एक कश्मीरी युवती बनी महाराष्ट्र की पहली बहू

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अनुच्छेद 370 हटने के बाद गैर-कश्मीरियों से शादी करने लगी हैं कश्मीरी युवतियां
मराठी युवक और कश्मीरी युवती बने दंपति, कश्मीरी व मराठी पंरपरा से हुई शादी
प्रीति सोमपुरा

फिल्म जब-जब फूल खिले के गाने परदेसियों से ना अंखियां मिलाना, परदेसियों को है एक दिन जाना को संभवतः आनंद बक्शी ने अनुच्छेद 370 और 35 ए को ही ध्यान में रखकर लिखा था कि परदेशी यानी गैर-कश्मीरी से कभी दिल मत लगाना, क्योंकि इन अनुच्छदों के कारण कोई भी परदेशी यहां का बाशिंदा नहीं हो सकता। दरअसल, आज़ादी के बाद से ही कश्मीर को मिले विदेश दर्जे ने इस राज्य को पूरे देश से काट कर रख दिया था। कोई भी ग़ैर-कश्मीरी कश्मीर के साथ न तो रोटी का न तो बेटी का रिश्ता जोड़ सकता था। यानी कोई बाहरी आदमी न तो यहां अपने नाम से कोई कारोबार खड़ा कर सकता था और न ही कोई ग़ैर-कश्मीर युवक या युवती किसी कश्मीरी से शादी कर सकता था, क्योंकि कश्मीरी जीवनसाथी चुनने के बाद भी वह यहां का नागरिक नहीं बन सकता था।

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इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रतिनिधि के रूप में गृहमंत्री अमित शाह ने जब पांच अगस्त 2019 को इस काले क़ानून को समाप्त करने के लिए जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक लोकसभा में रखा तो सबसे ज़्यादा ख़ुशी उन युवाओं को हुई, जिनका दिल कश्मीर में धड़कता था। ऐसे लोगों को फ़ेहरिस्त में भारतीय सेना में कार्यरत महाराष्ट्र के सातारा के कराड़ तहसील के उंडाले गांव के रहने वाले अजित प्रह्लाद पाटिल भी थे, जिनके सपनों की रानी महाराष्ट्र में नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर का वादियों में रहती थी और वह भी अजित के साथ सात फेरे लेने के लिए इन काले क़ानूनों को खत्म होने का इंतज़ार कर रही थी।

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बहरहाल, लॉकडाउन हटने के बाद जैसे ही हालात सामान्य हुए, वैसे ही अजित पाटिल और कश्मीरी कन्या सुमन देवी ने साथ सात फेरे ले लिए। इस तरह से कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा हटाने का नरेंद्र मोदी सरकार का फ़ैसला इस कपल के लिए ईश्वर का रूप साबित हुआ। तकनीकी तौर पर अनुच्छे 370 हटने के बाद कश्मीर के पहले ‘दामाद’ बने अजित पाटिल ही बने। अजित अपनी पत्नी सुमन से कैसे मिले, दोनों मैं कैसे प्यार हुआ और प्यार परवान चढ़ा, यह कहानी भी एकदम फिल्मी है।

दरअसल, सातारा के अजित पाटिल की भारतीय सेना में 2019 में एजुकेशन इंस्ट्रक्टर की पोस्ट नियुक्ति हो गई। उनकी पहली पोस्टिंग उत्तर प्रदेश के झांसी में हुई। झांसी में ड्यूटी कर ही रहे थे कि उनकी मुलाकात मूलरूप से जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के जोधानगर तहसील के पलमार गांव की रहने वाले एक फौजी से हुई। दोनों के विचार-व्यवहार समान थे लिहाज़ा, परिचय मित्रता में बदल गई। संयोग से उसी साल मॉनसून में कश्मीरी मित्र के घर कुछ दिनों के लिए उनकी बहन सुमन देवी आ गईं। अजित का अपने कश्मीरी फौजी मित्र के घर बराबर आना जाना था। लिहाज़ा, मित्र ने ही अजित का परिचय अपनी बहन से करवा दिया। सुमन सुंदरता की मूरत तो थी ही, शिक्षित भी थी और बातचीत में हर कश्मीरी युवती की तरह तेज़-तर्रार थी।

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अजित और सुमन में नियमित रूप से बातचीत होने लगी। कई मुद्दों पर वे बहस भी करने लगे। लगातार मेल मुलाकात और बहस के दौरान दोनों एक दूसरे को पसंद भी करने लगे। इसी बीच कब एक दूसरे को दिल दे बैठे यह दोनों को भी पता नहीं चला। सबसे बड़ी बात दोनों ने एक दूसरे से इज़हार-ए-मोहब्बत भी नहीं किया। वे जानते थे कि अगर उन्होंने अपनी मोहब्बत का इज़हार कर भी दिया तो वह फलीभूत नहीं हो सकेगा। दोनों अपने-अपने परिवार को तो राजी कर सकते थे, लेकिन अनुच्छेद 370 और 35 ए से नहीं निपट सकते थे। यह कानून उनके परिणय सूत्र में बंधने के रास्ते में सबसे बड़ा विलेन बनकर खड़ा था।

