व्यंग्य – मी पोलिस कॉन्स्टेबल न.म. पांडुरंग बोलतोय!

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हरिगोविंद विश्वकर्मा

21वीं सदी का मुंबई पुलिस का एक पुलिस स्टेशन। आधुनिक युग की नवीनत संचार सुविधाओं से सज्ज।

दिन का समय। साढ़े तीन बजे का वक़्त। सारे पुलिस वाले होश-ओ-हवास में बैठे शाम का इंतज़ार कर रहे थे। कुछ पुलिस वाले मास्क लगाए बैठे थे। कुछ लोगों ने मास्क को नाक से नीचे सरका दिया था। बाक़ी लोगों ने कोरोना को अफ़वाह मानकर मास्क को पॉकेट में रख लिया था। ज़्यादातर लोग अपनी-अपनी कुर्सी पर बैठे झपकी लेते हुए ड्यूटी कर रहे थे। कोरोना के कारण आम आदमी अपने-अपने घरों में क़ैद था। कोई बाहर निकल ही नहीं रहा था। कोरोना वायरस से अपराधी, स्नैचर, मनचले यहां तक कि अंडरवर्ल्ड वाले भी डर गए थे। इसलिए शहर में संपूर्ण शांति थी। मतलब, क़ानून-व्यवस्था की कोई समस्या नहीं थी। निश्चिंतता पुलिस वालों के चेहरे पर साफ़ दिख रही थी। शर्तिया सब के सब कोरोना वायरस या चीन को ‘थैंक्स’ कह रहे होंगे। जिनकी कृपा से यह सुख मिल रहा था।

तभी वहां एक आदमी आता है। बदहवास सा। उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही है।

-साहेब-साहेब!

थाने के पुलिस वालों ने उसे देखा भर। कोई रिएक्शन नहीं दिया।

-ओ साहेब! ओ साहेब!

अब भी सारे पुलिस वाले ख़ामोश हैं। उन पर उसके चिल्लाने का कोई असर नहीं हुआ।

-हे साहेब, हे साहेब! वह चिल्लता रहा।

कुछ देर बाद एक पुलिस वाले ने धीरे से उसे इशारा किया। मतलब ड्यूटी ऑफ़ीसर के पास जाओ। शर्तिया उसने मन ही मन यही कहा होगा। यहां क्या चिल्लपो कर रहे हों। आराम में ख़लल डाल रहे हो।

वह आदमी ड्यूटी ऑफ़ीसर के पास गया।

-साहेब-साहेब!

-बोलो ना, क्या साहेब-साहेब लगा रखा है। लगेचं बोला, काय झालं?

-एक आदमी की मौत हो गई।

-मय्यत झाली तर मी काय कराव। क्या मैं रोऊं। तुम्ही सांगा।

-सर, उसने फांसी लगा ली।

-तो लटकला तर मी काय कराव। फांसी तो लोग लगाते ही रहते हैं।

-वय किती आहे?

-34-35 साल के होंगे सर।

-कोई लफड़ा वगैरह नको न?

-नहीं सर, कोई लफड़ा नहीं है।

-फिर अंतिम संस्कार करून टाक न बॉडी का।

-सर रिपोर्ट दर्ज़ कर लीजिए और चलिए। पोस्टमॉर्टम करना होगा न!

-तुमचा सोबत माणुस पाठवतो, परंतु मुंबई पुलिस महाविकास अघाड़ी सरकार के कार्यकाल में सुसाइड का रिपोर्ट या एफआईआर दर्ज नहीं करती। ओके।

-ओके सर।

-ओ पोलिस कॉन्स्टेबल न.म. पांडुरंग साहेब। या माणसा सोबत जा।

पोलिस कॉन्सटेबल न.म. पांडुरंग दो-तीन मिनट आंख मलते हैं। फिर अनिच्छा से कुर्सी से उठते हैं।

-च्या मायला, जायचं कुठे? न.म. पांडुरंग ने पूछा।

-पाली हिल। उस व्यक्ति ने बताया।

-चलो। न.म. पांडुरंग अपनी लाठी लेकर उसके साथ चल दिए।

-तुमको पता है क्यों सुसाइड किया? कोई लफड़ा-वफड़ा था?

-नहीं सर मुझे नहीं पता। मैं तो बिल्डिंग का वॉचमैन हूं। ड्यूटी करके निकल रहा था, तभी ख़बर मिली मुझे।

दोनों घटनास्थल पर पहुंच गए।

-यह तो वीआईपी इलाका है। वीआईपी था क्या, जो मर गया? न.म. पांडुरंग ने पूछा।

-हां, फिल्मों का काम करता था।

-आईला, क्या नाम था?

