कोई उनसे कह दे हमें भूल जाएं…

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कालजयी गायक मुकेश की पुण्यतिथि पर विशेष

आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें, कोई उनसे कह दे हमें भूल जाएं… मुकेश के गाए इस गाने को सुनते हुए उनकी आवाज़ में दर्द की गहराई और उसकी टीस शिद्दत से महसूस की जा सकती है। इसमें दो राय नहीं कि उनकी आवाज़ में दर्द को भी सुकून भरा ठिकाना मिलता था। यही कारण है कि मुकेश के गाए उदासी भरे गीत इतने अधिक लोकप्रिय हुए कि उन्हें दर्द की आवाज़ ही मान लिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि हर दिल को छू लेने वाले दर्दीले नगमों से पहचान बनाने वाले मुकेश आज भी करोड़ों संगीत प्रेमियों के दिल में बसे हुए हैं।

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सुख-दुख जीवन के दो पहलू होते हैं। दुख की घड़ी में दर्द ज़िंदगी का अनिवार्य हिस्सा होता है। कभी-कभी दर्द इस कदर तक बढ़ता है कि कुछ दर्द भरा सुनने का मन करता है। मुकेश के गले से जो दर्द निकलता है, उसे सुनने पर महसूस होता है कि वह हमारे बहुत क़रीब से हमें छूता हुआ गुज़रता रहा है। 1969 में आई ‘विश्वास’ फ़िल्म में गुलशन बावरा के गाने चांदी की दीवार ना तोड़ी, प्यार भरा दिल तोड़ दिया… में कुछ ऐसे ही दर्द की इंतहां मौजूद है। कल्याणजी आनंदजी की धुन और मुकेश की आवाज़ के चलते यह गाना दर्द के मारों की पीड़ा को बड़ी शिद्दत से उभारता है।

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किसी कालजयी गायक की सबसे बड़ी ख़ासियत यह होती है कि उसके गाने सुनते हुए आप भी साथ-साथ ख़ुद गुनगुनाने लगें। मुकेश इस कसौटी पर एकदम खरे उतरते हैं। फ़िल्म ‘कभी-कभी’ का साहिर लुधियानवी का लिखा मैं पल दो पल का शायर हूं गाना ख़य्याम की धुन और मुकेश की आवाज़ पाकर इतना सहज हो गया कि यह गाना सुनकर हर आदमी ख़ुद इसे गुनगुनाने लगता है। 1965 में आई गाना आनंदजी वीरजी शाह की धुन और मुकेश की आवाज़ में रिकॉर्ड ‘पूर्णिमा’ फ़िल्म का गुलज़ार का लिखा गाना तुम्हें ज़िंदगी के उजाले मुबारक, अंधेरे हमें आज रास आ गए हैं… सीधे दिल को छू लेता है।

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मुकेश के गाए गानों में सबसे बड़ी ख़ूबी यह रही है कि उन्हें ऐसे कालजयी गीतकारों के बोल गाने को मिले जिनमें हताशा और दिलासा दोनों हैं। अपने गायन से वह निराशा में भी उम्मीद जगाते हैं। मसलन, जिंदगी हमें तेरा ऐतबार न रहा… के ज़रिए वह गहरी हताशा की तरफ़ ले जाते हैं, लेकिन ‘गर्दिश में तारे रहेंगे सदा…’ के माध्यम से बहुत-कुछ ख़त्म होने के बाद भी थोड़ा बहुत बचा रहने की दिलासा भी देते हैं। मुकेश की आवाज़ आम कद्रदानों की भावनाओं को सबसे बेहतर ढंग से व्यक्त करती है और यही उनको आज भी उतना ही लोकप्रिय बनाए हुए है।

