हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है…

0
1405

गीतकार शैलेंद्र को न तो कोई राष्ट्रीय सम्मान नहीं मिला न ही स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा

सर पे लाल टोपी रूसीफिर भी दिल है हिंदुस्तानी… और हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है… जैसे जन-जन लोकप्रिय गानों के शिल्पी शैलेंद्र को संभवतः दलित होने की कीमत ज़िंदगी भर चुकानी पड़ी। ऐसे समय जब सरकारें एरे गैरे नत्थू खैरे को पुरस्कार बांटती रहती हैं। तब बिडंबना ही कहा जाएगा कि शैलेंद्र जैसे गीतकार को किसी सरकार से आज तक कोई राष्ट्रीय सम्मान नहीं मिला। जबकि हिंदी सिनेमा के हर प्रमुख गीतकर, संगीतकार, निर्देशक और अभिनेता को कोई न कोई राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। यहां तक कि मौजूदा दौर के गीतकार प्रसून जोशी तक को पद्मश्री मिल चुका है और शैलेंद्र के समकक्ष गीतकार प्रदीप उर्फ रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी को दादासाहेब फाल्के पुरस्कार दिया जा चुका है।

इसे भी पढ़ें – कोई उनसे कह दे हमें भूल जाएं…

गीतकार शैलेंद्र मूल रूप से बिहार के रहने वाले थे, वह उत्तर प्रदेश में पले और बढ़े और महाराष्ट्र को उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाई, लेकिन न तो किसी राज्य सरकार और न ही केंद्र सरकार ने उनको उचित सम्मान दिया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दैरान जेल में बंद रहने वाले शैलेंद्र को कोई पुरस्कार तो दूर की बात उन्हें स्वतंत्रता संग्रास सेनानी का दर्जा तक नहीं दिया गया। यहां तक कि शैलेंद्र पद्मश्री के भी क़ाबिल नहीं समझे गए। शैलेंद्र पर सरकार ने एक डाक टिकट जारी करके सम्मानित करने की औपचारिकता पूरी कर ली। हालांकि उन्हें 1966 में ‘तीसरी कसम’ के निर्माता के रूप में 1966 में राष्ट्रपति पदक और 1967 में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, लेकिन बतौर गीतकार कोई सम्मान नहीं मिला।

हिंदी सिनेमा में गीतकारों को कभी उतनी शोहरत, श्रेय और अहमियत नहीं मिली जितनी अभिनेताओं, निर्देशकों और संगीतकारों को मिलती रही है। जबकि जिस तरह से संवाद लेखक फ़िल्म की जान होता है, वैसे ही गीतकार गीतों का शिल्पी माना जाता है। इस उपेक्षा के बावजूद हिंदी सिनेमा के एक सदी से ज़्यादा के सफ़र में कई ऐसे गीतकार हुए, जिनके गीतों की तासीर आज भी वही है जैसी फ़िल्म के रिलीज़ के समय थी। यही वजह है कि उन गीतों को आज पांच दशक बाद भी लोग गाहे-बगाहे गुनगुनाते रहते हैं। शब्दों के जादूगर गीतकर शैलेंद्र उन्हीं गीतकारों की फ़ेहरिस्त में आते हैं।

इसे भी पढ़ें – ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है…

गीतकार शैलेंद्र की ज़िंदगी के पन्ने पलटते समय यही महसूस होता है कि वह ग्लैमरस फिल्मी दुनिया के लिए बने ही नहीं थे। वह इस स्वप्नीली दुनिया में कभी सहज नहीं हो के। यही वजह है कि इसीलिए बेहतर निर्देशन और बेहतर रचनाशीलता के बावजूद वह ज़िंदगी भर भटकते रहे। हालांकि उनकी राजकपूर से अंत तक दोस्ती बनी रही और उनके लिए कई गाने लिखे, लेकिन फ़िल्मी दुनिया में उनकी कोई लॉबी नहीं थी। सरल शब्दों में भावनाओं और संवेदनाओं को अभिव्यक्त कर देना उनकी विशेषता थी। किसी के आंसुओं में मुस्कुराने जैसा विचार केवल शैलेंद्र जैसे कालजयी गीतकार के संवेदनशील हृदय में ही आ सकता था।

