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धूम मचाने लगा है ‘स्टाइल आइकॉन’ डॉ. मेघल का नया गीत ‘डियर सुआ’

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‘डियर सुआ’ में अभिनय करती हुई ‘यूके सुपरस्टार रॉकस्टार’ डॉ. मेघा भारती मेघल

हमेशा लीक से हटकर, कुछ नया करने के लिए जानी जाने वाली और अनगिनत खिताब अपने नाम करने वाली बहुमुखी प्रतिभा की धनी ‘यूके सुपरस्टार रॉकस्टार’ डॉ. मेघा भारती मेघल ने एक और ऐतिहासिक और स्टाइलिश प्रयोग करते हुए अपना नवीनतम गीत ‘डियर सुआ’ रिलीज़ किया है, जिसे अच्छा प्रतिसाद मिलने लगा है।

सबसे बड़ी बात इस गीत की ये शुरुआती पंक्तियां ओ लौंडा मोहना सुआ दिल तू मेरो लैजा, तेरी गोरी मुखड़ी सुआ इक बारी दिखै जा, सुन मोहना, सुन मोहना’ ही गीत के विषय को स्पष्ट कर देती हैं। हिन्दी, अंग्रेज़ी और पहाड़ी जैसी, तीन-तीन भाषाओं का प्रयोग करके, ये प्रेम गीत मेघल ने विश्वभर में फैले अपने प्रशंसकों को वेलेंटाइन्स पर तोहफे के रुप में प्रस्तुत किया है। इस गीत में भी उनका विशिष्ट स्टाइल साफ़ दिखाई पड़ रहा है।

‘डियर सुआ’ के साथ डॉ. मेघल ने उत्तराखंड की पारम्परिक संगीत पद्धतियों को पाश्चात्य संगीत के रैप से मिश्रित कर, ये अद्भुत गीत तैयार किया है। ये गीत उत्तराखंडी संगीत जगत में एक मील का पत्थर है। ये आने वाले कलाकारों के लिए एक उदाहरण है। पहाड़ी संगीत की दुनिया में ये पहला गीत है जिसमें लोक संगीत और पाश्चात्य संगीत का संगम इस ख़ास रूप में देखा जा रहा है। पहाड़ी ‘न्यौली’ और ‘रैप’ से प्रेरित होकर ये गीत मेघल ने लिखा है।

इस गीत को इन्होंने कंपोज किया, संगीत दिया, और गाया भी है। इस गीत में उन्होंने पहाड़ी, हिंदी और अंग्रेज़ी – तीन भाषाओं का अद्भुत प्रयोग किया है, जैसे – ‘डियर सुआ, सुन बात मेरी, आई थिंक आ एम फॉलिंग इन लव विथ यू, यू आर माय लाइट, माय क्रेज़ी डिलाइट, तू ही तो है मेरी फैंटेसी फ्लाइट, हां हां हां मेरी जान है तू।’ इन पद्धतियों से रचा गया ये आज तक का पहला गीत है।

ग्लोबल अप्रोच देते इसी गीत से मेघल रैप गायन की दुनिया में भी कदम रख रहीं हैं। जहाँ उत्तराखंडी गीतों में रैप गायन केवल पुरुषों द्वारा गाया जा रहा है, वहां एक बार फिर मेघल एक रैप गायिका के रूप में भी अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए तैयार हैं। साथ ही मेघल ने स्वयं इसमें अभिनय भी किया है। इस गीत पर लम्बे अरसे से काम कर रहीं थीं डॉ. मेघल।

इस बारे में कहती हैं – ‘इस गीत पर काम करना मेरे लिए एक बहुत बड़ी चुनौती रही क्योंकि दो बिल्कुल ही अलग तरीके की संगीत शैली को इस तरह तैयार करना कि वे एक ही गीत बन जाए, गीत भी ऐसा कि दोनों शैली के मूल भाव और मधुरता भी बनी रहे। वाकई मुश्किल तो था। लेकिन मैं खुश हूं कि मेरा ये प्रयोग सफ़ल हुआ।’

‘डियर सुआ’ में अभिनय करती हुई डॉ. मेघल

डॉ. मेघल का ये गीत उत्तराखंडी लोक संगीत की एक ख़ास पद्धति और पाश्चात्य संगीत के रैप का उदाहरण बनने के साथ ही मील का पत्थर बन गया है। ‘स्टाइल आइकॉन’ डॉ. मेघल ने अपने इस ऐतिहासिक शाहकार के साथ, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रों में उन्हें कोट करने वाले और उनके व्यक्तिव एवम कार्यों पर शोध करने वाले सभी को एक बार फ़िर सही साबित कर दिया है।

अनगिनत खिताब अपने नाम किए हैं और बहुत से अलग-अलग नामों से इन्हें जाना जाता है। उनके स्टाइल स्टेटमेंट और बहुमुखी प्रतिभा ने उन्हें ‘स्टाइल आइकॉन’ का लोकप्रिय मुक़ाम दिलवाया है। हमेशा लीक से हटकर, कुछ नया करने के लिए जानी जाने वाली ‘यूके सुपरस्टार रॉकस्टार’ मेघल ने अपनी इस ‘स्टाइल आइकॉन’ की छवि को और मज़बूत करते हुए रिलीज़ किया है अपना नया गीत ‘डियर सुआ’। ‘

संगीत, कला और साहित्य के क्षेत्र में कई बार विश्व पटल पर अपने नाम का परचम लहरा चुकीं, डॉ. मेघल ‘प्रथम अन्वेषक’ यानि ‘पायनियर’ भी कही जाती हैं। हमेशा कुछ नया सबसे पहले कर दूसरों के एक नया रास्ता बनाकर देना उनकी आदत में शुमार है। फिर चाहे वो उनका कोई गीत हो, उनकी कोई पुस्तक हो या मंच और टेलीविज़न पर उनका कोई कार्यक्रम हो।

उत्तराखंड के संगीत जगत में डॉ.मेघल नए-नए प्रयोग कर चुकीं हैं। अपने विद्यार्थी जीवन के दौरान ‘पहाड़ी पॉप म्यूज़िक’ को भी इन्होंने ही जन्म दिया। इसके अलावा भी कई ऐतिहासिक उपलब्धियाँ इन्होंने अब तक हासिल की हैं। पहली बार राज्य में स्टार नाईट का आयोजन भी मेघल के नाम से ही शुरू हुआ {मेघा भारती नाइट}। वे उत्तराखण्ड की प्रथम और एकमात्र महिला गीतकार, कंपोजर, संगीतकार एवं गायिका हैं और सर्वप्रथम महिला गायिका हैं जिनके सोलो एल्बम मार्केट में आए।

अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवल्स में भी मेघल के लिखे और कंपोज़ किए गीतों ने खासी प्रशंसा लूटी है। मेघल को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का सम्मान भी प्राप्त है। इनके गीतों को गायिका साधना सरगम ने भी स्वर दिया है। अमेरिका और यूक्रेन जैसे देशों से डॉ. मेघल को मिल चुके हैं सम्मान।

मेघल यूथ आइकॉन’, ‘यूके सुपरस्टार रॉकस्टार’, ‘उत्तराखंड की शान, उत्तराखंड की पहचान’, ‘सर्वश्रेष्ठ गीतकार’, ‘मैगास्टार एमबीएम’, ‘ऑल इन वन एंबैसेडर’, ‘ग़ज़ल शहज़ादी’, ‘हिन्दी काव्य रत्न अवॉर्ड’, ‘श्री अटल बिहारी बाजपाई वोमेन अचिवर अवार्ड’, कला निधि’ जैसे कई खिताबों से भी नवाज़ी जा चुकी हैं। वह संगीत, कला और साहित्य की ‘ऑल इन वन ब्रान्ड एंबैसेडर’ बन चुकी हैं।

इनके प्रशंसक देश से विदेश तक फैले हैं। जिस प्रकार रिसर्च के क्षेत्र में, अंग्रेज़ी में पीएचडी की डिग्री हासिल करने वाली डॉ. मेघल को शोध कर्ताओं द्वारा पुस्तकों और रिसर्च पेपर्स में कोट किया जा रहा है उसी तरह, संगीत के क्षेत्र में भी कई कलाकार इनका अनुसरण करते आ रहे हैं। उनके लिए भी मेघल का नया गीत किसी उपहार से कम नहीं है।

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गोवा की कैबिनेट ने किया रामलला का दर्शन

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रामलला का दर्शन करना मेरा सौभाग्य : सीएम प्रमोद सावंत
गोवा से ट्रेन के जरिए आए 2000 श्रद्धालुओं ने भी किए रामलला के दर्शन
योगी सरकार के मंत्री समेत स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने किया भव्य स्वागत
योगी के निर्देश पर सहजता से हुआ दर्शन, सुरक्षा व्यवस्था थी चुस्त-दुरुस्त

अयोध्या, 15 फरवरी। राम मन्दिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद से अयोध्या में लगातार श्रद्धालुओं के आने का क्रम जारी है। देश विदेश से रामभक्त रामलला का दर्शन पूजन करने चले आ रहे हैं। दर्शन के क्रम में विभिन्न राज्यों की पूरी कैबिनेट भी रामलला के दर्शन के लिए अयोध्या पहुंच रही है। इससे पहले यूपी व अरुणाचल प्रदेश की कैबिनेट भी रामलला का दर्शन कर चुकी है।

इसी क्रम में गुरुवार को गोवा सरकार की कैबिनेट सीएम प्रमोद सावंत के नेतृत्व में रामलला का दर्शन करने अयोध्या पहुंची। इस दल में कुल 51 सदस्य शामिल रहे। गोवा कैबिनेट के सभी मंत्री व विधायक राजर्षि वाल्मीकि एयरपोर्ट अयोध्या पहुंचे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर गोवा प्रदेश से आए अतिथियों की सुरक्षा व्यवस्था के चाक-चौबंद इंतजाम किए गए थे।

गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने कहा कि राम मंदिर आंदोलन में वे दो बार कारसेवा कर चुके हैं। उनके साथ केन्द्रीय मंत्री भी साथ रहे। उन्होंने कहा कि आज पूरी कैबिनेट के साथ अयोध्या आया हूं यह मेरा सौभाग्य है। उन्होंने कहा यहां आकर बहुत अच्छा लग रहा है। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के दिन 22 जनवरी को पूरे गोवा के गांव अयोध्या बन चुके थे। पूरा प्रदेश राममय था।

सीएम प्रमोद सावंत ने कहा राम मंदिर बनने की वजह से हम लोग अयोध्या आ पाए हैं। इसके लिए पीएम नरेन्द्र मोदी व सीएम योगी और राम मंदिर ट्रस्ट का बहुत आभार व्यक्त करता हूं। सीएम ने कहा कि गोवा को मुख्यमंत्री दर्शन योजना के तहत अयोध्या से जोड़ा जाएगा, जिससे वहां के लोग रामलला का दर्शन आसानी के साथ कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि योगी सरकार ने यदि भूमि दी तो वह अयोध्या में गोवा का भवन जरूर बनना चाहेंगे। कहा अब तो यहां आना-जाना लगा ही रहेगा। ऐसे में यहां गोवा भवन बनना आवश्यक हैं।

योगी सरकार के मंत्री ने किया स्वागत
एयरपोर्ट पर योगी सरकार के मंत्री सतीश शर्मा, अयोध्या विधायक वेद प्रकाश गुप्ता, महापौर गिरीश पति त्रिपाठी, जिला पंचायत अध्यक्ष रोली सिंह ने गोवा के मुख्यमंत्री व अन्य मंत्रियों व विधायकों को माला पहनाकर उनका स्वागत किया। इसके बाद सभी लोगों ने अयोध्या पहुंच कर रामलला का दर्शन पूजन किया। सभी लोग रामलला का दर्शन कर काफी खुश व उत्साहित दिखे। जय श्रीराम के नारों से मंदिर गूंज उठा। मंदिर ट्रस्ट की ओर से सभी लोगों को प्रसाद दिया गया।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के खिलाफ वेलेंटाइन्स डे पर सिटीजन्स फॉर इक्वेलिटी का प्रदर्शन?

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संवाददाता
नई दिल्ली: वैलेंटाइन्स डे के दिन जहां 14 फरवरी को पूरी दुनिया के प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे के प्यार में खोए थे और मोहब्बत का जश्न मना रहे थे वहीं केंद्र सरकार की प्रस्तावित भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 को पुरुष विरोधी करारे देकर इसमें संशोधन की मांग को लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे थे। गौरतलब है कि गृह मामलों की संसदीय समिति ने भी इस धारा का एकतरफा करार दिया है।

यह अनोखा प्रदर्शन ‘सिटीजन्स फॉर इक्वेलिटी’ नाम की ओर से भारतीय न्याय संहिता के खिलाफ़ विरोध में आयोजित किया गया। इस दौरान संस्था के सदस्यों ने भारत में सहमति से यौन संबंध के अपराधीकरण पर गंभीर चिंता जताई। प्रदर्शन कर रहे लोग इस मौके पर नारे भी लगा कि ‘वैलेंटाइन से पहले कानून जान लो, नहीं तो धारा 69 के तहत जेल जाओ’ और ‘हां का मतलब हां, ना का मतलब ना’ जैसे नारों के साथ सेक्शन 69 के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया गया।

दरअसल, भारतीय न्याय संहिता नामक नई भारतीय दंड संहिता के तहत लाया गया यह कानून धोखे से सेक्स को अपराध मानता है। इसमें कहा गया है कि जो कोई किसी महिला के साथ धोखे से शादी करने का वादा करके या बिना किसी इरादे के उसे नौकरी या पदोन्नति का वादा करके यौन संबंध बनाने के लिए प्रेरित करके यौन संबंध बनाता है, उसे 10 साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। यह कानून पहचान छिपाकर किसी महिला से शादी करने को भी अपराध मानता है। विरोध प्रदर्शन में सभी उम्र और लिंग के नागरिकों की सर्वसम्मत आवाज यह थी कि यह कानून भेदभावपूर्ण, असंवैधानिक और दुरुपयोग की अत्यधिक संभावना है और इसलिए इसे इसके मौजूदा स्वरूप में वापस लेने की जरूरत है।

विरोध प्रदर्शन में शामिल कई लोगों ने अपने अनुभव को साझा करते हुए बताया कि कैसे वे एक महिला के साथ सहमति से संबंध बनाने के बाद शादी के झूठे वादे पर बलात्कार के गलत आरोपों का सामना कर रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि ब्रेकअप हो गया था। विरोध प्रदर्शन में शामिल कई एक्टिविस्ट्स ने कहा, “यह कानून मानता है कि अगर किसी महिला को शादी या नौकरी या पदोन्नति का वादा करके यौन संबंध के लिए प्रस्तावित किया जाता है तो उसके पास ‘ना’ कहने की शक्ति नहीं है, जबकि हर महिला ऐसा कर सकती है।”

जब पहले से ही बलात्कार कानूनों का इतना दुरुपयोग हो रहा है, जहां शादी के झूठे वादे पर वर्षों की सहमति से बने मामलों को बलात्कार में बदल दिया जा रहा है। ऐसे में कानून निर्माताओं को इस तरह का कठोर कानून लाने से पहले कुछ जमीनी अध्ययन करना चाहिए था। कोई पुरुष कैसे साबित करेगा कि वह निर्दोष है और उसने किसी महिला से कोई वादा नहीं किया था और सेक्स पूरी तरह सहमति से हुआ था? रिश्ते में खटास आने पर ऐसे मामलों में शिकायतें काफी देरी के बाद की जाती हैं।

जाहिर है ऐसे में कानून सिर्फ महिला की बातों के आधार पर पुरुषों को सजा दे देगा। जब हम समाज में यह प्रचार कर रहे हैं कि “नहीं का मतलब ना” होता है तो महिलाओं को यह समझना चाहिए कि “हां का मतलब हां” होता है। यौन संबंध सिर्फ पुरुष की ही नहीं बल्कि महिला की भी जिम्मेदारी है। क्या अब हम यह कह रहे हैं कि किसी महिला के लिए किसी पुरुष के साथ यौन संबंध बनाना बिल्कुल ठीक है अगर वह उसे नौकरी या पदोन्नति का वादा करता है और यह केवल तभी अपराध है जब वह वादा पूरा नहीं किया जाता है? यह कानून महिलाओं के प्रति भी बहुत अपमानजनक लगता है।”