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मुंबई में मुकेश के फ़िल्मी सफ़र का आरंभ 1941 में ‘निर्दोष’ फ़िल्म में बतौर अभिनेता हुआ। इसमें उन्होंने बतौर गायक नीलकांत तिवारी का लिखा गाना दिल ही बुझा हुआ हो तो फ़स्ल-ए-बहार क्या… अशोक घोष की धुन पर गाया गाया था। हालांकि बतौर गायक उन्हें चर्चा 1945 में रिलीज फ़िल्म ‘पहली नज़र’ से मिली। मुकेश ने इसमें दिल जलता है तो जलने दे… गाया। इसमें स्वर सम्राट कुंदललाल सहगल का प्रभाव साफ़ नज़र आता है। सहगल के ज़बरदस्त फैन मुकेश उनकी आवाज़ की नक़ल करते थे। उन दिनों सहगल का संगीत क्षेत्र में एकाधिकार था। जब सहगल ने मुकेश की आवाज़ में यह गाना सुना तो समझ नहीं पाए कि यह गीत उन्होंने गाया है या किसी और ने। सहगल को मुकेश की आवाज़ बहुत पसंद आई और उनके गाने के अंदाज़ और सुरों पर नियंत्रण से वह ख़ासे प्रभावित हुए।

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बहरहाल, 1940 के दशक में अपने मधुर गीतों और सुरीली आवाज़ से अलग पहचान बनाने वाले मुकेश ने अपनी अलग गायन शैली विकसित की। ‘पहली नज़र’ का गाना उनके गॉडफ़ादर अभिनेता मोतीलाल पर फिल्माया गया था। पहले गाने को सुनकर लोगों की धारणा बनने लगी कि मुकेश गाने को बहुत सादे और सरल ढंग से गाते हैं। उसके बाद वह गायन के लंबे सफ़र पर चल पड़े। उनकी आवाज़ उत्तरोत्तर निखरती गई। वह गीतों के ज़रिए लोगों के जीवन में पैदा होने वाली उदासी और दर्द को सबसे असरदार ढंग से साझा करने लगे।

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1950 के दशक में नौशाद के साथ उन्होंने एक के बाद एक कई सुपरहिट गाने दिए। उस दौर में उनकी आवाज़ में सबसे ज़्यादा गीत दिलीप कुमार पर फ़िल्माए गए। जल्द ही मुकेश शोमैन राजकपूर के पसंदीदा गायक और दोस्त बन गए। उनकी दोस्ती कभी ख़त्म ही न हुई। उन्हें राजकपूर की आवाज़ कहा जाने लगा। ख़ुद राजकपूर कहते थे, “मैं तो बस शरीर हूँ मेरी आत्मा तो मुकेश हैं।” साठ के दशक के आख़िरी दौर में मुकेश शिखर पर पहुंच गए। 1959 में रिलीज़ ‘अनाड़ी’ फ़िल्म के गाने सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी समेत यहूदी और मधुमती के गानों ने उनकी गायकी को एक नया मुकाम दिया। जिस देश में गंगा बहती है के गाने ने तो उन्हें हर देशभक्त के दिल में स्थान दिलाया।

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1960 के दशक की शुरुआत मुकेश ने कल्याणजी-आनंदजी के साथ डम-डम डीगा-डीगा गाया, तो नौशाद के साथ मेरा प्यार भी तू है जैसे सुपरहिट गाने दिए। सचिन देव बर्मन के नगमों और राज कपूर की ‘संगम’ में शंकर-जयकिशन के साथ तैयार गाने बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं और दोस्त दोस्त ना रहा प्यार प्यार ना रहा तो रिलीज से पहले हर संगीतप्रेमी की ज़ुबान पर थे। वह युग मुकेश का युग था,क्योंकि तब उनका करियर अपने चरम पर था। उस दौर के अभिनेताओं के मुताबिक उनकी गायकी भी बदलती रही। तब तक वह हर बड़े सितारे की आवाज़ बन चुके थे। उन्होंने सुनील दत्त और मनोज कुमार के लिए भी कई गाने गाए। वह ज़्यादातर गाने कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और राहुल देव बर्मन जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ गा रहे थे।

