कैसे शुरू हुई गणेश मूर्ति के विसर्जन की परंपरा?

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इस बार भले कोरोना संक्रमण के चलते गणेशोत्सव की धूम नहीं है, लेकिन लोग घरों में और कहीं-कहीं गणेशोत्सव मंडलों द्वारा छोटे स्तर पर इस बार भी सार्वजनिक गणेशोत्सव का आयोजन शुरू किया जा रहा है। जिस आयोजन को लोग इतनी धूमधाम से मनाते थे, उसे शुरू करने में 1890 के दशक में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को काफी मुश्किलों और विरोध का सामना करना पड़ा था। हालांकि, सन् 1893 में कांग्रेस के उदारवादी नेताओं के भारी विरोध की परवाह किए बिना लोकमान्य तिलक ने इस गौरवशाली परंपरा की पुणे में नींव रख ही दी। बाद में सावर्जनिक गणेशोत्सव स्वतंत्रता संग्राम में लोगों को एकजुट करने का ज़रिया बन गया।

1890 के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तिलक अकसर चौपाटी पर समुद्र के किनारे जाकर बैठते थे और सोचते थे कि कैसे लोगों को एकजुट किया जाए। अचानक उनके दिमाग़ में आइडिया आया, क्यों न गणेशोत्सव को घरों से निकाल कर सार्वजनिक स्थल पर मनाया जाए, ताकि इसमें हर जाति के लोग शिरकत कर सकें। वैसे तो विघ्नहर्ता गणेश की पूजा भारत में प्राचीन काल से होती रही है, लेकिन गणेशोत्सव को त्यौहार के रूप में मनाने की परंपरा पेशवा काल से शुरू हुई और सार्वजनिक गणेशोत्सव शुरू करने का श्रेय लोकमान्य तिलक को जाता है।

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दरअसल, अगर गणेशोत्सव के पौराणिक इतिहास पर नज़र डालें तो नारद पुराण की कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती ने शरीर के मैल से बालक की जीवंत मूर्ति बनाई। उस मूर्ति का नाम गणेश रखा दिया और उन्हें दरवाज़े पर खड़ा कर दिया। पार्वती ने कहा, “मैं स्नान करने जा रही हूं’, इसलिए इस बीच तुम किसी को अंदर नहीं आने देना।” जैसे ही वह अंदर गईं, उसी समय वहां भगवान शिव पहुंच गए। वहां खड़े गणेशजी ने माता की आज्ञा का पालन करते हुए शिवजी को अंदर नहीं जाने दिया। शंकरजी बहुत क्रोधित हुए और गणेश का गला धड़ से अलग कर दिया।

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गणेशजी का गला काट देने पर पार्वती विलाप करने लगीं। शिव को गहरा पश्चाताप हुआ। लिहाज़ा, उन्होंने हाथी के एक बच्चे का सिर उस बालक के शरीर में जोड़कर उसे फिर से जीवित कर दिया। उसके बाद भाद्रपद मास की चतुर्थी को भगवान गणेश का जन्म उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। यहां इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि अंगों यानी ऑर्गन ट्रांसप्लांट का कॉन्सेप्ट संभवतः उसी समय आया होगा। उसी थ्यौरी पर विचार करते हुए आधुनिक युग में मेडिकल साइंस ने ऑर्गन ट्रांसप्लांट का आविष्कार किया होगा। जैसे तीन हज़ार साल पुराने पुष्पक विमान के कॉन्सेप्ट से प्रेरित होकर एयरोनॉटिक इंजीनियरों ने प्लेन का आविष्कार किया।

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भारत के ईश्‍वरवादी और अनीश्वरवादी दोनों ही धर्मों में गणेशजी की पूजा का प्रचलन और महत्व माना गया है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने जहां कैलाश पर डेरा जमाया, तो उन्होंने कार्तिकेय को दक्षिण भारत की ओर शैव धर्म के प्रचार के लिए भेजा। दूसरी ओर गणेश जी पश्चिम भारत की ओर निकल गए। जबकि माता पार्वती ने पूर्वी भारत की ओर शैव धर्म का विस्तार किया। कार्तिकेय ने हिमालय के उस पार भी अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। कार्तिकेय का एक नाम स्कंद भी है। उस पार स्कैंडेनेविया, स्कॉटलैंड आदि क्षेत्र उनके उपनिवेश थे।

