बारिश में डूबते शहरों से उफनते सवाल

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सरोज कुमार

आबादी, अतिक्रमण, और अनियंत्रित नियोजन के बोझ तले दबते भारत के शहर अब बारिश में डूबने लगे हैं। डूबना किसी एक शहर की कहानी नहीं है, बल्कि हर शहर की एक ही कहानी है। हर कहानी का कारण और निवारण भी एक ही है। बारिश में डूबने की ताज़ा कहानी तेलंगाना की राजधानी और देश का पहला आईटी हब रहे हैदराबाद की है। इसके पहले चेन्नई, मुंबई, पुणे, सूरत, दिल्ली, पटना, बाड़मेर और जैसलमेर जैसे शहरों में यह कहानी दोहराई जा चुकी है। पानी अपना रास्ता नहीं भूलता, लेकिन हम अपने रास्ते भूलते जा रहे हैं। ज़मीन की क़ीमत आसमान पहुंच गई तो जल स्रोतों पर अतिक्रमण शहरीकरण का नया शगल बन गया। डूबकर भी हम सबक लेने को तैयार नहीं हैं और शासन-प्रशासन प्रकृति को ज़िम्मेदार बताकर अपनी जवाबदेही से बच निकलता है। चपेट में आता है आम आदमी, जो लगभग बेग़ुनाह ही होता है।

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हैदराबाद में पिछले 13 अक्टूबर को हुई 192 मिलीमीटर बारिश से शहर की दो हज़ार से अधिक कॉलोनियां डूब गईं। कम से कम 50 लोगों की मौत हो गई और लगभग छह हज़ार करोड़ रुपए मूल्य की संपत्ति का नुकसान हुआ है। बारिश ने 17 अक्टूबर की रात भी शहर पर कहर बरपाया और 150 मिलीमीटर बारिश का बोझ बालापुर झील (गुर्रम चेरुवु) नहीं उठा पाई और उसके तटबंध टूट गए, कई इलाके जलमग्न हो गए। इमारतों के साथ ही गोलकोंडा किले का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। शासन-प्रशासन का वही रटा रटाया राग कि अचानक हुई भारी बारिश के कारण शहर को हलकान होना पड़ा, न कि उसकी कुव्यवस्था और कुनीतियों के कारण। यह बात अपनी जगह सही भी है कि अचानक इतनी बारिश न होती तो शहर में ऐसी तबाही नहीं होती। लेकिन बारिश तो किसी के बस में नहीं है। जो बस में है, उस मामले में भी हम बेबस हो गए हैं। असल समस्या यहीं पर है।

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हैदराबाद इसके पहले 1908 में भी तबाह हुआ था। बादल फटने के कारण मुसी नदी में आई बाढ़ में कोई 15 हज़ार लोगों की मौत हो गई थी। तब तीन करोड़ रुपए मूल्य की संपत्ति का नुकसान हुआ था। 19 हज़ार से अधिक मकान नष्ट हो गए थे और 80 हज़ार से अधिक लोग बेघर हो गए थे। हैदराबाद के तत्कालीन निजाम ने प्रख्यात जल विज्ञानी मोक्षगुंदम विशेश्वरैया को इटली से बुलाकर बाढ़ नियंत्रण के उपाय सुझाने का ज़िम्मा सौंपा था। विशेश्वरैया की सिफ़ारिश पर शहर को बाढ़ से बचाने के लिए उस्मान सागर और हिमायत सागर नामक दो झीलें निर्मित की गईं और जल निकासी की मजबूत प्रणाली विकसित की गई थी। लेकिन पानी के रास्तों पर हुए अंधाधुंध अतिक्रमण के कारण शहर को 112 साल बाद एक बार फिर भारी तबाही का सामना करना पड़ा है। गोदावरी और कृष्णा नदी के बीच तलहटी में बसे हैदराबाद में पानी के बहाव का रास्ता एक दिशा में नहीं है। शहर को बाढ़ से बचाने के लिए कभी यहां छोटे-बड़े लगभग सात हज़ार तालाब हुआ करते थे। ये तालाब नालों के ज़रिए आपास में जुड़े थे और नाले शहर के बीच से बहने वाली मुसी नदी में मिलते थे। तालाबों का अतिरिक्त पानी नालों से होता हुआ मुसी में जाता था। मुसी इस पानी को कृष्णा नदी में उड़ेल देती थी। लेकिन शहरीकरण के दबाव में ये तालाब औैर नाले सिकुड़ते गए।

