कैंसर मरीजों की आखिरी उम्मीद – टाटा मेमोरियल सेंटर

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स्थापना दिवस पर विशेष

देश के लाखों कैंसर मरीज़ों के लिए उम्मीद की एकमात्र किरण टाटा मेमोरियल केंद्र (Tata Memorial Centre) यानी टाटा कैंसर अस्पताल पिछले साढ़े सात दशक से लाइलाज कैंसर से जूझ रहे लोगों को चिकित्सा सुविधा मुहैया करवा रहा है। इस अस्पताल की स्थापना 1941 को सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (Sir Dorabji Tata Trust) ने की थी। तब से इस अस्पताल में देश-विदेश के कैंसर रोगियों का हमेशा जमावड़ा रहा है। यह अस्पताल हर साल मौत का साक्षात्कार करने वाले हज़ारों कैंसर रोगियों की जान बचाता है। इस लेख में जानते हैं इस अस्पताल के बारे में।

एक ऐसी जगह जहां अस्पताल परिसर में तो मरीज़ों और उनके परिजनों की भीड़ दिखती ही है। टाटा अस्पताल की ओर जाने वाली सड़कों के फुटपाथों पर भी कैंसर रोगियों और उनके परिजनों को बेड का इंतज़ार करते देखा जा सकता है। यह नज़ारा किंग एडवर्ड मेमोरिल अस्पताल (केईएम अस्पताल) के उत्तर में बने टाटा मेमोरियल केंद्र यानी टाटा कैंसर अस्पताल का होता है। यहां रोगियों की भीड़ देखकर यही लगता है, कि शायद पूरे देश को कैंसर हो गया है और यही एकमात्र अस्पताल है, जहां कैंसर मरीज़ों का बिना लूट-खसोट के इलाज होता है, सो हर कैंसर मरीज़ इलाज के लिए यहीं चला आता है।

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चिकित्सा विज्ञान ने हार नहीं मानी
कैंसर रोग विश्वस्तरीय समस्या है। पता चलते ही मरीज़ सोच लेता है कि जीवन का अंत आ गया है, किंतु अब ऐसा नहीं है। चिकित्सा विज्ञान ने हार नहीं मानी है। कैंसर पर नित्य नए शोध हो रहे हैं और इलाज के नए-नए तरीक़े ईजाद किए और अपनाए जा रहे हैं। नई-नई दवाइयां आ रही हैं। इसीलिए कैंसर रोगियों को जीवित रखने में सफलता मिल रही है। बहरहाल, दुनिया भर में कैंसर के क़रीब एक से सवा करोड़ मरीज़ हैं। इनमें से 50 फ़ीसदी से ज़्यादा विकासशील देशों से हैं। भारत में किसी भी समय 25 लाख कैंसर मरीज़ होते ही हैं। बहुत कम लोग ही कैंसर से लड़ाई में जीत पाते हैं, बाक़ी लोगों को कैंसर अपना ग्रास बना लेता है। यहां हर साल 8 लाख लोग कैंसर की चपेट में आ जाते हैं।

कैंसर रोगियों का इलाज कठिन
सवाल उठता है कि क्या भारत कैंसरयुक्त भविष्य की चुनौती का मुक़ाबला करने के लिए तैयार है? इसका जवाब है “नहीं”। टाटा मेमोरियल सेंटर के डीन रहे डॉ मोहनदास मेलथ कहते हैं, “देश में कैंसर की दर एक लाख की आबादी में क़रीब सौ है। दरअसल, कैंसर मरीज़ों की संख्या देखते हुए देश के हर राज्य में टाटा मेमोरियल अस्पताल की ज़रूरत है। फ़िलहल, टाटा मेमोरियल अस्पताल देश में कैंसर के क़रीब एक तिहाई मरीज़ों का इलाज करता है। इस तरह टाटा मेमोरियल सेंटर का कैंसर रोगियों के उपचार में अहम योगदान है।

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पड़ोसी मुल्कों से भी आते हैं मरीज़
इस कैंसर अस्पताल में न केवल पूरे भारत से, बल्कि पड़ोसी देशों से भी क़रीब 64000 मरीज़ हर साल आते हैं। जिसमें से 70 फीसदी कैंसर रोगियों का मुफ्त इलाज होता है। 1300 मरीज़ रोज़ाना ओपीडी में जांच करवाते हैं। 80 बेड वाला अस्पताल 53890 वर्गमीटर क्षेत्रफल में फैला है। अस्पताल में हर साल कैंसर से जुड़े 18500 माइनर ऑपरेशन, 11500 मेजर ऑपरेशन और 200 लेज़र सर्जरी होती है। सन् 2014 में यहा रोबोटिक सर्जरी शुरू की गई, तब से अब तक 50 रोबोटिक ऑपरेशन हो चुके हैं। हर साल यहां 6200 मरीज़ों की रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी की जाती है। यहां के डॉक्टर कई मरीज़ों की जान बचा लेते हैं। टाटा मेमोरियल अस्पताल के शोध द्वारा यह तथ्य सामने आया है कि प्रारंभिक स्तर पर रोग का पता लग जाने से कैंसर को जड़ से समाप्त किया जा सकता है।