प्रदर्शनकारियों ने कानून की कथित असंवैधानिकता को रेखांकित किया है, उनका तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 में निहित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। व्यक्त की गई शिकायतों में सीमा की एक निर्दिष्ट अवधि की अनुपस्थिति, संभावित दुरुपयोग के खिलाफ सुरक्षा उपायों की कमी, सहमति संबंधों के भीतर समझदार इरादे में शामिल जटिलताओं, और पुरुषों की तत्काल गिरफ्तारी की अनुमति देने वाले प्रावधान शामिल हैं। इसके अलावा, प्रदर्शनकारियों ने संगठित आपराधिक गतिविधियों में वृ‌द्धि को उत्प्रेरित करने के लिए कानून की क्षमता के बारे में आशंकाएं जताई हैं, जिससे पर्याप्त जांच और संतुलन की कथित अनुपस्थिति पर जोर दिया गया है।

यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि दिसंबर 2022 में, उड़ीसा हाई कोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर सेक्स के लिए सहमति की वैधता निर्धारित करने के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 90 के स्वतः विस्तार की तर्कसंगतता पर गंभीरता से विचार करने का आह्वान किया था। इस मामले में इसी तरह के आरोप में आरोपी एक व्यक्ति को जमानत देते हुए न्यायमूर्ति डॉ संजीव कुमार पाणिग्रही ने कहा, “इस मुद्दे पर कानून निर्माताओं की मंशा स्पष्ट है। बलात्कार कानूनों का उपयोग अंतरंग संबंधों को विनियमित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, खासकर उन मामलों में जहां महिलाओं के पास एजेंसी है और वे अपनी पसंद से किसी रिश्ते में प्रवेश कर रही हैं।”

ऐसे में लगता है कि धारा 69 में कई मुद्दे हैं जो अनसुलझे रह गए हैं। सिटीज़न्स फॉर इक्वेलिटी द्वारा साझा किए गए डेटा में बताया गया है कि कुछ राज्यों में, शादी के झूठे वादे पर बलात्कार के मामले दर्ज किए गए कुल बलात्कार के मामलों का 60-75 प्रतिशत हैं। ऐसे मामलों में दोषसिद्धि की दर बेहद कम है क्योंकि ज्यादातर मामलों में यह सहमति से बने रिश्ते का मामला साबित होता है जो गलत हो गया है, जैसा कि विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों ने अपने फैसलों में देखा है। हालाँकि, ऐसे सभी मामलों में, आरोपी को जमानत पर रिहा होने से पहले हमेशा लंबे समय तक जेल में रहना पड़ता है। भले ही कभी शादी का कोई वादा न किया गया हो, फिर भी उस आदमी को बलात्कारी कहलाने की बदनामी झेलनी पड़ती है और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए उसे सालों तक मुकदमे का सामना करना पड़ता है।

संसदीय स्थायी समिति ने भी धारा भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के संबंध में प्रमुख चिंताओं को चिह्नित किया है:

व्यक्तिपरकता व इरादा
व्यक्तिपरक स्वभाव और बदलते इरादों के कारण शादी के वादों को सत्यापित करने में कठिनाई।

गोपनीयता व स्वायत्तता
विवाह के वादों को व्यक्तिगत मामलों में घुसपैठ के रूप में विनियमित करने की आलोचना, जिससे गोपनीयता और स्वायत्तता प्रभावित होती है।

स्पष्टता का अभाव
विवाह के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी वादों को परिभाषित करने में अस्पष्टता प्रवर्तन संबंधी विसंगतियों को जन्म देती है।

सांस्कृतिक व सामाजिक गतिशीलता
कानूनी दायित्वों से परे जटिलताओं की पहचान, सांस्कृतिक मानदंडों के महत्व पर जोर देना।

प्रवर्तन चुनौतियां
साक्ष्य प्रदान करने में बाधाएँ, विशेष रूप से मौखिक प्रतिबद्धताजी के लिए प्रवर्तन काठिनाइयां पैदा करती हैं।

लिंग गतिशीलता
लिंग पर संभावित असंगत प्रभावों और रूढ़िवादिता के सुदृढ़ीकरण पर चिंताएं।

प्रदर्शनकारियों ने सरकार से कानून पर दोबारा विचार करने की मांग की। दिलचस्प बात यह है कि गृह मामलों की संसदीय समिति ने भी सरकार को धारा 69 के खिलाफ सलाह दी थी, क्योंकि शादी के बाद को साबित करना या अस्वीकार करना आसान बात नहीं है।

सिटिजेंस फॉर इक्वेलिटी ने समानता के लिए नागरिकों की ओर सरकार के सामने कई मांगें पेश की हैं:
1. कानून को जेंडर न्यूट्रल बनाएं।
2. सजा को 7 साल से कम करें ताकि अपराध सीआरपीसी की धारा 41ए के तहत कवर हो जाए और पुलिस स्वचालित रूप से आरोपी को गिरफ्तार न करे। उस व्यक्ति को भी अपने साक्ष्य प्रस्तुत करने और जांच में शामिल होने का अवसर दिया जाना चाहिए।
3. सीमा की एक धारा लाएं ताकि सहमति से बने शारीरिक संबंध के 4-5 या 10 साल बाद रेप के मामले दर्ज न हों।
4. स्पष्टीकरण दे कि पहले से ही विवाहित महिला को शादी के झूठे वादे के तहत इस तरह की धारा लागू करने से रोका जाता है।
5. झूठे आरोप के खिलाफ एक विशेष धारा लाएं, जुर्माना और कारावास का प्रावधान करें।
6. इसे मौजूदा कानूनों के तहत धोखाधड़ी का अपराध बनाने पर विचार करें।
7. अनुभाग के भीतर दुरुपयोग खंड होना चाहिए।

कानून के खिलाफ शुरू की गई एक याचिका को Change.org पर 20 हजार से अधिक हस्ताक्षर प्राप्त हुए हैं। CITIZENS FOR EQUALITY की ओर से इस प्रदर्शन का आयोजन संस्था के दीपिका नारायण भारद्वाज, रूपेंशु प्रताप सिंह, ज्योति पांडे, सरोज और केडी झा की ओर से किया गया।

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म्यूज़िक थेरेपी – संगीत सुनें और बीमारियों से दूर रहें…

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ये कैसी अजब दास्तां हो गई है, छुपाते-छुपाते बयां हो गई।
या
आजकल में ढल गया दिन हुआ तमाम, तू भी सो जा सो गई रंग भरी शाम

इन कर्णप्रिया गानों के बोल तो ख़ूबसूरत हैं ही, इनके संगीत यानी म्यूज़िक में एक मिठास है जो मन को बेहद सुकून देता है। यह सुकूव सुनने वाले के अंदर ऊर्जा का संचार करता है। इसी तरह कई फ़िल्मी गाने या ग़ज़ल हैं, जो मन को फ्रेश कर देते हैं। मन ताजगी भर देते हैं। इसीलिए उन्हें बार बार सुनने का मन होता है। संगीत से मिलने वाला सुकून और ताज़गी दिमाग को सक्रिय कर देती है। गाना सुनते-सुनते श्रोता एक काल्पनिक दुनिया में प्रवेश करने लगता है। यानी संगीत इंसान को वास्तविकता से दूर ले जाता है, जिससे उसे अपने हित और खुशी पर ध्यान केंद्रित करने के लिए पर्याप्त समय मिलता है। मधुर संगीत सुनने की प्रक्रिया में सारे अवसाद दूर हो जाते हैं। इसी कला को संगीत चिकित्सा यानी म्यूज़िक थेरेपी कहा जाता है।

वाराणसी के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के मनोविज्ञान संकाय की विभागाध्यक्ष प्रो. रश्मि सिंह कहती हैं कि संगीत कोई दवा नहीं है जो किसी मरीज़ को रातोरात ठीक कर दे। दरअसल, संगीत चिकित्सा ऐसी थेरेपी बन गई है जो पांच कारकों ध्यान, व्यवहार, भावनाओं, अनुभूति और संचार को नियंत्रित करती है जो हमें बाहरी उत्तेजनाओं के कारण उत्पन्न अवसाद और नकारात्मक भावनाओं से लड़ने में मदद करता है। इससे मरीज बीमारी से उबरने लगता है और उसका मानसिक असंतुलन ठीक होने लगता है।

भावना
संगीत में मस्तिष्क क्षेत्र को नियंत्रित करके हमारी भावनाओं को नियंत्रित करने की शक्ति है जो विभिन्न प्रकार की भावनाओं की उत्पत्ति, शुरुआत, रखरखाव और समाप्ति के लिए जिम्मेदार है। इसलिए, जब आप किसी बाहरी कारक के कारण उदास या परेशान महसूस कर रहे हों, तो संगीत आपके मस्तिष्क को विचलित कर सकता है और संगीत के शब्दों से जुड़ी भावना को मुक्त कर सकता है।

ध्यान
संगीत हर जीव के मन को प्रभावित करता है। संगीत मस्तिष्क की उत्तेजनाओं को विचलित कर देता है, जिससे इंसान चिंता, चिंता और दर्द जैसी नकारात्मक भावनाओं की ओर अग्रसर हो जाता है। ध्यान इंसान को हमें स्थिति से बेहतर ढंग से लड़ने और उसके अनुसार परिस्थिति को नियंत्रित करने में मदद करता है।

व्यवहार
चिकित्सा के रूप में संगीत किसी विशेष व्यवहार या क्रिया को जागृत करने और नियंत्रित करने में भी सहायक होता है। यह चलने, बात करने, सोने और खाने सहित किसी भी चीज़ से संबंधित हो सकता है। कोई भी व्यक्ति संगीत चिकित्सा गीतों के साथ व्यवहार संबंधी समस्याओं को सहजता से सुधार सकता है।

अनुभूति
संगीत का संबंध अनुभूतियो से होता है। मस्तिष्क सहजता से संगीत वाक्य-विन्यास को एन्कोड, स्टोर और डिकोड करता है, गीत याद रखता है और अनुभवों को संगीत से कनेक्ट करता है। इससे संज्ञानात्मक क्षमता बढ़ाने में मदद मिलती है। संज्ञानात्मक क्षमता को बढ़ाने के इच्छुक लोगों के लिए यह बहुत सही है।

संचार
संगीत का सीधा ताल्लुकात संचार से है, क्योंकि संगीत बिना शब्दों के भी संवाद करने में मदद करता है। कोई भी व्यक्ति बिना शब्दों के बात करने की कला सहजता से सीख सकता है। संगीत थेरेपी के माध्यम से कोई भी इंसान आसानी से बिना अधिक प्रयास के लोगों से संवाद करने में बढ़त हासिल कर सकता है।

प्रोफेसर रश्मि सिंह, विभागाध्यक्ष, मनोविज्ञान, काशी पीद्यापीठ

प्रो. रश्मि सिंह आगे कहती हैं, “संगीत सदियों से ग्रामीण परिवेश तथा छोटे कस्बों आदि में रहने वाली महिलाओं के लिए अपनी भावनाओं, अपने द्वंद्व, अपने घुटन, अपनी इच्छाओं को अभिव्यक्त करने का एकमात्र साधन रहा है। वर्त्तमान में इस क्षेत्र में हो रहे शोध कार्य ये बताते हैं कि संगीत चिकित्सा महिलाओं के सशक्तिकरण एवं कल्याण, उनकी पहचान को पुनः परिभाषित करने, उन्हें उनके तक़लीफ़ देने वाले अनुभवों से उबरने में सहायक हो सकता है। संगीत चिकित्सा पेरिमेनोपॉज़ल महिलाओं के मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक लक्षणों में मदद कर सकती है और उपचार के लिए प्रभावी है।”

वह कहती हैं, “दिमाग़ यानी मस्तिष्क शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। लाखों सेल्स से बना मस्तिष्क बहुत संवेदनशील होता है। यही शरीर का संचालन करता है। इस पर मामूली बात या छोटी घटना का भी व्यापक असर होता है। इसीलिए अप्रिय बातों या घटनाओं से मस्तिष्क बीमार हो जाता है। बीमार मस्तिष्क वाला शरीर महज एक ढांचा बन कर रह जाता है। इसके बाद शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होने लगती है और शरीर पर बीमारियों का आक्रमण होने लगता है। समय रहते उचित इलाज न करने पर बीमारी गंभीर रूप धारण कर लेती है।”

प्रो. रश्मि सिंह आगे कहती हैं, “मस्तिष्क की विशेष देखभाल इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि भागदौड़ और तनाव भरी जीवनशैली के चलते इंसान को कई तरह की मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कभी वह अवसाद से घिर जाता है, तो कभी उस पर तनाव का आक्रमण होता है। रात को अनिद्रा उसे सोने नहीं देती और रही सही कसर चिंता पूरी कर देती है। इन सभी मानसिक समस्याओं से निपटने के लिए म्यूज़िक थेरेपी सबसे प्रचलित और कारगर है। संगीत किसी चिकित्सा से कम नहीं है। मन की स्थित कैसी भी हो हर कोई म्यूज़िक चाव से सुनता है। म्यूज़िक मानव मन के भावों को व्यक्त करता है। म्यूज़िक थेरेपी से मानव की मनोदशा में बदलाव होने लगता है। नतीजतन, दवाइयों के बिना ही वह ठीक हो जाता है। कभी-कभार तो म्यूज़िक थेरेपी उसे हमेशा के लिए ठीक कर देती है।”


 

विद्यापीठ के मनोविज्ञान विभाग ने की संगीत के जरिए चिकित्सा करने की पहल

प्रो. रश्मि सिंह ने हाल ही मे महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के मनोविज्ञान विभाग में स्थापित संगीत चिकित्सा प्रकोष्ठ एवं शोध केंद्र (उच्चानुशीलन केंद्र, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अनुदानित) एवं महिला अध्ययन संस्थान, लखनऊ विश्वविद्यालय के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के बाद आयोजित कार्यक्रम में लोगों को संबोधित करते हुए संगीत चिकित्सा की बारीक़ियों को समझाया। शोध कार्य ये बताते हैं कि संगीत चिकित्सा महिलाओं के सशक्तिकरण एवं कल्याण, उनकी पहचान को पुनः परिभाषित करने, उन्हें उनके तक़लीफ़ देने वाले अनुभवों से उबरने में सहायक हो सकता है। संगीत चिकित्सा पेरिमेनोपॉज़ल महिलाओं के मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक लक्षणों में मदद कर सकती है और उपचार के लिए प्रभावी है। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दोनों सस्थानों के बीच समझौता हुआ।

संगीत चिकित्सा प्रकोष्ठ एवं शोध केंद्र के समन्वयक डॉ. दुर्गेश उपाध्याय ने बताया कि दोनों केंद्रों के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर 06 फ़रवरी 2024 में हुआ। दोनों विश्वविद्यालय इस समझौते के अंतर्गत एक दूसरे के विद्यार्थियों को कार्यशालाओं, एवं व्याख्यानों के माध्यम से प्रशिक्षित करेंगे तथा शोध कार्य में भी साझेदार होंगे। उन्होंने कहा महिला अध्ययन संस्थान, लखनऊ विश्वविद्यालय की समन्वयक डॉ. मानिनी श्रीवास्तव के सार्थक पहल से यह सम्भव हो सका। यह उत्तर प्रदेश के किसी भी राज्य अथवा केंद्रीय विश्वविद्यालय में सबसे पहले काशी विद्यापीठ के मनोविज्ञान में “संगीत चिकित्सा प्रकोष्ठ एवं शोध केंद्र” की स्थापना माननीय कुलपति प्रो. आनंद कुमार त्यागी के कुशल मार्गदर्शन, कुलसचिव डॉ. सुनीता पांडेय के सहयोग एवं विभागाध्यक्ष प्रो. रश्मि सिंह के नेतृत्त्व में हुआ है।


 

