की मंजूरी दी। उन प्रस्तावों में से एक पिंपरी-चिंचवड़ की आबादी को जलापूर्ति और जल विद्युत के निर्माण के लिए पावना नदी पर बांध बनाने का प्रस्ताव भी था। ज़मीन अधिग्रहण संबंधी ज़रूरी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद मारोतराव कन्नमवार के कार्यकाल में 1963 में पावना बांध के निर्माण का कार्य शुरू हुआ। राज्य के विजनरी चीफ़ मिनिस्टर वसंतराव नाईक के कार्यकाल में इसके निर्माण कार्य में तेजी आई और 1972 में यह बांध और पन बिजली केंद्र बनकर तैयार हो गया। 1973 में ख़ुद नाईक ने ही 10 टीएमसी क्षमता वाले पावना बांध और यहां की 1250 मेगावाट क्षमता वाली पनबिजली परियोजना का उद्घाटन किया।

यहां जमीन खरीदने वालों ने लोगों ने पावना प्रॉप्रर्टी ओनर असोसिएशन नाम से एक संगठन बनाया है। पावना झील के प्रदूषणरहित और स्वच्छ बनाना और यहां के पर्यावरण को और समृद्ध करना ही इस संगठन का मुख्य उद्देश्य है। संगठन के कार्यकारी अधिकारी रोहित लाल कहते हैं, “पहले यह इलाक़ा वीरान और बंजर था। हम लोगों ने कड़ी मेहनत करके उसे ऊपजाऊ और हरा-भरा बनाया है और तरह तरह के वृक्ष लगाएं हैं। जहां पहले यह इलाका एकदम से खुला था, वहीं अब यहां की धरती पेड़ों से ढंकी हुई दिखती थी। हम लोगों ने यहां की हरियाली को और अधिक समृद्ध किया है। फार्म हाऊस की देख-रेख करने वाले हमारे लोग खेती भी करते हैं। हम प्रकृति प्रेमी हैं और यहां के पर्यावरण का संरक्षण करते हैं। हम अपने फार्म हाउस का कॉमर्शियल इस्तेमाल से पूरी तरह परहेज़ करते हैं।”

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रोहित लाल कहते हैं, “पावना प्रॉप्रर्टी ओनर असोसिएशन बांध में जल स्तर बनाएं और उसे स्वच्छ रखने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहता है। इसीलिए असोसिएशन की ओर से समय समय पर बांध का तलछट साफ कर उसकी गाद से पहाड़ों पर उपजाऊ मिट्टी की परत चढ़ाकर देसी पेड़ पौधे लगाए जाते हैं जिससे न केवल बांध में पानी का भंडारण बढ़ रहा है, बल्कि पहाड़ों से साइल एरोजन भी घटा है। वृक्षारोपण से यहां आसापस की हरियाली भी बढ़ी है। असोसिएशन समय-समय पर कई संगीत म्यूजिक और कला फेस्टिवल का भी आयोजन करता रहता है, जिससे विश्वस्तर पर पावना को ख्याति मिल रही है और विदेशी सैलानियों के आने की वजह से स्थानीय व्यवसायियों को कारोबार बढ़ा है और स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिला है।”

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प्रकृति का नियम है, जहां अच्छे और जनहित के कार्य होते हैं, वहां ऐसे तत्व भी सक्रिय हो जाते हैं, जिनका कुछ न कुछ वेस्टेड इंटरेस्ट होता है। पावना में भी कुछ इसी तरह की परिस्थिति बन गई है। एक ओर जहां प्रकृति प्रेमियों की मेहनत से पावना क्षेत्र लगातार तरक्क़ी कर रहा है। वहीं दूसरी ओर विकास की रफ़्तार किसी भी क़ीमत पर रोकना चाहते हैं। इसीलिए वेस्टेड इंटरेस्ट वाले लोगों ने कथित तौर पर स्थानीय गांव वालों का प्रतिनिधित्व बन कर उनकी ओर से राष्ट्रीय हरित पंचाट यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की गई है। इस याचिका में इस पावना क्षेत्र को दर्शनीय बनाने वाले प्रकृति-प्रेमियों पर ही लेक की इकोलॉजी से छेड़छाड़ करने का आरोप लगा दिया गया है। याचिकाकर्ताओं में कुछ राजनेता और पर्यावरण कार्यकर्ता भी शामिल हैं। इनका आरोप है कि इन फार्म हाऊसेस के चलते बांध प्रदूषित हो रहा है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि उद्योगपति, बिज़नेसमेन, हीरा व्यापारी, अभिनेता, क्रिकेटरों और दूसरे धनवान लोगों ने पावना बांध से सटे क्षेत्रों और पहाड़ियों के किनारे अवैध रूप से बंगले, विला और फार्म हाऊस का निर्माण करके इलाके के पर्यावरण को असंतुलित कर दिया है। आरोप यह भी है कि इस निर्माण की वजह से इस क्षेत्र की अति संवेदनशील जैव विविधता को रौंदी जा रही है और पर्यावरण सरंक्षण से संबंधित नियमों से छेड़छाड़ कर रहे हैं। इसमें पावना प्रॉप्रर्टी ओनर असोसिएशन के सदस्यों को वादी बनाया गया है। फिलहाल मामले की सुनवाई राष्ट्रीय हरित पंचाट में चल रही है और दोनों तरफ से लोग अपना-अपना पक्ष रख रहे हैं। वैसे इस याचिका में पर्यावरण एवं वन विभाग, पुणे मेट्रोपोलिटन रिजन डेवलपमेंट अथॉरिटी और महाराष्ट्र राज्य जैव विविधता मंडल को भी पक्षकार बनाया गया है।

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याचिका में आरोप लगाया गया है कि पावना क्षेत्र में स्थित 53 फार्म हाऊसेस से गंदगी छोड़ी जाती है, जिससे बांध का पानी प्रदूषित हो रहा है। इस मुद्दे पर रोहित लाल कहते हैं, यहां केवल फार्म हाऊस की देख-रेख करने वाले कर्मचारी ही रहते हैं। इससे पावना को प्रदूषित करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। रोहित लाल यह भी कहते हैं के राष्ट्रीय हरित पंचाट को खुद या अपने भरोसेमंद प्रतिनिधि को एक बार ख़ुद इस इलाक़े का दौरा करने के लिए भेजना चाहिए। तब पता चल जाएगा कि पावना क्षेत्र में स्थित फार्म हाउस पावना क्षेत्र का विकास कर रहे हैं या यहां के पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं। हम लोग यहां के पर्यावरण को समृद्ध कर रहे हैं, लेकिन आरोप लग रहा है कि हम यहां के इको-सिस्टम को ख़राब कर रहे हैं, जो कि ग़लत और पूर्वाग्रह से प्रेरित आरोप है।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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