पर्यावरण प्रेमियों के समूह ’फोरम फॉर अ बेटर हैदराबाद’ के अनुसार, 1990 के दशक में अतिक्रमण का सिलसिला शुरू हुआ और लगभग तीन हज़ार से अधिक जल संरचनाएं अबतक अतिक्रमण की भेट चढ़ चुकी हैं। मुसी नदी की ज़मीन पर ही कोई 12,000 अतिक्रमण बताए जाते हैं। राज्य सरकार ने नदी की सफ़ाई और सौंदर्यीकरण के लिए 2017 में मुसी रीवरफ्रंट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन का गठन किया। संस्था ने नदी पर हुए अतिक्रमणों की पहचान की, लेकिन उन्हें आजतक इसलिए नहीं हटाया जा सका, क्योंकि सरकार की तरफ से मंजूरी नहीं मिल पाई। जिस अप्पा चेरुवु झील के उलटने से 13 अक्टूबर को गगनपहाड़ इलाके में बाढ़ आई, वह आज महज दो एकड़ में सिकुड़ गई है, जबकि इसका मूल क्षेत्रफल छह एकड़ का था। गाद के कारण झील की जलग्रहण क्षमता काफी घट गई है। परिणामस्वरूप भारी बारिश का पानी झील के तटों को तोड़कर बाहर आ गया और तमाम मकानों सहित हैदराबाद-बेंगलुरू राजमार्ग डूब गया।

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सेंटर फॉर साइंस एंड एनविरोनमेंट (सीएसई) की 2016 की एक रपट के अनुसार, 12 सालों में हैदराबाद में 3,245 हेक्टेयर जल क्षेत्र अनियोजित शहरीकरण और अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुका है। एक अनुमान के मुताबिक, हैदराबाद में तालाबों और नालों पर अतिक्रमण कर बसी बस्तियों में 10 लाख से अधिक लोग निवास करते हैं। ये बस्तियां ऐसा नहीं कि लोगों ने अपनी मर्जी से बसा ली हैं। तमाम बस्तियां सरकार ने बसाई है। बाढ़ का खामियाज़ा इन्हीं लोगों को अधिक भुगतना पड़ा है। सवाल उठता है कि क्या इस आपदा से हैदराबाद या देश के दूसरे शहर कोई सबक लेंगे? अबतक के अनुभव बताते हैं कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है।

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हैदराबाद में 14 अगस्त, 2000 को भी इसी तरह की बाढ़ आई थी, जब 24 घंटे में 245 मिलीमीटर बारिश हुई थी। सरकार ने नालों के सुधार के उपाय सुझाने एक समिति गठित की थी। समिति ने 28 हज़ार अतिक्रमणों की पहचान की और उन्हें हटाने व नालों के सुधार के लिए 10 हज़ार करोड़ रुपए की ज़रूरत बताई थी। वह रपट रद्दी की टोकरी में डाल दी गई। अलबत्ता उसके बाद जल संरचनाओं पर और तेज़ी से अतिक्रमण हुए। जल निकासी प्रणाली के आधुनिकीकरण और विस्तार के लिए 2007 में एक दूसरी समिति बनाई गई। उसने भी इसी तरह के सुझाव दिए और उसकी रपट दरकिनार कर दी गई। उसके बाद नालों और झीलों के सुधार के उपाय सुझाने विशेषज्ञों की एक तीसरी समिति गठित की गई, और उसका हाल भी वहीं हुआ। समिति की रपट धूल खा रही है।