-सुशांत सिंह राजपूत।

-सुशांत सिंग राजपूत, ओ हीरो! जो धोनी का रोल किएला था। न.म. पांडुरंग ने हैरानी जताई।

-हां सर।

दोनों बिल्डिंग के उस फ्लोर पहुंचे। जहां घटना हुई थी। वहां चार पांच लोग थे। पुलिस को देखकर घबरा गए। पुलिसवाला बेडरूम में गया।

-किधर आत्महत्या किया!

-पंखे से लटककर।

-लेकिन बॉडी तो बिस्तर पर है। किसने उतारा? न.म. पांडुरंग ने पूछा।

-मैंने सर। वहीं मौजूद एक व्यक्ति ने कहा।

-अकेले उतार लिया, ग्रेट। अच्छा किया। नहीं तो पोलिस को मेहनत करनी पड़ती। तुमने अच्छा काम किया। मैं तुमसे खुश हुआ। न.म. पांडुरंग ने कहा।

-थैंक यू सर।

-बेडरूम में और कौन-कौन था?

-सर अकेले थे। चार-पांच घंटे से दरवाजा नहीं खोल रहे थे। इसलिए ताला तोड़वाना पड़ा।

-ताला भी तोड़ दिया तुमने। ग्रेट। तुम तो बहादुर हो। पोलिस का काम ख़ुद कर डाला।

-नहीं सर, ताला एक चाबी बनाने वाले ने तोड़ा।

-आईला, तो बाहरी को पता चल गया। सुसाइड का? फिर कॉल करो चाबीवाले को। न.म. पांडुरंग ने कहा।

चाबीवाले को फोन करके बुलाया गया। न.म. पांडुरंग ने ड्यूटी ऑफ़ीसर को बता दिया। तो तीन पुलिसवाले और आ गए। दस मिनट में चाबीवाला भी आ गया।

-तुमने ताला तोड़ा? न.म. पांडुरंग ने पूछा।

-हां साहेब, लेकिन मुझे अंदर नहीं जाने दिया। इन लोगों ने। मुझे कुछ नहीं पता।

-तुम अंदर जाकर क्या करते? घंटा बजाते? ठीक किया तुम्हें जाने नहीं दिया। अब अपने घर जाओ तुम।

चाबी वाला चला गया।

-एक बात बताओ। पोलिस कॉन्स्टेबल न.म. पांडुरंग ने धीरे से कहा, -किसी डॉक्टर को जानते हो? जो डेथ सर्टिफिकेट दे दे? एक काम करते हैं। कोई डिसप्यूट नहीं है, तो डॉक्टर को बता देंगे। बीमार थे मर गए। उससे डेथ सर्टिफिकेट लेकर अंतिम संस्कार करवा देते हैं।

-छान आयडिया पोलिस कॉन्सेटबल न.म. पांडुरंग साहेब। दूसरे पुलिस वाले ने कहा।

-सही रहेगा सर। शव को अकेले पंखे से उतारने वाले ने कहा।

-हे पोलिस कॉन्सेटबल न.म. पांडुरंग साहेब, खाली मीडिया आली आहे। बवाल हो जाएगा। पोस्टमॉर्टम करवा लेना ठीक रहेगा। मैं रुग्णवाहिनी वाले को कॉल करता हूं। तीसरे पुलिसवाले ने कहा।

न.म. पांडुरंग ने एक नौकर से कहा, -पोस्टमॉर्टम करवा देते हैं, बॉडी को जला डालो। अंतिम संस्कार करून टाक।

-ओके सर। सभी नौकरों की आंखें चमक उठीं।

कुछ देर में एंबुलेंस आ गई। बॉडी बहुत वज़नदार थी, इसलिए कई लोगों ने मिल कर उठाया और एंबुलेंस में डाला। पोलिस कॉन्सेटबल न.म. पांडुरंग बॉडी लेकर अस्पताल जाने लगे। तभी एक और व्यक्ति वहां पहुंच गया।

-साहब, मैं भी चलता हूं अस्पताल।

-तुम कौन?

-मैं सुशांत का लंगोटिया यार हूं। उसने शर्माते हुए कहा और एंबुलेंस में बैठ गया।

बॉडी को अस्पताल ले जाया गया।

अस्पताल के पोस्टमॉर्टम डिपार्टमेंट में कोई डॉक्टर नहीं था। कहा गया कि सुबह होगा पोस्टमॉर्टम।

-लेकिन अर्जेंट है। बुलाइए डॉक्टर को। पोलिस कॉन्सेटबल न.म. पांडुरंग ने कड़क स्वर में आदेश दिया। कमिश्नर सर आदेश दिलेले आहे।

वहां अफ़रा-तफ़री मच गई। मीडिया वाले वहां भी आने लगे। थोड़ी देर में डॉक्टर भी आया।

-डॉक्टर साहेब, जल्दी करिए। मुझे घर जाना है। ड्यूटी कधीचं संपली। न.म. पांडुरंग ने कहा।