टेलिफोनिक बातचीत में प्रो. रश्मि सिंह ने कहा कि संगीत मन ही नहीं शरीर पर गहरा असर डालता है। म्यूज़िक थेरेपी में एक ख़ास तरह का म्यूज़िक उपयोग में लाया जाता है। जब मरीज को संगीत सुनाया जाता है, तो संगीत की तरंगों का संपर्क शरीर से होता है। वायब्रेशन धीरे-धीरे शरीर के अंदर प्रवेश करते हैं। इससे शरीर और दिमाग़ भी वाइब्रेट होने लगते हैं। वायब्रेशन की वजह से उस ख़ास अंग में और उसके आसपास सक्रियता बढ़ जाती है। उन ख़ास हिस्सों में ब्लड सर्क्युलेशन सामान्य होने लगता हैं। ब्लड और ऑक्सीजन उस ख़ास अंग पर सकारात्मक असर डालता है और उसकी हीलिंग शुरू हो जाती है। इस प्रॉसेस में शरीर शिथिल होने लगता है जिससे आराम मिलता है।

म्यूज़िक का ज़्यादातर प्रभाव मानसिक अवस्था पर पड़ता है। आजकल इसका इस्तेमाल अल्टरनेट थेरेपी के रूप में किया जा रहा है। आधुनिक युग में म्यूज़िक थेरेपी एक अच्छा विकल्प बन कर उभर रहा है। तभी तो इस थेरेपी का उपयोग अब कई अस्पतालों में भी होने लगा है। म्यूज़िक कैंसर, पार्किंसंस, अवसाद, अन्य मानसिक समस्या जैसी कई असाध्य बीमारियों को ठीक करने में कारगर साबित हुआ है।

मस्तिष्क
संगीत की ध्वनि से उठनेवाली तरंगों की बीट से मस्तिष्क की तरंगें तालमेल बनाने की कोशिश करतीं हैं। इसके अनुसार अगर तेज़ बीट का म्यूज़िक सुना जाए तो एकाग्रता और सोचने की क्षमता बढ़ती है। इसके विपरीत धीमी बीट वाला संगीत शरीर को शांत करने में सहायक होता है और ध्यान की अवस्था में व्यक्ति को लेकर जाता है। मस्तिष्क पर म्यूज़िक का असर लंबे समय तक बना रहता है। इस प्रकार व्यक्ति मस्तिष्क के स्वास्थ्य को अपने अनुसार बना सकता है।

हृदय एंव ब्रीथिंग
मस्तिष्क की तरह ही म्यूज़िक का प्रभाव दिल यानी हृदय पर भी होता है। संगीत से पैदा तरंगों से सांस और हृदय की गति सामान्य हो जाती है। ऐसी स्थिति में रोगी आराम से सांस लेने लगता है और उसकी धड़कन सामान्य गति से चलने लगती है। इससे शरीर में रिलेक्सेशन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है और म्यूज़िक से शरीर में तनाव के कारण होनेवाले हानिकारक प्रभाव दूर हो जाते हैं।

मन या मनोदशा
संगीत का लोगों की मनोदशा पर बहुत सकारात्मक असर पड़ता है। इसके कारण लोगों पर अवसाद, तनाव और चिंता से होने वाले नकारात्मक ऊर्जा का असर कम होने लगता है। संगीत थेरेपी लोगों को सकारात्मक और आशावादी बनाती है। इससे मरीज़ को बीमारी से लड़ने का उत्साह और ऊर्जा मिलती है।

क्यों ज़रूरी है म्यूसिक थेरेपी
हर आदमी की अपनी मुश्किलें, परेशानियां और ज़िम्मेदारियां होती हैं। इसकी वजह से अकसर वह तनाव में रहता है। लंबे समय तक तनाव में रहने का असर उसकी हेल्थ पर दिखने लगता हैं। उसे चिंता और थकान होने लगती और वह चिड़चिड़ेपन का शिकार होने लगता है। म्यूज़िक थेरेपी ऐसे लोगों के लिए आसान और फ्री-ऑफ-कॉस्ट विकल्प है। इससे मिलनेवाला आराम शारीरिक और मानसिक दृष्टि से भी लाभदायक होता है। व्यक्ति अपनी मनोदशा के आधार पर म्यूज़िक का चुनाव कर सकता है। स्ट्रेस-फ्री रहने के लिए भी म्यूज़िक की सहायता ली जा सकती है। अगर आप तनाव महसूस कर रहें हों या काम के कारण थकान होने लगी हो, तो कुछ समय के लिए म्यूज़िक सुनना फायदेमंद साबित होता है। यह मस्तिष्क को शांत करके शरीर को नई स्फूर्ति प्रदान करता है।

म्यूज़िक थेरेपी कई और समस्याओं को दूर करने में सहायक होती है-

डर
डर सबके लिए नुकसानदेह होता है। यह सही फैसले लेने से रोकता है। इसका अच्छा उदाहरण है प्लेन का सफर। अगर हवाई सफर से आपको डर लगता है तो म्यूज़िक एक अच्छा विकल्प हो सकता है। प्लेन में बैठते ही आप हेडफोन से म्यूज़िक सुनने लगे तो डर से ध्यान हट जाता है। इसके अलावा अंधेरा, ऊंचाई, तेज़ रफ्तार जैसी फोबिया से लड़ने में म्यूज़िक से अच्छा कोई उपाय नहीं।

निराशा
ज़रूरत से ज़्यादा काम के बाद भी कामयाबी ना मिले तो निराशा होती है। ऐसे में व्यक्ति कोई भी कार्य करने से कतराने लगता है। इससे निपटने के लिए उसे मोटिवेशनल म्यूज़िक सुनना चाहिए। संगीत से उसमें नई आशा का संचार होता है। इस तरह वह आगे बढ़ने के लिए प्रेरित होता है। इस प्रकार कोई भी अपनी निराशाजनक स्थिति से बाहर निकल सकता है।

चिंता
कहते हैं कि चिंता मनुष्य की सबसे बड़ी शत्रु है। इससे निकलना भी आसान नही होता। इसके उपचार में म्यूज़िक की अहम् भूमिका होती है। भरपूर म्यूज़िक सुनने से मन में समस्याओं से निपटने का साहस मिलता है और व्यक्ति जल्दी ही इस स्थिति से बाहर आ जाता है। चिंता की वजह से मस्तिष्क में रक्त प्रवाह धीमा हो जाता है, म्यूज़िक प्रमुख रूप से रक्त प्रवाह को सामान्य करता है।

तनाव
मौजूदा जीवनशैली तनाव की जड़ है। मानसिक बीमार व्यक्ति शारीरिक रूप से प्रभावित होता है। यही कारण है कि लोग हार्ट और ब्लडप्रेशर जैसी समस्याओं से घिरे रहते हैं। ऐसी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए म्यूज़िक लाभदायक हो सकता है। मधुर संगीत तनाव दूर करता है। पियानो, बांसुरी, वायोलिन जैसे इंस्ट्रूमेंट शरीर में नई स्फूर्ति पैदा कर देते हैं और तनाव रफूचक्कर हो जाता है।

कसरत करते हुए सुनें संगीत
कसरत अपने-आप में दवा का काम करता है। इससे शरीर में एंटीस्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ता है। अगर कसरत करने का मन न करे तो म्यूज़िक सुनते हुए कसरत करें। शर्तिया कसरत में मज़ा आएगा और शरीर के साथ-साथ मस्तिष्क भी शांत रहेगा। म्यूज़िक के साथ कसरत ज़्यादा आसान हो जाता है। सांस की गति के अनुसार म्यूज़िक सुनने से एकाग्रता बढ़ती है। मस्तिष्क आराम की अवस्था में पहुंचता है। अगर आप ताल और लय के साथ व्यायाम करते हैं तो शरीर अपने आप इसके अनुसार कार्य करने लगता है और शरीर को इस तरह ज़्यादा फायदा होता है।

क्या है स्पंदनों का साइंस
ध्वनि हर्ट्ज़ में नापी जाती है। आमतौर पर, मनुष्य 20 हर्ट्ज़ से 20 किलो हर्ट्ज़ तक की फ्रीक्वेंसी की आवाज़ सुन लेता है। इन ध्वनियों में बेस स्वरों से वाइब्रेशन अधिक होता है। इसके वाइब्रेशन शरीर के ब्लड सर्कुलेशन को प्रभावित करते हैं। इसलिए रोग के निदान के लिए इनका उपयोग होता है। वाइब्रेशन की मदद से दी जानेवाली इस थेरेपी को वायब्रो आकुस्टिक थेरेपी कहा जाता है। यह पार्किंसन रोगियों को भी दी जाती है। रोगी को शांत और आरामदायक जगह बैठाया जाता है। स्पीकर से बेस फ्रिक्वेन्सी यानी 200 हर्ट्ज़ से कम की फ्रीक्वेंसी वाले साउंड वेव को उसके शरीर में पहुंचाया जाता है। इस प्रयोग को एक मिनट के अंतराल में पुन: दोहराया जाता है। इससे रोगी के मस्तिष्क में ब्लड-सर्कुलेशन सामान्य होने लगता है। रोगी निर्धारित समय से पूर्व ठीक होने लगता है। यह थेरेपी मानसिक रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक मानी जाती है। म्यूज़िक से व्यक्ति के शरीर और मन में तालमेल बनाना आसान हो जाता है। इसका असर न केवल वयस्कों पर बल्कि बच्चों पर भी पड़ता है। हमारे मन के भावों को व्यक्त करने का सबसे बेहतर ज़रिया म्यूज़िक होता है। थेरेपी के रूप में इसका उपयोग करना लोगों के लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध हुआ है।

अब मोदी से पहले मोदी के आने के बाद की तुलना होती है – अमरजीत मिश्र

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भारतीय जनता पार्टी मुंबई के प्रदेश उपाध्यक्ष अमरजीत मिश्र ने कहा है कि अब तक देश की आर्थिक, सामाजिक, औद्योगिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक विकास की जब भी चर्चा होती थी तब आज़ादी के पूर्व व आज़ादी के बाद के काल की चर्चा होती थी। पर अब जब भारत दुनिया की तीसरी महासत्ता के रूप में उभर रहा है तब देश के चहुँमुखी विकास के संदर्भ में पीएम मोदी से पहले के भारत और मोदी के पीएम बनने के बाद के भारत की स्थिति पर चर्चा होगी।

मुंबई भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष आज अपने चार दिवसीय उत्तरप्रदेश दौरे पर लखनऊ में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। मुंबई से ट्रेन से अयोध्या आनेवाले दर्शनार्थियों के लिये सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए मुंबई भाजपा के कार्यकर्ताओं के साथ श्री मिश्र कल अयोध्या चले जाएँगे। आज उन्होंने पर्यटन भवन जाकर पर्यटन व संस्कृति विभाग के प्रधान सचिव मुकेश मेश्राम से मुलाक़ात की। उन्होंने श्री मिश्र का उत्तरप्रदेश द्वारा बनाया गाया राम दरबार का मेडल देकर उनका स्वागत किया।

महाराष्ट्र में फ़िल्मसिटी के उपाध्यक्ष रह चुके अमरजीत मिश्र ने कहा कि पहले सरकार में बैठे लोगों के घोटालों, बवालों और हवालों पर घमासान होता था, लेकिन अब तो सरकार के राष्ट्रवाद, आस्थावाद, अर्थवाद और एकात्म मानववाद की दिशा में बढ रहे कदमों पर अनुसंधान हो रहा है।उन्होंने कहा कि मोदी से पहले आतंकवाद की घटना हो जाने के बाद मुँह तोड़ जवाब देने के ज़ुबानी तीर चलाये जाते थे, मोदी के बाद सर्जिकल स्ट्राइक कर दुश्मन देशों को इशारों- इशारों में यह समझा दिया जा रहा है कि भारत की ताक़त को लेकर कोई मुग़ालते में न रहे।

भाजपा नेता कहते हैं कि मोदी से पहले भारत के नेताओं से विदेशी नेतागण हाथ मिलाने से भी कतराते थे अब गले मिलने के लिए आतुर रहते हैं।हमारे राष्ट्रीय ध्वज को कल तक कोई अहमियत नहीं देता था लेकिन यह मोदी की गारंटी ही है कि आपदा के समय विदेशी भूमि पर भारत का तिरंगा आत्म रक्षा का प्रबल अस्त्र समझा जाने लगा है।

उन्होंने कहा कि मोदी से पहले हम आर्थिक सहयोग पाने के लिए दुनिया भर में कश्कोल (भीख का कटोरा) लिए फिरते थे। मोदी के बाद पूरी दुनिया ने देखा कि भारत दुनिया के देशों को मदद देने के लिये अग्रेसर की भूमिका में होता है। मुंबई भाजपा के उपाध्यक्ष अमरजीत मिश्र कहते हैं कि इस काल के भारतीय खुश क़िस्मत हैं कि वे एक नये भारत के स्वर्णिम समय के साक्षी बन रहे हैं।

ढाई आखर प्रेम की यात्रा का मध्य प्रदेश पड़ाव (संस्मरणात्मक रिपोर्ताज)

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विनीत तिवारी
प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के वक़्त 1936 में लेखकों को एक ज़िम्मेदारी देते हुए कहा था कि हमें हुस्न का मेयार बदलना है। मतलब सौंदर्य के मापदंड बदलने हैं। कुछ वक़्त तक प्रेमचंद के इन शब्दों की रौशनी में हिंदी और उर्दू ही नहीं, बल्कि तमाम भारतीय भाषाओं के लेखक अपने लिखे से समाज के प्रचलित मापदंडों को बदलने की कोशिशें करते भी रहे। लेकिन आज़ादी के बाद लेखक और कलाकार धीरे-धीरे मध्यवर्गीय चरित्र और कांग्रेस के ज़माने की मौक़ापरस्ती में उलझते गए और अपनी बदलावकारी क्रन्तिकारी भूमिका से दूर होते गए। आज हालात और भी ख़राब हैं।
लेकिन जो संगठन वैचारिक और सांगठनिक रूप से प्रगतिशील और जनवादी हैं, और जो कला को केवल अभिजात्य या आध्यात्मिक ही नहीं मानते, वे अपने आपको समाज के निचले और हाशिये के तबकों से जोड़े रखने और अपनी समझ को साफ़ रखने के लिए बार-बार जन के पास और जन के बीच जाते हैं – अपनी जड़ें, अपने कार्यभार और अपना भरोसा फिर से हासिल करने के लिए।

यात्रा की तैयारी और बिछुड़े हुए साथियों की याद
“ढाई आखर प्रेम” के नाम तले देश भर में यात्रा निकालने का मक़सद अलग-अलग जगह अलग-अलग रहा होगा लेकिन जब हमने सोचा कि मध्य प्रदेश में इसे करना है तो यह भी सोचा कि इसे इप्टा के विचार के साथ कैसे करना है। इप्टा के अध्यक्ष हरिओम राजोरिया से बात हुई, कुछ रास्ते सोचे गए। फिर हरिओम को भी हमारा प्रस्ताव अच्छा लगा कि इंदौर शहर के मज़दूर इलाक़ों से लेकर नर्मदा घाटी के आदिवासी इलाकों से लगाकर अच्छी खेती वाले निमाड़ के समृद्ध आंदोलनरत गाँवों तक की यात्रा की जाए।

जब रास्ता तय हो गया तो नवंबर के किसी एक दिन मैं, प्रमोद बागड़ी, अशोक दुबे और हरनाम सिंह बड़वानी गए। रास्ते में पहले पीथमपुर आता है जो औद्योगिक शहर बसाया गया है। यहाँ पिछली साल भी कार्यक्रम किया था और इस साल फिर करना ही था। एटक के कॉमरेड रुद्रपाल यादव हमारे साथ पीथमपुर तक आये। मज़दूर साथियों को बुलाया। कॉमरेड मोहन निमजे के जीते-जी एटक यहाँ मज़बूत थी लेकिन अब लोग बिखरने लगे हैं। मज़दूरों पर हमला भी बहुत है। वहाँ के साथियों से कार्यक्रम का दिन और वक़्त तय करके हम बड़वानी पहुँचे। मेधा पाटकर, मुकेश भाई, भगवान भाई, राजा तथा नर्मदा बचाओ आंदोलन के अन्य साथियों के साथ मिलबैठकर गाँव तय किए गए और बाक़ी रहने, खाने, आदि की व्यवस्थाओं की सम्भावनाएं टटोलीं गईं।