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हैदराबाद ही क्यों, क्या चेन्नई ने 2015 की बाढ़ से कोई सबक लिया? क्या बाढ़ के लिए ज़िम्मेदार रहे अतिक्रमणों को हटाया गया? नहीं। शहर के 300 से अधिक तालाबों, झीलों, नहरों, नालों को समाप्त कर वहां पक्की संरचानाएं खड़ी की गई हैं। चेन्नई का अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा अदयार नदी पर बना हुआ है। यह अलग बात है कि एक दिसंबर, 2015 को हुई 490 मिलीमीटर बारिश 100 सालों की पहली घटना थी। लेकिन क्या योजनाकारों को इतनी समझ नहीं कि किसी नदी पर हवाईअड्डा नहीं बनाना चाहिए? दरअसल, समझ होती है, लेकिन विकास की गंगा बहाने की गरमाहट में निर्जीव की जा चुकी किसी नदी की आत्मा नहीं दिखाई देती। हमें जरा भी अंदेशा नहीं होता कि यह आत्मा कभी ज़िंदा हो उठेगी और हमारे सपनों को क्षण में मटियामेट कर देगी।

राजधानी दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाईअड्डा पर टर्मिनल-3 के निर्माण के लिए 10 तालाबों की बलि चढ़ाई गई। हवाईअड्डा चालू होने के तीन साल बाद 17 जून, 2013 को पालम इलाक़े में 24 घंटे में 123.4 मिलीमीटर बारिश हुई और टर्मिनल-3 घुटने भर पानी में डूब गया। बाद में जल निकासी के लिए एक प्रणाली विकसित की गई, लेकिन उसका इम्तहान होना अभी बाक़ी है। हीरा नगरी के नाम से प्रसिद्ध गुजरात का सूरत शहर अगस्त 2006 में चार दिनों तक बाढ़ में डूबा रहा। कोई 20 लाख लोगों को अपने-अपने घरों में बगैर बिजली-पानी और भोजन के क़ैद रहना पड़ा था। उकाई बांध से ताप्ती नदी में बड़ी मात्रा में छोड़े गए पानी के कारण सूरत का 80 प्रतिशत हिस्सा जलमग्न हो गया था। शासन-प्रशासन ने तब भी प्रकृति को ज़िम्मेदार ठहराया था। जबकि अध्ययनों में बाढ़ की वजह अतिक्रमण निकल कर सामने आया था। वजह यह भी कि ताप्ती में पूरे साल प्रवाह न होने से नदी गाद से भरी हुई थी और मुहाना बंद हो गया था। नदी में अचानक बड़ी मात्रा में छोड़ा गया पानी समुद्र में नहीं जा पाया और बस्तियों में फैल गया।

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पिछले साल सितंबर में बिहार की राजधानी पटना एक सप्ताह से अधिक समय तक घुटने से लेकर कमर भर पानी में डूबी रही। बाढ़ में आम तौर पर ग़रीबों की बस्तियां डूबती हैं, लेकिन पटना में 48 घंटे में गिरी 177 मिलीमीटर बारिश में वे इलाक़े भी डूब गए थे, जहां ख़ास लोगों के आवास थे। उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को नौका के ज़रिए उनके घर से बचाया गया था। बाढ़ में 30 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। यहां भी कारण अतिक्रमण ही था। बिहार में हर साल बाढ़ आती है, लेकिन 2019 की पटना की बाढ़ ने सरकारी नियोजन की पोल खोल कर रख दी थी।

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मुंबई में 26 जुलाई, 2005 को आई बाढ़ मीठी नदी पर हुए भारी अतिक्रमण का परिणाम थी। हालांकि 24 घंटे में 994 मिमी बारिश हुई थी। लेकिन नदी की 620 एकड़ जमीन पर बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स का निर्माण बाढ़ की मुख्य वजह थी। बाड़मेर, जैसलमेर की बाढ़ भी पानी के रास्तों पर अतिक्रमण का परिणाम थी। अभी बीते 19 अगस्त को 118 मिलीमीटर बारिश में हरियाणा का पूरा गुरुग्राम शहर डूब गया था। शहर के शानदार इलाके और 11 में से सात अंडरपास पूरी तरह जलमग्न हो गए थे। दिल्ली के कई इलाक़ों में भी घुटने तक पानी भर गया था। तालाबों और पानी के रास्तों पर अतिक्रमण कर सड़कें औैर इमारतें तैयार कर ली गई हैं। जल निकासी की समुचित प्रणाली के अभाव में गुरुग्राम हर साल बारिश में डूबता है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी तालाबों, झीलों, नदी-नालों की ज़मीन पर सड़कें और इमारतें बनाई गई हैं। शहर में चिन्हित कुल 1012 जल स्रोतों में से 117 पर कानूनी या गैरकानूनी तरीके से ऊंची इमारतें खड़ी हो चुुकी हैं। यमुना की ज़मीन पर दिल्ली सचिवालय, अक्षरधाम मंदिर और खेलगांव कॉलोनी का निर्माण किसी से छिपा नहीं है। तालकटोरा स्टेडियम तालाब पर बना हुआ है। कल्पना कीजिए जिस दिन दिल्ली में हैदराबाद या मुंबई जितनी बारिश हुई तो शहर का क्या हाल होगा।

