बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराने के लिए सदैव याद किए जाएंगे स्वामी अग्निवेश

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समाज सुधारक, राजनेता व आर्य समाजी स्वामी अग्निवेश का जन्म 21 सितंबर 1939 को आंध्रप्रदेश के श्रीकाकुलम के परंपरावादी और रूढ़िवादी हिंदू ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनका वचपन का नाम वेपा श्याम राव था। चार साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता को खो दिया था। उनका पालन-पोषण उनके नाना ने किया। वह छत्तीसगढ़ में शक्ति रियासत के दीवान थे। लॉ एंड कॉमर्स में डिग्री लेने के बाद वह कोलकाता के प्रतिष्ठित सेंट ज़ेवियर कॉलेज में मैनेजमेंट संकाय में लेक्चरर बन गए। बाद में प्रो. वेपा श्याम राव ने कुछ समय भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश सब्यसाची मुखर्जी के जूनियर के रूप में कानून की प्रैक्टिस की। अपने छात्र जीवन में वह आर्य समाज के प्रगतिशील आदर्शों के संपर्क में आए और उस विचारधारा के साथ उनका जीवन भर का रिश्ता बन गया।

प्रो. वेपा श्याम राव के अंदर बैठे शिक्षाविद और वकील राजनीतिक नेतृत्न करने के लिए अधीर था। अपने आसपास विश्वास के नाम पर सामाजिक एवं आर्थिक अन्याय और घोर अंधविश्वास देखकर वह लगातार विचलित होते रहे। इसी के चलते छोटी उम्र में ही धीरे-धीरे राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में सक्रियता होते गए। जीवन की तलाश में वह कलकत्ता से निकलकर हरियाणा पहुंच गए। जो उनके सपने को मूर्तरूप देने का मंच बना। हरियाणा के महान समाज सुधारक और युवक क्रांति अभियान के जनक स्वामी इंद्रवेश के सानिध्य में उनके अंदर क्रांतिकारी परिवर्तन आया।

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1968 में अग्निवेश आर्य समाज के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए। 1970 दो साल बाद संन्यास ग्रहण करने के बाद सांसारिक संपत्ति और रिश्तों का त्याग कर दिया और प्रो. वेपा श्याम राव से स्वामी अग्निवेश बन गए। वह कहते थे कि उनके लिए त्याग का मतलब पलायनवाद नहीं था। अपने संन्यास के दिन उन्होंने स्वामी इंद्रवेश के साथ आर्य सभा नाम की राजनीतिक पार्टी बनाई। वह राजनीतिक व्यवस्था के ज़रिए लोगों के लिए काम करना चाहते थे। उन्होंने 1974 में प्रकाशिक अपनी पुस्तक वैदिक समाजवाद में अपने दल का उल्लेख किया। उन्होंने लिखा, “वैदिक समाजवाद ‘सामाजिकता’ के पक्ष में पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों के भौतिकवाद को खारिज करता है।” आने वाले वर्षों में वह स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी और कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों के दर्शन और लेखन से प्रभावित हुए हैं। अंधविश्वास के विरोध से प्रेरित सामाजिक और आर्थिक न्याय और विश्वास उनके दर्शन की नींव बना।

पंजाब से अलग होकर हरियाणा के पृथक राज्य बनने के दौरान ही अग्निवेश का सियासी सफर शुरू हुआ। उन्होंने हरियाणा को उचित हिस्सा दिलाने के लिए संघर्ष किया। वह उग्र वक्ता थे और शुरू से ही उनकी भाषा प्रभावी और प्रेरणादायक रही। उनके भाषण प्रशासन के लिए सिरदर्द बनने लगे। उनकी शैली ने जल्द ही पुलिस क्रूरता का शिकार बनाया और वह कई बार जेल गए। स्वामी इंद्रवेश के साथ उन्होंने नए राज्य हरियाणा में पूर्ण शराबबंदी के लिए आंदोलन चलाया और सफल रहे। किसानों की उकी फसल की उचित कीमत दिलाने के लिए शुरू किसान आंदोलन का सफल नेतृत्व किया। जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल की घोषणा की तो स्वामी को भूमिगत हो गए और इस फ़ैसले के विरोध में जयप्रकाश नारायण के साथ आंदोलन किया।

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1977 के चुनावों में इंदिरा गांधी की पराजय हुई और स्वामी अग्निवेश हरियाणा राज्य विधानसभा के लिए चुन लिए गए। वह भजनलाल सरकार में शिक्षा मंत्री बने। चार महीने से भी कम समय में उनका सत्ता से मोहभंग हो गया। फरीदाबाद औद्योगिक बस्ती में फायरिंग में 10 मजदूर मौत के बाद अपनी ही सरकार की न्यायिक जांच की मांग कर दी। इसके बाद उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा ही नहीं दिया बल्कि राजनीति से संन्यास ले लिया। इसके बाद अपनी सारी ऊर्जा और समय सामाजिक न्याय आंदोलनों में लगाने का फैसला किया।

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उनका सामाजिक सरोकार राजनीतिक सफर के समानांतर चलता रहा। लिहाज़ा, राजनीति छोड़ने के बाद सामाजिक सक्रियता बढ़ गई। गांधीजी के अंत्योदय के सिद्धांत पर चलते हुए समाज के वंचित तबके की सेवा में जुटे थे। उन्होंने देखा कि भारत में दासता भले ही हमेशा अवैध रही है, लेकिन बंधुआ मजदूरों के रूप में वह व्यवस्था मौजूद है। 1980 के दशक में बंधुआ मजदूरी के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू बंधुआ मुक्ति मोर्चा का गठन किया। दुनिया में वह बंधुआ मजदूरों को मुक्ति दिलाने के लिए जाने जाते हैं। बंधुआ मजदूर उन्मूलन कानून उनके मिशन के कारण ही मुमकिन हुआ। अरुण शौरी ने अपनी किताब ‘कोर्ट्स एंड देयर जजमेंट्स प्रिमायसेस, प्रिरिक्विजिट, कॉन्सक्वेंसेस’ में उनके आंदोलन का उल्लेख किया है। शुरू में जब अग्निवेश ने हरियाणा के मुख्यमंत्री भजन लाल के समक्ष यह मुद्दा उठाया, तो दो साल पहले एक उद्योगपति की हत्या के आरोप में उनके खिलाफ नक्सली के रूप में मामला दर्ज हो गया।

