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आबादी पर अंकुश लगाने के लिए सख्त प्रावधान की जरूरत (Strict provision needed to control the population)

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भारत में जनसंख्या (Population) नासूर बन गई है। हर जगह इंसानों की भीड़ बढ़ रही है। रेलवे स्टेशन हो, बस स्टॉप हो या फिर सड़क, हर जगह इंसान ही इंसान दिखते हैं। देश में इंसान इतने ज़्यादा पैदा हो गए हैं कि धरती छोटी पड़ने लगी है। भारत में तो जनसंख्या सभी समस्याओं की जननी (Population is mother of all problems) बन गई है। उदाहरण के लिए ग़रीबी, कुपोषण, बेरोज़गारी, अपराध, नक्सलवाद, आतंकवाद, आवासहीनता, धार्मिक उन्माद और स्कूल-कॉलेज में सीटों की कमी जैसी देश की हर छोटी बड़ी  समस्या जनसंख्या की नाभि से ही पैदा हो रही हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि जनसंख्यावृद्धि सभी योजनाओं, नीतियों और प्रोग्राम्स की हवा निकाल रही है।

जनसंख्या वृद्धि का आलम यह है कि पिछले साल 14 अप्रैल को वैशाखी के दिन भारत चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का सबसे अधिक मानव आबादी वाला देश बन गया। संयुक्त राष्ट्रसंघ (United Nations) ने भारत की जनसंख्या 143 करोड़ से अधिक बताई है। दुर्भाग्य से क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत रूस, कनाडा, चीन अमेरीका, ब्राज़ील और ऑस्ट्रेलिया के बाद सातवें नंबर पर है। भारत के पास विश्व की समस्त भूमि का केवल 2.4 फ़ीसदी हिस्सा ही है, जबकि विश्व की आबादी का 16.7 फ़ीसदी हिस्सा यहां रहता है। देश की आबादी 1,430,877,989 है। पुरुषों की संख्या 738,800,084 और महिलाओं की संख्या 692,077,905 है। चीन का क्षेत्रफल भारत से तीन गुना है। लेकिन मानव आबादी के मामले में वह अब भारत से पीछे हो गया है।

आबादी में इज़ाफ़े से पर्यावरण का संतुलन भी गड़बड़ा रहा है। मनुष्यों द्वारा छोड़ी गई कार्बनडाईआक्साइड भी बढ़ रही है। उसे ऑक्सीजन में बदलने वाले पेड़ कम पड़ रहे हैं। मनुष्य अपनी ज़रूरत पूरी करने के लिए पेड़ काट रहा है। इससे वातावरण में कार्बनडाईआक्साइड ज़रूरत से ज़्यादा हो रही है और ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है। इंसानों की आबादी बढ़ने से वन्यजीवों की संख्या पिछले 40 साल में घटकर आधी रह गई है। आबादी के कारण दुनिया में भारत का परिचय नकारात्मक देश के रूप में होता है। जहां दुनिया के बाक़ी देशों में लोग बेहतर जीवन जी रहे हैं, वहीं भारत में लोग थोक के भाव बच्चे पैदा करके ख़ुद तो परेशान हो ही रहे हैं, दूसरों को भी परेशान कर रहे हैं। इसीलिए देश में आबादी पर सख़्ती से अंकुश लगाने का समय आ गया है।

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आबादी पर नज़र रखने वाली सरकार की अधिकृत बेवसाइट सेंसस इंडिया (Census India) के मुताबिक़ देश में हर घंटे 3080 से ज़्यादा बच्चे पैदा हो रहे हैं, जबकि मृत्यु दर प्रति घंटे 1099 से भी कम है। यानी आबादी की भीड़ में क़रीब दो हज़ार लोग हर घंटे बढ़ रहे हैं, जो किसी बड़ी कंपनी में कर्मचारियों की संख्या के बराबर है। हर घंटे पैदा हो रहे बच्चों के लिए भविष्य में रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ, शिक्षा और रोज़गार की व्यवस्था करना बहुत बड़ी गंभीर समस्या बन रही है। वर्ल्‍ड हेल्‍थ ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट ‘वर्ल्ड पॉप्युलेशन प्रोस्पेक्ट्स-दी 2012 रिवाइज्ड’ में कहा गया था कि 2028 तक भारत की आबादी चीन से ज़्यादा हो जाएगी। लेकिन भारतीयों ने पांच साल पहले ही वह ‘कारनामा’ कर दिखाया।

2011 की जनगणना पर गौर करें तो आबादी एक दशक में 18.1 करोड़ बढ़ गई। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में इस भूभाग (तब भारत नहीं ब्रिटिश इंडिया था) की आबादी ही क़रीब 17 करोड़ थी, लेकिन अब उससे ज़्यादा लोग दस साल में बढ़ रहे हैं। 1901 में ब्रिटिश इंडिया की आबादी 23.84 करोड़ थी जो 1911 में 25.21 करोड़ हो गई। लेकिन 1921 में घटकर 25.13 करोड़ हो गई। मगर 1931 और 1941 में जनसंख्या क्रमशः 27.89 और 31.86 करोड़ पहुंच गई। जनसंख्या वृद्धि में बूम आज़ादी के बाद आया। 1951 की जनगणना में पता चला कि भारत की आबादी 36 करोड़ पार कर गई। 1961 में और उछली और 43.9 करोड़ को टच कर गई। सत्तर के दशक में लगा कि लोगों में बच्चे पैदा करने की होड़ मच गई है। दस साल में 11 करोड़ लोग बढ़ गए और आबादी 54 करोड़ हो गई। इसके बाद तो मानो आबादी को पंख लग गए। 1981 में 68.3 करोड़ तो 1991 में 84.6 करोड़। अगले 10 साल में क़रीब 16 करोड़ लोग बढ़ गए तो न्यू मिलेनियम में तो जन्मदर के सारे रिकॉर्ड टूट गए। एक दशक में 21 करोड़ बच्चे पैदा हुए और 2011 में आबादी 1.21 करोड़ हो गई। जनसंख्या-वृद्धि बदस्तूर जारी है।