टाटा मेमोरियल अस्पताल का इतिहास
सन् 1930 के आरंभ में दोराबजी टाटा की पत्नी मेहरबाई टाटा को ल्यूकेमिया कैंसर हो गया था। तब देश में कैंसर के इलाज की सुविधा नहीं थी। लिहाज़ा, टाटा सन्स के चेयरमैन और संस्थापक जमशेदजी टाटा के पुत्र दोराबजी टाटा मेहरबाई को लेकर न्यूयार्क के मैनहट्टन में स्थित न्यूयॉर्क कैंसर हॉस्पीटल गए। जहां 1932 में इलाज के दौरान मेहरबाई की मौत हो गई थी। दोराबजी इस बात से बहुत क्षुब्ध थे कि अपने देश में कैंसर अस्पताल न होने से वह अपनी पत्नी को लेकर न्यूयॉर्क गए और इस चक्कर में देरी हो गई, जिससे उनका अपनी जीवनसंगिनी से साथ छूट गया।

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28 फरवरी 1941 को हुआ जन्म
देश के बाक़ी लोगों को इस तरह की पीड़ा से दो-चार न होना पड़े, इस मकसद से दोराबजी टाटा ने सन् 1935 में अपने सहयोगियों और कुछ कैंसर विशेषज्ञों से सलाह मशविरा करने के बाद कैंसर अस्पताल बनाने का फ़ैसला किया। दोराबजी न्यूयॉर्क के कैंसर अस्पताल जैसी सुविधा भारत में लाना चाहते थे। उनकी मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी नवरोज़ी सकलतवाला ने इस काम को आगे बढ़ाया। अंततः जेआरडी टाटा के प्रयास से हाऊस ऑफ टाटा का 28 फ़रवरी 1941 को मुंबई के मजदूर इलाके परेल के बीचोंबीच सात मंज़िली इमारत बनाकर टाटा मेमोरियल अस्पताल अस्तित्व में आया। उस समय अस्पताल का वार्षिक वजट 5 लाख रुपए था। अस्पताल में कैंसर इलाज के लिए सभी आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक उपलब्ध कराई गई, जिससे रोगियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

1957 में केंद्र सरकार ने किया अधिग्रहण
सन् 1952 में कैंसर रिसर्च पर काम करने के लिए भारत सरकार की ओर से इंडियन कैंसर रिसर्च सेंटर की स्थापना की गई। बाद में उसका नाम कैंसर रिसर्च इंस्टिट्यूट (सीआरआई) कर दिया गया। 1957 में यूनियन हेल्थ मिनिस्ट्री ने टाटा मेमोरियल अस्पताल को अपने अधिकार में ले लिया। 1962 में इस अस्पताल का प्रबंधन डिपार्टमेंट ऑफ अटामिक एनर्जी को दे दिया गया। 1966 में टाटा मेमोरियल अस्पताल और कैंसर रिसर्च इंस्टिट्यूट को मिलाकर टाटा मेमोरियल सेंटर कर दिया गया।

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कई डॉक्टरों का रहा अहम् योगदान
इस अस्पताल के निर्माण में डॉ. जेसी पेमास्टर, डॉ. ई बोर्गीस, डॉ. डी मेहर-होमजी, डॉ. डीजे जूसवाला, डॉ. वीआर खानोलकर, डॉ. केजे रणदिवे का अहम् योगदान रहा है। बाद में डॉ. पीबी देसाई, डॉ. आरएस राव, डॉ. एमजी देव, डॉ. एएन भिसे और डॉ. केए दिनशॉ के सहयोग से अस्पताल नें बेहतर तरक़्क़ी में अहम् योगदान रहा। बाद में यह संस्थान डिपार्टमेंट ऑफ अटामिक एनर्जी के सक्रिय सहयोग और चेयरमैन एच भाभा, डॉ. वी साराभाई, डॉ. एचएन सेठना, डॉ. आर रमन्ना, डॉ. एमआर श्रीनिवासन, डॉ. पीके अयंगर, डॉ. आरसी चिदंबरम, डॉ. अनिल काकोडकर और डॉ. श्रीकुमार बैनर्जी के नेतृत्व में तेज़ी से आगे बढ़ा।