इसे भी पढ़ें – पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही…

हिंदी सिनेमा को 800 से अधिक नगमे देने वाले शैंलेंद्र सिर्फ़ 43 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए। आज वह ज़िंदा होते तो अपना 97 वां जन्मदिन मना रहे होते। उनका जन्म 30 अगस्त, 1923 को पाकिस्तान के रावलपिंडी में हुआ था। उनका बचपन का या असली नाम शंकरदास केसरीलाल राव था। दलित समुदाय के धुसिया चर्मकार जाति के थे। मूल रूप से उनका परिवार बिहार के आरा जिले के धुसपुर गांव का रहने वाला था। उनके पिता केसरीलाल राव ब्रिटिश मिलिटरी हॉस्पिटल में कार्यरत थे। परिवार के बाक़ी लोग भूमिहीन थे और ज़मीदारों के खेतों में मजदूरी करते थे। दरअसल, जब केसरीलाल राव की तैनाती रावलपिंडी के मूरी केंटोनमेंट एरिया में हुई तो उनका परिवार रावलपिंडी आकर रहने लगा।

हालांकि भारतीय सेना से रिटायर होने के बाद पिता केसरीलाल राव बीमार हो गए। उनकी बीमारी और आर्थिक तंगी के चलते परिवार का रावलपिंडी में रहना मुमकिन नहीं हुआ। लिहाज़ा, राव परिवार मथुरा में आकर बस गया, लेकिन वहां भी परिवार की आर्थिक समस्याएं कम नहीं हुईं। घर की माली हालत इतनी अधिक ख़राब हो गई कि कई-कई दिन पूरे सदस्यों को भूखे सोना पड़ता था। तमाम आर्थिक परेशानियों के बावजूद, 1939 में शैलेंद्र ने मथुरा केआर इंटर कॉलेज से पहले हाईस्कूल और बाद में इंटर तक पढ़ाई की। वह मेधावी छात्र थे। हाईस्कूल की परीक्षा में तो उन्होंने 16 साल की उम्र में पूरे उत्तर प्रदेश में तीसरा स्थान प्राप्त किया था।

इसे भी पढ़ें – मोहब्बत की झूठी कहानी…

प्रकृति ने उनकी राह में हर क़दम पर कांटे बिछाकर रखे थे। ग़रीबी के चलते उनकी इकलौती बहन का इलाज नहीं हो सका और उसकी मृत्यु हो गई। तब एक वक़्त ऐसा आया कि भगवान शंकर में असीम आस्था रखनेवाले शैलेंद्र ईश्वर से ही विमुख हो गए। वह कॉलेज में आयोजित वादविवाद और काव्यलेखन प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे और ख़ूब पुरस्कार जीतते थे। उनकी बेटी अमला शैलेंद्र बताती हैं, शैलेंद्र कॉलेज में बहुत अच्छी हॉकी खेलते थे। ख़ासकर ड्रिबलिंग में उन्हें महारत हासिल थी। लेकिन एक बार जब हॉकी खेल रहे थे, तो कुछ छात्रों ने उनका मज़ाक़ उड़ाते हुए कहा, ‘अब ये लोग भी खेलेंगे।’ शैलेंद्र को यह जातिवादी टिप्पणी बहुत गहरे तक चुभ गई। वह बहुत दुखी हुए और अपनी हॉकी स्टिक तोड़ दी। पहली बार उन्हें दलित होने का दंश झेलना पड़ा था।

इसे भी पढ़ें – चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो..

किशोरवय से ही शैलेंद्र ने कविता लिखना शुरू कर दिया था। कॉलेज के दिनों में ही आज़ादी से पहले नवोदित कवि के तौर पर कवि सम्मेलनों में हिस्सा लेने लगे थे। उनकी कविताएं हंस, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी मशहूर पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। उन्होंने महज 19 साल की उम्र में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया और कॉलेज के साथियों के साथ जेल भी गए। काफी समय तक वह जेल में ही रहे। जेल से छूटने के बाद उनके पिताजी ने कहा, “बेटा हम लोगों के लिए पेट सबसे बड़ा आंदोलन है, इसलिए आंदोलन शामिल होने की बजाय काम की तलाश करो।” बस क्या था, रोज़ी-रोटी के संकट ने उन्हें लेखन से दूर कर दिया था, लेकिन उनके अंदर का कवि ज़िंदा रहा।

दरअसल, पिता की बीमारी के चलते कम उम्र में निधन के बाद ही शैलेंद्र को आभास हो गया कि उनका जीवन आसान नहीं होगा। लिहाज़ा, घर चलाने के लिए उन्हें ही काम-धंधा करना होगा। ऐसी स्थिति में वे साहित्य प्रेम छोड़कर रेलवे की परीक्षा पास करके काम पर लग गए। उन्होंने रेलवे की परीक्षा दी और मैकेनिक की नौकरी मिल गई। उनकी पोस्टिंग पहले झांसी हुई, फिर बंबई के माटुंगा रेलवे वर्कशॉप के मेकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग में ट्रांसफर हो गया। वर्कशॉप के मशीनों के शोर और महानगरी की चकाचौंध के बीच भी उनके अंदर का कवि मरा नहीं और उन्हें अक्सर कागज-कलम लिए अपने में गुम अकेले बैठे देखा जाता था।