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बहरहाल, कालांतर में गणेश हिंदुओं के आदि आराध्य देव बन गए। हिंदू धर्म में उनको विशिष्ट स्थान प्राप्त हो गया। अब तो कोई भी धार्मिक उत्सव हो, यज्ञ, पूजन सत्कर्म हो या फिर विवाहोत्सव हो, निर्विघ्न कार्य संपन्न कराना हो, कार्यसिद्धि के लिए सर्वप्रथम गणेश की पूजा की जाती है। अगर इतिहास की बात करें तो महाराष्ट्र में सातवाहन, राष्ट्रकूट और चालुक्य जैसे राजाओं ने गणेशोत्सव की प्रथा चलाई। ख़ुद छत्रपति शिवाजी महाराज भी गणेश की उपासना करते थे। उन्होंने गणेशोत्सव को राष्ट्रीयता एवं संस्कृति से जोड़कर एक नई शुरुआत की। पुणे में कस्बा गणपति की स्थापना राजमाता जीजाबाई ने की थी। इसीलिए महाराष्ट्र में गणेशोत्सव को सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है।

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गणेशोत्सव की परंपरा पेशवाओं के समय में भी जारी रही। पेशवाओं के समय में गणेशजी को लगभग राष्ट्रदेव के रूप में दर्जा प्राप्त था, क्योंकि वह उनके कुलदेव थे। मराठा साम्राज्य के बाद पेशवा भी गणेश पूजा करते थे। पेशवा भगवान गणेश की मूर्ति को मंदिर से निकाल कर आंगन में रख कर पूजा करते थे और पूजा के बाद मूर्ति को वापस मंदिर में स्थापित कर देते थे। पेशवाओं ने ही पहली बार गणेश को मूर्ति दर्शन के लिए आंगन की बजाय खुले मैदान में रखा। तब देश में अस्पृश्यता अपने चरम सीमा पर थी। मूर्ति बाहर रखने से पहली बार शूद्र और दलित समुदाय के लोगों को गणेशजी की पूजा करने का मौक़ा मिला, क्योंकि तब मंदिरों में उनका प्रवेश वर्जित था। गणेश मूर्ति की स्थापना मंदिर के बाहर करने से शूद्रों और दलितों ने गणेश प्रतिमा का चरणस्पर्श करके आशीर्वाद लिया।

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गणेशोत्सव के बाद जब प्रतिमा को वापस मंदिर में स्थापित किया जाने लगा तो कट्टरपंथी पंडितों ने इसका भारी विरोध किया। उनका तर्क था कि इस मूर्ति को शूद्रों और अछूतों ने छूकर अपवित्र कर दिया है। लिहाज़ा अपवित्र हो चुकी गणेश की मूर्ति को वापस मंदिर में स्थापित नहीं का जा सकता। यह विवाद कई दिनों तक चलता रहा। अंततः कट्टरपंथी ब्राह्मणों के दबाव में निर्णय लिया गया कि मूर्ति को सागर में विसर्जित कर दिया जाए। इस पर सभी लोग सहमत हो गए। कहा जाता है तभी से गणेश जी की मूर्ति के विसर्जन की परंपरा शुरू हुई।

वैसे विजर्सन को लेकर कई और मान्यताएं प्रचलन में हैं। कहा जाता है कि विजर्सन जीवन चक्र का प्रतीक है। जैसे गणेश जी चतुर्थी को आकर चतुर्दशी को वापस समुद्र में समाधि ले लेते हैं, उसी तरह मानव जन्म लेता है और अपना जीवन जीकर माहप्रयाण कर जाता है। इसीलिए गणेश जी को नवजीवन का भगवान भी कहा जाता है। विसर्जन के बाद गणेश जी अपने माता-पिता शिव और पार्वती के पास कैलास पर्वत पर चले जाते हैं।

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गणोशोत्सव उत्सव, हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास की चतुर्थी से चतुर्दशी तक दस दिनों तक चलता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी भी कहते हैं। गणेश की प्रतिष्ठा सम्पूर्ण भारत में समान रूप में व्याप्त है। महाराष्ट्र इसे मंगलकारी देवता के रूप में व मंगलपूर्ति के नाम से पूजता है। पेशवाओं के बाद 1818 से 1892 तक के काल में यह पर्व हिंदू घरों के दायरे में ही सिमटकर रह गया। यानी गणेश पूजा केवल घर में होती थी। महोत्सव को सार्वजनिक रूप देते समय तिलक ने उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि आजादी की लड़ाई, छूआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने और आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का उसे जरिया बनाया और उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया। अंत में इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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लोकमान्य तिलक ने जनमानस में सांस्कृतिक चेतना जगाने और लोगों को एकजुट करने के लिए ही सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरूआत की। दरअसल, 28 दिसंबर 1885 को कांग्रेस की स्थापना के बाद उसमें नरमपंथियों का वर्चस्व था। नरम दल में व्योमेशचंद्र बैनर्जी, सुरेंद्रनाथ बैनर्जी, दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, गोपालकृष्ण गोखले, मदनमोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू, बदरुद्दीन तैयबजी और जी सुब्रमण्यम अय्यर जैसे उदारवादी नेता थे। कुछ दिन बाद ही कांग्रेस में गरम दल पैदा हो गया। लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिनचंद्र पाल और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे नेता था। 1905 में बंग-भंग यानी बंगाल विभाजन के बाद तो गरम दल एकदम से सक्रिय हो गया और उसका नेतृत्व लोकमान्य ने ही किया। उस समय लाल-बाल-पाल की तिकड़ी काफी चर्चित हुई थी।