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अनुच्छेद 370 और 35 ए के चलते अजित तो क्या कोई भी गैर-कश्मीरी युवक किसी कश्मीर युवती के साथ सात फेरे लेने के बाद भी कश्मीर की नागरिकता नहीं पा सकता था और सुमन या कोई और कश्मरी युवती अगर ग़ैर-कश्मीरी युवक से शादी करती तो वह अपनी भी कश्मीर नागरिक का दर्जा और अधिकार गंवा देती। इसीलिए दोनों वे एक दूसरे को दिलो-जान से चाहने के बावजूद न तो इजहार-ए-मोहब्बत किया और न ही इस रिश्ते को कोई नाम दिया। दोनों अपने अपने दिल पर पत्थर रखकर मौन ही रहे और वक़्त का इंतज़ार करते रहे। इस बीच दोनों की फोन पर बातचीत होती रही। हालांकि दोनों ने अब भी अपने रिश्ते को औपचारिक रूप से “ढाई अक्षर” का रूप नहीं दिया था।

इस बीच जब मईर् 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में एनडीए की दोबारा सरकार बनी, तभीसे पूरे देश में सुगबुगाहट थी कि शायद मोदी सरकार अनुच्छेद 370 और 35 ए को ख़त्म करने की पहल करे, क्योंकि इन दोनों अनुच्छेदों के सबसे बड़े लाभार्थी रहे कश्मीरी नेता ख़ासकर मेहबूबा मुफ़्ती, उमर अब्दुल्ला और उनके पिता फारुक अब्दुल्ला धमकी भरा बयान दे रहे थे। इस तरह जब सरकार ने इन दोनों अनुच्छेदों को समाप्त करने के लिए पांच अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक लोकसभा में रखा, तब भी इन अजित और सुमन को उम्मीद नहीं थी कि वह विधेयक कानून का रूप ले सकेगा। बहरहाल, जब विधेयक दो तिहाई बहुमत से संसद से पारित हो गया और उस पर राष्ट्रपति का हस्ताक्षर गया तब मानों इस अघोषित प्रेमी-युगल को मुंह मांगी मुराद मिल गई।

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उसके बाद भी अजित और सुमन ने न तो अपने रिश्ते को प्यार का नाम दिया था और न ही उसे किसी परिजन या दोस्त के साथ शेयर किया। दोनों के बीच प्यार का पौधा पनप चुका है, यह बात अब भी अधिकृत तौर पर गोपनीय ही थी। अजित झांसी में ड्यूटी कर रहे थे और सुमन कश्मीर की वादियों में थीं। कई महीने गुज़र जाने के बाद अजित की सुमन से मिलने की बड़ी इच्छा हुई। वह पिछले मार्च में कश्मीर घूमने निकल गए। घूमना तो बहाना मात्र था, दरअसल, उन्हें सुमन को देखना और उनसे बात करना था। लिहाज़ा, घाटी में घूम-घाम कर वह अपने फौजी मित्र के किश्तवाड़ घर चले गए। किश्तवाड़ में वह कई दिन रुक गए, क्योंकि वहां के पहाड़ उन्हें बरबस खींचते थे। संभवतः सुमन के कारण वहां के पहाड़ उन्हें और भी मनोहारी लगते थे। संयोग से तभी 25 मार्च से पूरे देश में कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए लॉकडॉउन की घोषणा हो गई। अब अजित अपने मित्र के घर में क़ैद हो गए। पूरे के पूरे तीन महीने वह कश्मीर में ही फंसे रहे।

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इन तीन महीने के दौरान अजित और सुमन के बीच जो भी झिझक थी, वह अपने आप कब ख़त्म हो गई पता ही नहीं चला। तीन महीने का ख़ूबसूरत और दिलकश वक़्त पलक झपकते ही गुज़र गया। यह दोनों प्रेमी-युगल के जीवन का सबसे खूबसूरत पल था। इस दौरान उन्होंने न केवल एक दूसरे से इज़हार-ए-मोहब्बत किया, बल्कि उन्होंने शादी करने का फ़ैसला कर लिया। दोनों एक दूसरे के दीवाने तो पहले से ही थे, लेकिन प्यार का इज़हार करने के बाद यह बेकरारी कई गुना बढ़ गई। वे जानते थे कि उनकी मोहब्बत अब निश्चित रूप से फलीभूत होगी और शादी के मुकाम तक पहुंचेगी। हालांकि दोनों ने अपने-अपने परिवार से अपने रिश्ते की बात गोपनीय ही रखी, लेकिन निकलते समय अजित ने अपने कश्मीरी मित्र से कह दिया कि वह अपनी मित्रता को स्थाई रिश्ते में बदलना चाहते हैं, इसलिए सुमन का हाथ मांगते हैं। कश्मीरी मित्र को अपनी बहन के लिए सेना का जवान सबसे बेहतरीन वर लगा और वह शादी के लिए तैयार हो गया। इसके बाद अजित-सुमन वैवाहिक जीवन के सपने बुनने लगे।