1983 में हुआ बोन मेरो का प्रत्यार्पण
कैंसर का मुख्य कारण है सेल्स का अनियंत्रित होकर पूरे शरीर में फैलना। कैंसर कई प्रकार का होता है, मसलन – ब्लड कैंसर, बोन कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, थ्रोट कैंसर, स्किन कैंसर, माऊथ कैंसर, लंग कैंसर, किडनी कैंसर, सरवाइकल कैंसर और लिवर कैंसर होता है। शरीर के किसी भी अंग में कैंसर हो सकता है। अनियमित खानपान, सिगरेट या वंशानुगत प्रमुख कारण हैं। कैंसर का कोई विशेष लक्षण नहीं है लेकिन अगर शरीर के किसी भाग में गांठ हो तो उसकी जांच ज़रूर करवानी चाहिए। टाटा मेमोरियल अस्पताल देश का पहला केंद्र था जिसने 1983 में बोन मेरो का प्रत्यार्पण किया। कुछ समय के बाद ही अस्पताल ने कैंसर के लिए आधुनिक तकनीक के अंतर्गत रेडिओलोजिकल, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्केनर, एमआरआई को अपनाया।

टाटा अस्पताल में उपलब्ध सुविधाएं
टाटा मेमोरियल अस्पताल के पास आधुनिक सुविधाओं से युक्त 8 ऑपरेशन थिएटर हैं। समान रूप से कैंसर होने पर भी इलाज समान रूप से नहीं होता, प्रत्येक मरीज का इलाज उसकी उम्र एवं रोग की अवस्था पर निर्भर करता है। कैंसर रोग में विभिन्नता होने पर भी सभी रोगियों पर इलाज रेडिएशन थेरेपी और कीमो थेरेपी के ज़रिए की जाती है। कई मामले में हार्मोन थेरेपी और इम्यूनो थेरेपी के लिए ऑपरेशन किया जाता है।

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1993 में ओंकोलोजी की स्थापना
1993 में टाटा मेमोरियल अस्पताल ने ओंकोलोजी डिपार्टमेंट की स्थापना की, जिसका उद्देश्य प्रारंभिक अवस्था में कैंसर का पता करना है। टाटा मेमोरियल अस्पताल की शोध समिति में विभिन्न डॉक्टर व वैज्ञानिक कैंसर की दवाइयों व इलाज के तरीकों पर शोध में लगे हैं, शोध के साथ ही यहां कैंसर के बारे में संपूर्ण जानकारी देने के लिए प्रशिक्षण केंद्र की व्यवस्था है। इस अस्पताल में स्नातकोत्तर की पढ़ाई होती है, इसका पाठ्यक्रम मुंबई विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त है, चिकित्सकीय, गैरचिकित्सकीय क्षेत्रों से 400 विद्यार्थी प्रतिवर्ष प्रशिक्षण के लिए आते हैं। टाटा मेमोरियल अस्पताल से प्रति वर्ष 35 से 40 छात्र पीएचडी की उपाधि प्राप्‍त करते हैं। टाटा मेमोरियल अस्पताल ने 2002 में वारसी कैंसर अस्पताल के लिए टेलीमेडिसीन व टेलिपेथोलोजी की सुविधा शुरू की, बाद में इसके साथ देश के उत्तरी-पूर्वी भाग के कैंसर अस्पताल जुड़ गए। यह अस्पताल कैंसर के प्रति जागरण अभियान चलाता है।

मील का पत्थर है यह संस्थान
कैंसर की रोकथाम और उपचार और रिसर्च के लिए टीएमसी वैश्विक स्वास्थ्य मानचित्र पर एक मील का पत्थर है। केंद्र कैंसर के क्षेत्र में शिक्षा पर ज़ोर देता है। डॉ दिनशा बताती हैं, “टीएमसी और टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च एवं डॉ भाभा के साथ अपने संबंधों के कारण डिपार्टमेंट ऑफ अटॉमिक एनर्जी ने अपनी कार्य संस्कृति टाटा समूह से विरासत में पाई है।” वह याद करती हैं कि जेआरडी टाटा संस्थान के प्रति किस हद तक प्रतिबद्ध थे। डॉ दिनशा बड़े चाव से अस्पताल में जेआरडी के दौरों को याद करती हैं, “उनका व्यक्तित्व इतना विशाल था; हम सब उनसे बेहद प्रभावित थे। वे सचेत एवं प्रतिबद्ध थे। मैं विशेष रूप से 1991 में स्वर्ण जयंती के उत्सव में उनके आगमन को याद करती हूं।”

