भारत का ‘ब्रह्मास्त्र’ सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty)

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
केवल ताक़त को सलाम करने वाली यह दुनिया सहिष्णुता या शांति की बात करने वाले को कायर और कमज़ोर मानती रही है। इसीलिए सहिष्णुता और शांति का राग आलापने वाले भारत की इमैज सॉफ़्ट नेशन की बन गई है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नज़र में भारत ऐसा लाचार देश है, जो अपने निर्दोष नागरिकों की हत्या करने वाले आतंकवादियों और उन्हें पनाह देने वालों के ख़िलाफ़ कोई निर्णायक एक्शन नहीं ले पाता। एक्शन लेने की जगह भारत हत्यारों के ख़िलाफ़ सबूत पेश करता है। देश की इस नीति पर पूरी दुनिया हंसती है और सहानुभूति जताती है। सहिष्णुता और शांति की नीति के चलते ही भारत जैसा विशाल देश सन् 1947 में विभाजन के बाद से पाकिस्तान जैसे छोटे शरारती देश की हरकतों से परेशान है।

भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस्लामाबाद की हरकतों की मय सबूत शिकायत करता है, लेकिन किसी के कान पर जूं नहीं रेंगता। कहते हैं, “प्रमाण पर्याप्त नहीं हैं। लिहाज़ा, एक्शन नहीं लिया जा सकता।” लिहाज़ा, भारत सक्षम और समर्थ होने के बावजूद दुनिया की नज़र में बेचारा है। यह कमज़ोर बिल पावर वाली लीडरशिप के कारण है। भारतीय नेता कश्मीर में आतंकवाद के खात्मे के लिए पाकिस्तान पर निर्भर हैं। उन्हें अब भी लगता है कि पाकिस्तान मान जाएगा। दूसरी ओर देश का हर नागरिक, ख़ासकर शहरी, इस बात को लेकर तनाव में रहता है कि पाकिस्तान पोषित सिरफिरे आतंकवादी जिहाद के नाम पर कब और कहां बम न फोड़ दें या सशस्त्र हमला न कर दें और सैकड़ों मासूमों की जान न ले लें। हैरानी वाली बात यह कि देश के पास ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिसे इस्तेमाल करके शरारती पाकिस्तान को सबक सिखा सकता है और उसे घुटने टेकने पर मजबूर कर सकता है। वह अचूक ब्रह्मास्त्र है, इंडस वॉटर ट्रीटी यानी सिंधु जल संधि, जो इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन ऐंड डेवलपमेंट (अब विश्व बैंक) की मध्यस्थता में 19 सितंबर 1960 को हुई। इंडस वॉटर ट्रीटी पर कराची में प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब ख़ान ने हस्ताक्षर किए थे। तब से भारत सिधु वॉटर ट्रीटी यानी सिंधु जल संधि को ढो रहा है।

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दरअसल, भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान दक्षिण पंजाब में सिंधु नदी घाटी पर बड़े नहर का निर्माण किया गया था। इससे उस इलाके को इसका इतना लाभ मिला कि बाद में वह दक्षिण एशिया का प्रमुख कृषि क्षेत्र बन गया। विभाजन जब पंजाब को विभाजित किया गया तो इसका पूर्वी भाग भारत में और पश्चिमी भाग पाकिस्तान में चला गया। उस दौरान सिंधु नदी घाटी और इसके विशाल नहरों को भी विभाजित कर दिया गया। समय सिंधु और उसकी सहायक नदियों के हैडवर्क्स भारतीय क्षेत्र में आ गए थे और ज़्यादातर सिंचित इलाक़ा पाकिस्तान में चला गया था। इस सिंचाई व्यवस्था का ढांचा सिंधु और उसकी सहायक नदियों रावी, व्यास, सतलुज पर खड़ा किया गया था। सिंधु जलतंत्र की शेष नदियां झेलम और चेनाब पर सिंचाई व्यवस्था का ढांचा अविकसित ही था। भारत इन नदियों पर नदी तटीय अधिकारों का ऊपर वाला हिस्सेदार और पाकिस्तान नीचे वाला हिस्सेदार था। लिहाज़ा, पानी के लिए पाकिस्तान पूरी तरह भारत पर निर्भर था। जल बहाव को बनाए रखने के उद्देश्य से पूर्व और पश्चिम पंजाब के चीफ़ इंजीनियरों के बीच 20 दिसंबर 1947 को एक समझौता हुआ, जिसके तहत भारत को 31 मार्च 1948 तक पाकिस्तान को देते रहना तय हुआ।