जून 2020 के बाद जब कोरोना संक्रमण का प्रकोप कम होने लगा और हालात सुधारने लगे, तब अजित कश्मीर से वापस झांसी चले गए। झांसी मैं तीन महीने ड्यूटी करने के बाद वह अपने गांव यानी कराड़ गए। घर आने के बाद अजित ने अपनी मोहब्बत सुमन के बारे में अपने माता-पिता और परिजनों को बताई और कहा कि वह सुमन के साथ शादी करना चाहते हैं। पहले तो अजित का परिवार घबरा गया, क्योंकि कश्मीर में हालात ठीक नहीं थे और आए दिन वहां से आतंकी हमले और मुठभेड़ की की ख़बरें आती रहती थीं। लेकिन जब अजित ने अनुच्छेद 370 और 35 ए समाप्त होने का हवाला देकर परिवार को समझाया कि कश्मीर का भविष्य उज्जवल है तो उनका परिवार मान गया। दरअसल, कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म होने से शादी में कोई संवैधानिक बाधा भी नहीं थी। इसके बाद अजित के गांव में धूमधाम से बहू को लाने का फ़ैसला हुआ। यह तय हुआ कि पहले शादी कश्मीरी रीति रिवाज़ से होगी और उसके बाद महाराष्ट्रीयन रीति रिवाज़ से दोनों परिणय सूत्र में बंधेंगे।

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पिछले नंवबर में अजित अपने माता-पिता और अन्य परिजनों को लेकर किश्तवाड़ चले गए। वहीं 27 नवंबर 2020 को अजित और सुमन देवी की कश्मीरी परंपरा के अनुसार शादी हुई। शादी में कन्या पक्ष के लोग भी बड़े उत्साह के साथ भाग लिया। शादी के बाद दुल्हन को लेकर अजित अपने गांव कराड़ चले आए। 18 दिसंबर को उनके गांव में महाराष्ट्रीयन रीती रिवाज से बड़े धूमधाम से उनका विवाह हुआ। अजित और सुमन प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का दिल से शुक्रिया करते हैं। जिनके कारण ही वह अपने सपनों की रानी को अपनी पत्नी बना सके। अजित और सुमन दोनों कहते हैं, “अगर कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 ए न हटता तो उनकी मोहब्बत एक अधूरी कहानी बनकर रह जाती। कश्मीर का विशेष हटाने का पहला और सबसे बड़ा फ़ायदा मिला हम दोनों को मिला और हम पति-पत्नी बन पाए। इसके लिए हम दोनों प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को दिल से धन्यवाद देते हैं।”

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कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने और राज्य को दे केंद्र शासित क्षेत्र में बदलने के बाद महाराष्ट्र के अजित पाटिल पहले युवक हैं, जिन्हें कश्मीरी लड़की को शादी ब्याह करके महाराष्ट्र ले आने का मौक़ा मिला। इस तरह वह अधिकृत तौर पर कश्मीरी के पहले गैरकश्मीर दामाद बन गए हैं। फ़िलहाल दोनों महाराष्ट्र के कराड़ मैं ही वैवाहिक जीवन बिता रहे हैं। सुमन बताती हैं, “मुझे मराठी संस्कृति खूब रास आ रही है। यह कश्मीरी जैसी ही है। मराठी सब्ज़ी और दाल मुझे बहुत अच्छी लगती है। कराड़ की आबोहवा, वहां का रहन-सहन मैं अपना चुकी हूं। मैं अपने पति से मराठी भी सीख रही हूं। थोड़ी बहुत मराठी बोलने भी लगी हूं।” सुमन का कहना है कि उनकी इस शादी के बाद और भी कश्मीरी लड़कियों को भारत के दूसरे राज्यों में जीवनसाथी चुनने का मौक़ा मिलेगा और इससे देश की सांस्कृतिक विरासत और भी मज़बूत होगी।

भारतीय सेना की नौकरी के ज़रिए देश सेवा के लिए जुटे अजित का कहना है, “मुझे तो लगता है कि प्रधानमंत्री ने शायद सुमन को न अपना पाने की मेरी दर्द भरी आवाज़ को सुन ली थी, इसलिए उन्होंने जल्दी से अनुच्छेद 370 हटा दिया। बहरहाल, इस अनुच्छेद के हटने से अब कश्मीर में भी भारत का क़ानून लागू हो गया है। अब आम भारतीय युवक मेरी तरह कश्मीरी लड़कियों से शादी करके उन्हें अपने घर ला सकता है।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के उत्थान और संस्कृति को बढ़ाने के लिए यह बहुत बड़ा काम किया है। इतिहास उनके इस कार्य का हमेशा याद रखेगा। अजित का कहना है कि उन्हें कश्मीर की वादियां बहुत पसंद हैं। वह भविष्य में कश्मीर मैं ज़मीन ख़रीदकर वहां फलों खेती भी करना चाहते हैं।

(लेखिका देश के मशहूर टीवी पत्रकार हैं।)

(संपादन – हरिगोविंद विश्वकर्मा)

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