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आज़ादी के बाद से ही केंद्र और सभी राज्य सरकारें कोशिश कर रही हैं कि इस पर अंकुश लगाया जाए लेकिन हर कोशिश टांय-टांय फिस्स हो रही है। एक नहीं दो-दो बार जनसंख्या नीति बनाई जा चुकी है। तय हुआ कि जनसंख्या विस्फोट पर अंकुश लगेगी और छोटे परिवार को प्रमोट किए जाएंगे। सन् 2000 से जनसंख्या आयोग भी अस्तित्व में है। फिर भी यह थमने का नाम नहीं ले रही है। पचास के दशक में भारत में चीन से पहले नसबंदी शुरू की गई लेकिन 65 साल में कोई ख़ास नतीजा नहीं निकला। नसबंदी योजना कैसे काम करती है, इसकी मिसाल प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस में मिली। जनवरी 2020 में ज़िला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर चिरईगांव के हेल्थसेंटर के बाहर 73 महिलाओं की ज़मीन पर लिटाकर नसबंदी की गई। चूंकि अस्पताल में बिस्तर की व्यवस्था नहीं थी; लिहाज़ा, खुले आसमान के नीचे ज़मीन बेड बना दी गई। यह घटना ग्रामीण स्वास्थ केंद्रों की बदहाली की कहानी कहती है।

भारतीय राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (INFHS) के अब तक 1991-92, 1998-99 और 2005-06 में तीन सर्वे हो चुके हैं। चौथा सर्वे चल रहा है। डेटाज़ के मुताबिक़ आबादी पर अंकुश लगाने की कोई युक्ति कारगर नहीं हो रही है। 1991-92 में मुस्लिम महिलाओं की कुल प्रजनन दर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट 4.41 थी। यानी हर मुस्लिम महिला 4.41 बच्चे पैदा कर रही थी। इसी तरह तब हर हिंदू महिला 3.31 बच्चे जन रही थी। 1998-99 और 2005-06 में मुस्लिमों की प्रजनन दर 3.39 और 3.4 थी तो हिंदुओं की प्रजनन दर 2.78 और 2.59 थी। राष्ट्रीय स्तर पर जनसंख्या वृद्धि की दर 18 फ़ीसदी है, परंतु मुसलमानों की आबादी 24 फ़ीसदी की दर से बढ़ रही है। 1991-2001 के दौरान तो मुस्लिम आबादी 29 फ़ीसदी की दर से बढ़ी थी, जो चिंता का विषय थी। INFHS की रिपोर्ट के मुताबिक जहां देश की हर महिलाएं औसतन 2.4 बच्चे पैदा कर रही हैं, वहीं मुस्लिम महिलाएं 3.6 बच्चे पैदा कर रही हैं। यही बात हिंदूवादी संगठनों और नेताओं को मुस्लिमों पर हमला करने का मौक़ा देती है।

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जनसंख्या वृद्धि में भारत की परंपराएं काफी ज़िम्मेदार हैं। देश में सोसल सिक्योरिटी नाम की चीज़ ही नहीं है। इसलिए लोग बुढ़ापे में बच्चों के साथ रहते हैं। तो लोग बुढ़ापे का ख़याल करके पुत्र चाहते हैं। मानते हैं कि बेटियां शादी के बाद दूसरे के घर चली जाती हैं, इसलिए बुढ़ापे में देखभाल के लिए पुत्र ज़रूरी है। इसलिए हर दंपत्ति एक बेटा चाहता है। इसीलिए दो बेटियां होने पर कई लोग बेटे के लिए तीसरा बच्चा पैदा करते हैं। दो बेटे पैदा हो जाने पर बेटी के लिए कोई तीसरी संतान पैदा नहीं करता। कभी-कभी बेटे की प्रतीक्षा ख़त्म ही नहीं होती और छह-सात बेटियां पैदा हो जाती हैं। पांच साल पहले पन्ना में एक हिंदू महिला ने पुत्र के इंतज़ार में 42 साल की उम्र में 14 वीं संतान को जन्म दिया। लेकिन आजकल बेटे भी बुढ़ापे में मां-बाप का ख़्याल नहीं रखते। पं मदनमोहन मालवीय की 90 साल की सगी पोती विजया पारिख मिसाल हैं जो नोएडा के सेक्टर 55 के वृद्धाश्रम में पांच साल से रह रही हैं, क्योंकि बच्चे नहीं चाहते कि वो उनके साथ रहें।

देश में 60 साल के लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। WHO और हेल्पेज के मुताबिक, 2026 में भारत में बूढ़ों की आबादी 17.32 करोड़ होने का अनुमान है। मज़ेदार यह है कि पुरुष महिलाओं से ज़्यादा हैं लेकिन बड़ी उम्र में स्त्रियां पुरुषों से ’ज़्यादा हैं। पॉप्युलेशन को उम्र के हिसाब से नज़र रखने वाली संस्था कंट्री मीटर्स की वेबसाइट के मुताबिक भारत में 65 साल या उससे ऊपर की आबादी 5.5 फ़ीसदी यानी सात करोड़ है। अनुमानतः 50 लाख लोग ऐसे होंगे, जिनके पास बुढ़ापे में कोई सहारा नहीं होगा। ऐसे लोगों को 65 साल की उम्र होने पर सरकार की ओर से 10 हज़ार रुपए महीने वेतन देने की योजना शुरू करनी चाहिए। वैसे भी सरकार कई फ़ालतू योजनाओं में लाखों करोड़ रुपए बर्बाद कर रही है। अगर वृद्धावस्था में सामाजिक सुरक्षा की योजना शुरू की गई तो निश्तित रूप से लोगों में बेटे की चाहत कम होगी और आबादी पर अंकुश लगेगा।

