कोरोनावायरस की कुव्वत नहीं जो भारतीय राजनीति को संक्रमित कर सके!

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सरोज कुमार

कोरोनावायरस या कोविड-19 के प्रकोप ने पूरी दुनिया की रफ्तार रोक दी है। हर क्षेत्र में गिरावट। इस बीमारी ने अर्थव्यवस्था को इस कदर बीमार किया है कि दुनिया की महाशक्तियां भी अठन्नी-चवन्नी का हिसाब लगाने लगी हैं। पूरी दुनिया जैसे ठहर-सी गई है। दुनिया में दो करोड़ से अधिक मामले और आठ लाख से अधिक मौतें महामारी की भयावहता को बयान करते हैं। भारत 32 लाख से अधिक मामलों और 60 हजार से अधिक मौतों के साथ अमेरिका और ब्राजील के बाद तीसरे स्थान पर है। जल्द ही ब्राजील को पछाड़कर दूसरे स्थान पर पहुंचने वाला है। पांच महीने बीत जाने के बाद भी संकट बना हुआ है, बल्कि बढ़ता जा रहा है। हर कोई वर्तमान का सामना तो कर रहा है, लेकिन भविष्य को लेकर कहीं अधिक भयभीत है।

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इस बीच क्या कोई ऐसी चीज भी रही है, जिस पर कोरोना बेअसर रहा है? इस सवाल के जवाब के लिए पेशानी पर बल देने की जरूरत नहीं होगी। भारतीय राजनीति जुबान पर सहज ही अवतरित हो जाएगी। हमारी राजनीति कोरोना काल में भी विजेता बनकर उभरी है। वायरस इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया है। इसने कोरोना जैसी घातक महामारी के बीच भी पानी की तरह अपने रास्ते ढूंढ़ लिए हैं और जन मानस को उपकृत किया है। कोरोना काल के दौरान देश की जनता अपनी मूलभूत जरूरतों से भले ही वंचित रही है, लेकिन कोई यह शिकायत नहीं कर सकता कि वह राजनीति से वंचित रह गया है। हमारे राजनेताओं ने आम जन की राजनीतिक जरूरतों का पूरा ख्याल रखा है और भयानक संकट के बीच भी राजनीति की पूरी खुराक समय-समय पर जनता तक पहुंचाई है।

अब एक नजर अपनी इस महान उपलब्धि पर। देश में कोरोना अपने पांव पसार रहा था और हमारे देश की संसद चल रही थी और इस इंकार के साथ कि भारत में कोई हेल्थ इमर्जेंसी नहीं है, जैसा कि दुनिया के बाकी देशों में घहराया हुआ था। कोरोना से लड़ाई के लिए साजो-सामान जुटाने के बदले हम संकट को ही इंकार कर रहे थे और राजनीति की रस्सा-कसी के सामान जुटाने में लगे हुए थे, जैसा कि हम हमेशा करते रहते हैं। इस बीच मध्यप्रदेश में राजनीति का सबसे सुंदर नाटक शुरू हुआ, जिसके कई किरदार कर्नाटक चले गए और नाटक के पटाक्षेप तक वहीं से अपनी भूमिका निभाते रहे। इस नाटक में जिसका नुकसान हो रहा था, वह तरह-तरह के आरोप लगा रहा था और जिसका फायदा होने वाला था वह जनता के हित की दुहाई दे रहा था। अब जनता का हित तत्कालीन सरकार के बचने में था या नई सरकार के बनने में, यह तो जनता ही जाने, लेकिन यह तो साफ है कि राजनीति परवान चढ़ रही थी, और प्रदेश की जनता और प्रदेश को उसकी सबसे ज्यादा कीमत चुकानी थी और उसने चुकाया भी।

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मुख्यमंत्री कमलनाथ ने विधानसभा में फ्लोर टेस्ट से कुछ घंटे पहले ही 20 मार्च को इस्तीफा दे दिया और इसके साथ ही राज्य में नई सरकार का रास्ता साफ हो गया। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर 22 मार्च को देश की जनता ने कोरोना के खिलाफ पूरे देश में कर्फ्यू लागू किया। इसी दिन शाम पांच बजे सभी ने अपने-अपने दरवाजों और बालकनियों पर खड़े होकर ताली और थाली भी बजाई। देश में एक नए तरह का माहौल तैयार हो गया, जैसे कोरोना देशवासियों की तालियों की गड़गड़ाहट के आगे घुटने टेक लेगा। राजनीति यहां पर भी हुई। कई नेताओं ने ताली-थाली की आलोचना की। इसके बाद 24 मार्च से देश में 21 दिनों के लिए मुकम्मल लॉकडाउन की घोषणा प्रधानमंत्री ने की।