इसे भी पढ़ें – परदेसियों से ना अखियां मिलाना…

कविता लिखने और अपने प्रगतिशील नज़रिए के चलते शैलेंद्र इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ गए। ड्यूटी से छूटने के बाद संघ के कार्यालय पहुंच जाते थे और वहीं अपना समय बिताते थे। तब संघ का दफ़्तर फ़िल्मकार पृथ्वीराज कपूर के रॉयल ओपेरा हाउस के ठीक सामने हुआ करता था। संघ के कार्यालय में हर शाम कवि जुटते थे। वहीं शैलेंद्र का परिचय शोमैन राजकपूर से हुआ। दरअसल, राजकपूर की नज़र उनकी लेखन पर तब गई, जब शैलेंद्र अपना लिखा गीत ‘जलता है पंजाब साथियों…’ को जन नाट्य मंच के आयोजन में गा रहे थे। उस समय 1947 में देश आज़ादी के जश्न के साथ-साथ विभाजन के दंश में डूबा था।

इसे भी पढ़ें – तेरा जलवा जिसने देखा वो तेरा हो गया….

उस कार्यक्रम में श्रोताओं में राजकपूर भी मौजूद थे। उन्हें शैलेंद्र का गीत बहुत पसंद आया और उनकी प्रतिभा को वहीं पहचान लिया। वहीं से उनकी दोस्ती हो गई। उस समय राजकपूर केवल 23 साल के थे और शैलेंद्र 24 सला के, लेकिन राज अपनी पहली फ़िल्म ‘आग’ बनाने की तैयारी कर रहे थे। शैलेंद्र की बेटी अमला शैलेंद्र बताती हैं, “राजकपूर ने अपनी फ़िल्म के लिए गीत शैलेंद्र से लिखवाना चाहते थे, लेकिन तब शैलेंद्र को लगा कि गीत बेचने की चीज़ नहीं होती है। लिहाज़ा, उन्होंने राजकपूर से कह दिया कि वह पैसे के लिए गीत नहीं लिखेंगे। इस तरह फिल्मों में गीत लिखने का मौक़ा उन्होंने झूठी शेखी में गंवा दिया।

जब तक शैलेंद्र अकेले थे, तब तक तो यह रवैया ठीक था। लेकिन जब ख़र्च बढ़ने लगा तो उन्हें अपनी ग़लती का एहसास होने लगा। 1948 में उनकी शादी हो गई। लिहाज़ा, मुंबई में घर-गृहस्थी जमाने के लिए अतिरिक्त पैसे की ज़रूर आन पड़ी। इससे आर्थिक मोर्चे पर शैलेंद्र भयंकर तंगी महसूस करने लगे थे। ख़ासकर जब पत्नी गर्भवती हुईं, तब आर्थिक ज़रूरतें अचानक अधिक बढ़ गईं। एक दिन वह राजकपूर के पास गए। उस समय राज ‘बरसात’ फ़िल्म बना रहे थे। फ़िल्म लगभग पूरी हो चुकी थी, इसके बावजूद राज ने कहा, “दो गानों की गुंज़ाइश है। आप लिख दें।” तब शैलेंद्र ने बरसात के दो गाने हमसे मिले तुम सजनतुमसे मिले हम और पतली कमर हैतिरछी नज़र है लिखा। दोनों गाने बहुत लोकप्रिय हुए। राजकपूर ने दो गीतों का पचास हज़ार रुपए पारिश्रमिक दिए, जो 1949 में बहुत बड़ी राशि थी।

इसे भी पढ़ें – हम रहे न हम, तुम रहे न तुम…

उसके बाद तो शैलेंद्र ने राजकपूर की चार-सदस्यीय टीम में अपना स्थान बना लिया। टीम में थे शंकर, जयकिशन, हसरत जयपुरी और शैलेंद्र थे। इसके बाद उनका साथ अगले 16-17 साल तक रहा। ‘बरसात’ से लेकर ‘मेरा नाम जोकर’ तक राजकपूर की सभी फ़िल्मों के थीम गीत शैलेंद्र ने ही लिखे। राजकपूर शैलेंद्र को कविराज कहकर बुलाते थे। आवारा फ़िल्म में शैलेंद्र के लिखे गीत गाकर राजकपूर दुनिया भर में लोकप्रिय हो गए। बहरहाल, शैलेंद्र के गीत इस कदर लोकप्रिय हुए कि आज भी लोग गुनगुनाते हैं। शैलेंद्र के लिखे 800 गीतों में ज़्यादातर गीत लोकप्रिय हुए।