1 अप्रैल 1948 को जब समझौता ख़त्म हुआ तो भारतीय पंजाब में असिंचित क्षेत्रों के लिए सिंचाई व्यवस्था करने के लिए भारत ने पाकिस्तान की ओर जाने वाली पानी को रोक दिया था। भारत के इस कदम के कई कारण बताए गए जिसमें एक था कि भारत कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहता था। भारत के इस क़दम से पाकिस्तानी पंजाब में पानी की भयानक तंगी के हालात पैदा हो गए और पाकिस्तानी पंजाब की 17 लाख एकड़ ज़मीन पर हालात ख़राब हो गए। केवल 30 दिन में वहां सूखा पड़ने लगा। पाकिस्तान भारत से रहम की भीख मांगने लगा। लिहाज़ा, रहम करते हुए 30 अप्रैल 1948 को हुई सहमति के बाद भारत पानी की आपूर्ति जारी रखने पर राज़ी हो गया और पानी की आपूर्ति बहाल कर दिया गया। इसके बाद 4 मई 1948 को इस मुद्दे पर बातचीत के लिए सम्मेलन बुलाया गया। इस सम्मेलन में हुए समझौते में पाकिस्तान ने भारतीय पंजाब के असिंचित क्षेत्रों के विकास के लिए पानी की ज़रूरत की बात स्वीकार की और पाकिस्तानी पंजाब के लिए पानी धीरे-धीरे कम करने पर सहमति बनी किंतु यह समाधान स्थाई साबित नहीं हुआ। पाकिस्तान ने मामले को अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण में ले जाने की धमकी दी, जिसे भारत ने अस्वीकार कर दिया।

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1951 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने टेनसी वैली अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख डेविड लिलियंथल को भारत आमंत्रित किया। लिलियंथल पाकिस्तान भी गए और वापस अमरीका लौटकर उन्होंने सिंधु नदी घाटी के बंटवारे पर एक लेख लिखा। ये लेख विश्व बैंक प्रमुख और लिलियंथल के दोस्त डेविड ब्लैक ने भी पढ़ा और ब्लैक ने भारत और पाकिस्तान के प्रमुखों से इस बारे में संपर्क किया और बातचीत से इस मुद्दे के समाधान के लिए मध्यस्थता का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव को दोनों देशों ने इन तीन सिद्धांतों के आधार पर स्वीकार किया। फिर शुरू हुआ दोनो पक्षों के बीच बैठकों का सिलसिला। तीन बिंदुओं पर सहमति बनी। पहला, सिंधु जल तंत्र के जल संसाधन वर्तमान और भविष्य की दोनों देशों की ज़रूरतों के लिए पर्याप्त हैं। दूसरा, पूरे सिंधु जल तंत्र क्षेत्र को इकाई मानकर, सहयोग से जल संसाधनों को इस तरह विकसित किया जाए ताकि पूरे सिंधु जल तंत्र क्षेत्र का आर्थिक विकास संभव हो। तीसरा, सिंधु जल तंत्र क्षेत्र के जल संसाधनों के विकास और उपयोग की समस्या को राजनीतिक धरातल से अलग हटकर व्यावहारिक धरातल पर हल किया जाए।

इसके बाद वार्ता का दौर चलता रहा और 1960 आते-आते सहमति बनी। अंततः 19 सितंबर 1960 को सिंधु जल समझौते पर कराची में हस्ताक्षर हुए। इस समझौते में प्रस्तावना के अलावा 12 धाराएं और ए से एच तक परिशिष्ट शामिल हैं। धारा 2 के तहत पूर्वी नदियों रावी, व्यास और सतलुज का सारा पानी भारत के हिस्से में दिया गया। इसके अनुसार सीमावर्ती क्षेत्र में जहां सतलुज और रावी पाकिस्तान में पूर्णतः दाखिल होने से पहले सीमा के साथ-साथ बहती हैं। इस क्षेत्र में पाकिस्तान इन नदियों से घरेलू और गैर उपभोगीय प्रयोग के आलावा ज़रा भी पानी लेने का हक़दार नहीं होगा। रावी और सतलुज के पाकिस्तान में पूर्ण प्रवेश के बाद पाकिस्तान इन नदियों के पानी की उपलब्ध मात्रा का प्रयोग कर सकेगा, किंतु वह कोई मात्रात्मक दावा नहीं कर सकेगा। सतलुज का पाकिस्तान में पूर्ण प्रवेश स्थल सुलेमान के ऊपर ‘नया हस्ताबंद’ और रावी के मामले में पाकिस्तान में पूर्ण प्रवेश स्थल ‘बीआरबीडी’ साइफन के करीब तीन किलोमीटर ऊपर माना गया।

