शिवसेना का कांग्रेस-एनसीपी के साथ सेक्यूलर पार्टी के रूप में ट्रांसफॉर्मेशन

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हरिगोविंद विश्वकर्मा

नवंबर 2019 में जब शिवसेना (Shiv Sena) ने महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री (Chief Minister) पद पाने के लिए भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) के साथ तीन दशक पुराना भगवा गठबंधन तोड़कर कांग्रेस (Congress) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NPC) के साथ महाविकास अघाड़ी का गठन कर राज्य में सरकार बनाई थी, तब यह आशंका जताई गई थी कि कभी कट्टर हिदुत्व की प्रबल पैरोकार रही यह पार्टी आने वाले समय में कांग्रेस और एनसीपी को भी हिंदुत्व का पाठ पढ़ा देगी, लेकिन हुआ इसके एकदम उलटा। इसे कांग्रेस-एनसीपी की स्मार्टनेस ही कहा जाएगा कि इन दोनों दलों ने मिलकर हिंदू हृदय सम्राट कहे जाने वाले बाल ठाकरे की शिवसेना को पूरी तरह ट्रांसफॉर्म करके उसे एक सेक्यूलर राजनीतिक पार्टी बना दिया।

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मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के एक साल के कार्यकाल की चर्चा करें तो कोरोना के कारण राज्य सरकार ने भले कोई जनहित या विकास कार्य नहीं किया, लेकिन उद्धव ठाकरे ने इस दौरान जो भी फ़ैसले लिए उनसे यही विदित होता है कि शिवसेना हिंदुत्व की राजनीति को सदा के लिए अलविदा कहकर धर्मनिरपेक्षता यानी सेक्युलरिज़्म के कांग्रेसी सांचे में पूरी तरह ढल गई है। इसे अगर एनसीपी के कद्दावर नेता शरद पवार की सर्वश्रेष्ठ राजनीतिक उपलब्धि कहें, तो बिलंकुल हैरानी या अतिरंजना नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने महाराष्ट्र के राजनीतिक फलक से कट्टर हिंदुत्व का नारा देने वाले दल की विचारधारा ही बदल कर रख दिया।

फ़िलहाल आलम यह है कि शुरू से महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि देश भर के मुसलमानों के लिए सिरदर्द रहा राजनीतिक दल मुसलमानों का माई डियर दल बन गया है। सोशल मीडिया पर जो लोग कभी शिवसेना को खुले तौर पर कोसते और गाली देते थे, वही लोग आज उसके मुरीद बने हुए हैं और उसके समर्थन में तरह-तरह की दलील देते हुए पोस्ट करते नज़र आ रहे हैं। इसकी वजह यह है कि उद्धव ठाकरे ने बतौर मुख्यमंत्री अपने एक साल के कार्यकाल में जितने भी फ़ैसले लिए उससे मुसलमान बिल्कुल प्रभावित नहीं हुए, बल्कि उनके हर फ़ैसले से सबसे ज़्यादा प्रभावित हिंदू का झंडा उठाने वाले या हिंदुत्व का समर्थन करने वाले लोग ही हुए हैं।

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पिछले साल उद्धव ठाकरे को राज्य का मुख्यमंत्री बनाने के लिए शिवसेना ने अपने दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों एनसीपी और काग्रेस का आलिंगन कर लिया था। इसके लिए इस पार्टी ने उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे के अनुवाई में कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़ने और उसी सेक्यूलर यानी धर्मनिरपेक्षता शब्द को अंगीकार करने का फ़ैसला किया था। जिस धर्मनिरपेक्षता या सेक्युलरिज़्म शब्द को बाल ठाकरे जीवन भर ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ यानी ‘स्यूडो सेक्युलरिज़्म’ कहते रहे, वही शब्द आज उनके दल का प्रमुख एजेंडा बना हुआ है। शिवसेना का सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़कर ‘सेक्यूलर शिवसेना’ में ट्रांसफॉर्म होना, महाराष्ट्र के छह दशक के राजनीतिक इतिहास में बहुत बड़ा परिवर्तन कहा जाएगा।