बाद में कमलनाथ ने संवाददाता सम्मेलन में खुलेआम आरोप लगाया कि उनकी सरकार गिराने के लिए लॉकडाउन नहीं लगाया गया और संसद को चलाया गया, और जैसे ही सरकार गिरी देश में लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई। उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार देश में कोरोना के खिलाफ लड़़ाई के इंतजाम करने के बदले उनकी सरकार को गिराने के इंतजाम में जुटी हुई थी।

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बहरहाल, हिंदू समाज में 21 की संख्या तो वैसे शुभ मानी जाती है, लेकिन कोरोना के खिलाफ 21 दिनों का लॉकडाउन देश के लिए बहुत शुभकर साबित नहीं हुआ और मरीजों की संख्या के साथ लॉकडाउन की अवधि भी बढ़ती गई, और बढ़ती गई देश की जनता की मुसीबतें भी। सबसे ज्यादा परेशान वे दिहाड़ी मजदूर थे, जिनके पास भोजन और आवास का इंतजाम नहीं था। जिनके पास थोड़े बहुत इंतजाम थे, समय के साथ वे भी सूख गए और लॉकडाउन के अंतहीन सिलसिले को देख वे मजदूर नियमों का उल्लंघन कर अपने गांवों की ओर पैदल कूच कर दिए। इस दौरान कई लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी, लेकिन राजनीति यहां पर भी जारी रही। जो लोग मजदूरों की मदद कर रहे थे, उन पर भी राजनीतिक हमले हुए, और जो नहीं कर पा रहे थे, उन पर तो हमले हुए हीं। इस तरह की कई घटनाएं घटीं, लेकिन विस्तार से बचने के लिए यहां हम कुछ प्रमुख घटनाओं का ही जिक्र कर रहे हैं।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हरियाणा से उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड स्थित अपने गांव लौट रहे कुछ मजदूरों से नई दिल्ली में सड़क किनारे मुलाकात की। उन्होंने 16 मई को सुखदेव विहार में लगभग 25 प्रवासी श्रमिकों के साथ सड़क किनारे बैठ कर बातचीत की, उनकी समस्याएं सुनी और उन्हें उनके गांव तक पहुंचाने का इंतजाम भी किया। कांग्रेस ने बाद में इस पूरे घटनाक्रम का एक वीडियो जारी किया। सत्ता पक्ष को राहुल की यह मेल-मुलाकात अच्छी नहीं लगी और वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने उन पर कोरोना संकट पर राजनीति करने का खुलेआम आरोप लगा दिया।

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कांग्रेस, खासतौर से राहुल गांधी कोरोना काल के दौरान सरकार की बदइंतजामी को लेकर लगातार बोलते रहे हैं और प्रवासी श्रमिकों व देश के गरीबों को सीधे आर्थिक मदद पहुंचाने की मांग सरकार से करते रहे हैं। सरकार ने हालांकि मुफ्त राशन, रसोई गैस सिलिंडर, महिला जन धन खातों में 500 रुपए नकद हस्तांतरण सहित कई पहलों के जरिए गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करने की कोशिश की, लेकिन ये मदद ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हुए, और इसे लेकर राजनीति के तीर बराबर चलते रहे।

कोरोना काल के मध्य लोगों को संक्रमण से बचाने और संक्रमित लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं जुटाने से बड़ी समस्या प्रवासी मजदूरों को उनके गांवों तक पहुंचाने की उठ खड़ी हुई। अचानक लागू किए गए लॉकडाउन के कारण देश भर में तमाम प्रवासी श्रमिकों सहित छात्र व अन्य लोग जहां-तहां फंस गए थे, और वे किसी तरह अपने घरों को पहुंचना चाहते थे। इस मुद्दे पर राजनीति का अच्छा स्कोप था, खासतौर से उन राज्यों में जहां निकट भविष्य में विधानसभा चुनाव होने हैं। प्रवासी श्रमिकों की मदद की राजनीति से शायद ही कोई नेता छूट गया हो।