मेधा पाटकर ने जया और सारिका का और बाक़ी साथियों का हालचाल पूछा ही लेकिन रास्ते में भी और बड़वानी में भी बात करते-करते हम लोग कॉमरेड एस. के. दुबे को याद करते रहे। पिछले कुछ वर्षों में वो हमारी लगभग हर गतिविधि का अभिन्न हिस्सा रहते थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यालय में दीवारों पर की गई चित्रकारी की वजह से विमलभाई याद आए जो 2022 की 15 अगस्त को अचानक ही रुख़सत हो गए थे। वे टिहरी के थे और नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ-साथ एनएपीएम में भी सक्रिय थे। आंदोलन के कार्यालय में एक तस्वीर आशीष की भी लगी थी। आशीष बड़वानी के पास के ही एक गाँव छोटा बड़दा का रहने वाला था और बहुत सक्रिय कार्यकर्त्ता था। आंदोलन में उसकी गाँव-गाँव तक पहचान भी थी और सरकारी अधिकारी हों या बाँध बनाने वाले पूंजीपतियों के दलाल, सब उससे ख़ौफ़ भी खाते थे। विमल भाई जब गए तो 60 के भी नहीं हुए थे। जाने की तो उनकी भी कोई उम्र नहीं थी लेकिन आशीष तो सिर्फ़ 38 वर्ष का ही था जब 2010 में दिल के दौरे से उसकी मृत्यु हुई थी।

बहरहाल हमें लग रहा था कि अगर ठीक से प्रचार हुआ तो राज्य के बाहर से और इप्टा के अलावा अन्य संगठनों के साथी भी इस यात्रा में शरीक होना चाहेंगे। फिर भी व्यवस्थाओं को देखते हुए तय किया गया कि केवल उतने ही यात्रियों की संख्या तय की जाए जो एक बस और एक कार में आ जाएँ। यात्रा कोई मौज-मज़े के लिए थी नहीं सो कम ख़र्च में ज़्यादा से ज़्यादा अच्छा क्या हो सकता है, यही ध्यान रखा गया। रुकने और सोने के लिए गुरुद्वारे वालों ने मुफ़्त में जगह मुहैया करवाने का वादा कर दिया। केवल गद्दे और कम्बल टेंट से बुलवाने का बंदोबस्त करने का कहा जो ज़्यादा महँगा भी नहीं था और ठीक-ठाक था। हमें बड़वानी में दो रातें काटनी थीं और दिन में आसपास के गाँवों में जाना था।
बहरहाल, 21 दिसंबर आ गई।

फैशन शो होगा तो मेहनत के सैंदर्य का होगा
इस बीच जया ने कहा कि अगर इंदौर में दिल्ली की तर्ज पर देश के मशहूर फैशन डिज़ाइनर प्रसाद बिडपा (बेंगलुरु) का खादी और हथकरघे से बने कपड़ों का फैशन शो रखना है तो वह केवल किसी भी सुडौल शरीर वाले युवाओं को खादी या हैंडलूम के कपडे पहनाकर नहीं करना है बल्कि हमें असल श्रमिकों को मंच पर लाना है। अब ये कैसे हो? इस उधेड़बुन में यह विचार आया कि क्यों न महेश्वर जो इंदौर से 75 किलोमीटर दूर है और हथकरघे की साड़ियों के लिए देश भर में मशहूर है, वहाँ से क्यों न करघा चलने वालों को लेकर आया जाए। अब कैसे आया जाए। वहाँ एक रेवा सोसाइटी है जो होल्कर राजघराने के वंशज रिचर्ड होल्कर और उनकी पत्नी सैली होल्कर ने क़रीब 40 वर्ष पहले शुरू की थी। आज उससे क़रीब 250 महिलाएँ और पुरुष जुड़े हैं और उनकी आजीविका इसी से चलती है। अब रिचर्ड होल्कर और सैली होल्कर से संपर्क कैसे किया जाए।

इंटरनेट पर पड़ताल की और सोसाइटी के बोर्ड मेम्बरों के बारे में पता किया और हमारे एक दोस्त बाज़िल शेख़ जिन्होंने कभी सैली होल्कर के साथ कुछ अध्ययन किया था, ने बताया कि सीपीएम की पोलित ब्यूरो सदस्य कॉमरेड सुभाषिणी अली भी उस सोसाइटी में ट्रस्टी हैं। कॉमरेड सुभाषिणी को फ़ोन लगाया। कहीं व्यस्त होंगी, नहीं उठाया। फिर सुधन्वा देशपाण्डे को फ़ोन लगाया और सुभाषिणी जी से बात करने के लिए कहा। एक मिनट में ही वापस फ़ोन आया कि तुरंत बात कर लो, वो कहीं जाने के लिए एयरपोर्ट पर हैं। तुरंत बात की। उन्होंने रिचर्ड होल्कर और सैली होल्कर के बेटे यशवंत होल्कर का नंबर दिया जो महेश्वर के कामकाज को देखते हैं। बोलीं कि तुम फ़ोन मत करना। वो ही फ़ोन करेंगे जब उन्हें वक़्त होगा क्योंकि उनकी माँ की तबियत कुछ नासाज है। दो दिन बाद यशवंत होल्कर जी का सन्देश आ गया और सुभाषिनी जी के हवाले से उन्होंने कहा कि आप को जो भी मदद चाहिए, आपका स्वागत है।

हमने महेश्वर जाकर उनके कर्मचारियों से बात करके उन्हें कहा कि हम चाहते हैं कि आपकी सोसाइटी की साड़ी बुनने वालीं 10-12 महिलाएँ इंदौर में हो रहे हमारे फ़ैशन शो में भाग लें, इसके लिए उन्हें सुन्दर साड़ियाँ उपलब्ध करवाएँ और महेश्वर से उनके इंदौर आने-जाने का प्रबंध करवा दें। सब हो गया। वे 21 दिसंबर को भी वक़्त पर आ गईं जब प्रसाद बिडपा ने ऑडिशन रखा था। उनमें से अनेक ने बताया कि वे पहली बार इतनी महँगी साड़ी पहन रही हैं। उस दिन ऑडिशन में क़रीब 70-80 लोग आये थे। प्रसाद बिडपा का नाम तो एक आकर्षण था ही लेकिन सभी साथियों ने प्रचार में भी काफी मेहनत की थी। प्रसाद ने सबको मंच पर कैसे चलना है, कहाँ खड़े होना है, एक पोज़ में कितने सेकंड खड़े रहना है, आदि का प्रशिक्षण दिया। एक और उल्लेखनीय बायत ये भी है कि हम लोगों ने कभी कोई फैशन शो – किसी भी तरह का आयोजित किया ही नहीं था तो हमें नहीं पता था कि इसमें क्या-क्या ज़रूरतें होती हैं।

अब प्रसाद ने फ़ोन पर कहा कि कुछ मेक अप आर्टिस्ट भी चाहिए होंगे जो रैम्प पर उतरने वाले मॉडल्स का हल्का-फुल्का मेकअप करेंगे। अब ये नयी समस्या थी। सारिका को कहा कि तुम्हारी जान-पहचान के लोगों में से कुछ लोग ब्यूटी पार्लर जाते होंगे तो तुम देखो कि कौन बिना पैसा लिए इस काम को करने तैयार हो सकता है। सारिका ने कहा कि मैं तो कभी पार्लर जाती नहीं फिर भी देखती हूँ। उसने हमारी नयी कवयित्री दीपाली चौरसिया को कहा और वे दोनों अनेक ब्यूटी पार्लर गए। अंततः एक दीपाली दाते मेकओवर्स नाम की ब्यूटी पार्लर फर्म से उनका संपर्क हुआ और दीपाली दाते बिना किसी शुल्क के अपने आठ-दस लोगों के स्टाफ के साथ और अपने ही खर्च से अपने साजो-सामान के साथ 60-70 लोगों का मेकअप करने तैयार हो गईं। इस तरह की अनेक जो सहायताएँ मिलीं उन सबका ज़िक्र भी संभव नहीं है। फिर भी इस रास्ते पर आगे बढ़ने और हौसला दिलाने के लिए विभाष सुरेका, सुरेंद्र संघवी, श्रेया भार्गव, प्रवीण खारीवाल और राहुल निहोरे, दिलीप भावनानी, आनंद मोहन माथुर, चुन्नीलाल वाधवानी, राजा मान्ध्वानी, पायस लाकरा, शब्बीर हुसैन, मुश्ताक़ हुसैन, अश्विनी, अखिलेश शुक्ल, अनुराधा तिवारी आदि ने जो सहयोग किया, उस सबके बिना ये संभव होता ही नहीं।

श्रम के सौंदर्य और गरिमा का मंच पर सम्मान
इंदौर के गांधी हॉल में 22 दिसंबर को खादी और हथकरघे के वस्त्रों का अद्वितीय फैशन शो हुआ। अद्वितीय इसलिए कि प्रसाद बिडपा ने कहा कि अपने तीन-चार दशकों के अनुभव में यह पहली बार हुआ कि उनके रैम्प पर वो महिलाएँ आईं जिन्होंने ख़ुद वो कपड़े बनाये थे जो उन्होंने पहनकर प्रदर्शित किए। दो दिन के प्रशिक्षण में ही महिलाएँ मंच पर पूरे आत्मविश्वास के साथ मौजूद हुईं। इससे श्रम के सौंदर्य का अलग ही दृश्य उपस्थित हुआ। तीन-चार साल की बच्ची से लेकर 60-65 वर्ष की महिलाओं और पुरुषों ने गरिमापूर्ण तरह से हथकरघे और खादी के वस्त्रों को पहनकर प्रदर्शित किया। लगभग 50 महिलाओं और पुरुषों ने “वैष्णव जन तो तेने कहिए”, “एकला चलो रे” और अन्य शास्त्रीय गान और धुनों पर फैशन शो में भाग लिया। इस शो में ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्य भी शामिल हुए। छोटी-सी लड़की पिंकल हार्डिया ने शो स्टॉपर की भूमिका निभायी और और अदिति मेहता ने अपने नृत्यों से दर्शकों का मन मोह लिया।

यहाँ एक बात और उल्लेखनीय है कि इस कार्यक्रम के एक दिन पहले 70 से ज़्यादा लोग ऑडिशन में शामिल हुए थे लेकिन अगले दिन संख्या काफी घट गई। साथी लोग कानाफूसी कर रहे थे कि अगर ऐसे नौसिखियों को और उम्रदराज लोगों को और ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को भी रैम्पवॉक में शामिल किया जाएगा तो वो लोग क्यों शामिल होना चाहेंगे जो मॉडलिंग को प्रोफेशनल तौर पर कर रहे हैं। ये बात जब प्रसाद बिडपा के कानों में पड़ी तो उन्होंने कहा कि आज के शो में कोई भी प्रतियोगी नहीं है बल्कि सब खादी और हथकरघे के वस्त्रों को लोकप्रिय बनाने के अभियान के स्वयंसेवक हैं। जिसे आना हो आये, जिसे न आना हो न आये। मुझे प्रसाद का यह स्टैंड बहुत अच्छा लगा। मंदसौर प्रगतिशील लेखक संघ के साथियों ने “ताकि जागें लोग” शीर्षक से एक छोटी-सी महत्त्वपूर्ण पुस्तिका भी प्रकाशित की थी जिसका विमोचन प्रह्लाद टिपानिया जी ने किया।

इसके पूर्व आईआईटी, मुंबई के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर कीर्ति त्रिवेदी ने खादी की दुर्दशा के बारे में लोगों को बताया कि शासकीय नीतियों के कारण खादी को कॉर्पोरेट के हवाले कर दिया गया है और जिसे सरकार खादी कहकर अरविन्द मिल्स और रेमंड्स कंपनी के ज़रिये बेच रही है, वो दरअसल खादी है ही नहीं। उसमें 66 फ़ीसदी पोलिस्टर है और मात्र 33 फ़ीसदी कॉटन है। मालवा के कबीर कहे जाने वाले कबीर गायक पद्मश्री प्रह्लाद टिपाणिया जी ने अपने साथियों के साथ कबीर के भजनों को प्रस्तुत किया तो माहौल सुकून देने वाले संगीत से सराबोर हो गया। इसके अतिरिक्त वरिष्ठ रंगकर्मी फ्लोरा बोस (बेंगलुरु) ने जया मेहता के निर्देशन में उजान बैनर्जी के साथ एक छोटा-सा नाटक प्रस्तुत किया जिसमें मार्मिक तरह से बताया गया कि पराधीन भारत में किस तरह हमारे सूत काटने वाले मज़दूरों की आजीविका को ब्रिटैन में मशीनों से बने धागे से ख़त्म किया गया।

इंदौर में चरखे से सूत कातने का प्रशिक्षण देने वाली कस्तूरबा गांधी आश्रम की पद्मा ताई एवं 30 हजार महिलाओं को हथकरघे से जोड़ने वाली बाड़मेर राजस्थान की रूमा देवी का सम्मान किया गया। नृत्य, संगीत, नाटक के साथ ही मुकेश बिजौले, पंकज दीक्षित और अशोक दुबे जैसे चित्रकारों के कविता-पोस्टरों की प्रदर्शनी भी लगायी गई थी। इंदौर के कार्यक्रम में अशोकनगर से इप्टा और प्रलेस के वरिष्ठ सदस्य विनोद शर्मा भी शामिल हुए। रात के खाने का यह तय हुआ था कि जो मॉडल्स हैं वो, और जो साथी बाहर से आये हैं, उनके खाने का प्रबंध करना है। संख्या तय नहीं हो रही थी। ज़िम्मेदारी आस संस्था के साथी वसीम ने सहर्ष ले ली थी। पहले हमने कहा 60 लोग हो जाएँगे, फिर दो घंटे बाद कहा कि आप 70-80 का इंतजाम रखना। रात में जब मैं वसीम के पास पहुँचा और पूछा कि क्या बचा? तो वसीम ने कहा कि अब तो दाल चावल भी ख़त्म हो गए। कुल क़रीब 120 से ज़्यादा लोगों ने खाना खाया था। तभी वसीम ने बताया कि उन्होंने जिस खाना बनाने वाले को ज़िम्मा दिया था, उसके यहाँ कुछ अचानक अप्रिय घटित हो जाने से वो नहीं कर पाया तो सारा खाना बनाने और परसकर खिलाने का काम दरअसल वसीम के साथ के ऑफिस के स्टाफ ने ही किया है। मेरे शुक्रिया पर वसीम कहता – अब शुक्रिया कहकर आप हमारा किया हुआ बेकार नहीं कीजिए।

प्रेम की यात्रा के सहयात्री
यात्रा में इंदौर से जया मेहता, प्रमोद बागड़ी, सारिका श्रीवास्तव, अशोक दुबे, विवेक मेहता, हरनाम सिंह, रऊफ खान, विजय दलाल, रवि शंकर, उजान बनर्जी, अथर्व शिंत्रे, शिवम शुक्ला, विवेक, तौफ़ीक़, नितिन, गुफ़रान, रुद्रपाल यादव, के साथ ही अशोकनगर से सीमा राजोरिया, हरिओम राजोरिया, रतनलाल, कबीर राजोरिया, अभिषेक अंशु, मंदसौर से असद अंसारी, हूर बानो सैफी, दिनेश बसेर, निखिलेश शर्मा, छतरपुर से शिवेन्द्र शुक्ला, अंकित अग्रवाल, लखन अहिरवार, अधिराज चतुर्वेदी, बेंगलुरु से फ्लोरा बोस और सुमेर राजू भी शामिल हुए। हमारे साथ रायपुर से निसार अली भी शामिल हो गए थे जो छत्तीसगढ़ की नाचा गम्मत लोक शैली के कलाकार हैं। और बढ़िया बात तो यह हुई कि एकलव्य, भोपाल से चुनिंदा किताबें लेकर रघुवीर जी भी आ गए ताकि अच्छी किताबों की प्रदर्शनी भी लगाई जा सके और साथ ही जहाँ जितना संभव हो, किताबें बेचीं भी जा सकें। भोपाल से कवयित्री और संपादक आरती काफी समय पहले से ही यात्रा में चलने की इच्छा ज़ाहिर कर चुकी थीं लेकिन एक रोज़ पहले ही बोलीं कि स्वास्थ्य ठीक नहीं है। ऐसा न हो कि और तबियत ख़राब हो जाए तो मैं अन्य साथियों पर वजन बन जाऊँ। मैंने बहुत देर तक समझाया कि यात्रा से और लोगों के संगसाथ से तबियत ठीक हो जाएगी। चलो। चलो। और आखिरकार आरती भी यात्रा में शरीक हुई। और मेरा कहा भी सही साबित हुआ। उसकी तबियत कोई ज़्यादा ख़राब नहीं हुई।