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सत्तर के दशक में चीन में कमोबेश ऐसे हालात थे। लिहाज़ा, बेतहाशा बढ़ रही आबादी पर लगाम लगाने के लिए चीन ने 1979 में एक बच्चा नीति लागू की। शादी-शुदा जोड़ों को केवल एक ही बच्चा पैदा करने की इजाज़त थी। दूसरा बच्चा पैदा करने पर माता-पिता के ख़िलाफ़ तो कार्रवाई होती ही थी, बच्चे को ‘गैरकानूनी’ बच्चा कहा जाता था। उसे पहचान पत्र जारी नहीं किया जाता, जिससे बच्चा निःशुल्क शिक्षा या सेहत संबंधी सुविधाएं नहीं ले सकता था। यही नहीं, बच्चा अपने ही देश में यात्रा नहीं कर सकता और किसी लाइब्रेरी का इस्तेमाल नहीं कर सकता था। एक बच्चा नीति के लागू होने से पहले चीन में लोगों के औसतन चार बच्चे हुआ करते थे। एक संतान नीति लागू होने के बाद देश की आबादी पर तो अंकुश लगा ही, वहां ज़िंदगी पूरी तरह से बदल गई।

भारत में राजनीति के चलते चीन जैसा कठोर क़ानून बनाना संभव नहीं, लेकिन ऐसा कुछ क़दम उठाना ही होगा ताकि धड़ल्ले से बच्चे पैदा करने वालों के मन में ख़ौफ़ पैदा हो। जब तक भय पैदा नहीं किया जाएगा, आबादी पर अंकुश लगाना मुमकिन नहीं। इसके लिए सरकार को कुछ ऐसे कड़े क़ानून बनाने पड़ेंगे, जिन पर आसानी से अमल करके जनसंख्या पर अंकुश लगाया जा सके। जब तक दो से ज़्यादा बच्चा पैदा करने वालों को शर्मिंदा नहीं किया जाएगा, यह सिलसिला नहीं थमेगा। ऐसे लोगों को हतोत्साहित किया जाए। उन्हें एहसास कराया जाए कि दो से ज़्यादा बच्चे पैदाकर करके उन्होंने सामाजिक अपराध किया है। मसलन, दो से ज़्यादा बच्चे पैदा करने वालों को इनकम टैक्स में मिलने वाली छूट ख़त्म की जा सकती है। सरकारी योजनाओं का लाभ केवल उन्हीं को दिया जाए जिनके पास केवल एक बच्चा है। जिनके पास केवल एक बेटी है, उन्हें अनिवार्य रूप से सरकारी नौकरी देने का प्रावधान भी कारगर हो सकता है। इसके अलावा एक संतान वाले दंपति को इनकम टैक्स स्लैब में पांच लाख रुपए तक की छूट देकर ऐसा करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा सकता है।

लेखक- हरिगोविंद विश्वकर्मा

(15 अप्रैल 2023 को अपडेट)

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व्यंग्य – मेरे देश के कुत्ते….. मेरे देश के कुत्ते !!!

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हरिगोविंद विश्‍वकर्मा
सुबह-सबेरे घर से बाहर निकलकर मैं सड़क पर आया। स्टेशन तक पैदल जाने के मूड में था। उसी समय भौंकते कुत्तों का एक समूह मुझ पर टूट पड़ा। एक बार तो मैं तो बुरी तरह डर गया, क्योंकि इधर मुझे लगने लगे कि कुत्ते भी आदमी की तरह हो गए हैं। एकदम ख़ुदगर्ज़। सेल्फ़-ओरिएंटेड। उनमें इंसानियत, नहीं-नहीं, कुत्तियत नाम की चीज़ नहीं रह गई है। कहीं मुझे काट न लें। जिन कुत्तों में कुत्तियत नहीं उनका कोई भरोसा नहीं।

दरअसल, न्यूज़ चैनल में नौकरी के अंतिम दिनों में अल-सुबह की ड्यूटी लगा दी गई। पता नहीं, अनजाने में या अंतिम दो तीन दिन परेशान करने के लिए। जब ड्यूटी चार्ट बन गया तो दफ़्तर जाना ही था। जब सब सो रहे थे, तब उठना अच्छा बिलकुल नहीं लगा। मगर, मजबूरी थी। ना, नहीं कर सकता था। बहरहाल, इसी बहाने सुबह-सबेरे लंबे समय बाद ग्रामसिंहों से मुलाक़ात हो गई। लेकिन सारे ग्रामसिंह पाकिस्तान-मोड पर थे। यानी अपनी जगह से मुंह से ही मुझ पर गोली दाग़ रहे थे। यह अलग बात थी कि उनके भौंकने से मैं घायल नहीं हुआ।

-क्या है? मैंने ज़ोर से डांटा। कहीं सुना था, इंसान के चिल्लाने से अमूमन जानवर घबरा जाते हैं। अपनी आक्रामकता छोड़कर एकदम डिफ़ेंस पर आ जाते हैं।

मेरे डांटने का भौंक रहे एक कुत्ते पर अच्छा असर हुआ। शायद वह बहुत पहले एक बार मुझसे सुबह की ड्यूटी के दौरान मिल चुका था। मैंने तो नहीं, उसने ज़रूर मुझे पहचान लिया। वह फ़ौरन चुप हो गया। दुम हिलाता हुआ मेरी ओर लपका। मैं समझ गया, यह दुम हिला रहा है, यानी शांतिप्रिय है। शांतिप्रिय देश की तरह आक्रमण करने की इसमें हिम्मत इसमें नहीं है। लिहाज़ा, यह मुझसे फ्रेंडशिप करना चाहता है। कहने का मतलब इस कुत्ते ने मुझे ताक़तवर मान लिया।