बतौर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के कार्यकाल में जो सबसे पहली हिंदू विरोधी घटना हुई वह थी पालघर में दो हिंदू साधुओं की हत्या। उन साधुओं की हत्या ही नहीं की गई, बल्कि भीड़ ने उन्हें पुलिस वालों के सामने बड़ी बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला था। उद्धव सरकार ने इस मॉब लिंचिंग की भयानक वारदात में कुछ गिरफ़्तारियां ज़रूर की थीं, लेकिन साधुओं को भीड़ के हवाले करने वाले पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की गई। इसका असर यह हुआ कि पूरे देश में हिंदुओं, ख़ासकर संत समाज में शिवसेना के प्रति बहुत ग़लत संदेश गया। देश-विदेश में भी पालघर की घटना उस तरह सुर्खियों में नहीं आई, जिस तरह मॉब लिंचिंग में गैरहिंदुओं की हत्या की घटनाएं सुर्खियों में आती रही हैं।

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उद्धव ठाकरे सरकार ने कथित तौर पर दूसरा जो सबसे बड़ा हिंदू विरोधी फ़ैसला लिया वह था हिंदू आतंकवाद की थ्यौरी गढ़ने वाले हेमंत करकरे की टीम के प्रमुख सदस्य रहे भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी परमबीर सिंह को मुंबई का पुलिस कमिश्नर बनाना। परमबीर को सर्वाधिक चर्चा तब मिली थी, जब उन्होंने दुनिया को हिंदू आतंकवाद के बारे में बताया और कहा कि आतंकवादी केवल मुसलमान नहीं होते, बल्कि हिंदू भी आतंकवादी होते हैं। एटीएस ने मालेगांव बमकांड में साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर और कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित समेत बड़ी संख्या में लोगों को आतंकवादी करार देकर गिरफ़्तार कर लिया था।

सभी गिरफ़्तार आरोपियों को परमबीर सिंह ने भयानक रूप से टॉर्चर ही नहीं किया, बल्कि लंबे समय तक सभी को जेल में भी रखा। पिछले चुनाव में भोपाल से भाजपा की सांसद चुनी गईं प्रज्ञा ठाकुर ने तो सीधे परमबीर सिंह पर हिरासत के दौरान अनैतिक रूप से पीटने के आरोप लगाती रही हैं। यानी उद्धव ठाकरे ने हिंदू साध्वी (महिला) को कथित तौर टॉर्चर करने वाले अधिकारी को ही मुंबई पुलिस की कमान सौंप दी। मालेगांव बमकांड के अन्य आरोपी कर्नल प्रसाद पुरोहित की पत्नी डॉ. अपर्णा पुरोहित ने भी इसी तरह का आरोप लगाते हुए कहा था कि परमबीर सिंह ने उनके पति को बहुत अधिक टॉर्चर किया था।

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यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की गिरफ़्तारी का सबसे ज़्यादा और खुला विरोध शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने किया था। उस समय जब भाजपा के नेता चुप्पी साधे हुए थे, तब बाल ठाकरे, शिवसेना और शिवसेना का मुखपत्र ‘सामना’ और ‘दोपहर का सामना’ साध्वी को लेकर बहुत मुखर थे और एटीएस पर हिंदू आतंकवाद की झूठी थ्यौरी गढ़ने का आरोप भी लगा रहे थे। यह भी अजीब संयोग रहा कि साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर को पीटने और उनसे बदतमीज़ी करने के आरोपी परमबीर सिंह बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे के कार्यकाल में ही मुंबई के पुलिस कमिश्नर बनाए गए।

तीसरी बार उद्धव ठाकरे हिंदू विरोधी कार्य तब करते नज़र आए जब उनकी पुलिस ने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमय मौत के 66 दिन बाद भी कोई एफआईआर दर्ज नहीं की और अभिनेता के पार्थिव शरीर का आनन-फानन में अंतिम संस्कार करवा कर पूरे सबूत को ही नष्ट करवा दिया। इतना ही नहीं उद्धव सरकार सुशांत सिंह की रहस्यमय मौत की सीबीआई जांच का अंतिम समय तक डटकर विरोध करती रही। बहरहाल, जब सुप्रीम कोर्ट के दख़ल से मामला जब तक सीबीआई को सौंपा जाता, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लिहाज़ा, लाख कोशिश के बाद भी उस घटना की बाद में जांच करने वाली सीबीआई के हाथ भी कुछ नहीं लगा और मामला टांय-टांय फिस्स हो गया।