शासन निर्मित बाढ़ से तबाही
इंदौर के बाद क़रीब 30 कलाकारों के जत्थे वाली प्रेम और इंसानियत की यह यात्रा पीथमपुर, ठीकरी और पिपलूद गाँवों में कार्यक्रम करती हुई, गीत जाती हुई, नाटक करती हुई और स्थानीय कलाकारों से उनके लोक संगीत को सुनती हुई 23 दिसंबर की रात बड़वानी पहुँची। अगले दो दिनों तक 24 और 25 को बड़वानी के विभिन्न गाँवों में हम लोग गए, उनके संघर्षों की कहानियाँ सुनीं और हाल में 17 सितम्बर 2023 को उन पर शासन ने जो कहर बरपाया, वो भी सुना। दरअसल, 17 सितम्बर को बिना चेतावनी दिए ओंकारेश्वर बाँध के गेट खोल दिए जाने से अनेक गाँवों में अचानक ही बाढ़ जैसे हालात हो गए। सैकड़ों लोगों के घर ढह गए, हज़ारों मवेशी मर गए और बह गए। घर-गृहस्थी का सारा सामान और हज़ारों क्विंटल सोयाबीन और अन्य फसलें ख़राब हो गईं।

जाँगरवा गाँव में हम लोग देशी बैलों को देखकर ख़ुश हो रहे थे कि कितने सुन्दर बैल हैं लेकिन वहीं नज़दीक खड़ी महिलाएँ रोने लगीं कि इन जानवरों के लिए चारा न होने की वजह से ये मर रहे हैं। लोगों के डूबे और ढहे घरों को, पानी से भरे खेतों को जिनमें फसल सड़ चुकी थी, देखना बहुत कारुणिक था। हम लोग गणपुर चौकी, कवठी, सेमल्दा और एकलवारा गाँवों में गये और लोगों के बीच प्रेम, मनुष्यता और सद्भाव के गीत गाये। हमारे युवा साथियों ने हरिशंकर परसाई जी की जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में उनकी एक कहानी “सदाचार का तावीज” पर आधारित एक नाटक भी तैयार कर लिया था जो जगह-जगह खेला। निसार अली ने दो-तीन छोटे-छोटे नाटक तैयार कर लिए थे जो मनोरंजक होने के साथ शिक्षाप्रद भी होते थे और उन्हें हर उम्र और हर तरह के लोग पसंद करते थे। जहाँ जैसा समय होता, वहाँ प्रस्तुति को छोटा-बड़ा कर लिया जाता। छतरपुर, मंदसौर और अशोकनगर के साथी जनगीतों और कबीर केगीतों की तैयारी के साथ आये ही थे। दो दिन बड़वानी में हम लोग गुरुद्वारे में रुके। तीसरे दिन यानि 25 दिसंबर यानि क्रिसमस की रात को पूनम का चाँद था। हम लोग रात में पहुँचे महेश्वर जहाँ ऋषि दत्तात्रेय का एक मंदिर है और सहस्त्रधारा के नज़दीक है। मात्र रुपये 2100 लेकर मंदिर के संचालक महोदय ने हमारे लिए रुकने की जगह उपलब्ध करवा दी थी। इस जगह का नाम जलकोटि है। रात में ही उज्जैन से शशिभूषण, कविता और दिवि आ गए थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथी गोगांवां के जगदीश भाई टेंट से गद्दे और कम्बल रखवा गए थे। सुबह सभी लोग सहस्त्रधारा में जाकर नर्मदा स्नान का आनंद ले आये।

आंदोलन के गाँव और लोग 
सुबह अशोकनगर के साथी सत्तार ख़ान और उनकी शरीके हयात अफ़रोज़ भी आ गईं। 26 दिसम्बर 2023 को पूरे महेश्वर में एक प्रभात फेरी निकालकर गीत गाते हुए लोगों को शाम को अहिल्या घाट पर होने वाले कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया और पर्चे बाँटे। फिर हम लोग जगदीश भाई के गाँव गोगांवां गए। गोगांवां आंदोलन का महत्त्वपूर्ण गाँव रहा है। फिल्म अभिनेत्री मीता वशिष्ठ को शाम को महेश्वर के घाट पर कार्यक्रम प्रस्तुत करने आना था। वो एक रात पहले ही चेन्नई से इंदौर आ गईं थीं। वो भी इंदौर से निकलकर सीधे गोगांवां आ गईं। नर्मदा देखी और गोगांवां में जमा हुए महिलाओं-पुरुषों से ख़ूब आत्मीयता से बात की। जगदीश भाई ने महेश्वर बाँध के ख़िलाफ़ लड़ी गई बहादुराना लड़ाई के बारे में सबको बताया। अभी महेश्वर बाँध रुका पड़ा है। मतलब बाँध की कंक्रीट की दीवार अनियोजित विकास, भ्रष्टाचार और जनविरोधी रवैये की एक स्मारक है। महेश्वर बाँध से 61 गाँवों का विस्थापन हुआ था। हज़ारों परिवार विस्थापित हुए थे। अनेक बार पुलिस का दमन हुआ, लोग जेलों में ठूँसे गए। और आखिरकार यह सब करके और क़रीब 3000 करोड़ रुपये ख़र्च करके बाँध की दीवार बेमतलब वहाँ खड़ी है। न उससे बिजली बन रही है और न ही उसका कोई अन्य उपयोग हो रहा है।

हमने गोगांवां जाते हुए खेतों में साड़ियाँ लगीं देखीं तो पूछा कि ये क्यों? पता चला कि इधर जंगली सूअरों का आतंक काफ़ी है। शाम को जैसे ही किसान खेत से घर चले जाते हैं वैसे ही जंगली सूअरों की पूरी टोली खेत का सफाया कर देती है। जंगली सूअर के बारे में यह माना जाता है कि वो एक सीधी लकीर में चलता है। अगर उस सीध में कोई अड़चन दिखे तो वो रास्ता बदल लेते हैं। इसलिए साड़ी देखकर वो रास्ता बदल लेते हैं। हालाँकि यह सवाल फिर भी मन में बना रहा कि अगर सूअर रास्ता बदल भी लेते होंगे तो किसी और के खेत को तबाह करते होंगे जो उनके रास्ते में आ जाता होगा। बहरहाल।

किले से बाहर लोगों के बीच कला
गोगांवां से हम लोग महेश्वर पहुँचे तो नर्मदा नदी का पर्याय बन चुकीं मेधा पाटकर हमारे बीच अपनी महिला साथियों के साथ वक़्त से पहले ही पहुँच गईं। लाइट-साउंड वग़ैरह के इंतज़ार में थोड़ी देर हो रही थी। मेधा बोलीं कि विनीत भाई, शुरू करते हैं न, हम लोग तो ऐसे ही कर लेते हैं। आप क्यों लाइट और साउंड के चक्कर में पड़ रहे हैं। जैसे-तैसे लाइट साउंड तैयार हुआ और फिर जब महेश्वर के किले के बाहर नर्मदा के घाट पर अशोकनगर के साथी हरिओम, सीमा और कबीर द्वारा कबीर गायन, निसार अली द्वारा नाट्य प्रस्तुति, हूर बानो और उनके साथियों के जनगीत गायन, अदिति मेहता और सुरभि बोर्डिया का कत्थक, शर्मिष्ठा घोष का गायन, मीता वशिष्ठ का 14वीं सदी की कश्मीरी कवयित्री लल्लेश्वरी, जिन्हें लाल देड भी कहते हैं, पर सम्मोहक वक्तव्य और महेश्वर की बुनकर महिलाओं का अपने ही शहर में रंगबिरंगी रोशनियों के बीच फैशन शो हुआ तो आते-जाते लोगों के कदम थम गए। और वहीं जम गए। मेधा बोलीं कि नहीं, लाइट साउंड से रौनक तो बढ़ गई।

मेधा ने अपने वक्तव्य में कश्मीर की झेलम से लेकर नर्मदा तक नदियों की दुर्दशा और उस बहाने से पूरी मनुष्य सभ्यता पर प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से गहराते जा रहे संकट की ओर इशारा किया और कहा कि देश में केवल कावड़ यात्राएँ ही नहीं निकल रही हैं, ढाई आखर प्रेम की यात्रा भी निकल रही है जो इंसानियत के लिए ज़्यादा ज़रूरी है। मेधा का वक्तव्य एक कविता और एक नदी की तरह था। सञ्चालन करते हुए मैंने कहा कि हमने राजप्रासादों में रहने वाली शास्त्रीय कला को क़िले के बाहर नर्मदा के तट पर आम लोगों के बीच लाया और यह साबित हुआ कि अगर शास्त्रीय कला भी लोगों के बीच प्रदर्शित की जाए तो लोग उसका रसास्वादन कर सकते हैं। तब तक इंदौर के साथी अशोक दुबे, विवेक मेहता, अरविन्द पोरवाल, अनुराधा तिवारी और देवास से प्रलेस के साथी कुसुम वागड़े, ओमप्रकाश वागड़े, एकलव्य, देवास से शोभा भी आ गए। ठीकरी से सेंचुरी मिल के साथी भी आ पहुँचे। बंद हो चुकी सेंचुरी मिल के कर्मचारी नवीन मिश्र जी गायक भी हैं। उन्होंने भी जनगीत गाये।

मोहब्बत के नये रिश्ते
महेश्वर और महेश्वर के आसपास के गाँवों में जो परिचय से था, उसमें एक इजाफ़ा ये हुआ कि महेश्वर में भी हमें सस्ते में रहने का इंतजाम तो हो गया था और एक वक़्त का खाना जगदीश भाई गोगांवां में अपने घर पर ही खिला रहे थे लेकिन फिर भी दो वक़्त के खाने का प्रबंध और करना था। इंदौर में वसीम ने बताया था कि मेरे चाचा महेश्वर में रहते हैं। वो कुछ मदद कर सकते हैं। उनका नाम शब्बीर भाई है। शब्बीर भाई से बात की तो बोले कि आपको वसीम ने कह दिया है तो आप किसी बात की चिंता मत कीजिए। और उन्होंने महेश्वर में काफी मदद की। सस्ते में अच्छा खाना खिलाया और मेवे के लड्डू अपने हाथों से बनाकर हम सभी के लिए लाये। इसी तरह रेवा सोसाइटी के ओंकार भाई ने मीता और अन्य महिलाओं को कपडे बदलने के लिए वक़्त पर होटल के कमरों का इंतजाम महेश्वर में कर दिया जबकि सारे होटल भरे हुए थे।

इसी तरह एक समस्या अचानक आ खड़ी हुई थी महेश्वर के अहिल्या घाट पर कार्यक्रम करने के लिए। अचानक प्राप्त हुई शर्तों में उल्लेख था कि आपको घाट पर कोई कार्यक्रम करना है तो खासगी ट्रस्ट (होल्कर राजपरिवार के सदस्यों की ट्रस्ट) को रुपये एक हज़ार बतौर शुल्क देने पड़ेंगे जो कि आसानी से दी जा सकने वाली राशि थी। लेकिन उसमें अगली शर्त थी कि ढाई लाख रुपये सुरक्षा राशि के तौर पर जमा करने होंगे ताकि अगर घाट पर मौजूद प्राचीन सामग्री में कोई तोड़फोड़ या नुक्सान हो तो उसका मुआवजा वसूला जा सके। ये टेढ़ी शर्त थी। हम लोग पहले ही यात्रा में थे और बहुत मुश्किल से यात्रा लायक पैसे भी पूरे नहीं जुट पाए थे। तारिख भी 25 दिसंबर थी यानी क्रिसमस।

मैंने बहुत संकोच के साथ यशवंत होल्कर जी को व्हाट्सप्प पर मैसेज भेजा कि इस समस्या से उबारने में आप कोई मदद कर सकते हैं क्या? क्योंकि खासगी ट्रस्ट के सचिव कर्नल भटनागर ने मुझे ट्रस्टियों के नाम बताये थे। बहरहाल मुझे बिलकुल उम्मीद नहीं थी कि अपने परिवार के साथ क्रिसमस की छुट्टियों में बाहर गये हुए यशवंत जी मेरे सन्देश को देखेंगे और कोई जवाब देंगे, लेकिन थोड़ी देर बाद ही जवाब आया – मैं देखता हूँ। और उसके पाँच मिनट बाद खासगी ट्रस्ट के दफ्तर से फ़ोन आया कि आप बस 25 हज़ार जमा करवा दें जो आपको कार्यक्रम के बाद वापस मिल जाएँगे। मेरे पास तो 25 हज़ार भी नहीं थे। मैंने शब्बीर भाई को कहा और उन्होंने जाकर 25 हज़ार जमा करवाए दिए जो उन्हें कार्यक्रम के अगले ही रोज़ वापस मिल गए। इस

यात्रा में यह सब नये और महत्त्वपूर्ण रिश्ते बने
इंदौर में 27 दिसंबर को दिन में हमने शाम को भाषा सिंह का “चुनाव, युद्ध और मीडिया” विषय पर व्याख्यान रखा था। भाषा को दिल्ली से आना था और संजय वर्मा एवं दीपक असीम को उन्हें इंदौर से महेश्वर लेकर आना था। शाम 5 बजे तक ये लोग भी आ गए। यह भी उल्लेखनीय है कि महेश्वर में प्रसाद बिडपा नहीं थे लेकिन उनके फैशन शो को देखकर शर्मिष्ठा और जया ने महेश्वर की महिलाओं को तैयार करके फिर से महेश्वर में रैम्प पर चलवाया और उनके लिए वो बहुत यादगार हुआ। भाषा ने उन पर एक विशेष स्टोरी की अपने चैनल पर।

26 दिसंबर को महेश्वर का कार्यक्रम संपन्न होने के बाद खाना खाकर हम लोगों को रात में ही इंदौर पहुँचना था जहाँ से सुबह मीता वशिष्ठ को मुम्बई जाना था और हम लोगों के इंदौर में और भी कार्यक्रम थे। महेश्वर से इंदौर के रास्ते में आगरा-मुंबई राजमार्ग पर पड़ने वाले घाट सेक्शन में तभी एक एक्सीडेंट हो जाने के कारन चार ट्रक जलकर ख़ाक हो गए थे और दोनों तरफ ट्रकों और बसों की लम्बी कतारें लगीं थीं। हम लोग इंदौर काफिर देर रात पहुँच सके और जब तीन बजे के आसपास सोये तो लग नहीं रहा था कि अगले दिन के सुबह के नुक्कड़ नाटक का कार्यक्रम कर पाएँगे। लेकिन वो भी कर लिया।

मालवा मिल के पास मज़दूर क्षेत्र में कबीर चौक पर जनगीत भी गाये, पुस्तक प्रदर्शनी भी लगायी और निसार अली के नाचा-गम्मत के साथ “सदाचार का तावीज” भी किया। दोपहर में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के शहीद सआदत ख़ान और अमझेरा के शहीद राजा बख्तावर सिंह के स्मारक पर गए। ये स्मारक भी कोई इमारत नहीं थी बल्कि बरगद के और नीम के पेड़ हैं जिन पर इन शहीदों को फाँसी पर लटकाया गया। शहीद सआदत ख़ान की छठवीं पीढ़ी के वंशज रिज़वान खिलजी जी हमारे इसरार पर वहाँ आ गए थे जिन्होंने पूरे इतिहास से रूबरू करवाया।