-लेकिन कोविड टेस्ट करना पड़ेगा। जरूरी है। डॉक्टर बोला।

-कोविड-वोविड टेस्ट जाने दीजिए सर। बस पॉस्टमॉर्टम कर दीजिए। ज्यादा लेट करने पर बवाल हो सकता है। इश्यू बढ़ जाएगा। न.म. पांडुरंग ने धीरे से कहा।

-ओके। ऐसी बात है तो टेंशन मत लीजिए। दस मिनट में निपटाता हूं।

तभी सफ़ेद कपड़े और मैचिंग मास्क लगाए एक युवती वहां आ गई।

-मुझे बॉडी देखनी है। मुझे बॉडी देखनी है। आई वान्ट टू सी हिम। उसने ज़ोर दिया।

तुम कौन?

-मैं रिया चक्रवर्ती हूं। सुशांत की गर्लफ्रेंड।

-आप रिया चक्रवर्ती हैं। मी पोलिस कॉन्स्टेबल न.म. पांडुरंग। दिखा दीजिए डॉक्टर साहब बॉडी इन्हें। न.म. पांडुरंग ने कहा।

डॉक्टर ने शव के चेहरे पर से कपड़ा उठा दिया। रिया चेहरे पर झुक गई।

-सॉरी बाबू! उसने कहा और पोलिस कॉन्स्टेबल न.म. पांडुरंग और डॉक्टर को थैक्स कहकर नौ-दो-ग्यारह हो गई।

बहरहाल, डॉक्टर पोलिस कॉन्सेटबल न.म. पांडुरंग से भी स्मार्ट था। नौ मिनट में ही पोस्टमॉर्टम निपटा दिया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी उसी समय दे दिया। उस पर एक नहीं, बल्कि चार-चार डॉक्टर के सिगनेचर थे।

-ग्रेट सर, एकदम फिल्मी। आपने सब कुछ मिनटों में निपटा दिया। तुसी ग्रेट हो। आपको तो फिल्मों में होना चाहिए। अपने सुशांत का लंगोटिया यार बताने वाले ने व्यक्ति ने डॉक्टर और पोलिस कॉन्सेटबल न.म. पांडुरंग का शुक्रिया अदा करते हुए कहा।

फिर उस दोस्त ने न.म. पांडुरंग और कुछ वार्डबॉय के साथ बॉडी को दूसरी एंबुलेंस में डाला और लेकर श्मशान चला गया। हर जगह मीडिया के कैमरे पर वहीं सुशांत का संगोटिया यार ही दिख रहा था।

फिर बॉडी को कुछ घंटे में जला दिया गया। यानी कोरोना संक्रमण काल में सब कुछ चौबीस घंटे के अंदर निपट गया।

-फिर पोलिस कॉन्सेटबल न.म. पांडुरंग ने किसी को फोन करके कहा – सर विलेपार्ले श्मशान घर पासून मी पोलिस कॉन्स्टेबल न.म. पांडुरंग बोलतोय। सर, आपके कहे अनुसार सारा काम शांतिपूर्वक निपटा दिया। अब मेरे प्रमोशन का ज़रा देख लेना सर।

वहीं, श्मशान घर के सामने टीवी न्यूज़ चैनल का एक रिपोर्टर पीटीसी कर रहा था।

-स्कॉटलैंड यार्ड के समकक्ष मानी जाने वाली मुंबई पुलिस ने शानदार काम करते हुए अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमय मौत की गुत्थी को सुलझा ली। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में फांसी लगाकर जान देने की बात सामने आई है। दरअसल, फ़िल्में न मिलने से सुशांत डिप्रेशन में चल गए थे। इसीलिए उन्होंने मौत को गले लगा लिया। मुंबई पुलिस ने शानदार काम करते हुए मौत से अंतिम संस्कार तक के सारे कार्यक्रम को केवल 22 घंटे से भी कम समय में निपटा। सैल्यूट टू मुंबई पुलिस। 21वीं सदी की पुलिस ने 21वीं सदी जैसा ही काम किया। इसके सारा क्रेडिट पोलिस कॉन्स्टेबल न.म. पांडुरंग को जाता है।

-लेकिन आपने यह नहीं बताया कि पुलिस स्टेशन ज़रूर 21वीं सदी का है, लेकिन ग़लती से वहां 18वीं सदी के पुलिस वालों की ड्यूटी लग गई है। और यह भी बताना चाहिए था कि राज्य सरकार ने तो 22वीं सदी का काम कर दिया। अब सीबीआई क्या, एफ़बीआई आ जाए तब भी कुछ नहीं होगा। मामला ख़त्म।

-आप कौन? रिपोर्टर ने पूछा

-मैं सुशांत सिंह राजपूत का फैन हूं। वह व्यक्ति आगे चला गया।

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