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यहां यह भी ग़ौर करने वाली बात है कि सुशांत सिंह राजपूत के लिए जस्टिस की बात वहीं लोग कर रहे थे, जिन्हें सेक्यूलर विचारधारा के लोग कट्टर हिंदू कहते हैं और ख़ुद सेक्यूलर लोग सुशांत की हत्या या आत्महत्या पर चुप्पी साधे हुए थे। यानी सुशांत सिंह राजपूत को लेकर जहां देश हिंदू और सेक्यूलर जैसे दो खेमे में बंटा हुआ था और सुशांत सिंह को अभिनेता नहीं हिंदू अभिनेता मानकर हिंदू विचारधारा के लोग कह रहे थे कि उनकी हत्या की गई तो दूसरे पक्ष के लोग यह दावा कर रहे थे कि उस अभिनेता ने विशुद्ध रूप से ख़ुदकुशी की थी। इस दौरान पूरे समय शिवसेना हिंदू विरोधी खेमे में खड़ी नज़र आई।

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चौथी बार उद्धव ठाकरे की छवि हिंदू विरोधी तब दिखती नज़र आई, जब बॉलीवुड में हिंदूवादी इमैज वाली अभिनेत्री कंगना राणावत के दफ़्तर को बृहन्मुंबई महानगर पालिका ने उद्धव ठाकरे के अप्रत्यक्ष निर्देश पर गैरक़ानूनी ढंग से ढहा दिया। जिसे 27 नवंबर को अपने आदेश में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी गैरक़ानूनी और पूर्वाग्रहित कार्रवाई मानते हुए बीएमसी को नुक़सान की भरपाई करने का निर्देश दिया। यहां भी एक महिला के ख़ून-पसीने से बनाए गए दफ़्तर को तोड़ने का कार्रवाई सेक्यूलर खेमे के किसी व्यक्ति को अनुचित नहीं दिखी और राग सेक्युलिरिज़्म आलापने वाले लोग डटकर शिवसेना के साथ खड़े रहे। इस मामले को लेकर भी देश में हिंदू-सेक्यूलर होता रहा और शिवसेना गैरहिंदू खेमे की प्रतिनिधि बनकर उभरी।

पांचवी बार शिवसेना सेक्यूलर दल की भूमिका में तब नज़र आई, जब उसकी सरकार हिंदुत्व और हिंदूवादियों के ख़िलाफ़ अक्सर ज़हर उगलने वाले फिल्मकार अनुराग कश्यप पर नवोदित अभिनेत्री पायल घोष के साथ रेप करने का आरोप लगने पर भी कथित ‘नारीवादी पुरुष’ अनुराग कश्यप के ख़िलाफ़ कोई भी कार्रवाई नहीं की। उल्टे पुलिस पायल को ही बार बार वर्सोवा थाने में बुलाती रही। जबकि सुप्रीम कोर्ट 1983 के एक ऐतिहासिक फ़ैसले में कह चुका है कि कोई भी स्त्री किसी पुरुष पर कम से कम बलात्कार का झूठा आरोप कभी लगा ही नहीं सकती, क्योंकि बलात्कार जैसा शब्द उसके जीवन से जुड़ने उसकी पुरुष से ज़्यादा मानहानि होती है। पायल घोष-अनुराग कश्यप के प्रकरण के दौरान भी शिवसेना अनुराग कश्यप के पक्ष में खड़ी दिखी।

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छठवीं बार शिवसेना तब हिंदू विरोधी पार्टी नज़र आई जब उसने खुले तौर पर हिंदुत्व विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाले पत्रकार अर्नब गोस्वामी और उनके चैनल रिपब्लिक टीवी को ख़त्म करने का मास्टर प्लान पर काम करना शुरू किया और टीआरपी जैसे छोटे से मामले में मुंबई के पुलिस कमिश्नर को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए हाज़िर किया, जबकि ब्रॉडकास्ट ऑडिएंस रिसर्च कॉउंसिल यानी प्रसारण दर्शक अनुसंधान परिषद (बार्क) के बार-ओ-मीटर यानी टीआरपी बॉक्स का रख-रखाव करने वाली हंसा रिसर्च ग्रुप प्राइवेट लिमिटेड की ओर से दर्ज कराई गई एफ़आईआर में रिपब्लिक टीवी का नाम नहीं था।