इसे भी पढ़ें – वक्त ने किया क्या हसीन सितम…

आज हम हर धरना प्रदर्शन में ‘हर जोर-जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है’ सुनते हैं। यह नारा कालांतर में इतना लोकप्रिय हुआ कि आज भी हर मजदूर के लिए मशाल के समान हो है। बहुत कम लोगों को पता है कि इस नारे के रचयिता शैलेंद्र हैं। उन्होंने बतौर निर्माता भी हाथ आजमाया। राजकपूर अभिनीत ‘तीसरी कसम’ का निर्माण किया। फ़िल्म का निर्देशन बासु भट्टाचार्य ने किया। शैलेंद्र को उपन्यसकार फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ बहुत पसंद आई। लिहाज़ा, उन्होंने निर्माता बनने की ठान ली। राजकपूर और वहीदा रहमान को लेकर ‘तीसरी कसम’ बनाई। अपनी सारी दौलत तो लगाई ही, मित्रों से उधार भी लिया। तीसरी कसम बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई और शैलेंद्र क़र्ज़ से लद गए।

शैलेंद्र के लिखे कई गीत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर हुए। आवारा हूंआवारा हूंगर्दिश में हूं आसमान का तारा हूं की लोकप्रियता के बारे में शैलेंद्र की बेटी अमला बताती हैं, “नोबल पुरस्कार से सम्मानित रशियन साहित्यकार अलेक्जेंडर सोल्ज़ेनित्सिन ने अपनी किताब ‘द कैंसर वार्ड’ में इस गाने का ज़िक्र किया है। किताब में वर्णित कैंसर वार्ड के एक दृश्य में नर्स कैंसर मरीज़ की तकलीफ़ दर्द कम करने के लिए इस गाने को गाती है। मज़ेदार बात यह रही कि इस गीत को राजकपूर ने सुनने के बाद तुरंत रिजेक्ट कर दिया था।

इसे भी पढ़ें – कि घूंघरू टूट गए…

उसी समय शैलेंद्र ने अपने बारे में धर्मयुग के 16 मई, 1965 के अंक में ‘मैं, मेरा कवि और मेरे गीत’ शीर्षक से लिखे लेख में लिखा कि आवारा की कहानी सुने बिना, केवल नाम से प्रेरित होकर यह गीत लिखा था। जब इस गीत को राजकपूर को सुनाया तो उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। संयोग से शैलेंद्र का लेख ख़्वाज़ा अहमद अब्बास ने पढ़ा। वह आवारा के पटकथा और संवाद लेखक थे। तब तक फ़िल्म पूरी हो गई थी। लेकिन अब्बास के कहने पर राजकपूर ने मुझे फिर से गीत सुनाने को कहा। इसके बाद अब्बास ने कहा कि इतने सुंदर गीत को तो फ़िल्म का मुख्य गीत होना चाहिए।

इसे भी पढ़ें – कहानी – एक बिगड़ी हुई लड़की

‘सपनों के सौदागर’ के निर्माता बी अनंथा स्वामी ने शैलेंद्र से गाना लिखने का आग्रह किया। लंबा वक्त निकल गया, लेकिन गीत नहीं लिखा गया। एक दिन स्वामी और शैलेंद्र का सामना हो गया। शैलेंद्र के मुंह से निकला, तुम प्यार से देखोहम प्यार से देखेंजीवन की राहों में बिखर जाएगा उजाला।  इसे सुनकर स्वामी बोले, “आप इसी को पूरा कर दो।“ इस तरह ‘सपनों के सौदागर’ का यह गाना बना। ऐसे ही 1955 में रिलीज़ ‘श्री 420’ के गाने मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के  को लिखने का प्रसंग प्रचलित है। शैलेंद्र ने नई कार ख़रीदी थी। कहीं जा रहे थे पर सिगनल पर कार रुकी। तभी एक लड़की पास आकर खड़ी हो गई। सभी उसे कनखियों से देखने लगे। सिगनल ग्रीन हुआ और कार चल पड़ी, परंतु कार में बैठे शंकर लड़की को देखते रहे, तो शैलेंद्र ने चुटकी ली, मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के  बस फिर क्या था, यह गाना बन गया।