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जब तक पाकिस्तान इन पूर्वी नदियों पर अपनी निर्भरता समाप्त करने के लिए, अपने हिस्से की पश्चिमी नदियों, सिंधु, झेलम और चेनाब से सिंचाई व्यवस्था का ढांचा विकसित नहीं कर लेता, तब तक भारत अपने हिस्से के पानी में से विशेष छूट देकर पाकिस्तान को पानी देता रहेगा, यह छूट अवधि 1 अप्रैल 1960 से 31 मार्च 1970 तक होगी। किसी भी सूरत में यह छूट अवधि 31 मार्च 1973 के आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। धारा 3 के तहत पश्चिमी नदियों, सिंधु, झेलम और चेनाब पर पाकिस्तान को पूरे पानी का हक़ दिया गया, भारत इन नदियों से केवल सीमित कार्यों के लिए पानी का सीमित प्रयोग कर सकता था। मसलन, घरेलू प्रयोग के लिए, गैरउपभोगीय प्रयोग के लिए, परिशिष्ट सी के तहत 7 लाख एकड़ में सिंचाई के लिए और परिशिष्ट डी के तहत जल विद्युत निर्माण के लिए।

फ़िलहाल  सिंधु जल संधि के तहत भारत अपनी छह प्रमुख नदियों सिंधु, झेलम, चिनाब, सतलुज, व्यास और रावी का अस्सी (80.52) फ़ीसदी से ज़्यादा यानी 167.2 अरब घन मीटर जल हर साल पाकिस्तान को देता है। सिंधु, झेलम और चिनाब तो पूरी की पूरी पाकिस्तान को भेंट कर दी गई हैं। यह दुनिया की इकलौती संधि है, जिसके तहत नदी की ऊपरी धारा वाला देश निचली धारा वाले देश के लिए अपने हितों की बलि दे देता है। इतनी उदारता दुनिया की किसी दूसरी संधि में नहीं मिलती है। इसीलिए विश्व इतिहास में इस संधि को सबसे उदार जल बंटवारा कहा जाता है। पाकिस्तान की 80 फ़ीसदी खेती यानी 2.6 करोड़ एकड़ ज़मीन की सिंचाई इन्हीं छह नदियों के पानी से होती है।

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सबसे हैरान करने वाली बात है कि इस बेजोड़ संधि का लाभार्थी देश पाकिस्तान भारत की उदारता का जवाब आतंकवादी हरकतों से देता है। इसीलिए बहुत से लोग इस समझौते को भारत के हित में न्यायपूर्ण नहीं मानते हैं। क्योंकि संधि के अस्तित्व में आने के बाद लाभार्थी पाकिस्तान जलदाता देश भारत के साथ दो बार घोषित और एक बार अघोषित तौर पर युद्ध छेड़ चुका है। इतना ही नहीं, सीमा पर गोलीबारी और घुसपैठ हमेशा करता है। भारत के पानी पर निर्भर यह देश जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों को शह और मदद देता है। उधर पानी पर वैश्विक झगड़ों पर किताब लिख चुके ब्रह्म चेल्लानी मानते हैं, “भारत वियना समझौते के लॉ ऑफ़ ट्रीटीज़ की धारा 62 के अंतर्गत इस आधार पर संधि से पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान आतंकी गुटों का इस्तेमाल उसके खिलाफ़ कर रहा है। ख़ुद अंततराष्ट्रीय न्यायालय भी कह चुका है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन होता है तो किसी भी संधि को रद्द किया जा सकता है।”

कहने का मतलब किसी देश के संसाधन पर दूसरे देश का अधिकार तभी तक माना जाता है, जब तक लाभार्थी देश का रवैया दोस्ताना हो। चूंकि भारत के साथ पाकिस्तान का रवैया शत्रुतापूर्ण है, ऐसे में अपनी नदियों का पानी इस्लमाबाद को देने का कोई तुक नहीं दिखता। लिहाज़ा, सिंधु जल संधि के तहत भी भारत को पाकिस्तान को पानी देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इन परिस्थितियों में भारत को अपने इस ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल करना चाहिए। पाकिस्तान के सामने पानी देने के लिए स्पष्ट रूप से तीन शर्त रखनी चाहिए। पहली, आतंकियों को समर्थन बंद करे। दूसरी, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के आतंकी शिविर नष्ट करे और शिविर नष्ट करने की की पुष्टि करने की इजाज़त भारतीय एजेंसियों को दे। तीसरी, भारतीय अदालतों में वांछित पाकिस्तान हाफिज़ सईद, ज़कीउररहमान लखवी (दोनों लश्करे तैयबा), मौलाना मसूद अज़हर (जैश-ए-मोहम्मद), सैयद सलाउद्दीन (हिज़बुल मुजाहिद्दीन), भटकल बंधु (इंडियन मुजाहिद्दीन) और दाऊद इब्राहिम एवं टाउगर मेमन (1993 मुंबई बम ब्लास्ट के आरोपी) को पाकिस्तान मुक़दमा चलाने के लिए भारत को सौंपे।