इसमें दो राय नहीं कि देश का एक बड़ा तबक़ा अर्नब गोस्वामी और रिपब्लिक टीवी की पत्रकारिता से बिल्कुल सहमत नहीं है, क्योंकि उनके अनुसार चिल्ला-चिल्ला कर पत्रकारिता करने की नई शैली विकसित करने वाले अर्नब गोस्वामी पत्रकारिता की मर्यादाओं का घनघोर उल्लंघन कर रहे हैं। इसके बावजूद अर्नब गोस्वामी के ख़िलाफ़ जब सीआरपीसी की धारा 111 के तहत “चैप्टर प्रोसिडिंग” (chapter proceedings) की कार्यवाही शुरू की गई तब पूरे देश को प्राइमा फेसाई यही लगा कि महाराष्ट्र सरकार के निर्देश पर मुंबई पुलिस अर्नब गोस्वामी से अपना खुन्नस निकाल रही है, क्योंकि पालघर साधु हत्याकांड और अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध मौत के मामले में सबसे आक्रामक रिपोर्टिंग अर्नब गोस्वामी की थी।

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शिवसेना उस समय चरम सेक्यूलर चोले में नज़र आई जब अर्नब गोस्वामी को सबक सिखाने के लिए उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली महाविकास अघाड़ी सरकार के निर्देश पर राज्य पुलिस ने दो साल पहले बंद हुए एक आत्महत्या के मामले को केवल रिओपन ही नहीं किया, बल्कि पुलिस सुबह छह बजे उनके घर पहुंच गई। पुलिस एक पत्रकार को घसीटते हुए थाने ही नहीं ले गई, बल्कि आठ दिन तक पत्रकार को राज्य की सबसे असुरक्षित जेल में भी रखा। जिस पर देश की सबसे बड़ी अदालत को दख़ल देते हुए यह कहना पड़ा कि देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों की हिफ़ाज़त के लिए देश में सुप्रीम कोर्ट है। किसी राज्य सरकार के ख़िलाफ़ इतनी कठोर टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने कभी नहीं की थी। बहरहाल, चूंकि अर्नब अब एक आरोपी हैं, इसलिए टीवी स्क्रीन से दूर हैं यानी हिंदुओं की आवाज़ उठाने वाले पत्रकार की आवाज़ शिवसेना ने ही बंद कर दी।

बहरहाल, इन घटनाओं पर ग़ौर करें तो यही लगता है कि शिवसेना प्रवक्ता और उद्धव ठाकरे के लेफ़्टिनेंट संजय राऊत ने शिवसेना का पूरी तरह एक कट्टर सेक्यूलर दल के रूप में ट्रांसफॉर्म कर दिया है। अब सेक्यूलर शिवसेना को उसके परंपरागत हिंदूवादी मतदाता स्वीकार करेंगे यह नहीं यह तो बहस और भविष्य का विषय है। हां, शिवसेना को इतना तो लगने ही लगा है कि उसके ढेर सारे मतदाता उसके दूर होते जा रहे हैं। इसीलिए 26 नवंबर को अपने संबोधन में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को कहना पड़ा कि 2022 में होने वाले बीएमसी चुनाव में शिवसेना कांग्रेस-एनसीपी के साथ गठबंधन करेगी।

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इसका मतलब साफ़ है कि शिवसेना में अब अपने बुते मतदाताओं का सामना करने की हिम्मत नहीं रही। अगर शिवसेना बीएमसी चुनाव महाविकास अघाड़ी के साथ लड़ती है तो 227 सदस्यों वाली बीएमसी में उसे कितनी सीटें दी जाएंगी, यह अहम होगा। कांग्रेस-एनसीपी कम से कम आधी सीटें यानी 113-114 सीटें तो उसे कभी नहीं देंगी। इससे बीएमसी चुनाव में शिवसेना में विद्रोह होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि गठबंधन में चुनाव लड़ने से ढेर सारे शिवसेना नेताओं का राजनीतिक भविष्य ही ख़त्म हो सकता है। ऐसे में इतना कहना काफ़ी होगा कि मजबूरी या सत्ता के लिए शिवसेना ने भले सेक्यूलर चोला पहन लिया है, इसे चोले के साथ उसकी राहें बाल ठाकरे के दौर से अधिक कठिन होने वाली हैं।

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