-क्या है? दूर रहो! दूर रहो! मैं उस पर रहम दिखाने के मूड में नहीं था। लिहाज़ा, दोबारा डांट पिलाई। कुत्ते ने इसके बाद तो पूरी तरह से सरेंडर कर दिया। मेरा नेतृत्व स्वीकार कर लिया। उसकी नज़र लगातार मुझ पर थी। उसने मेरे चेहरे से ग़ायब होती आक्रामकता पढ़ ली। लिहाज़ा, लपक कर मेरे चरणों में आ गिरा। मेरे जूते चाटने लगा। मैंने सोचा, चलो यह तो मेरा चमचा बन गया। कोई बात नहीं। आम आदमी की तरह मुझे भी चमचे अच्छे लगते हैं। हां, चमचागिरी दूर से ही करें तब।

बहरहाल, उस कुत्ते की देखा-देखी बाक़ी कुत्ते भी मेरी शरण में आने लगे। किसी नेता-अफ़सर की तरह मेरे चमचों की संख्या बढ़ने लगी। कोई भी कुत्ता भौंक नहीं रहा था। यानी सबने सामूहिक रूप से मेरी प्रभुता स्वीकार कर ली थी। कुल नौ कुत्ते थे। नौ रत्न। सबने मुझे कमांडो की तरह घेर लिया। दो आगे, दो पीछे, दो दाएं और दो बाएं। नौवां कुत्ता बहुत आगे था। शायद मेरे लिए सेफ पैसेज़ बना रहा था। मैं किसी नेता की तरह कमांडोज़ के बीच निर्भय होकर पैदल रेलवे स्टेशन चला जा रहा था। अचानक सबसे आगे वाले कुत्ते का एनकाउंटर दूसरे मोहल्ले के कुत्तों से हो गया। उसने फ़ौरन यू-टर्न लिया और दुम दबाकर मेरी ओर लपका।

-क्या है? मैंने और ज़ोर से दूसरे मोहल्ले के कुत्तों को डांटा। मेरे सम्मान में सबके सब चुप हो गए। उन्होंने आपस में भी एक दूसरे पर भौंकना बंद कर दिया। मैं उस समय हैरान रह गया, जब देखा कि कुत्ते आपस में फुसफुसाकर कुछ कह रहे हैं। यानी कुत्तों ने आपस की सदियों पुरानी परंपरागत दुश्मनी छोड़ दी। कमाल है! इस बीच, मेरे मोहल्ले के कुत्तों ने मेरी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी दूसरे मोहल्ले के कुत्तों को सौंप दी और वे एक दूसरे को उचित स्थान पर सूंघकर वापस लौट गए। मैं आगे बढ़ता रहा। मेरी सुरक्षा अब दूसरे मोहल्ले के कुत्ते कर रहे थे। उसी तरह नौ रत्न। चारों ओर दो-दो कुत्ते। एक कुत्ता सबसे आगे था।

मेरे पदयात्रा की ख़बर जंगल के आग की तरह मुझसे पहले ही तीसरे मोहल्ले में पहुंच गई। वहां आदमियों में तो नहीं कुत्तों में ज़रूर हड़कंप मच गया। उनमें भौंका-भौंकी होने लगी। दो कुत्ते स्कॉटिंग कर रहे कुत्ते के पीछे दौड़े आ रहे थे। मैंने फिर बहुत ज़ोर से डांटा -क्या है? मैनर नाम की चीज़ नहीं है तुम कुत्तों में। कब तक लड़ोगे आपस में। मेरी बात मानो, मलाई खाना हो तो दुश्मनी भुला दो। एक हो जाओ। फ़ायदे में रहोगो। किसी सरकार की कृपादृष्टि मिल गई तो पीढ़ियां संवर जाएंगी।

मेरी बात का तीसरे मोहल्ले के कुत्तों पर भी ख़ासा असर हुआ। सब दुम हिलाते हुए मेरी शरण में आ गए। दोनों मोहल्ले के कुत्ते एक दूसरे को सूंघने लगे। इस कार्यक्रम के पूरा होने पर दूसरे मोहल्ले के कुत्ते भी स्वमोहल्ला वापस लौट गए। अब मैं तीसरे मोहल्ले के कुत्तों के संरक्षण में था। मोहल्ले के नौ कुत्ते मेरा बॉडीगार्ड बनने पर गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। फूले नहीं समा रहे थे। मैं उऩकी सुरक्षा में आराम से स्टेशन की ओर चला जा रहा था।

अचानक मैंने स्टेशन के पास के मोहल्ले के कुत्तों के जागरण की आवाज़ सुनी। फिर मुझे सुखद आश्चर्य यह हुआ कि यहां भी कुत्ते एक दूसरे से लड़ नहीं रहे हैं, बल्कि प्यार का प्रदर्शन कर रहे हैं। एक दूसरे को सूंघ रहे हैं। स्टेशन के कुत्तों ने तीसरे मोहल्ले के कुत्तों को प्रेम के साथ विदा किया और मेरी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली।

अंततः इन सभी कुत्तों ने मुझे सकुशल रेलवे स्टेशन पर पहुंचा दिया। सभी कुत्ते मुझे प्लेटफ़ॉर्म तक छोड़कर वापस लौट गए। बस एक कुत्ता मेरी हिफ़ाज़त में प्लेटफ़ॉर्म पर ही खड़ा रहा। वह मेरे ट्रेन में सवार होने के बाद ही वापस लौटा।

ट्रेन में मुझे सीट मिल गई। बैठकर मैं कुत्तों के बारे में ही सोच रहा था। इतने ढेर सारे कुत्ते मेरी हिफ़ाज़त कर रहे थे। मैं कुत्तों का निर्विवाद नेता बन गया था। अचानक मेरे मन में ख़याल आया कि मुझे शांति का नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए। चार-चार मोहल्ले के कुत्तों के बीच शांति, प्रेम और भाई-चारा स्थापित करने के लिए। मेरे कारण कुत्तों ने अपनी परंपरागत दुश्मनी छोड़ दी। यानी मैं इंसानों में इंसानियत भले न जगा पाया होऊं परंतु कुत्तों में कुत्तियत ज़रूर जगा दिया। कुत्ते मेरे साथी बन गए। मैंने सुबह ड्यूटी लगाने के लिए सीनियर को धन्यवाद दिया। उन्होंने मुझे यह अहसास दिलाया कि मैं भी पदयात्रा करने वाला शांति की पूजारी हूं। कुत्तों का नेता हूं।

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क्या महात्मा गांधी को सचमुच सेक्स की बुरी लत थी?