राजकपूर जब 1970 में ‘मेरा नाम जोकर’ बना रहे थे तो, हसरत जयपुरी ने जाने कहां गए वो दिन… जैसा गाना लिख दिया कि इसके लिए गायक का चयन करते समय राज असमंजस में पड़ गए। वह फ़िल्म को लेकर कितने संजीदा थे, इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने फ़िल्म के गाने हसरत के अलावा शैलेंद्र और नीरज से भी लिखवाए। मुकेश इसके साथ न्याय कर पाएंगे, इस पर उन्हें संदेह था। उनका मानना था कि दर्द में डूबे स्वर कुछ और होते हैं और किसी की भर चुके ज़ख्म याद करने की पीड़ा कुछ और होती है। यह गाना उसी तरह पीड़ा को सुर देता है। बाद में शंकर-जयकिशन के कहने पर वह मुकेश के नाम पर ही राजी हो गए। मुकेश के स्वर में इस गाने को सुनकर लगता है किसी दूसरी आवाज़ में यह मुमकिन ही नहीं था। शैलेंद्र का लिखा जीना यहां मरना यहां… गाना भी मुकेश की आवाज़ पाकर अमर हो गया।

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उसी साल ‘पहचान’ फ़िल्म का गोपालदास नीरज का लिखा गाना बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं, आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं… हर आदमी गुनगुनाने लगा था। इस गाने का क्रेज़ आज भी उतना ही है। उस दौर में भी मुकेश ने हिंदी सिनेमा को कई कर्णप्रिय गाने दिए। फ़िल्म ‘धरम करम’ का एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल… और फ़िल्म ‘आनंद’ के योगेश के लिखे गाने कहीं दूर जब दिन ढल जाए, सांझ की दुल्हन बदन चुराए… आज भी उतने ही चाव से सुने जाते हैं। साल 1976 में यश चोपड़ा की फ़िल्म ‘कभी कभी’ के शीर्षक गीत कभी-कभी मेरे दिल में ख़याव आता है तो आज भी उतना ही लोकप्रिय है।

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फ़िल्म इंडस्ट्री में कुछ नया करने की चाह ने मुकेश को फ़िल्म निर्माता भी बना दिया। उन्होंने 1951 में ‘मल्हार’ फ़िल्म बनाई। जो कुछ ख़ास नहीं चली। इसी दौरान मुकेश को अभिनय का अपना शौक पूरा करने का अवसर मिला। बतौर अभिनेता 1953 में रिलीज़ ‘माशूका’ में नज़र आए, लेकिन फ़िल्म असफल हुई। अभिनय की दबी इच्छा को पूरा करने के लिए उन्होंने 1956 में ‘अनुराग’ भी बनाई। लेकिन बॉक्स ऑफिस पर वह भी फ्लॉप रही। बतौर अभिनेता-निर्माता उन्हें बिल्कुल सफलता नहीं मिली। इसके चलते वह आर्थिक तंगी में भी फंस गए। लिहाज़ा, गलतियों से सबक लेते हुए वह फिर से सुरों की महफिल में लौट आए और दोबारा गायन पर ध्यान देना शुरू किया।

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फ़िल्मफेयर पुरस्कार 1960 में शुरू किया गया और संयोग से पहला फ़िल्मफेयर पुरस्कार मुकेश को ही मिला। 1959 में बनी राजकपूर-नूतन अभिनीत ऋषिकेश मुखर्जी की ‘अनाड़ी’ के शैलेंद्र के लिखे सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी… गीत के लिए मिला। मुकेश को दूसरी बार फ़िल्मफेयर पुरस्कार 1970 में आई मनोज कुमार-बबिता अभिनीत सोहनलाल कंवर की फिल्म ‘पहचान’ के वर्मा मलिक के लिखे सबसे बड़ा नादान… के लिए दिया गया। तीसरी बार मुकेश को फ़िल्मफेयर पुरस्कार उनकी 1972 में रिलीज सोहनलाल कंवर की ही फ़िल्म ‘बेइमान’ के गाने जय बोलो बेइमान की के लिए दिया गया। फिल्म में मनोज कुमार के साथ राखी मुख्य किरदार में थीं। मुकेश को चौथी बार फ़िल्मफेयर पुरस्कार 1976 में प्रदर्शित अमिताभ बच्चन-राखी अभिनीत यश चोपड़ा की फ़िल्म ‘कभी-कभी’ के कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है… गीत के लिए दिया गया। 1974 में रिलीज़ फ़िल्म ‘रजनीगंधा’ के गाने कई बार यूं भी देखा है… के लिए मुकेश को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से भी नवाज़ा गया।