चुनाव, युद्ध और मीडिया
शाम को स्टेट प्रेस क्लब के साथ मिलकर भाषा का व्याख्यान हुआ। सभागार पूरा भरा हुआ था और भाषा एक घंटे तक सम्मोहक तरह से विषय पर बोली। इसमें युद्ध के कवरेज से लेकर चुनाव के कवरेज तक मीडिया को उन्होंने अनेक तरफ से कठघरे में खड़ा किया और महिलाओं के समबन्ध में आजकल के तथाकथित साधुओं की बातों को चुनौती देते हुए कहा – “चाहे कोई धीरेन्द्र शास्त्री कहे या कोई और, महिलाएँ अब अपनी आज़ादी खोने नहीं देंगी।” अभिनेत्री फ्लोरा बोस ने अपने हाल ही में दिवंगत पति प्रसिद्ध कश्मीरी शायर शांतिवीर कौल की फ़िलिस्तीन पर लिखीं कविताओं सहित साहिर लुधियानवी की जंग के ख़िलाफ़ नज़्म का भावप्रवण पाठ किया और मैंने फ़िलिस्तीनी – अमेरिकी कवि लिसा सुहैर मजाज की कविता “क्या बोली वो” के मेरे ही अनुवाद का पाठ किया। इसी के साथ मध्य प्रदेश का जत्था ख़त्म हो गया। लेकिन अब मुझे और निसार अली को गुजरात का “ढाई आखर प्रेम” का कला जत्था निकालने भी जाना था। गुजरात के साथियों से भी मैं ही संपर्क में था और यह बात मुझे पता थी कि अहमदाबाद से वरिष्ठ कॉमरेड रामसागर सिंह परिहार जी के अलावा कोई साथी आगे नहीं जा सकेंगे। तो मैंने निसार अली को इंदौर में ही रोक लिया कि अब तुम रायपुर वापस जाकर उलटे तीन दिन बाद फिर गुजरात के लिए आओ, इसके बजाय इंदौर से ही अहमदाबाद चलते हैं। निसार मान गए।

अब मान गए तो चार दिन तक केवल लेटे-बैठे तो रह नहीं सकते तो हमने सोचा कि उनके नाचा गम्मत के कुछ और प्रदर्शन रख दिए जाएँ। देवास के साथियों ने एक प्रदर्शन की ज़िम्मेदारी ली तो साथ में सदाचार का तावीज नाटक की टीम भी साथ चली गयी और ओटला तथा प्रगतिशील लेखक संघ के साथियों के सहयोग से देवास में बहुत अच्छा प्रदर्शन हुआ। साथ ही इंदौर में एक प्रदर्शन निसार अली ने रूपांकन में भी कर दिया और दोनों नाटकों के दो प्रदर्शन हमने मालवा मिल के आसपास दुबे का बगीचा और पंचम की फेल में भी कर दिए। इस तरह 27 दिसंबर को ख़त्म होने के के बजाय ढाई आखर प्रेम की यात्रा इंदौर में 31 दिसंबर तक चलती रही।

पहले दिन खलघाट से ही नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथी मुकेश भाई, भगवान् भाई, कमलू जीजी, राजा, और बहुत से साथी हमारे साथ यात्रा में यात्री की तरह भी शामिल रहे और पूरे क्षेत्र से वाकिफ होने के कारण हमारे मार्गदर्शक भी रहे। उनके आंदोलनों के अनुभवों से नए साथियों ने बहुत कुछ सीखा। इंदौर से रवि शंकर तिवारी, सारिका श्रीवास्तव, शिवम् शुक्ला, गुफ़रान, विलास बम्ब्रू आदि साथी भी यात्रा में शामिल हुए और विभिन्न मौकों पर जैसी ज़रूरत आयी, वैसे कामों में हाथ बँटाया। कभी मतभेद भी हुए, कभी डाँट-डपट और रूठना-मनाना भी लेकिन साथ -साथ की गयी इस यात्रा ने आखिरकार लोगों के साथ प्यार के रंग को ही गाढ़ा किया।

यात्रा में तैयार होते गए कलाकार
होता ये आया था कि निसार अली अपनी नाचा गम्मत की तीन लोगों की टीम लेकर चला करते थे। तो पहले वो पहुँचे अपने साथियों के साथ पंजाब। तीन लोग थे। पंजाब के साथियों ने उनके आने-जाने और प्रवास का बेहतरीन इंतज़ाम कर दिया। फिर वो और भी जगह गए। मध्य प्रदेश में पैसों की थी किल्लत तो साथियों ने कहा कि और तीन लोगों को बुलाएँगे तो खर्च और बढ़ जाएगा। लेकिन मेरा मन था कि निसार मध्य प्रदेश के जत्थे में भी शामिल हो। तो मैंने एक दिन निसार को फ़ोन किया कि निसार, क्या मध्य प्रदेश नहीं आओगे? निसार बोले कि आप कहोगे तो क्यों नहीं आएँगे?

मैंने कहा कि हमारे पास पैसे नहीं हैं लेकिन तुमको आना पड़ेगा। निसार ने कहा कि जैसा आप कहो। मैंने कहा कि मैंने तुम्हारे प्रदर्शन देखे हैं। उनमें तुम्हें जिन साथियों की ज़रूरत पड़ती है, वो हम यहीं तैयार करवा देंगे। निसार आ गए। उनके ठहरने का इंतजाम अशोक दुबे जी से कहकर रूपांकन वाचनालय पर कर दिया गया जहाँ चौबीसों घंटे सौ-पचास नौजवान विद्यार्थियों की मौजूदगी रहती ही है। इंदौर से यात्रा शुरू हुई तो मैंने निसार को अथर्व मिलवा दिया कि तुम इसे तैयार कर लो। अथर्व और निसार ने बस में बैठे-बैठे ही बातचीत कर ली और पीथमपुर, ठीकरी, पिपलूद, बड़वानी, जांगरवा, कवठी, गोगांवां और महेश्वर तक के प्रदर्शन अथर्व ने निसार के साथ किए। हर प्रदर्शन में अथर्व और निखरता भी गया।

अब 27 दिसंबर की सुबह आ गए हम इंदौर। और अथर्व ने कहा कि मेरी परीक्षा है और तौफीक ने कहा कि वो भी नौकरी की वजह से नहीं आ सकेगा। तो तुरंत ही “सदाचार का तावीज” और नाचा-गम्मत के दोनों प्रदर्शनों में अथर्व और तौफीक की जगह आदित्य और विकास को लाया गया। उन्होंने ही तौफीक और अथर्व की जगह की जगह आगे इंदौर और देवास में भूमिकाएँ निभाईं और शानदार निभाईं। इस तरह निसार अली ने अपनी प्रस्तुतियों के लिए अथर्व, उजान और विक्की को अपना सोमारू का किरदार सिखाया।

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हत्या से ठीक पहले गाँधीजी और गोडसे की क्या हुई थी बातचीत?

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मोहनदास कर्मचंद गांधी

हरिगोविंद विश्वकर्मा
मोहनदास करमचंद गाँधी की नीतियों को हिंदुओं के हितों के ख़िलाफ़ मानने वाले हत्यारे नाथूराम विनायक गोडसे ने 30 जनवरी 1948 की शाम दिल्ली के बिड़ला हाउस में राष्ट्रपिता की गोली मारकर दी थी। लेकिन हत्या से ठीक पहले बापू और गोडसे के बीच बातचीत हुई थी। यह बातचीत क्या थी, इसका ज़िक्र हत्या की साज़िश की जाँच करने के लिए गठित न्यायमूर्ति जीवनलाल कपूर आयोग की रिपोर्ट में किया गया है। कपूर आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक हत्या से कुछ मिनट पहले ही महात्मा गाँधी और नाथूराम गोडके के बीच संक्षिप्त बातचीत हुई थी।

दरअसल, आज़ादी के बाद पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आने वाले सिंधी और पंजाबी समुदाय के लोग गाँधीजी के व्यवहार से जिस तरह नाराज़ थे और हर क्षुब्ध सिंधी और पंजाबी कहता था कि वह गाँधीजी की हत्या करना चाहता है, उनको गोली मारना चाहता है। इससे इस बात की संभावना प्रबल हो गई थी कि महात्मा की हत्या हो सकती है। जब विभाजन में अपना सब घर-परिवार गंवाने वाले पंजाबी युवक मदनलाल पाहवा ने हत्या की घटना से 10 दिन पहले यानी 20 जनवरी की शाम बिड़ला हाउस में बम फेंका था। तभी तय हो गया था कि गाँधीजी को मारने की साज़िश रची जा चुकी है।

1940 के दशक के अख़बारों की रिपोर्ट्स और दूसरे दस्तावेज़ों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि विभाजन के बाद गाँधीजी अपनी मुस्लिमपरस्त नीतियों के चलते बहुत अलोकप्रिय हो गए थे। वह इतने अलोकप्रिय हो गए थे कि कई बड़े नेता उनसे नफ़रत करने लगे थे। इस बीच उनके ब्रम्हचर्य के प्रयोग के लिए लड़कियों के साथ नग्न सोने की बात आश्रम से बाहर निकलकर राजनीतिक गलियारों तक फैल गई थी। इससे गाँधीजी के सबसे छोटे पुत्र देवदास गाँधी, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ-साथ खुद गाँधीजी के कई अनुयायी उन्हें कोस रहे थे कि इस उम्र में उन्हें ब्रम्हचर्य का प्रयोग करने की सूझी है।

हालाँकि 2019 में स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रमुख नेता बनने वाले गाँधीजी बहुत ज़िद्दी स्वभाव के थे। अपनी धुन के आगे वह किसी की भी नहीं सुनते थे। तमाम विरोध के बावज़ूद उन्होंने ब्रह्मचर्य के प्रयोग को रोका नहीं और वह बदस्तूर चलता रहा। इत्तिफ़ाक से उसी समय पाकिस्तान के 55 करोड़ रुपए के भुगतान की एक और अहम घटना घट गई, जिससे गाँधीजी की लोकप्रियता का ग्राफ एकदम से गिर गया। गाँधीजी इतने अधिक अलोकप्रिय हो गए कि अचानक जिन्ना के साथ-साथ वह भी राष्ट्रीय विलेन बन गए। लोग खुलेआम उनकी आलोचना और उन्हें मारने की बात करने लगे।

हुआ यूँ कि आज़ादी के बाद पाकिस्तान चाहता था कि मुस्लिम बाहुल्य आबादी के कारण जम्मू-कश्मीर उसे मिलना चाहिए, लेकिन जब उसकी मंशा पूरी न हुई तो अचानक उसकी शह पर कबिलाइयों ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। जवाब में तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने 12 जनवरी 1948 को घोषणा की कि पाकिस्तानी की कश्मीर में घुसपैठ से भारत नाराज़ है और आज़ादी से पहले हुए क़रार के तहत इस्लामाबाद को दी जाने वाली 75 करोड़ रुपए की राशि में से बाक़ी 55 करोड़ रुपए के भुगतान को रोका दिया गया है। पाकिस्तान के क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना ने गाँधीजी को फोन कर पटेल के निर्णय पर अप्रसन्नता जताई।

‘द हिंदू’ के 8 अगस्त 1948 के अंक में छपी ख़बर के मुताबिक 12 जनवरी 1948 की शाम तक गाँधीजी ने बिड़ला हाउस में संवाददाता सम्मेलन आयोजित की और उसमें घोषणा कर दी कि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए के भुगतान को रोकने के पटेल के निर्णय के ख़िलाफ़ वह आमरण अनशन करेंगे। उन्होंने 13 जनवरी, 1948 से अपना उपवास शुरू भी कर दिया। वह केंद्र सरकार पर इस बात के लिए दबाव बना रहे थे कि वह पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए तुरंत जारी करे। वैसे भारत ने क़रार के तहत 75 करोड़ में से 20 करोड़ पहले ही दे चुका था।

15 जनवरी, 1948 से अनशनरत गाँधीजी की तबियत ख़राब होने लगी। इससे केंद्र सरकार भारी दबाव में आ गई। गाँधीजी की तबियत लगातार बिगड़ती रही। 17 जनवरी, 1948 की शाम भारत ने गाँधी जी के दबाव के चलते पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए भुगतान कर भी दिया। अगले दिन यानी 18 जनवरी को गाँधीजी ने अपना आमरण अनशन समाप्त कर दिया। इससे सरकार और कांग्रेस ही नहीं, बल्कि पूरा देश गाँधीजी से बहुत नाराज़ हो गया था। गाँधीजी के अनशन की ख़बर 13 जनवरी को ही पुणे के दैनिक ‘हिंदूराष्ट्र’ के दफ़्तर में पहुँच गई थी और 17 जनवरी को 55 करोड़े के भुगतान की ख़बर भी वहाँ पहुँची।

नारायण आप्टे उर्फ नाना दैनिक ‘हिंदूराष्ट्र’ का प्रकाशक और नाथूराम गोडसे संपादक था। गाँधी के पाकिस्तान प्रेम से नाराज़ होकर नाथूराम ने उनकी हत्या करने की योजना बना ली। 14 जनवरी को उसने दूसरे दिन 3-3 हज़ार रुपए की अपनी दो बीमा पालिसियों का नॉमिनी अपने दोस्त नारायण आप्टे की पत्नी चंपूताई आप्टे और छोटे भाई गोपाल गोडसे की पत्नी सिंधुताई गोडसे को बना दिया। यही बात नाना और गोपाल के ख़िलाफ़ गई और दोनों गाँधी हत्याकांड में शामिल ना होने के बावजूद फँस गए। बाद में नाना को गोडसे के साथ फांसी दी दे गई और गोपाल को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई।

गाँधीजी की हत्या करने की योजना बना चुका नाथूराम गोडसे बारह दिन पहले मुंबई से दिल्ली पहुँच गया। वह एन केन प्रकारेण बिड़ला हाउस में घुसने का मौक़ा तलाशने लगा। उसने ग़ौर किया कि 20 जनवरी को पाहवा के बम फेंकने की घटना के बावजूद बिरला हाउस की सुरक्षा व्यवस्था बहुत शिथिल है। इसी बीच गाँधीजी ने पटेल की नाराज़गी दूर करने के लिए उन्हें 30 जनवरी 1948 को बातचीत के लिए बिरला हाउस बुलाया था। पटेल अपनी बेटी मणिबेन के साथ शाम 4 बजे गाँधीजी से मिलने पहुँचे और मीटिंग शुरू हो गई। उस बैठक में पटेल की गाँधीजी से काफी बहस हुई जिससे बैठक लंबी खिंच गई।

इसी बीच 4.50 बजे के आसपास नाथूराम ने गेटकीपर छोटूराम और पुलिसकर्मियों को चकमा देकर रिवॉल्वर समेत बिड़ला हाउस में प्रवेश कर लिया। गोपाल गोडसे ने अपनी ‘गाँधी वध आणि मी’ में इस प्रसंग का ज़िक्र किया है। नाथूराम ने जेल में उस घटना का ज़िक्र करते हुए बताया था, “शुक्रवार की शाम 4.50 बजे मैं बिड़ला भवन के गेट पर पहुँचा। 4.55 बजे छह गोलियों से लोडेड रिवॉल्वर समेत अंदर प्रवेश करने में सफल रहा। मुझे तब बहुत अधिक हैरान हुई जब गेट पर तैनात रक्षकों ने मेरी तलाशी नहीं ली। वहाँ मैं भीड़ में अपने को छिपाए रहा, ताकि किसी को मुझे पर शक न हो।”

उधर गाँधीजी की पटेल के साथ बातचीत एक घंटे तक खिंच गई। गाँधीजी के व्यवहार ख़ासकर उनके आमरण अनशन से पटेल बहुत नाराज़ थे। बातचीत के दौरान अचानक गाँधीजी की नज़र घड़ी पर गई, तो पाँच बज रहे थे। गाँधीजी ने कहा- अरे, मेरी पूजा का समय हो गया। पटेल, रुको पूजा के बाद तुमसे बात करता हूं।” यह कहकर वह उठने का प्रयोजन करने लगे। लेकिन पटेल उनका इंतज़ार करने की बजाय वहां से चले गए। बैठक समाप्त कर बापू हमेशा की तरह आभा और मनु के कंधों पर हाथ रखकर प्रार्थना सभा में की ओर रवाना हो गए वह शामिल होने के लिए तेज़ी से उस तरफ़ बढ़ रहे थे।

आभा और मनु का सहारा लेकर चल रहे 79 वर्षीय गाँधीजी शाम 5.10 बजे बैठक से बाहर निकले। हमेशा की तरह सभास्थल की सीढ़ियों के पास मुलाक़ाती लाइन से खड़े थे। वही गोडसे भी खड़ा था, गाँधीजी को आता देखकर वह अचानक सामने आ गया। उसने सामने गाँधीजी को देखा। तभी बापूजी के साथ चल रही मनु ने कहा- “भैया, सामने से हट जाओ, बापू को जाने दो, पहले से ही देर हो चुकी है।” मनु की बात को अनसुना करते हुए नाथूराम गाँधीजी के बहुत क़रीब पहुँच गया और हाथ जोड़कर कहा- “नमस्ते बापूजी! आज तो आप लेट हो गए प्रार्थना करने में।”