बहरहाल, जब 1894 में तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव का सिलसिला शुरू किया तो कांग्रेस का उदारवादी खेमा खुश नहीं हुआ। नरम दल के नेता नहीं चाहते थे कि गरम दल के नेता तिलक सार्वजनिक गणेशोत्सव शुरू करें। उदारवादी दल इसलिए भी सार्वजनिक गणेशोत्सव का विरोध कर रहा था, क्योंकि 1893 में मुंबई और पुणे में दंगे हुए थे। लिहाजा, किसी भी दूसरे कांग्रेसी ने तिलक का साथ नहीं दिया। चूंकि गणेशोत्सव की अवधारणा हिंदू धर्म से संबंधित थी, इससे कांग्रेस के दूसरे नेता इस सार्वजनिक आयोजन में शामिल नहीं हुए। उन्हें डर था कि इससे उनकी सेक्यूलर इमेज को धक्का लग सकता है। लेकिन तिलक ने इसकी चिंता नहीं की। वह मानते थे कि लक्ष्य पाने के लिए जीवन के सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं करना चाहिए।

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बहरहाल, जब उदारवादियों की बात तिलक नहीं माने, तब कांग्रेस ने आशंका जताई कि गणेशोत्सव को सार्वजनिक करने से दंगे हो सकते हैं। यह दीगर बात है कि गणेशोत्सव आयोजन का सिलसिला शुरू होने के बाद जितने दंगे हुए उसके लिए गणेशोत्सव को ही ज़िम्मेदार माना गया। दरअसल, पहले गणेशोत्सव के आयोजन से दूर रहना, फिर दंगों की आशंका जताना और अंत में दंगों के लिए गणेशोत्सव को ही दोषी ठहराना उदारवादी कांग्रेसियों की सोची समझी चाल थी। हालांकि उस समय तिलक का राष्ट्रीय स्तर पर साथ लाजपत राय, बिपिनचंद्र, अरविंदो घोष, राजनारायण बोस और अश्विनी कुमार दत्त ने समर्थन किया। इसके बाद तो तिलक उस दौर के सबसे ज़्यादा प्रखर कांग्रेस नेता के रूप में लोकप्रिय हो गए।

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बीसवीं सदी में सार्वजनिक गणेशोत्सव बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हुआ। वीर सावरकर और गोविंद दत्तात्रय दरेकर उर्फ कवि गोविंद ने नासिक में गणेशोत्सव मनाने के लिए मित्रमेला नाम की एक संस्था बनाई दी। देशभक्तिपूर्ण मराठी लोकगीत पोवाडे को आकर्षक ढंग से बोलकर सुनाना ही इस संस्था का काम था। पोवाडों ने पश्चिमी महाराष्ट्र में धूम मचा दी थी। कवि गोविंद को सुनने के लिए भीड़ उमड़ने लगी। राम-रावण कथा के आधार पर लोगों में देशभक्ति का भाव जगाने में सफल होते थे। लिहाज़ा, गणेशोत्सव के ज़रिए आजादी की लड़ाई को मज़बूत किया जाने लगा। इस तरह नागपुर, वर्धा, अमरावती आदि शहरों में भी गणेशोत्सव ने आजादी का आंदोलन छेड़ दिया था।

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बताया जाता है कि सार्वजनिक गणेशोत्सव से अंग्रेज़ घबराने लगे। रोलेट समिति की रिपोर्ट में भी गंभीर चिंता जताई गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था गणेशोत्सव के दौरान युवकों की टोलियां सड़कों पर घूम-घूम कर अंग्रेज़ी शासन का विरोध करती हैं और ब्रिटेन के ख़िलाफ़ गीत गाती हैं। स्कूली बच्चे पर्चे बांटते हैं। जिसमें अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ हथियार उठाने और शिवाजी की तरह विद्रोह करने का आह्वान होता है। इतना ही नहीं, अंग्रेज़ी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए धार्मिक संघर्ष ज़रूरी बताया जाता है। सार्वजनिक गणेशोत्सवों में भाषण देने वाले में प्रमुख राष्ट्रीय नेता तिलक, सावरकर, सुभाषचंद्र, रेंगलर परांजपे,  मौलिकचंद्र शर्मा, दादासाहेब खापर्डे और सरोजनी नायडू होते थे।