अगर पाकिस्तान तीनों शर्तें माने तभी उसे सिंधु, झेलम, चिनाब, सतलुज, व्यास और रावी का पानी देना चाहिए अन्यथा पानी का इस्तेमाल पनबिजली परियोजनाओं और सिंचाई के लिए करनी चाहिए। यक़ीनी तौर पर पानी का प्रवाह कम होने से पाकिस्तान की खेती नष्ट हो जाएगी, क्योंकि पाकिस्तान की 80 फ़ीसदी खेती इन छह नदियों के पानी पर निर्भर है। यह नुकसान सहन करना पाकिस्तान के बस में नहीं है। भारत से पर्याप्त पानी न मिलने से पूरे पाकिस्तान में हाहाकार मच जाएगा। इससे इस्लामाबाद की सारी अकड़ ख़त्म हो जाएगी और वह न तो आतंकवादियों का समर्थन करने की स्थिति में होगा और न ही कश्मीर में अलगाववादियों का। ज़ाहिर है सिधु जल संधि का पाकिस्तान शुरू से बेज़ा फ़ायदा उठाता रहा है। आतंकवाद को समर्थ देने के अलावा इस्लामाबाद बगलिहार परियोजना के लिए भारत को ख़ासी मशक्कत करनी पड़ी। किशन-गंगा, वूलर बैराज और तुलबुल परियोजनाएं अधर में लटकी हैं। पाकिस्तान बगलियार और किशनगंगा पावर प्रोजेक्ट्स समेत हर छोटी-बड़ी जल परियोजना का अंतरराष्ट्रीय मंच पर विरोध करता रहा है। पाकिस्तान का मुंह बंद करने के लिए एक मात्र विकल्प है, सिधु जल संधि का ख़ात्मा।

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सिधु जल संधि भंग करने के बाद पूरी संभावना है पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विलाप करेगा। निश्चित तौर पर वह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का भी दरवाज़ा खटखटाएगा। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय या अंतरराष्ट्रीय संस्थान को बताने के लिए भारत के पास पर्याप्त कारण और आधार है। भारत इस संधि को निरस्त किए बिना रिपेरियन कानून के तहत अपनी नदियों के पानी पर उस तरह अपना अधिकार नहीं जता सकता, जैसा स्वाभाविक रूप से जताना चाहिए। फिर 2002 में जम्मू-कश्मीर की विधान सभा आम राय से प्रस्ताव पारित कर सिंधु जलसंधि को निरस्त करने की मांग कर चुकी है। राज्य की सबसे बड़ी जनपंचायत के इस सीरियस फ़ैसले का सम्मान किया जाना चाहिए।

सन् 2005 में पूरे मामले पर रिसर्च करने वाले इंटरनेशन वॉटर मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट (आईडब्ल्यूएमआई) और टाटा वॉटर पॉलिसी प्रोग्राम (टीडब्ल्यूपीपी) जैसे संस्थान भी अपनी रिपोर्ट में भारत को सिंधु जलसंधि को रद करने की सलाह दे चुका हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सिंधु जलसंधि से केवल जम्मू-कश्मीर को हर साल 65000 करोड़ रुपए की हानि होती है। “इंडस वॉटर ट्रीटी: स्क्रैप्ड ऑर अब्रोगेटेड” शीर्षक वाली रिपोर्ट में बताया गया है कि इस संधि के चलते घाटी में बिजली बनाने और कृषि संभावनों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक घाटी में 20000 मेगावाट से भी ज़्यादा बिजली पैदा करने की क्षमता है, लेकिन सिधु जलसंधि इस राह में रोड़ा बनी हुई है।