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प्रवासी श्रमिकों पर राजनीति का सबसे चर्चित मामला उत्तर प्रदेश में सामने आया। राज्य सरकार और कांग्रेस के बीच हुई राजनीतिक उठापटक कोरोना काल में राजनीति की अपने आप में एक मिसाल रही है। राजस्थान से लगभग 50 प्रवासी श्रमिकों को लेकर मध्यप्रदेश जा रहे एक ट्रेलर ट्रक के एक दूसरे ट्रक से टकरा जाने की घटना में 25 मजदूरों की मौत हो गई थी। उत्तर प्रदेश के औरैया में 16 मई को घटी इस दुर्घटना के बाद सत्ता पक्ष पर विपक्ष ने जोरदार हमले किए थे और उसके बाद कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी मजदूरों के लिए बस चलाने मैदान में उतर आई थीं। राजनीतिक ना-नुकुर के बाद अनुमति राज्य सरकार ने उन्हें बसें चलाने की अनुमति तो दे दी, लेकिन शर्त यह थी कि बसों की सूची पहले सरकार सौंपनी होगी।

प्रियंका की तरफ से 1000 बसों की जो सूची भेजी गई, सरकार अब उसकी जांच में जुट गई, यानी आम खाने के बदले पेड़ गिनने में। आरोप लगाया गया कि सूची में कई सारे नंबर ऑटो, एंबुलेंस, स्कूटर और मालवाहक वाहनों के थे। इस मामले में राजनीति का लंबा धारावाहिक चला और राज्य सरकार ने फर्जी सूची सौंपने के लिए प्रियंका गांधी के निजी सचिव संदीप सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी और बेचारे लल्लू गिरफ्तार कर जेल में डाल दिए गए।

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कांग्रेस द्वारा जुटाई गईं सैकड़ों की संख्या में बसें कई दिनों तक राजस्थान और दिल्ली से लगी उत्तर प्रदेश की सीमा पर प्रवासियों के लिए खड़ी रहीं, लेकिन राज्य सरकार ने उन्हें चलने की अनुमति नहीं दी। चली तो बस राजनीति। बेशक इस मामले में कांग्रेस को राजनीति का एक अवसर मिला था, लेकिन सरकार चाहती तो बसों को चुपचाप चलाकर राजनीति को दफन कर सकती थी। लेकिन उसने राजनीति के जरिए राजनीति को कतरने की कोशिश की, जिसमें किसको लाभ हुआ, यह तो वही जाने।

प्रवासी श्रमिकों को उनके घरों तक पहुंचाने का दबाव इतना बढ़ा कि सरकार को अंततः विशेष श्रमिक ट्रेनें चलाने का निर्णय लेना पड़ा। लॉकडाउन के अचानक लिए गए निर्णय से ऐसा लगता है कि सरकार को इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि देश में इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर हैं, और उनके सामने इस तरह का संकट भी उत्पन्न हो सकता है। बहरहाल, पहली ट्रेन पहली मई यानी मजदूर दिवस पर तेलंगाना के लिंगमपल्ली रेलवे स्टेशन से लगभग 1200 प्रवासी मजदूरों को लेकर झारखंड के हटिया स्टेशन के लिए रवाना हुई।

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इसके बाद देश के विभिन्न शहरों से विशेष श्रमिक टेªनों का संचालन शुरू हुआ। और इसके साथ शुरू हुई ट्रेन किराये की राजनीति। प्रवासी श्रमिकों से ट्रेन का किराया वसूले जाने की खबर आते ही विपक्षी दलों को जैसे तुरूप का पत्ता मिल गया। सबने सरकार पर हमले शुरू कर दिए। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने श्रमिकों के किराये का भुगतान कांग्रेस की तरफ से किए जाने की घोषणा कर दी। कांग्रेस के लोगों ने देश के कई शहरों में प्रवासी श्रमिकों को ट्रेन के टिकट उपलब्ध कराए। किराये का मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया कि प्रवासी श्रमिकों से किराया न लिया जाए। कोरोना की तमाम बंदिशों के बीच राजनीति अपने रास्ते तय कर रही थी। लेकिन भाषणबाज नेताओं के लिए लॉकडाउन के बीच मुंह लॉक कर के रखना तकलीफदेह हो रहा था। लिहाजा उन्होंने वर्चुअल रैलियों का रास्ता ढूढ़ लिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दौरान समाज के विभिन्न वर्गों से अलग-अलग वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए संवाद किया, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कई देसी-विदेशी हस्तियों से कोरोना महामारी और अर्थव्यवस्था पर संवाद किए, लेकिन राजनीतिक रैलियों की शुरुआत गृहमंत्री अमित शाह ने की। शाह ने दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में बनाए गए मंच से सात जून को बिहार के मतदाताओं के लिए पहली वर्चुअल रैली को संबोधित किया। मतदाता शब्द का इस्तेमाल यहां इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि यह रैली विशुद्ध रूप से चुनावी थी। पार्टी ने दावा किया कि राज्य के सभी 243 विधानसभा क्षेत्रों से एक लाख से अधिक लोगों ने रैली में शिरकत की थी। इसके बाद शाह ने दिल्ली से कई दूसरे राज्यों के लिए भी वर्चुअल रैलियों को संबोधित किया। खासतौर से उन राज्यों के लिए जहां निकट भविष्य में चुनाव होने हैं। उन्होंने नौ जून को बंगाल के लिए वर्चुअल रैली को संबोधित किया। पार्टी ने कहा कि बंगाल में कोई एक हजार वर्चुअल रैलियों की उसकी योजना थी। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा सहित पार्टी के अन्य नेताओं ने भी कई वर्चुअल रैलियों को संबोधित किया।