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राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी के जीवन पर हज़ारों की संख्या में पुस्तकें लिखीं गई हैं। इन किताबों में उनकी जीवन का विस्तार से वर्णन मिलता है। गांधी के साथ रहे अनगिनत लोगों ने गांधी के ‘ब्रह्मचर्य के प्रयोग’ पर भी बहुत अधिक लिखा है। इसीलिए गांधी की कथित सेक्स लाइफ़ पर बहसों का दौर चलता रहता है। गांधी के भक्त जहां उन्हें संत का दर्जा देते हैं, वहीं समय-समय पर ऐसे खुलासे होते रहते हैं, जिनसे गांधी की संत छवि को गहरा धक्का पहुंचता है। कुछ साल पहले एक राष्ट्रीय पत्रिका ने गांधी की अंतिम समय तक अनुयायी रही मनुबेन गांधी की डायरी के कुछ अंश को उद्धृत करते हुए गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग के बारे में सनसनीख़ेज़ जानकारी प्रकाशित की थी। यह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना था।

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2014 में गांधी को कभी भगवान की तरह पूजने वाली 82 वर्षीया गांधीवादी इतिहासकार कुसुम वदगामा ने कहा था कि गांधी को सेक्स की बुरी लत थी, वह आश्रम की कई महिलाओं के साथ निर्वस्त्र सोते थे, वह इतने ज़्यादा कामुक थे कि ब्रम्हचर्य के प्रयोग और संयम परखने के बहाने चाचा अमृतलाल तुलसीदास गांधी की पोती और जयसुखलाल की बेटी मृदुला गांधी उर्फ मधुबेन गांधी के साथ सोने लगे थे। ये आरोप बेहद सनसनीख़ेज़ थे क्योंकि किशोरावस्था में कुसुम भी गांधी के साथ रही थीं। कुसुम, दरअसल, लंदन में पार्लियामेंट स्क्वॉयर पर गांधी की प्रतिमा लगाने का विरोध कर रही थी। बहरहाल, लंदन के प्रतिष्ठित अख़बार ‘द टाइम्स’ समेत दुनिया भर के अख़बारों और पत्रिकाओं में कुसुम के इंटरव्यू छपे थे।

वैसे तो महात्मा गांधी की सेक्स लाइफ़ पर अब तक अनेक किताबें लिखी जा चुकी हैं। जो ख़ासी चर्चित भी हुईं। मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार जेड ऐडम्स ने पंद्रह साल के गहन अध्ययन और शोध के बाद 2010 में ‘गांधी नैकेड ऐंबिशन’ लिखकर सनसनी फैला दी थी। किताब में गांधी को असामान्य सेक्स बीहैवियर वाला अर्द्ध-दमित सेक्स-मैनियॉक कहा गया है। किताब राष्ट्रपिता के जीवन में आई लड़कियों के साथ उनके आत्मीय और मधुर रिश्तों पर ख़ास प्रकाश डालती है। मसलन, गांधी नग्न होकर लड़कियों और महिलाओं के साथ सोते थे और नग्न स्नान भी करते थे। मशहूर लेखिका एल्यानोर मॉर्टोन ने 1954 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘वीमेन बिहाइंड महात्मा गांधी’ में भी बहुत अधिक ब्यौरा दिया है। इसी तरह चंद्रशेखर शुक्ला की 1945 में प्रकाशित किताब ‘गांधी एंड वुमेन इन’ में भी गांधी के क़रीब रहने वाली महिलाओं के बारे में गहरी जानकारी मिलता है। गांधी के साथ रहे लेखक वेद मेहता ने अपनी पुस्तक ‘महात्मा गांधी एंड हिज अपोसल’ में भी गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग पर विस्तृत प्रकाश डाला है। उनकी किताब का पहला संस्करण 1977 में छपा था।

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देश के सबसे प्रतिष्ठित लाइब्रेरियन गिरजा कुमार ने गहन अध्ययन और गांधी से जुड़े दस्तावेज़ों के रिसर्च के बाद 2006 में “ब्रम्हचर्य गांधी ऐंड हिज़ वीमेन असोसिएट्स” में डेढ़ दर्जन महिलाओं का ब्यौरा दिया है जो ब्रम्हचर्य में सहयोगी थीं और गांधी के साथ निर्वस्त्र सोती-नहाती और उन्हें मसाज़ करती थीं। इनमें मनुबेन, आभा गांधी, आभा की बहनबेन पटेल, सुशीला नायर, प्रभावती (जयप्रकाश नारायण की पत्नी), राजकुमारी अमृतकौर, बीवी अमुतुसलाम, लीलावती आसर, प्रेमाबहन कंटक, मिली ग्राहम पोलक, कंचन शाह, रेहाना तैयबजी शामिल हैं। प्रभावती ने तो आश्रम में रहने के लिए पति जेपी को ही छोड़ दिया था। प्रभावती गांधी पर इतनी आशक्त थीं, कि उनसे दूर होने पर उन्हें दौरे पड़ने लगते थे और वह बेहोश हो जाती थीं। इस मुद्दे को लेकर जेपी का गांधी से ख़ासा विवाद हो गया था। जेपी ने पूरी ज़िंदगी गांधी को पसंद नहीं किया। बहरहाल, गांधी की मौत के बाद उनकी पत्नी प्रभावती उनके पास वापस आ गईं, लेकिन संतान पाने की जेपी की प्रबल इच्छा पूरी नहीं हो सकी।