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लोकमान्य तिलक उस समय युवा क्रांतिकारी दल के नेता बन गए थे। वह स्पष्ट वक्ता और प्रभावी ढंग से भाषण देने में माहिर थे। यह बात ब्रिटिश अफ़सर भी अच्छी तरह जानते थे कि अगर किसी मंच से तिलक भाषण देंगे तो वहां आग बरसना तय है। तिलक ‘स्वराज’ के लिए संघर्ष कर रहे थे। तिलक के सार्वजनिक गणेशोत्सव से दो फ़ायदे हुए, एक तो वह अपने विचारों को जन-जन तक पहुंचाने में सफल रहे और दूसरा यह कि इस उत्सव ने आम जनता को भी स्वराज के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी और उन्हें जोश से भर दिया।

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दरअसल, सन् 1857 की क्रांति के बाद स्वाधीनता आंदोलन में तिलक का प्रमुख भूमिका में होना सबसे महत्वपूर्ण रहा। कई लोग कहते हैं कि तिलक न होते, तो आज़ादी पाने में कई दशक और लगते। यह भी सत्य है कि कांग्रेस के भीतर तिलक की घोर अवहेलना हुई। वह मोतीलाल नेहरू जैसे समकालीन नेताओं की तरह ब्रिटिश राज से समझौते की मुद्रा में नहीं रहे। लिहाज़ा, वह ब्रिटिश राज के लिए चुनौती बनकर उभरे। तिलक की राय थी कि अंग्रेज़ों को यहां से किसी भी क़ीमत पर भगाना है। लिहाज़ा, उन्होंने दूसरे कांग्रेस नेताओं की तरह ब्रिटिश सत्ता के समक्ष हाथ फैलाने के बजाय उन्हें भारत से खदेड़ने की राह मज़बूत करने में अपनी मेहनत लगाई।

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‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर रहूंगा’, इस घोषणा के ज़रिए सन 1914 में तिलक ने जनमानस में ज़बरदस्त जोश भर दिया। तिलक से पहले समस्त भारतीय समाज में देश के लिए सम्मान और स्वराष्ट्रवाद का इतना उत्कट भाव इतने प्रभावी ढंग से कोई जगा नहीं पाया था। भारत से ब्रिटिश राज की समाप्ति के लिए उन्होंने सामाजिक आंदोलनों के ज़रिए सामाजिक चेतना का प्रवाह तेज़ करके अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ जनमत का निर्माण किया।

तिलक के नेतृत्व में जनमानस में पनपते असंतोष को फूटने से रोकने के लिए ही वायसराय लॉर्ड डफ़रिन की सलाह पर एनेल ऑक्टेवियन ह्यूम ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी। लिहाज़ा, अपने जन्म से ही कांग्रेस ने तिलक को दरकिनार करने की पूरी कोशिश की अंग्रेज़ों को अहसास था कि अगर तिलक का सामाजिक चेतना का प्रयास मज़बूत हुआ तो, उनकी विदाई का समय और जल्दी आ जाएगा। इसलिए शातिराना अंदाज़ में अंग्रेज़ों ने स्वतंत्रता आंदोलन पर नियंत्रण करने के लिए कांग्रेस की स्थापना की।

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सन् 1995 में क्रिसमस के दौरान पुणे में कांग्रेस के 11 वें अधिवेशन में लोकमान्य तिलक को आम राय से ‘स्वागत समिति’ का प्रमुख बनाया गया। लेकिन कांग्रेस के पंडाल में सामाजिक परिषद आयोजित किए जाने के नाम पर पार्टी में ज़बरदस्त विवाद हो गया। जिसके चलते अंततः तिलक को कांग्रेस अधिवेशन की स्वागत समिति छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। तिलक का साफ़ मानना था कि स्वतंत्रता मांगने से तो कभी नहीं मिलेगी। लिहाज़ा, इसे लेने के लिए खुला संघर्ष करना पड़ेगा और हर प्रकार के बलिदान के लिए तैयार रहना होगा। बहरहाल, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में गणेशोत्सव के जिस पौधे का रोपण किया था वह 1947 तक विराट वट वृक्ष बन गया और अंग्रज़ों को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। अब तो गणेशोत्सव का बहुत अधिक विस्तार हो गया है। इस में केवल महाराष्ट्र में ही 50 हजार से ज्यादा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल हैं। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में काफी संख्या में गणेशोत्सव मंडल हैं।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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