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होमी भाभा कैंसर अस्पताल, वाराणसी
टाटा मेमोरियल अस्पताल लगातार अपना विस्तार कर रहा है। इसमें टाटा ट्रस्ट का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यद्यपि टाटा समूह के लोग सीधे टाटा मेमोरियल केंद्र में शामिल नहीं होते हैं, फिर भी रोगियों की एक बड़ी संख्या को देखते हुए टाटा ट्रस्ट वित्तीय सहयोग प्रदान करता रहता है। टाटा ट्रस्ट से कैंसर पर अनुसंधान के लिए भी अनुदान मिलता है। अब तक मुंबई के अलावा वाराणसी, नवी मुंबई, गुवाहाटी, विशाखापत्तनम, पंजाब के संरूर जिले में कैंसर अस्पताल खुल चुके हैं। वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहयोग से एक नहीं बल्कि कैंसर के दो-दो अस्पताल खुल गए हैं। मई 2018 में 179 बेड वाला होमी भाभा कैंसर अस्पताल शुरू हुआ।

वाराणसी में दूसरा कैंसर अस्पताल
वाराणसी में 350 बेड की क्षमता वाले दूसरे कैंसर अस्पताल का उद्घाटन रतन टाटा की उपस्थिति में नरेंद्र मोदी ने 19 फरवरी 2019 को किया। इसका नाम महामना पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर सेंटर रखा गया है। अस्पताल के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने अपने 1360 एकड़ परिसर के भीतर पंद्रह एकड़ ज़मीन को नवीनतम और आधुनिक सुविधाओं के साथ कैंसर अस्पताल के निर्माण के लिए परमाणु ऊर्जा विभाग को दान किया गया था। संपूर्ण निर्माण लागत को टाटा ट्रस्ट ने वहन किया था और निर्माण कार्य महज दस महीने में फरवरी 2019 में पूरा कर दिया गया और फरवरी से मरीज़ों का पंजीकरण भी शुरू हो गया। सबसे अच्छी बात है वाराणसी के दोनों कैंसर अस्पताल अस्पताल टाटा मेमोरियल केंद्र मुंबई से ही प्रबंधित होते हैं। वहां के डॉक्टर सर्जरी के लिए आते रहते हैं। यह अस्पताल भी मुंबई से ही प्रबंधित किया जा रहा है।

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यूपी में हर साल 1.5 लाख नए कैंसर मरीज़
मुंबई के कैंसर अस्पताल पहुंचने वाले उत्तर प्रदेश के कैंसर मरीज़ों को अब अमूमन यहीं भेज दिया जाता है। दरअसल, एक अनुमान के मुताबिक यूपी में हर साल क़रीब 1.5 लाख नए कैंसर के मामले आते हैं और मुंबई टाटा में कुछ मरीज़ों का 25 फ़ीसदी उत्तर प्रदेश से ही होते थे। इसलिए प्रकार वाराणसी में अत्याधुनिक कैंसर केंद्र की आवश्यकता थी। इस लिहाज़, धर्मनगरी वाराणसी में दो-दो कैंसर अस्पताल शुरू हो जाने से काफी राहत मिलेगी। यहां मध्य प्रदेश, झारखंड और बिहार के आसपास के क्षेत्रों से भी मरीज़ आसानी से इलाज करवा सकेंगे।

इन कैंसर अस्पतालों में डॉक्टर ईमानदारी और निष्ठा से रोगियों का इलाज करते हैं। टाटा मेमोरियल अस्पताल में केवल उन रोगियों को देखने की व्यवस्था नहीं है, जिनके पास अपॉइंटमेंट है, बल्कि आने वाले हर रोगी का इलाज़ किया जाता है। टीएमसी इसका उत्कृष्ट उदाहरण है कि निजी परोपकार एवं सार्वजनिक सहयोग कितनी अच्छी तरह एक साथ काम कर सकते हैं। और, जैसा कि उन असंख्य लोगों द्वारा अभिप्रमाणित किया जाएगा जिन्होंने उस कौशल और देखभाल से लाभ प्राप्त किया है जो केंद्र प्रदान करता है, जो एक अस्पताल से अधिक है, चूंकि यह एक ऐसी बीमारी के खिलाफ भारत की लड़ाई में अग्रिम पंक्ति पर है, जो किसी को भी कैद नहीं करती।

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कैंसर मरीजों का हमदर्द परमार्थ सेवा समिति