“हाँ भाई, आज वाक़ई मैं ले हो गया। चलो-चलो देरी हो रही है।” गाँधीजी आगे बढ़ते हुए बोले। उसी समय गोडसे ने कहा “बापू, आपकी शानदार देश-सेवा के लिए मैं हाथ जोड़कर आपको प्रणाम करता हूँ।” गाँधी जी ने मुस्कुरा कर धन्यवाद कहा। गोडसे आगे बोला, “लेकिन बापू, आपका ज़िंदा रहना न तो देश के हित में है और न ही बहुसंख्यक हिंदुओं के हित में। देश और हिंदुओं का भारी नुक़सान करने के लिए आपको मारना ही पड़ेगा।” अरे यह क्या कह रहे हैं भाई। गाँधीजी बोले, लेकिन उनकी बात अनसुनी करके नाथूराम धीरे ने रिवॉल्वर निकाल ली मनु और आभा को गाँधीजी से दूर धकेल दिया। इसके बाद 5.17 बजे 3 गोलियाँ गाँधीजी के सीने में उतार दी।

लाल किला में बनी विशेष अदालत में मुक़दमे के ट्रायल के दौरान नाथूराम ने अदालत को बताया था कि वह दो ही गोली चलाने वाला था, लेकिन उत्तेजना में उससे तीसरी गोली भी चल गई और गाँधीजी ‘आह’ कहकर वहीं गिर पड़े। उन्होंने ‘हे राम’ उच्चरण नहीं किया था। जैसा कि लोग दावा करते हैं। जैसे ही गोली चली, गाँधीजी के साथ चल रहे सभी मौजूद सारे लोग सिर पर पांव रखकर भाग खड़े हुए। जबकि सब लोग दावा करते थे कि वे गाँधीजी के लिए जान दे सकते हैं। नाथूराम गोडसे यह सोचकर आया था कि जैसे ही वह गाँधीजी पर गोली चलाएगा, उसे भी गोली मार दी जाएगी और उसका काम-तमाम हो जाएगा।

जेल प्रवास के दौरान गोडसे ने साथियों को बताया था, “मुझे लगा था कि जैसे ही मैं गाँधीजी को गोलू मारूँगा, उसी समय मेरी हत्या कर दी जाएगी, लेकिन यहाँ तो पुलिवाले समेत सभी लोग डरकर वहाँ से भाग गए। लोगों का यह व्यवहार देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने जब समर्पण करने की मुद्रा में हाथ ऊपर किया, तब भी किसी की मेरे पास आगे की हिम्मत किसी की नहीं पड़ रही थी। पुलिवाला भी डर रहा था। गोली चलाने के बाद मैं काफी उत्तेजित महसूस कर रहा था। मैंने रिवॉल्वर समेत हाथ ऊपर उठा लिया था। मैं चाहता था कि पुलिस मुझे गिरफ़्तार कर ले। लेकिन वहां मौजूद कोई शख़्स मेरे पास आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।”

नाथूराम गोडसे ने साथियों को बताया, “फिर मैंने पुलिस वाले को आंखों से ही पास आने का संकेत किया और कहा कि वह मेरी रिवॉल्वर लेकर मुझे गिरफ़्तार कर ले। पांच छह मिनट तक वह भी डरता रहा। बाद में उसे भरोसा होने लगा कि मैं उस पर कतई गोली नहीं चलाऊँगा। उसके बाद वह हिम्मत जुटाकर धीरे-धीरे लेकिन सावधान मुद्रा में मेरे पास आया और मेरा हाथ पकड़ लिया। फिर उसने मेरी हथेली से मेरा रिवॉल्वर उठा लिया। इसके बाद वहाँ मौजाद क़रीब-क़रीब सभी लोग मुझ पर टूट पड़े। कोई मुझे छड़ी से मार रहा था तो कोई हाथ से प्रहार कर रहा था। कई लोगों ने मुझे कई मुक्के मुँह पर भी मारा।”

बिड़ला भवन में गोली चलने की आवाज़ सुनकर वहाँ से गुजर रही पुलिस वैन अंदर आ गई। डीएसपी जसवंत सिंह के आदेश पर दसवंत सिंह और कुछ पुलिस वाले नाथूराम को लेकर तुगलक रोड थाने गए। रात पौने दस बजे थाने के मुंशी दीवान डालू राम ने एफ़आईआर लिखा। मेडिकल के बाद नाथूराम को फिट घोषित कर दिया गया। शाम 5:45 बजे आकाशवाणी पर गाँधीजी के निधन की सूचना दी गई। बताया कि नाथूराम गोडसे नाम के व्यक्ति ने बापू की हत्या कर दी। सारा देश सन्न रह गया। हर कोई हैरान था कि एक मराठी युवक ने यह काम क्यों किया, क्योंकि लोगों को आशंका थी कि कोई पंजाबी या सिंधी व्यक्ति गाँधीजी की हत्या कर सकता है।

देश के विभाजन के लिए गाँधीजी को ज़िम्मेदार मानने वाला गोडसे, दरअसल, चाहता था कि गाँधीवाद के पैरोकार उसके साथ गाँधीवाद पर चर्चा करें, ताकि वह बता सके कि गाँधीवाद से इस देश का कितना नुक़सान हुआ। अगली सुबह गाँधीजी के सबसे छोटे पुत्र देवदास गाँधी गोडसे से मिलने तुगलक रोड थाने पहुँचे। लॉकअप के बाहर खड़े देवदास से गोडसे ने कहा, “मेरी वजह से आज आप अपने पिता को खो चुके हैं। आपके परिवार पर हुए वज्रपात का मुझे बहुत ख़ेद हैं। मैंने हत्या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से की है। आप अगर वक़्त दें तो मैं बताऊँ कि मैंने गाँधीजी की हत्या आख़िर क्यों की?”

दरअसल, गोडसे गाँधीवादियों से चर्चा करके अपना पक्ष रखना चाहता था, इसीलिए उसने गाँधीजी के तीसरे पुत्र रामदास गाँधी से भी इस विषय पर चर्चा करने की अपील की थी। रामदास तो उससे मिलने के लिए तैयार भी हो गए थे, लेकिन उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इजाज़त ही नहीं दी। दो बड़े गाँधीवादी नेता आचार्य विनोबा भावे और किशोरी लाल मश्रुवाला ने नाथूराम से चर्चा करके उसका पक्ष जानने की कोशिश की थी, लेकिन ऊपर से उन्हें भी गोडसे से मिलने की इजाज़त नहीं दी गई। इस तरह गाँधीवाद पर बहस की नाथूराम की इच्छा अधूरी रह गई।

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महिलाओं के लिए लेखन भारत ही नहीं पूरी दुनिया में चुनौतीपूर्ण – दिव्या माथुर

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मुंबई। ब्रिटेन मे बसी भारतीय मूल की हिंदी लेखिका दिव्या माथुर का मानना है कि तमाम विकास के बावजूद महिलाओं के लिए लेखन कार्य भारत ही नहीं पूरी दुनिया में चुनौतीपूर्ण है। लेकिन यह खुशी की बात है कि भारत ही नहीं पूरी दुनिया में महिलाएं चुनौती स्वीकार करके तेजी से लेखन ही नहीं कर रही हैं, बल्कि अपनी असरदार उपस्थिति भी दर्ज करवा रही हैं।

अपने कहानी संग्रह ‘आक्रोश’ के लिए वर्ष 2001 का पद्मानंद साहित्य सम्मान पाने वाली दिव्या माथुर ने गोरेगांव पश्चिम के केशव गोरे सभागृह में रविवार की शाम चित्रनगरी संवाद मंच के साप्ताहिक कार्यक्रम में कवियों, लेखकों एवं बौद्धिक तबके को संबोधित करते हुए कहा कि भारत में भी स्त्रियां बेहतरीन लेखन कर रही हैं। ब्रिटेन में साहित्यिक गतिविधियां करने वाली संस्था `वातायन’ की प्रमुख, यूके हिन्दी समिति की उपाध्यक्ष और लंदन के नेहरू सेंटर की कार्यक्रम अधिकारी दिव्या माथुर ने अपनी इस अवसर पर पिछले साल प्रकाशित अपनी चर्चित उपन्यास ‘तिलिस्म’ के कुछ अंशों का पाठ किया।

देश विदेश में हिंदी को बढ़ावा दे रहे और ब्रिटेन और फिज़ी में अपनी सेवाएं दे चुके विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी डॉ. अनिल जोशी ने भी अपनी कुछ कविताओं एवं व्यंग्य का वाचन किया। कार्यक्रम में आशू शर्मा, पूनम विश्वकर्मा, सविता दत्त, डॉ रोशनी किरण, यशपाल सिंह, नरोत्तम शर्मा, केपी सक्सेना दूसरे, मोहम्मद ताज और महेश साहू ने भी कविता पाठ किया। बुजुर्ग कथाकार आबिद सुरती और स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त महाप्रबंधक प्रदीप गुप्ता के सानिध्य में हुए इस कार्यक्रम के पहले सत्र का संचालन पहले देवमणि पांडेय और दूसरे सत्र का संचालन डॉ रवींद्र कात्यायन ने किया।

कार्यक्रम के पहले सत्र में भोपाल से पधारे गांधीवादी चिंतक सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त आरके पालीवाल ने ग्राम्य विकास से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि जब वे मुंबई में थे तो उन्होंने गुजरात की सीमा पर अंतिम गांव का चयन किया और कुछ दोस्तों की मदद से इस गांव में शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराकर उसे आदर्श ग्राम में रूपांतरित किया। कुछ सालों में ही आदिवासियों का वह गांव आत्मनिर्भर बन गया।

आरके पालीवाल ने बताया कि कुछ सालों में आदिवासियों का वह गांव आत्मनिर्भर बन गया। इसी तरह मध्य प्रदेश में पालीवाल जी और उनके गांधीवादी दोस्तों ने चार गांवों को आत्मनिर्भर बनकर उन्हें जैविक खेती के प्रति जागरूक किया। उन्होंने खेती में प्रयोग किये जा रहे ज़हरीले रसायनों के प्रति श्रोताओं को आगाह किया और कहा कि स्वस्थ रहने के लिए जैविक खेती को अपनाना निहायत ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि हमारे कई साहित्यकार गांव की सच्चाई को जाने बिना गांव का चित्रण करते हैं। रचनाकारों को कभी-कभी गांव में जाकर वहां के वास्तविक जीवन को भी देखना चाहिए।

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अयोध्या में बाल राम की स्थापना के साथ सनातन का रामोदय – अमरजीत मिश्र

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मुंबई भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष अमरजीत मिश्र ने कहा है कि अयोध्या में बाल राम की स्थापना के साथ सनातन का रामोदय हुआ है। पीएम मोदी ने जिस तरह से जप तप करके प्राण प्रतिष्ठा समारोह में हिस्सा लिया इससे देश का बहुसंख्य हिंदू समाज जागृत हुआ है। नई पीढ़ी में भी ईश्वर के प्रति आस्था बढ़ी है और पूरा देश राम काज क़रीबे को आतुर दिख रहा है। श्री मिश्र के नेतृत्व में मुंबई भाजपा का १२ सदस्यीय दल कल अयोध्या पहुँचा। मुंबई से ट्रेन से आनेवाले यात्रियों को अयोध्या में रामलला का दर्शन ,वाहन और आवास की व्यवस्था को सुचारू रूप देने के लिये मुंबई भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आशीष शेलार ने उपाध्यक्ष अमरजीत मिश्र के नेतृत्व में पहला जत्था अयोध्या भेजा है।

भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री सुनील बंसल ने देश के अलग अलग प्रांतों से आये व्यवस्था प्रमुखों की बैठक ली। श्री मिश्र ,कमलेश यादव व जितेंद्र राउत ने श्री बंसल को अटल चेतना बुक देकर अभिनंदन किया। मुंबई भाजपा के उपाध्यक्ष अमरजीत मिश्र ने कहा कि भगवान श्रीराम की कथा से समाज में व्याप्त कुरीतियाँ को दूर किया जा सकता है। पीएम मोदी ने जिस तरह से निषाधराज व माता शबरी पर डाक टिकट जारी किया। वह आनेवाले समय में मील का पत्थर साबित होगा।

मुंबई भाजपा के नेता ने कहा कि वह 82 सेकेंड का अविजित मुहूर्त जब रामलला की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा का मंत्र पढ़ा गया, श्याम शिला से बनी रामलला की मूर्ति मानो जीवंत हो उठी, मूर्तिकार अरुण योगीराज ने करोड़ों रामभक्तों के हृदय में विराजमान प्रभु की सुंदर छवि को साकार कर दिया था। किसी पत्थर से देव हो जाने की इस यात्रा में शायद भावों के तंतु प्रभु से जुड़ इस दिव्यता तक पहुंच कर हर आँख में बस गए। अरुण योगीराज ईश्वर की असीम अनुकंपा प्राप्त कर इतिहास में अमर हो गए हैं।श्री मिश्र ने उस दैवी घटना का ज़िक्र किया कि मधुर स्मित, गांभीर्ययुक्त भोलापन, आँखों से बरसती करूणा, अति सुन्दर, दिव्य, अलौकिक, ऐसा अद्भुत सौंदर्य एक कृष्ण शिला से गढ़ना, बिना ईश्वर की कृपा के कहाँ संभव है। स्वयं अरुण जी प्राण प्रतिष्ठा के समय गर्भ गृह में उपस्थित थे उनका कहना है कि मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा होते ही बदल गई यह दैवीय हस्तक्षेप है, मैं स्वयं अचंभित हूँ ऐसा प्रतीत हुआ जैसे यह मेरी बनाई मूर्ति से अलग है।

श्री मिश्र ने अयोध्या में मंदिर निर्माण के बाद पूरी दुनिया के सनातनधर्मियों में अयोध्या आकर भगवान श्रीराम का दर्शन करने की अजब सी कौतूहल देखने को मिल रही है। आनेवाले दिनों में अयोध्या का अध्यात्म व अर्थतंत्र दोनों ही आसमान चूमेगा।

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क्या अब मुसलमानों को खुद ही काशी और मथुरा को हिंदुओं को सौंप देना चाहिए?