हर साल देश के कई हिस्सों में सूखा पड़ता है। वहां पानी की बड़ी ज़रूरत पड़ती है। ऐसे में भारत अपने राज्यों को पानी क्यों न दे। जो देश ख़ुद पानी के संकट से दो चार हो, वह दूसरे देश, ख़ासकर जो देश दुश्मनों जैसा काम करे, उसे पानी देने की बाध्यता नहीं। अगर भारत जम्मू-कश्मीर में तीनों नदियों पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बांध बना दे और बिजली बनाने के बाद बांध से निकले पानी का सिंचाई के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दे, तब निश्चित तौर पर पाकिस्तान को कम पानी मिलने लगेगा और वह देश घुटने टेक देगा। पाकिस्तान को मिसाइल, तोप या बम से मारने की जरूरत नहीं, उसे मारने के लिए सिंधु जलसंधि ही पर्याप्त है।

सिंधु और सतलुज का उद्मग स्थल तिब्बत है, लेकिन दोनों नदियां भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद ही वृहद रूप अख़्तियार करती हैं। इसी तरह रावी, ब्यास, झेलम, सिंधु और चिनाब नदियों का आरंभिक बहाव भारतीय इलाके से है। इस हिसाब से रिपेरियन सिद्धांत के मुताबिक नदियों का नियंत्रण भारत के पास होना चाहिए। यानी नदियों के पानी पर सबसे पहला हक़ भारत का होना चाहिए। हां, भारत अपनी ज़रूरत पूरी होने पर चाहे तो अपना पानी पाकिस्तान को दे सकता है। वह भी उन परिस्थितियों में जब पाकिस्तान दोस्त और शुभचिंतक की तरह व्यवहार करे। पाकिस्तान का रवैया शत्रु जैसा होने पर भारत उसे एक बूंद भी पानी देने के लिए बाध्य नहीं है। भारत वियना समझौते के लॉ ऑफ़ ट्रीटीज़ की धारा 62 के अंतर्गत यह कह कर पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान चरमपंथी गुटों का उसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है।

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भारत को चीन से सबक लेनी चाहिए। राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए चीन ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का फ़ैसला मानने से इनकार कर दिया है। 2016 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने 3.5 वर्गकिलोमीटर में फैले दक्षिण चीन सागर क्षेत्र पर बीजिंग के दावे को खारिज़ करके फिलीपींस के अधिकार को मान्यता दी। चीन ने दो टूक शब्दों में कहा कि वह इस फ़ैसले को मानने के लिए बाध्य नहीं है। चीनी के डिफेंस प्रवक्ता ने कहा कि चीनी सेना राष्ट्रीय संप्रभुता और अपने समुद्री हितों एवं अधिकारों की रक्षा करेगी। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी कहा कि देश की संप्रभुता और समुद्री अधिकारों पर असर डालने वाले किसी भी फ़ैसले या प्रस्ताव को उनका देश खारिज करता है।

भारत ख़ासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चीन का यह पॉइंट नोट करना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फ़ैसले पर चीनी लीडरशिप की प्रतिक्रिया का फिलीपींस के अलावा किसी राष्ट्र ने विरोध नहीं किया। संयुक्त राष्ट्रसंघ में अमेरिका, रूस,फ्रांस और ब्रिटेन जैसे शक्तिशाली देश भी ख़ामोश रहे। इसकी मतलब यह है कि कोई भी राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हित का हवाला देकर दुनिया की सबसे बड़ी अदालत के फ़ैसले को भी मानने से इनकार कर सकता है। इसे कहते हैं, विल पावर, जो कम से कम अभी तक सिंधु जल संधि को लेकर भारतीय लीडरशिप में नहीं रहा है।

लिहाज़ा, भारतीय लीडरशिप को साहस दिखाकर सिंधु जल समझौते की समीक्षा करनी ही चाहिए। बेशक, अंतरराष्ट्रीय परंपराओं का उल्लंघन पानी जैसे संवेदनशील मामले में हमें नहीं करना चाहिए, किंतु अपने हिस्से के पानी का भी प्रयोग न करके फालतू की उदारता पाकिस्तान जैसे शरारती और दुश्मन देश के प्रति जारी रखने का भी कोई औचित्य दिखाई नहीं देता है। अंरराष्ट्रीय संबंध ठोस ज़मीनी सच्चाइयों पर निर्भर होने चाहिए, ख्याली आशाओं पर नहीं। ऐसी आशाएं अनेक बार झूठी साबित हो चुकी हैं। अगर भारत ने ठोस क़दम उठाए तो पाकिस्तान की सारी हेकड़ी ख़त्म हो जाएगी।

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