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बहरहाल, बंधुआ मुक्ति मोर्चा की पहल पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी भी कर्मचारी को वैधानिक रूप से निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम आय वाले को बंधुआ मजदूरी के रूप में मान जाएगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लागू करने में सरकार विफल रही। खदान-मालिकों की दहशत बरकरार थी। इस मुद्दे को उठाने पर स्वामी 1985 में गिरफ़्तार कर लिए गए। बहरहाल, बंधुआ मुक्ति मोर्चे ने 1.72 लाख से अधिक श्रमिकों को मुक्त कराया। इतना ही नहीं अग्निवेश के प्रयास से अखिल भारतीय ईंट भट्ठा मजदूर, पत्थर खदान श्रमिक और निर्माण श्रमिक सहित कई ट्रेड यूनियन्स के गठन में मदद मिली। उनके आंदोलन को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली और उन्हें तीन बार द यूएन ट्रस्ट ऑफ कंटेम्पररी फॉर्म्स ऑफ स्लैवरी का चेयरपरसन चुना गया। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पीएन भगवती ने एक बार कहा था कि भारत में बंधुआ मजदूरों का मुद्दा प्रकाश में लाने का श्रेय पूरी तरह से स्वामी अग्निवेश को जाता है।

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1987 में राजस्थान के देवराला में एक युवा स्त्री को सती करने की वीभत्स घटना के बाद अग्निवेश ने इस कलंक को धोने के लिए 18 दिन लंबी पदयात्रा कर राजस्थान पहुंचे। लेकिन उन्हें देवराला नहीं जाने दिया गया। हालांकि उसी वर्ष भारतीय संसद ने सती निवारण अधिनियम पारित किया। दिल्ली में उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान चलाया, जिसके बाद इस मुद्दे पर भी कानून बनाया गया। उन्होंने देश में महिलाओं की घटती संख्या का मुद्दा उठाया और गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में भ्रूण-कन्या के गर्भपात के खिलाफ मिशन शुरू किया। 2010 में स्वामी अग्निवेश के नेतृत्व में राजस्थान के नाथद्वारा मंदिर में दलितों के प्रवेश के लिए लंबा आंदोलन चला था, जिसमें आंदोलनकारियों को हिंसा का शिकार भी होना पड़ा था। इसके बाद उच्च न्यायालय ने सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा था कि वह दलितों के लिए प्रवेश की गारंटी करे और अगर कोई इसे रोकता है कि संविधान की धारा 17 के तहत सख्त कार्रवाई करे।

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अपने संपूर्ण जीवन में अग्निवेश धर्म के नाम पर सांप्रदायिकता और असहिष्णुता के खिलाफ लड़ाई लड़ते रहे। 1989 में, मेरठ में सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ दिल्ली से मेरठ तक एक बहु-धार्मिक मार्च का नेतृत्व किया। अग्निवेश कुछ साल पहले माओवादियों और भारत सरकार के बीच बातचीत करवाने की कोशिश को लेकर भी चर्चा में रहे। अग्निवेश का मानना था कि केंद्र सरकार और माओवादी मजबूरी में शांति वार्ता कर रहे हैं। दोनों के सामने इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। हालांकि उकी कोशिश बहुत कामयाब नहीं रही। कई बार उन पर नक्सलियों से सांठगांठ और हिंदू धर्म के खिलाफ दुष्प्रचार का आरोप गला। जिसके कारण भारत में अनेकों अवसरों पर उनके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन हुए।

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जन लोकपाल विधेयक के लिए आंदोलन कर रहे अण्णा हज़ारे के साथ अग्निवेश सक्रिय रहे। जंतर-मंतर पर अण्मा के अनशन के दौरान भी वह पूरे समय उनके साथ रहे। हालांकि कई मुद्दों पर सिविल सोसायटी और अग्निवेश के बीच मदभेद भी हुए। असली मुद्दा प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में रखने या नहीं रखने को लेकर है। अग्निवेश ने इस बारे में विवादास्पद बयान देकर सिविल सोसायटी को नाराज़ कर दिया था। अग्निवेश ने कह दिया था कि अगर सरकार सिविल सोसायटी की बाक़ी मांगों को मान ले तो प्रधानमंत्री और न्यायपालिका के मुद्दे पर नरमी बरती जा सकती। लेकिन सिविल सोसायटी ने इस बयान को बिलकुल ग़लत करार दिया और उन पर कांग्रेस नेताओं के साथ सांठगांठ करने का आरोप लगाया। जुलाई 2018 में झारखंड में उन पर हमला किया गया था।

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कुल मिलकर प्रो. वेपा श्याम राव उर्फ स्वामी अग्निवेश का जीवन न केवल लंबा बल्कि संघर्षों से भरा रहा है। उनका शुक्रवार शाम की शाम अंतिम सांस ली। उनको मंगलवार को तबीयत ख़राब होने पर दिल्ली के इंस्टिट्यूट ऑफ लिवर एंड बॉयलरी साइंसेज (आईएलबीएस) में भर्ती करवाया गया था। बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराने के लिए अग्निवेश सदैव याद किए जाएंगे।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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