गीतकार शैलेंद्र को फिल्मों में शानदार गीत लिखने के लिए तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिया गया। पहली बार 1958 में रिलीज़ ‘यहूदी’ फ़िल्म के ये मेरा दीवानापन हैया मुहब्बत का सुरूर… गाने के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला। दूसरी बार 1959 में आई फ़िल्म ‘अनाड़ी’ के सब कुछ सीखा हमनेन सीखी होशियारी… गाने के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता और तीसरी बार 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘ब्रह्मचारी’ के मै गाऊं तुम सो जाओ, सुख सपनों में खो जाओ… गाने के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से नवाजा गया। फ़िल्फेयर पुरस्कार 1960 में शुरू हुआ और पहले दो साल गीतकार का फ़िल्मफेयर अवार्ड्स शैलेंद्र को ही मिले।

इसे भी पढ़ें – कहानी – हां वेरा तुम!

कहा जाता है कि किसी बात पर शैलेंद्र का संगीतकार शंकर-जयकिशन से उनका किसी बात पर मनमुटाव हो गया। लिहाजा, शंकर-जयकिशन दूसरे गीतकारों से गीत लिखवाने लगे। शैलेंद्र ने उन्हें एक चिट्ठी भेजी। उसमें लिखा छोटी सी ये दुनियापहचाने रास्तेतुम कभी तो मिलोगेकहीं तो मिलोगेतो पूछेंगे हाल। उसे पढ़ते ही शंकर-जयकिशन उनसे मिलने पहुंच गए और कहा कि अनबन ख़त्म। अब हमारी जोड़ी कभी नहीं टूटेगी और दोनों का साथ आख़िर तक रहा। इस गीत को शंकर-जयकिशन ने 1962 में रिलीज़ ‘रंगोली’ फ़िल्म में इस्तेमाल किया।

इसे भी पढ़ें – कहानी – अनकहा

हिंदी सिनेमा में शैलेंद्र की प्रतिभा का बड़ा सम्मान किया जाता था। यह वाकया 1963 में हुए फ़िल्मफेयर पुरस्कार समारोह का है। गीतकर साहिर लुधियानवी ने समारोह में उस साल का फ़िल्म फेयर अवार्ड लेने से मना कर दिया था। उन्होंने कहा, “शैलेंद्र का लिखा बंदिनी फ़िल्म का गीत मत रो माता लाल तेरे बहुतेरे उनके गीत से बेहतर है। लिहाज़ा, फ़िल्मफेयर अवार्ड उन्ही को मिलना चाहिए।” शैलेंद्र बारे मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने एक बार कहा, “शैलेंद्र जीनियस थे। बड़ी बात सादगी से कह देने का जो गुण शैलेंद्र में था, वह किसी में नहीं था। शैलेंद्र का रिश्ता बनता है कबीर और मीरा जैसे कवियों से बनता है।” मज़रूह सुल्तानपुरी ने कहा था, “सच पूछो तो सही मायनों में गीतकार शैलेंद्र ही हैं।”

शैलेंद्र के पुत्र दिनेश शंकर शैलेंद्र के अथक प्रयास से शैलेंद्र की कविताओं का कविता संग्रह ‘अंदर की आग’ नाम से राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया। पुस्तक का लोकार्पण करते हुए मशहूर आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने शैलेंद्र को संत रविदास के बाद सबसे महत्वपूर्ण दलित कवि बताया। तो कई साहित्यकारों ने शैलेंद्र के साथ दलित शब्द जोड़ने पर एतराज़ जताया। बहरहला, अधिक शराब पीने से शैलेंद्र को लिवर सिरोसिस की बीमारी हो गई थी। 1966 मे बीमार होने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। तब वे ‘जाने कहां गए वो दिन, कहते थे तेरी याद में, नजरों को हम बिछाएंगे’ गीत की रचना में लगे थे। 14 दिसंबर 1966 को राजकपूर के जन्मदिन पर शैलेंद्र ने उन्हें जन्मदिन के शुभकामना देने की इच्छा ज़ाहिर की। बीमार होने के बाद भी वह आरके स्टूडियो चल दिए। रास्ते में उनका निधन हो गया। शैलेंद्र को नहीं मालूम था कि मौत के बाद उनकी फ़िल्म हिट होगी और उसे पुरस्कार मिलेगा। शैलेंद्र तो हमारे बीच नहीं है, पर उनके गीत, हमेशा उनकी याद दिलाने के लिए मौजूद रहेंगे।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

इसे भी पढ़ें – क्या पुरुषों का वर्चस्व ख़त्म कर देगा कोरोना?