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संगीत के जानकार मानते हैं कि मुकेश के स्वरों में अलग तरह की मौलिकता और सहजता थी। उनकी यही ख़ूबी उनकी सबसे बड़ी धरोहर थी। उनके गायन में सहजता ओढ़ी हुई नहीं थी। यह उनके व्यवहार में भी शामिल रही। इसकी एक नहीं अनेक मिसालें हैं। एक बार एक लड़की बीमार थी। उसने कहा कि यदि मुकेश गाना गाकर सुनाएं तो वह ठीक हो जाएगी। उसकी मां ने इसे नामुमकिन बताया। उसका तर्क था कि मुकेश बहुत बड़े गायक हैं, उन्हें गाना सुनाने का समय कहां। अगर किसी तरह उन्हें बुलाएंगे तो वह मोटी फीस की मांग कर सकते हैं। संयोग से इलाज करने वाले डॉक्टर की मुकेश से मुलाकात हो गई। उन्होंने उन्हें लड़की की इच्छा के बारे में बताया। मुकेश दूसरे दिन ही अस्पताल गए और लड़की को गाना गाकर सुनाया और कोई फ़ीस भी नहीं ली। संयोग से लड़की बीमारी को हराकर कुछ दिन बाद घर लौट आई।

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एक रेडियो प्रोग्राम में गायक महेंद्र कपूर ने मुकेश से जुड़ा संस्मरण साझा किया। उनके बेटे के स्कूल के प्रिंसिपल ने अनुरोध किया कि स्कूल के जलसे में मुकेश को बुलाएं। महेंद्र को तब ‘नीले गगन के तले’ के लिए फ़िल्मफेयर सम्मान मिला था। मुकेश बधाई देने उनके घर पहुंचे, तो महेंद्र ने उनसे बात की और पूछा कि स्कूल के जलसे में जाने का कितने पैसे लेंगे। मुकेश ने सहमति जताते हुए कहा, ‘मैं तीन हज़ार रुपए लेता हूं।’ मुकेश जलसे में गाना गाया और बिना रुपए लिए वापस हो लिए। अगले दिन उन्होंने बताया कि बच्चों के साथ बहुत मज़ा आया। तब महेंद्र ने पूछा कि रुपए तो लिए ही नहीं। तो मुकेश बोले, “मैंने कहा था कि तीन हज़ार लेता हूं पर यह नहीं कहा था कि तीन हज़ार लूंगा।”

संगीत जगत के बेताज़ बादशाह मुकेश ने अपनी दिलकश आवाज़ से भारतीय सिनेमा जगत में वह मुकाम हासिल किया, जहां तक पहुंचना बहुत मुश्किल होता है। उनका भी दिल बेहद मासूम था, इसीलिए उनके बारे में कहा जाता है कि जितनी संवेदनशीलता उनके गाए गीतों में नज़र आती थी, असल ज़िंदगी में भी वह जीवन भर उतने ही संवेदनशील थे। मुकेश ने अपने करियर के दौरान ‘सरस्वती चंद्र’, ‘बरसात’, ‘आवारा’, ‘श्री 420’, और ‘छलिया’ समेत अनगिनत फिल्मों में सुपरहिट गाने गाए। उनके गाए दुनिया बनाने वाले…, चंदन सा बदन…, राम करे ऐसा हो जाए… जैसे गाने आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं।