पानी मुनष्य के लिए प्रकृति का मूल्यवान उपहार है। पानी किसी कारखाने में नहीं बनाया जा सकता। प्रकृति ने पानी के संरक्षण के लिए झीलों, तालाबों और नदियों का निर्माण किया। हमारे पूर्वजों ने भी ज़रूरत के अनुसार अतीत में तमाम जल संरचनाओं का निर्माण कराया था। लेकिन हमारी कुनीतियों ने पानी की समयसिद्ध प्रणाली को बेमानी बना दिया है। जल संरचनाओं के नष्ट होने के कारण एक तरफ़ हम बारिश में डूबते हैं और बाक़ी मौसम में बूंद-बूंद पानी के लिए तरसते हैं। जहां बाढ़ आती है, वहीं सूखा भी पड़ता है। अतिक्रमण के इन दुष्परिणामों के बाद भी हमारी नीतियों और नियोजन में कोई बदलाव नहीं आया है। नदी और तालाब नगर की हमारी कल्पना से ही निकल गए हैं। आज के हमारे योजनाकारों के नगर सिर्फ़ सड़कों और इमारतों तक सिमट गए हैं।

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दरअसल, जब नीति और नियोजन पर राजनीति का वज़न बढ़ता है तब बसने वाले शहर को बारिश के पानी में डूबना पड़ता है। बेरोज़गारी से उजड़ते गांवों की आबादी को शहरीकरण का सपना दिखाना हमारी राजनीति के लिए सुविधानजनक हो गया है। साल 1901 की जनगणना में भारत की 11 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती थी, जो 2001 में बढ़कर 28.53 प्रतिशत हो गई और 2019 में यह 34.5 प्रतिशत। संयुक्त राष्ट्र की स्टेट ऑफ द वर्ल्ड पापुलेशन 2007 रपट के अनुसार, 2030 में भारत की 40.76 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास करेगी। शहरी आबादी का प्रतिशत और बढ़ सकता है। इस आबादी के लिए आवास की भी ज़रूरत होगी। यानी ज़मीन के लिए जल संरचनाओं पर दबाव बना रहेगा।

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हमारे शहर जब आज भारी बारिश का बोझ नहीं संभाल पा रहे हैं तो 10 साल बाद इन शहरों की हालत क्या होगी, ज़रा कल्पना कीजिए। तबाही का पैमाना कुछ भी हो सकता है। तो क्या भारतीय शहरों की नियत में अब डूबना ही लिखा है? नहीं, हमें इसे रोकना होगा। शहरों में पानी के रास्तों पर अतिक्रमण हर हाल में रोकना होगा और नियोजन नीति में भारी बारिश को शामिल करना होगा। उदारीकरण शहरीकरण को बढ़ावा देता है, लेकिन तीव्र शहरीकरण सतत विकास की अवधारण के ख़िलाफ़ भी है। हमें शहरों के बदले गांवों के विकास पर ध्यान देना होगा। गांव विकसित होंगे तो शहर भी बारिश और बाढ़ में डूबने से बच जाएंगे।

(वरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार समाचार एजेंसी इंडो-एशियन न्यूज़ सर्विस (आईएएनएस) से 12 साल से अधिक समय तक जुड़े रहे। इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।) 

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