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महामारी, आर्थिक संकट और रोजी-रोटी के संकट के बीच वोट के लिए आयोजित की गईं ये रैलियां कितना उचित थीं, जनता इसका निर्णय स्वयं करे। मेरी नजर में इससे बचा जाना चाहिए था। शासन की प्राथमिकता जनता के प्रासंगिक मुद्दे होने चाहिए। क्योंकि वोट इन्हीं के लिए किया जाता है, सरकारें इन्हीं के लिए बनती हैं। वोट की खातिर विधायकों की बाड़ेबंदी भी हुई। राज्यसभा चुनाव से लेकर राजस्थान संकट तक कोरोना के लिए निर्धारित प्रोटोकाल के खुलेआम उल्लंघन हुए। राजनीति की हर गति अपनी गति से चलती रही।

कोरोना संकट के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराने को लेकर भी राजनीति हुई। कभी तबलीगी जमात पर आरोप लगाए गए तो कभी गुजरात में डोनॉल्ड ट्रंप के आयोजन पर। राज्यों ने आपस में भी एक-दूसरे पर आरोप लगाए और अपनी-अपनी सीमाएं सील कर दी। कोरोना मामलों को कम दिखा कर अपने बेहतर प्रबंधन के लिए खुद की पीठ थपथपाने को लेकर भी राजनीति हुई; और शायद इसी राजनीति का नतीजा है कि आज हर रोज देश में 65 हजार से अधिक मामले सामने आ रहे हैं और भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। यदि यही रफ्तार रही तो अपना देश कोरोना मामलों में जल्द ही विश्वगुरु बन सकता है।

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कोरोना संकट के बीच सीमा संकट पर राजनीति का नया रूप देखने को मिला। लद्दाख में एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर कथित चीनी अतिक्रमण को दबाने-छिपाने का आरोप विपक्ष ने सरकार पर लगाया। सरकार ने विपक्ष पर चीन की भाषा बोलने का आरोप लगाया। गलवान घाटी में 15 जून को चीनी सैनिकों के साथ संघर्ष में 20 भारतीय जवान शहीद हो गए। इस खबर के सामने आने के बाद देश को लद्दाख संकट की गंभीरता का पता चला। सैनिकों की शहादत पर विपक्ष, खासतौर से कांग्रेस ने सरकार पर जमकर हमले किए, सरकार से सर्वदलीय बैठक बुलाकर संकट का सच सामने रखने की मांग की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से 19 जून को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भी कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने तीखे सवाल किए और सरकार को इस मुद्दे पर घेरने की जोरदार कोशिश की। हालांकि सरकार में अलग-अलग लोगों की तरफ से इस मुद्दे पर आए विरोधाभासी बयानों से भी इस मुद्दे पर राजनीति की गंध का आभास हुआ।

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अब सवाल यह उठता है कि राजनीति के माहिर खिलाड़ी मैदान में भला क्रिकेट का बल्ला क्यों उठाएंगे, और यदि हम उनसे इसकी उम्मीद करें तो गलती उनकी नहीं, हमारी है। हमारी राजनीति कोरोना से ताकतवर बन चुकी है। राजनीति ने कोविड को पछाड़ दिया है। हमें अपनी इस महान राजनीतिक व्यवस्था पर कम से कम गर्व तो करना ही चाहिए।

(वरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार समाचार एजेंसी इंडो-एशियन न्यूज़ सर्विस (आईएएनएस) से 12 साल से अधिक समय तक जुड़े रहे। इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)