तक़रीबन दो दशक तक महात्मा गांधी के व्यक्तिगत सहयोगी रहे निर्मल कुमार बोस ने अपनी बेहद चर्चित किताब “माई डेज़ विद गांधी” में राष्ट्रपिता का अपना संयम परखने के लिए आश्रम की महिलाओं के साथ निर्वस्त्र होकर सोने और मसाज़ करवाने का ज़िक्र किया है। 1953 प्रकाशित इस किताब में निर्मल बोस ने नोआखली की एक ख़ास घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है, “एक दिन सुबह-सुबह जब मैं गांधी के शयन कक्ष में पहुंचा तो देख रहा हूं, सुशीला नायर रो रही हैं और महात्मा गांधी दीवार में अपना सिर पटक रहे हैं।” उसके बाद निर्मल बोस गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग का खुला विरोध करने लगे। जब गांधी ने उनकी बात नहीं मानी तो बोस ने अपने आप को उनसे अलग कर लिया। गांधी को इस मुद्दे पर भारी विरोध का सामना करना पड़ा। बहरहाल, गांधी के ही सहयोगी अमृतलाल ठक्कर उर्फ बाप्पा ठक्कर ने मनु गांधी के ज़रिए किसी तरह बापू को ब्रह्मचर्य के प्रयोग को रोकने के लिए मनाने में सफल रहे। इस का ज़िक्र 1962 मे प्रकाशित मनुबेन गांधी की किताब ‘बापूः माई मदर’ में भी मिलता है। 

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‘गांधी नैकेड ऐंबिशन’ में जेड ऐडम्स का दावा है कि लंदन में क़ानून पढ़े गांधी की इमैज ऐसा नेता की थी जो सहजता से महिला अनुयायियों को वशीभूत कर लेता था। आमतौर पर लोगों के लिए ऐसा आचरण असहज हो सकता है पर गांधी के लिए सामान्य था। आश्रमों में इतना कठोर अनुशासन था कि गांधी की इमैज 20 वीं सदी के धर्मवादी नेता जैम्स वॉरेन जोन्स और डेविड कोरेश जैसी बन गई जो अपनी सम्मोहक सेक्स-अपील से अनुयायियों को वश में कर लेते थे। ब्रिटिश हिस्टोरियन के मुताबिक गांधी सेक्स के बारे लिखना या बातें करना बेहद पसंद करते थे। इतिहास के तमाम अन्य उच्चाकाक्षी पुरुषों की तरह गांधी कामुक भी थे और अपनी इच्छा दमित करने के लिए ही कठोर परिश्रम का अनोखा तरीक़ा अपनाया। ऐडम्स के मुताबिक जब बंगाल के नोआखली में दंगे हो रहे थे तक गांधी ने मनु को बुलाया और कहा “अगर तुम मेरे साथ नहीं होती तो मुस्लिम चरमपंथी हमारा क़त्ल कर देते। आओ आज से हम दोनों निर्वस्त्र होकर एक दूसरे के साथ सोएं और अपने शुद्ध होने और ब्रह्मचर्य का परीक्षण करें।”

‘गांधी नैकेड ऐंबिशन’ में महाराष्ट्र के पंचगनी में गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग का भी वर्णन है, जहां गांधी के साथ सुशीला नायर नहाती और सोती थीं। ऐडम्स के मुताबिक गांधी ने ख़ुद लिखा है, “नहाते समय जब सुशीला मेरे सामने निर्वस्त्र होती है तो मेरी आंखें कसकर बंद हो जाती हैं। मुझे कुछ भी नज़र नहीं आता। मुझे बस केवल साबुन लगाने की आहट सुनाई देती है। मुझे कतई पता नहीं चलता कि कब वह पूरी तरह से नग्न हो गई और कब वह सिर्फ़ अंतःवस्त्र पहनी होती है।” दरअसल, जब पंचगनी में गांधी के महिलाओं के साथ नंगे सोने की बात जब फैलने लगी तो नाथूराम गोड्से के नेतृत्व में वहां विरोध प्रदर्शन होने लगा। इससे गांधी को ब्रह्मचर्य का प्रयोग बंद कर वहां से बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा। मज़ेदार बात यह है बाद में गांधी हत्याकांड की सुनवाई के दौरान गोड्से के विरोध प्रदर्शन को गांधी की हत्या की कई कोशिशों में से एक माना गया था। 

ऐडम्स का दावा है कि गांधी के साथ सोने वाली सुशीला, मनु, आभा और अन्य महिलाएं गांधी के साथ शारीरिक संबंधों के बारे हमेशा गोल-मटोल और अस्पष्ट बाते करती रहीं। उनसे जब भी पूछा गया तब उन्होंने केवल यही कहा कि वह सब ब्रम्हचर्य के प्रयोग के सिद्धांतों का अभिन्न अंग था। गांधी की हत्या के बाद लंबे समय तक सेक्स को लेकर उनके प्रयोगों पर भी लीपापोती की जाती रही। उन्हें महिमा-मंडित करने और राष्ट्रपिता बनाने के लिए उन दस्तावेजों, तथ्यों और सबूतों को नष्ट कर दिया गया, जिनसे साबित किया जा सकता था कि संत गांधी, दरअसल, सेक्स-मैनियॉक थे। सबसे दुखद बात यह है कि गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग में शामिल क़रीब-क़रीब सभी महिलाओं का वैवाहिक जीवन नष्ट हो गया। कांग्रेस भी स्वार्थों के लिए अब तक गांधी के सेक्स-एक्सपेरिमेंट से जुड़े सच छुपाती रही है। गांधी की हत्या के बाद मनुबेन को मुंह बंद रखने की सख़्त हिदायत दी गई। गांधी के सबसे चोटे पुत्र देवदास, जो ब्रह्मचर्य के प्रयोग के कट्टर विरोधी थे, ने मनु को गुजरात में एक बेहद रिमोट इलाक़े में भेज दिया, जहां ग़ुमनामी में ही उनकी मौत हुई। 