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दिल्ली में एक कायस्थ परिवार में 22 जुलाई 1923 को जन्मे मुकेश का पूरा नाम मुकेश चंद माथुर था। सिनेमा जगत में वह केवल मुकेश के नाम से पहचाने गए। पिता जोरावर चंद माथुर लोक निर्माण विभाग में अभियंता थे और माता चांदरानी माथुर गृहणी। उन्हें बचपन में गायन के अलावा घूमना और घुड़सवारी करना पसंद था। उनकी बहन सुंदर प्यारी ने एक संगीत अध्यापक से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू की। वह बड़े चाव से बहन को गाते हुए सुना करते थे। बहन को संगीत की तालीम लेते देखकर उनके मन में भी गायन के प्रति रुझान बढ़ा और धीरे धीरे वह भी संगीत सीखने लगे। तब रियाज़ अपनी बहन के साथ घऱ पर ही करते थे।

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मुकेश की आवाज़ शुरू से अच्छी थी। उनके ही दूर के रिश्तेदार अभिनेता मोतीलाल ने तब पहचाना जब मुकेश बहन की शादी में गाना गा रहे थे। उस समय मुकेश दिल्ली में लोक निर्माण विभाग में क्लर्क थे। मोतीलाल ने उनकी नौकरी छुड़वा दी और उन्हें मुंबई लेकर आ गए। मुकेश उनके ही घर में रहने लगे। मोतीलाल ने उनके लिए तब के मशहूर संगीतज्ञ पंडित जगन्नाथ प्रसाद के सानिध्य में संगीत की तालीम लेने और रियाज़ करने का इंतज़ाम कर दिया। मुकेश संगीत का रियाज़ तो कर रहे थे, लेकिन उनकी दिली तमन्ना फ़िल्मों में बतौर अभिनेता डेब्यू करने की थी।

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अभिनेता मोतीलाल ने मुकेश की सिर्फ़ करियर बनाने में ही मदद नहीं की, बल्कि शादी कराने में भी अहम भूमिका अदा की। मुकेश के दिल में सरला त्रिवेदी रायचंद बसी थीं। सरला रईस घर से थीं और उनके घरवाले नहीं चाहते थे कि मुकेश जैसे साधारण गायक से उनकी शादी हो। उस समय मुकेश ने फिल्मों में गाना शुरू ही किया था, सो कोई ख़ास पहचान नहीं मिली थी। लिहाज़ा, मोतीलाल के कहने पर मुकेश और सरला दिल्ली से मुंबई भाग गए। वहां मोतीलाल ने उनकी शादी 22 जुलाई, 1946 को मुकेश के 23वें जन्मदिन पर एक मंदिर में करवा दी और दोनों साथ रहने लगे। उनके दो बोटे नितिन मुकेश, मोहनीश मुकेश और तीन बेटियां- रीता, नलिनी, नम्रता (उर्फ़ अमृता) हुईं।

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हिंदी सिनेमा के संगीत को हर दिल की छू लेने वाले सुपरहिट सेंटिमेंटल गीतों की सरगम देने वाले मुकेश ने आज ही के दिन दुनिया को अलविदा कह दिया था। उन्होंने अपना आख़िरी गाना अपने अज़ीज़ दोस्त राजकपूर की फ़िल्म ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ में ही गाया। लेकिन इस फ़िल्म के रिलीज़ होने से दो साल पहले ही 27 अगस्त, 1978 को दिल का दौरा पड़ने से उनका अमेरिका में निधन हो गया। दरअसल, वह चंचल निर्मल शीतल… की रिकार्डिंग पूरी करने के बाद अमरिका के डेट्रॉएट शहर में एक कंसर्ट में शिरकत करने के लिए गायिका लता मंगेशकर और पुत्र नितिन मुकेश के साथ गए थे। लेकिन वहां से वह लौटे ही नहीं। बहरहाल, संगीत कंसर्ट को लता और नितिन ने पूरा किया। मुकेश के गाए तीन गाने हम दोनों मिलके कागज पे…, हमको तुमसे हो गया है प्यार…, सात अजूबे इस दुनिया के… जैसे गाने उनके निधन के बाद रिलीज़ हुए।
उस महान गायन को सादर श्रद्धाजलि!

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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