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के मंदिर का निर्माण होने और प्राण प्रतिष्ठा के बाद एक सदी से ज़्यादा पुराना अयोध्या मुद्दा समाप्त हो गया। राम जन्मस्थल की ज़मीन पर दावा करने वाला मुस्लिम समाज अब अयोध्या में ही अन्यत्र मस्जिद बनवाएगा। यह सब देश की सबसे बड़ी अदालत के फ़ैसले के चलते हुआ। अदालत ने जन्मस्थल को हिंदुओं के हवाले कर दिया था। इस बीच अंतरराष्ट्रीय और मुस्लिम मामलों की विशद जानकारी रखने वाले अनुभवी लेखक-पत्रकार हसन सुरूर ने कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों में लिखा है कि मुसलमानों को बड़ा दिल दिखाते हुए बाबरी मस्जिद की विवादित जगह को 1980 के दशक के उत्तरार्ध में ही हिंदुओं को सौंप देना चाहिए था। किसी मुस्लिम बुद्धिजीवी का इस तरह का यह पहला लेख है, जिसमें लेखक तथ्यों का हवाला देकर मुसलमानों से बड़ा दिल रखने की नसीहत दी है।

निश्चित तौर पर हसन सुरूर ने यह लेख लिखने में 35 साल की देरी कर दी, क्योंकि अब तो अयोध्या मुद्दा ही ख़त्म हो चुका है। हां, उनका यह फॉर्मूला काशी और मथुरा के विवादित स्थलों के लिए अब भी प्रासंगिक है। ज़ाहिर है, अयोध्या मामले के बाद अब काशी मथुरा का मामला शर्तिया उठेगा और अयोध्या मुद्दे की तरह देर-सबेर इन दोंनों स्थलों पर भी अदालत का फैसला आएगा ही। और, यह भी तय है कि सबूत चाहे जो कहें, लेकिन कोई भी अदालत काशी और मथुरा के विवादित स्थलों को मुस्लिम समाज को सौंपने का साहस नहीं करेगी। हां, अयोध्या को उदाहरण मानकर अदालत इसी तरह का हल ज़रूर दे सकती है। मतलब विवादित ज़मीन हिंदुओं को और मुसलमानों को मस्जिद के लिए शहर में कहीं और जगह दे सकती है।

ऐसे में यह विचार करने का यह महत्वपूर्ण और उपयुक्त समय है कि क्या अयोध्या मुद्दे पर एक सदी से ज़्यादा समय तक हुए टकराव से सबक लेकर मुस्लिम समाज को काशी और मथुरा के विवादित स्थलों की ज़मीनों को हिंदुओं को सौंप देने पर गंभीरतपूर्वक विचार-विमर्श करना चाहिए? यहां यह भी कहना समीचीन होगा कि अगर मुस्लिम समाज अपने कथित हितैषी नेताओं और तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों की बात न मानकर स्वेच्छा से ऐसा कदम उठाते हैं तो निश्चित रूप से वे हिंदुओं का दिल जीत लेंगे।

हालांकि गांरटी के साथ यह नहीं कहा जा सकता है कि ऐसा करने से हिंदू-मुस्लिम विवाद या टकराव सदा के लिए ख़त्म हो जाएगा, लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि अगर मुसलमान काशी और मथुरा के विवादित स्थलों को लेकर ख़ासकर इसकी संवेदनशीलता को स्वीकार करते हुए टकराव की बजाय समझौते का नरम रुख अपना लेते हैं तो यह निर्णय उनका ऐतिहासिक निर्णय होगा। यह मुस्लिम समुदाय की पराजय नहीं, बल्कि सही मायने में उनकी विजय ही होगी। मुसलमानों का यह क़दम निश्चित रूप से उन्हें नैतिक रूप से लोगों के दिलों में उच्च स्थान दिलाएगा।

सबसे बड़ी बात यह है कि हिंदुओं के तीन सबसे बड़े और सबसे लोकप्रिय देवताओं मर्यादा पुरुषोत्तम राम, बाबा भोलेनाथ और वासुदेव कृष्ण का सीधा संबंध क्रमशः अयोध्या, काशी और मथुरा से है। ये तीनों जगह हिंदुओं के लिए उसी तरह पूजनीय और धार्मिक आस्था के केंद्र हैं जैसे मुसलमान के लिए मक्का और मदीना या फिर ईसाइयों के लिए वेटिकल सिटी। अयोध्या प्रभु राम की जन्मस्थली है, तो मथुरा में भगवान कृष्ण पैदा हुए और काशी के बारे में कहा जाता है कि वह तो शंकर के सिर पर बसी महादेव शंकर की ही नगरी है।

इस देश में यह भी सच है कि जो लोग भाजपा की विचारधारा या उसके हिंदूराष्ट्र की अवधारणा से बिल्कुल भी इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते हैं, उनके लिए भी राम, शंकर और कृष्ण जैसे देवता आराध्य देव हैं और वे भी अयोध्या, काशी और मथुरा से आस्था के साथ जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। वे यह भी कहते हैं कि वैसे तो देश में अनगिनत मंदिर हैं, लेकिन अयोध्या, मथुरा और काशी के धर्मस्थल राम, कृष्ण और शंकर से जुड़े होने के कारण विशेष हैं। दूसरी ओर, मुसलमानों के लिए तीनों जगह केवल संपत्ति विवाद है। इनका कोई धार्मिक या ऐतिहासिक महत्व नहीं है। ऐसे में यह कहना बेतुका बिल्कुल नहीं है कि मुसलमानों को स्वेच्छा से हिंदुओं के आराध्य देवों की जगह पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए। देश में हिंदू-मुस्लिम एकता और स्थाई शांति के लिए भारतीय मुसलमानों को अपनी ओर से यह पहल ज़रूर करनी चाहिए और मामले को अदालत के बाहर निपटाने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए।

इसकी दूसरी सबसे बड़ी वजह यह है कि जिस तरह मुसलमानों के लिए अयोध्या हिंदुओं जैसा धार्मिक महत्व और आस्था का प्रतीक नहीं था, वैसे ही काशी और मथुरा भी हैं। फिर इस्लाम में अगर आवश्यक हो तो किसी मस्जिद को ध्वस्त या स्थानांतरित करने के विरुद्ध कोई मनाही भी नहीं है। ऐसे में मुसलमान काशी में ज्ञानवापी और मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद की जगह पर दावा छोड़कर क्रमशः बनारस और मथुरा में ही कहीं और जगह लेकर वहां मस्जिद बनवा सकते हैं। मस्जिद की जगह बदलने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। सऊदी अरब समेत कई मुस्लिम देशों में विकास की राह में आने वाली कई मस्जिदें या तो ध्वस्त की जा चुकी हैं या फिर उनका रिलोकेशन किया जा चुका है। यह काम काशी और मथुरा में भी तो किया जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो यह देश के इतिहास की सबसे बड़ी घटना होगी।

भगवान श्री रामलला प्राण-प्रतिष्ठा के ठीक पहले इस तरह की पहल, जो बहुत सारे लोगों को अटपटी भी लग सकती है, को समझने के लिए पूरे अयोध्या विवाद जिसे पूरी दुनिया राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के रूप में जानती है, पर ग़ौर करना होगा। दरअसल, दुनिया में संभवतः हिंदू एकमात्र ऐसा धर्म है जिसके विस्तार के बारे में ख़ुद हिंदू ही नहीं सोचता। मतलब, किसी दूसरे धर्म के अनुयायी का धर्म-परिवर्तन करवाना हिंदुओं के डीएनए में ही नहीं है। यही इस धर्म की ख़ूबी है। इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि कोई हिंदू धर्म-प्रचारक धर्म-परिवर्तन करवाने के लिए किसी दूसरे देश में गया। हिंदू का किसी दूसरे का धर्मस्थल तोड़ने या अपना मंदिर बनाने में भी बहुत ज़्यादा इंटरेस्ट नहीं होता है। इसका गवाह सन 2019 का आम चुनाव है।

चुनाव के समय भारत की जनसंख्या 138 करोड़ थी। 110 करोड़ यानी लगभग 80 फ़ीसदी हिंदू थे। अगर ये हिंदू कट्टर होते तो हिंदूराष्ट्र की बात करने वाले राजनीतिक दल को सिर-आंखों पर बिठा लेते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हिंदूराष्ट्र की बात करने वाली भाजपा को पिछले लोकसभा चुनाव में कुल 23 करोड़ वोट ही मिले। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी लोकप्रियता के शिखर पर थे। कुल 91.2 करोड़ मतदाताओं में से केवल 67 फ़ीसदी वोटरों ने ही मतदान किया और 37.36 फ़ीसदी वोट भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को मिले। इसमें केवल हिंदू ही नहीं थे, बल्कि अन्य धर्मों के वोटर शामिल थे। कल्पना कीजिए, 110 करोड़ लोगों में से केवल 23 करोड़ लोगों ने ही उस दल का साथ दिया जो उनके हितों, हिंदूराष्ट्र और मंदिरों की बात करता है।

आइए अयोध्या मुद्दे पर वापस लौटते हैं। अयोध्या का मुद्दा वैसे तो सदियों पुराना था। मसलन, सन 1885 में महंत रघुबीर दास ने फैजाबाद की जिला अदालत में याचिका दायर की और विवादित ढांचे के बाहर चंदवा यानी कैनोपी बनाने की अनुमति मांगी थी। हालांकि अदालत ने उनकी याचिका ख़ारिज़ कर दी थी। इसी तरह सन 1959 में निर्मोही अखाड़े ने ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने के लिए मुक़दमा दायर किया था। लेकिन पहली फरवरी, 1986 को यह मामला तब अचानक सुर्खियों में आ गया, जब फैजाबाद की अदालत ने हिंदू श्रद्धालुओं को पूजा के लिए स्थान को खोलने के लिए सरकार को आदेश दिया। अदालत के फैसले के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आदेश पर प्रदेश की एनडी तिवारी सरकार ने ताला खोल भी दिया।

अदालत के उस आदेश के बाद ही देश में राजनीतिक घटनाक्रम बड़ी तेज़ी से परिवर्तित हुआ। या कह लीजिए पूरा का पूरा समीकरण ही बदल गया। अदालत के फ़ैसले के बाद ऐसे लोग अचानक से बहुत अधिक सक्रिय हो गए जिनकी दुकान ही हिंदू-मुसलमान का जाप करने से चलती थी। कुछ मुस्लिम नेताओं ने तो कथित तौर पर हिंदुत्व की लहर को भाप भी लिया और उस लहर का मुक़ाबला करने के लिए कमर कस लिया। ऐसे लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता ज़फरयाब जिलानी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमेटी का ही गठन कर दिया। कमेटी मुस्लिम प्राइड का हवाला देकर समझौता वार्ता की हर संभावना को नकारने लगी।

इसके बाद अपने आपको मुस्लिम हितों के रखवाले के रूप में पेश करने वाले सैयद शहाबुद्दीन, मौलाना इमाम अहमद बुखारी, मौलाना उबैदुल्ला आजमी, समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान और सांसद असदुद्दीन ओवैसी के पिता सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी सहित कई मुस्लिम नेता अपने-अपने स्तर पर सक्रिय हो गए। ये लोग अयोध्या विवाद की आग में घी डालने का काम करते रहे। ऐक्शन कमेटी के गठन का परिणाम यह हुआ कि विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठन भी सक्रिय हो गए। देश में राम जन्मभूमि आंदोलन शुरू हो गया। आंदोलन से जुड़े लोग जगह-जगह बंद और प्रदर्शन करने लगे।

उधर जिलानी ने अपनी गैर-समझौतावादी रवैए को सही ठहराते हुए बयान दिया, “अगर हम मुसलमान अपनी मस्जिद की ज़मीन हिंदुओं को दे देते हैं, तो पहले से ही उत्पीड़ित अल्पसंख्यक मुसलमान इस देश की नागरिकता भी खो देगा।” यह बयान बेहद ग़ैरज़िम्मेदाराना, हाइपोथेटिकल और वास्तविकता से परे था। इसके बाद मुस्लिम लीडरशिप की स्वार्थगत राजनीति और अपिरपक्वता सामने आ गई। कहने का मतलब मुस्लिमों को अपने कट्टरपंथी नेतृत्व के कारण बहुत नुक़सान उठाना पड़ा।

दरअसल, मुसलमानों के सच्चे हितैषी नेता ज़मीन को हिंदुओं को सौंपने के समझौते पर सहमत होकर टकराव टाल सकते थे। लेकिन ऐसा नहीं किया। धीरे-धीरे विभिन्न मुस्लिम समूह अयोध्या मुद्दा अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए आपस में ही प्रतिस्पर्धा करने लगे। बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमेटी में फूट पड़ गई। सैयद शहाबुद्दीन ने बाबरी मस्जिद कोऑर्डिनेशन कमेटी का गठन कर लिया। उस समय सारे के सारे मुस्लिम नेता मामले को सुलझाने के बजाय सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाने का काम कर रहे थे और शहाबुद्दीन ने विवादित स्थल को हिंदुओं को सौंपने से साफ़ इनकार किया।

शहाबुद्दीन ने तनाव बढ़ाने वाला फैसला लेते हुए विवादित स्थल पर नमाज़ पढ़ने की घोषणा कर दी। जैसा कि अनुमान था, इसके बाद विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति ने उसी समय विवादित स्थल के सात पांच दिवसीय श्रीराम महायज्ञ की घोषणा कर दी। कथित तौर पर नमाज़ पढ़ने वालों का मुकाबला करने के लिए एक लाख से अधिक हिंदू स्वयंसेवक वीएचपी के आह्वान पर अयोध्या के लिए रवाना हो गए। बहरहाल, हिंसा के संभावित ख़तरे को भांप कर शहाबुद्दीन ने नमाज़ पढ़ने का फ़ैसला वापस ले लिया।

बाबरी मस्जिद विध्वंस से तीन साल पहले नवंबर 1988 में एक राष्ट्रीय पत्रिका में अलग ही रिपोर्ट प्रकाशित हुई। रिपोर्ट के अनुसार मुस्लिम समूह और उसके धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक सहयोगी अपना राजनीतिक हित साधने के लिए अयोध्या मुद्दे का फायदा उठा रहे थे और 1989 के आम चुनावों से पहले भाजपा के साथ प्रतीकात्मक रूप से दोस्ताना लड़ाई में व्यस्त थे। यानी बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मुद्दे का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो गया था और मुद्दा वोट-राजनीति के दायरे में आ गया था। कोई भी मुद्दे को हल करने के लिए दिलचस्पी नहीं ले रहा था। यह मुस्लिम नेतृत्व की अकुशलता और सनकी दृष्टिकोण का एक उदाहरण था, जब हालात उस विवाद को सुलझाने के लिए अत्यधिक सावधानी और तात्कालिकता की मांग कर रहे थे, जो पहले ही समुदाय का नुक़सान कर चुका था।

तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 9 नवंबर, 1989 को अयोध्या में शिलान्यास कार्यक्रम करवाया था। श्री राम मंदिर निर्माण के लिए आधारशिला उस समय राम मंदिर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे महंत अवैद्यनाथ और एक दलित युवक कामेश्वर ने रखी थी। राजीव गांधी दोनों पक्षों में समझौता करवाना चाहते थे, लेकिन हिंदू-मुस्लिम टकराव में अपना भविष्य तलाशने वाले मुस्लिम नेताओं ने शिलान्यास की आलोचना करनी शुरू कर दी और मुसलमानों को भड़काकर कांग्रेस के विरुद्ध कर दिया। इस तरह राजीव गांधी को न तो मुसलमानों का साथ मिला और न ही हिदुओं का और वह चुनाव हार कर सत्ता से बाहर हो गए।

1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के मंडल कमीशन लागू करने की घोषणा के बाद भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर, 1990 को सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा शुरू कर दी। लालू प्रसाद यादव ने उन्हें बिहार में गिरफ़्तार करवाकर आग में घी डालने का काम किया। कुल मिलाकर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों अपनी भूमिका ईमानदारी से नहीं निभाई। मुस्लिम हितों के स्वयंभू संरक्षक कांग्रेस ने भी राजीव गांधी के बाद ऐसा कुछ नहीं किया जिससे लगता कि उसका दिलचस्पी समस्या को हल करने में है। अलबत्ता कांग्रेस शासन में ही बाबरी मस्जिद गिराई गई थी।

1980-90 के दशक में मुस्लिम लीडरशिप को हिंदू मुस्लिम के बीच तनाव कम करने और टकराव टालने की कोशिश करनी चाहिए थी जो उनके समाज के व्यापक हित में था, क्योंकि उस आंदोलन के लंबा खिंचने से आम मुसलमानों को बहुत अधिक नुक़सान हुआ। अगर मुस्लिम नेताओं ने बड़ा दिल और समझदारी दिखाई होती तो वे भाजपा को उसके दीर्घकालिक हिंदुत्व प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने से रोक सकते थे, रोक ना पाते तो निश्चित रूप से उसकी गति को धीमा कर सकते थे।

उनके इस क़दम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी उदारवादी हिंदुओं का दबाव पड़ता कि वह ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों से छोड़छाड़ को रोकने वाले पूजा-स्थल अधिनियम-1991 का पालन करे। उस क़ानून में यह प्रावधान किया गया था कि देश के ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों की उसी स्थिति को बरक़रार रखा जाए, जिस स्थिति में वे 15 अगस्त, 1947 तक थे। उस समय संवाद शुरू करके हिंदू-मुस्लिम संबंधों को सामान्य बनाने की संभावना थी, जिससे मुसलमानों को अधिक लाभ होता, लेकिन मुसलमानों के अपने रहनुमाओं ने ही किसी समझौते पर चर्चा करना भी मुनासिब नहीं समझा। इसके बाद देश में सांप्रदायिक विभाजन और गहरा हो गया और अंततः बाबरी मस्जिद गिरा दी गई।