    

मृदुला गांधी उर्फ मधुबेन डायरी के अंश (गुजराती से हिंदी अनुवाद)

एनीमिया से पीड़ित बापू आज सुशीलाबेन के साथ नहाते वक्त बेहोश हो गए। फिर सुशीलाबेन ने एक हाथ से बापू को पकड़ा और दूसरे हाथ से कपड़े पहनाया। फिर उन्हें बाहर ले आईं। यह बात सच है कि बापू और सुशीलाबेन एक साथ नहाते थे। सुशीलाबेन उनके सामने निर्वस्त्र होती थीं। (10 नवंबर 1943, आगा खां पैलेस, पुणे)

आज रात बापू, सुशीलाबेन और मैं एक ही बिस्तर पर सोए। बापू ने मुझे गले से लगाया और प्यार से थपथपाया। बड़े प्यार से मुझे सुला दिया। उन्होंने लंबे समय बाद मेरा आलिंगन किया था। फिर बापू ने अपने साथ सोने के बावजूद यौन इच्छाओं के मामले में मासूम बने रहने के लिए मेरी प्रशंसा की। लेकिन दूसरी लड़कियों के साथ ऐसा नहीं हुआ। वीना, कंचन और लीलावती (गांधी की सहयोगी) ने कहा कि वे उनके साथ नहीं सो पाएंगी। (10 दिसंबर 1946, श्रीरामपुर, बिहार)

सुशीलाबेन ने आज मुझसे पूछा कि मैं बापू के साथ क्यों सो रही थी और कहा कि मुझे इसके गंभीर नतीजे भुगतने होंगे। उन्होंने अपने भाई प्यारेलाल से विवाह के प्रस्ताव पर मुझसे फिर विचार करने को कहा। मैंने उनसे कहा कि मुझे प्यारेलाल में कोई दिलचस्पी नहीं है। (26 दिसंबर 1946. श्रीरामपुर, बिहार)

सुशीलाबेन मुझे अपने भाई प्यारेलाल से शादी करने के लिए कह रही हैं। उन्होंने मुझसे कहा कि अगर मैं उनके भाई से शादी कर लूं तो वे नर्श बनने में मेरी मदद करेंगी। लेकिन मैंने उन्हें साफ मना कर दिया और सारी बातें बापू को बता दी। बापू ने मुझसे कहा कि सुशीला अपने होश में नहीं है। उन्होंने कहा कि कुछ दिन पहले तक वो उनके सामने बिना कपड़े पहने ही नहाती थी और उनके साथ सोया भी करती थी। लेकिन, अब उन्हें मेरा सहारा लेना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि मैं हर मामले में निष्कलंक रहूं और ब्रह्मचर्य के प्रयोग के मामले में धीरज बनाए रखूं। (01 जनवरी 1947, कथुरी, बिहार)

बापू ने सुबह की प्रार्थना के दौरान अपने अनुयायियों को बताया कि वे मेरे साथ ब्रह्मचर्य के प्रयोग कर रहे हैं। फिर उन्होंने मुझे समझाया कि सबके सामने ये बात क्यों कही। मुझे बहुत राहत महसूस हुई क्योंकि अब लोगों की जुबान पर ताले लग जाएंगे। मैंने अपने आप से कहा कि अब मुझे किसी की परवाह नहीं है। दुनिया को जो कहना है कहती रहे। (02 फरवरी 1947, दशधारिया, बिहार)

ब्रिटिश इतिहासकार के मुताबिक गांधी के ब्रह्मचर्य के चलते जवाहरलाल नेहरू उनको अप्राकृतिक और असामान्य आदत वाला इंसान मानते थे। सरदार पटेल और जेबी कृपलानी ने उनके व्यवहार के चलते ही उनसे दूरी बना ली थी। गिरिजा कुमार के मुताबिक पटेल गांधी के ब्रम्हचर्य को अधर्म कहने लगे थे। यहां तक कि पुत्र देवदास गांधी समेत परिवार के सदस्य और अन्य राजनीतिक साथी भी ख़फ़ा थे। बीआर अंबेडकर, विनोबा भावे, डीबी केलकर, छगनलाल जोशी, किशोरीलाल मश्रुवाला, मथुरादास त्रिकुमजी, वेद मेहता, आरपी परशुराम, जयप्रकाश नारायण भी गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग का खुला विरोध कर रहे थे। प्रसिद्ध साहित्यकार आर्थर कोइस्लर ने 1949 में प्रकाशित अपनी किताब ‘द लोटस एंड रोबो’ में गांधी के ब्रह्मचर्य की तीव्र आलोचना की थी। ब्रह्मचर्य के प्रयोग में गांधी के साथ सोने वाली प्रेमा बहन कंटक की डायरी के कुछ हिस्सा ‘प्रसाद दीक्षा’ नाम से मराठी भाषा में 1938 प्रकाशित हो गए। डायरी में उन्होंने लिखा है कि गांधी जी ने स्वीकार किया था कि ब्रह्मचर्य के प्रयोग के दौरान एक बार गांधी जी नियंत्रण और आत्मविश्वास खो बैठे और स्खलित हो गए थे। इस किताब को लेकर भारी विवाद हुआ था।

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गांधी की सेक्स लाइफ़ पर लिखने वालों के मुताबिक सेक्स के जरिए गांधी अपने को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध और परिष्कृत करने की कोशिशों में लगे रहे। नवविवाहित जोड़ों को अलग-अलग सोकर ब्रह्मचर्य का उपदेश देते थे। रवींद्रनाथ टैगोर की भतीजी विद्वान और ख़ूबसूरत सरलादेवी चौधरी से गांधी का संबंध तो जगज़ाहिर है। हालांकि, गांधी यही कहते रहे कि सरला उनकी महज ‘आध्यात्मिक पत्नी’ हैं। गांधी डेनमार्क मिशनरी की महिला इस्टर फाइरिंग को भी भावुक प्रेमपत्र लिखते थे। इस्टर जब आश्रम में आती तो वहां की बाकी महिलाओं को जलन होती क्योंकि गांधी उनसे एकांत में बातचीत करते थे। किताब में ब्रिटिश एडमिरल की बेटी मैडलीन स्लैड से गांधी के मधुर रिश्ते का जिक्र किया गया है जो हिंदुस्तान में आकर रहने लगीं और गांधी ने उन्हें मीराबेन का नाम दिया। इसी तरह गांधी के साथ लंबे समय तक रहीं नीला क्रैम कुक खुद को गोपी और गांधी को कृष्ण मानती थीं, इसका ज़िक्र उन्होंने 1934 में प्रकाशित अपनी किताब ‘माई रोड टू इंडिया’ में किया है।  

वैसे गांधी पर भारत सरकार ने ‘कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी’ नाम से पूरे दस्तावेज को 1958 में प्रकाशिक किया और 1994 तक इसके कुल 100 खंड प्रकाशित हुए। इसके अलावा सर्व सेवा संघ प्रकाशन राजघाट वाराणसी ने 1970 में गांधी के निजी सचिव महादेव देसाई की पूरी डायरी को ‘डे टू डे विद गांधीः सेकेटरीज डायरी’ को 10 खंड प्रकाशित किया है, जिसमें महादेव के निधन से पहले तक की तमाम घटनाओं का दैनिक आधार पर सच्चा वर्णन मिलता है। मशहूर लेखक राबर्ट पेन ने ‘द लाइफ एंड डेथ ऑफ महात्मा गांधी’ नाम से गांधी की संपूर्ण जीवनी लिखी, जो 1969 में प्रकाशित हुई। आठ खंडों में गांधी की जीवनी ‘महात्मा: लाइफ़ ऑफ़ मोहनदास कर्मचन्द गाँधी’ नाम की किताब लेखक दीनानाथ गोपाल तेंदुलकर ने लिखी थी जो 1951 में छपी। इस किताब में गांधी के जीवन का सचित्र वर्णन है। अब तक जो फोटो प्रकाशित किए जाते हैं, सब के सब इसी किताब से लिए जाते हैं। अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर ने ‘दि लाइफ ऑफ महात्मा’ नाम से किताब लिखा जो 1951 में प्रकाशित हुई और उस पर गांधी फिल्म बनी थी, जिसे आस्कर पुरस्कार मिला था। अलेक्जेंडर होरेस ने भी 1984 में प्रकाशित अपनी किताब ‘गांधी थ्रू क्रिटिकल आइज’ में काफी कुछ लिखा है। 

अपने इंटरव्यू में कभी महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर चलाने वाली कुसुम ने उनकी निजी ज़िंदगी पर विवादास्पद बयान देकर हंगामा खड़ा कर दिया था। कुसुम ने कहा था, “बड़े लोग पद और प्रतिष्ठा का हमेशा फायदा उठाते रहे हैं। गांधी भी इसी श्रेणी में आते हैं। देश-दुनिया में उनकी प्रतिष्ठा की वजह ने उनकी सारी कमजोरियों को छिपा दिया। वह सेक्स के भूखे थे जो खुद तो हमेशा सेक्स के बारे में सोचा करते थे लेकिन दूसरों को उससे दूर रहने की सलाह दिया करते थे। यह घोर आश्चर्य की बात है कि धी जैसा महापुरूष यह सब करता था। शायद ऐसा वे अपनी सेक्स इच्छा पर नियंत्रण को जांचने के लिए किया करते हों लेकिन आश्रम की मासूम नाबालिग बच्चियों को उनके इस अपराध में इस्तेमाल होना पड़ता था। उन्होंने नाबालिग लड़कियों को अपनी यौन इच्छाओं के लिए इस्तेमाल किया जो सचमुच विश्वास और माफी के काबिल बिलकुल नहीं है।” कुसुम का कहना था कि अब दुनिया बदल चुकी है। महिलाओं के लिए देश की आजादी और प्रमुख नेताओं से ज्यादा जरूरी स्वंय की आजादी है। गांधी पूरे विश्व में एक जाना पहचाना नाम है इसलिए उन पर जारी हुआ यह सच भी पूरे विश्व में सुना जाएगा।

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दरअसल, महात्मा गांधी हत्या के 72 साल गुज़र जाने के बाद भी गांधी हमारे मानस-पटल पर किसी संत की तरह उभरते हैं। अब तक बापू की छवि गोल फ्रेम का चश्मा पहने लंगोटधारी बुजुर्ग की रही है जो दो युवा-स्त्रियों को लाठी के रूप में सहारे के लिए इस्तेमाल करता हुआ चलता-फिरता है। आख़िरी क्षण तक गांधी ऐसे ही राजसी माहौल में रहे। मगर किसी ने उन पर उंगली नहीं उठाई। कुसुम के मुताबिक दुनिया के लिए गांधी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के आध्यात्मिक नेता हैं। अहिंसा के प्रणेता और भारत के राष्ट्रपिता भी हैं जो दुनिया को सविनय अवज्ञा और अहिंसा की राह पर चलने की प्रेरणा देता है। कहना न भी ग़लत नहीं होगा कि दुबली काया वाले उस पुतले ने दुनिया के कोने-कोने में मानव अधिकार आंदोलनों को ऊर्जा दी, उन्हें प्रेरित किया।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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