IAS Topper टीना डाबी-अतहर आमिर का तलाक, प्रतिभाशाली व्यक्ति परिवार चलाने में असफल क्यों?

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हरिगोविंद विश्वकर्मा

मध्य प्रदेश से आने वाली भारतीय प्रशानिक सेवा (Indian Administrative Service) की 2015 की परीक्षा की टॉपर रही टीना डाबी (Tina Dabi) और उसी परीक्षा में दूसरे स्थान पर रहने वाले कश्मीर के अतहर आमिर ख़ान (Athar Aamir Khan) ने 2018 में अंतरधार्मिक प्रेम-विवाह (Inter-Religion Love Marriage) किया था। एक साथ एक ही छत के नीचे ढाई साल रहने के बाद दोनों लगने लगा कि उनके बीच वैयत्तिक और वैचारिक अंतर इतना ज़्यादा है कि दोनों जीवन भर साथ नहीं रह सकते। इसलिए दोनों ने सभ्य नागरिक की तरह आपसी सहमति से फैमिली कोर्ट (Family Court) में संयुक्त प्रार्थना पत्र देकर कहा कि उनके तलाक़ (Divorce) को वैधानिक मान्यता दी जाए।

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भारतीय प्रशासनिक सेवा के इन दो चर्चित अफ़सरों के बीच तलाक की यह ख़बर जब से सुर्खियों में आई है, तब से इसे ख़ूब पढ़ा जा रहा है। चूंकि लड़की हिंदू (Hindu) है और लड़का मुस्लिम (Muslim) है, इसलिए इस कहानी में सेक्स के साथ-साथ एवं धर्म का भी मसाला है। संभवतः इसीलिए इस ख़बर को भारत से अधिक संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates) और पाकिस्तान (Pakistan) जैसे इस्लामिक (Islamic) देशों में गूगल पर सर्च किया जा रहा है। लोग इन दोनों के बारे में अधिक से अधिक जानने के लिए जिज्ञासा लेकर गूगल पर लगातार सर्च कर रहे हैं। वैसे इनका प्रेम और शादी भी सोशल मीडिया (Social Media) में ख़ासी चर्चित रही थी और उसे गंगा-जमुनी संस्कृति (Ganga-Jamuni Culture ) की मिसाल कहा गया था।

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चूंकि टीना और अतहर संघ लोकसेवा आयोग (Union Public Service Commission) यानी यूपीएससी (UPSC) की परीक्षा में क्रमशः पहला (Topper) और दूसरा स्थान (Second rank) रहे थे। इसीलिए यह माना जाना चाहिए कि अगर वाक़ई यूपीएससी देश के सबसे प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों का चयन करता है तो टीना और अतहर देश के दो सबसे प्रतिभाशाली नागरिक हैं, क्योंकि दोनों ने देश की सबसे कठिन परीक्षा में क्रमशः प्रथम और द्वितीय रैंक हासिल की थी। लिहाज़ा, उनसे यह उम्मीद थी कि सबसे प्रतिभाशाली होने के नाते वे देश या राज्य का प्रशासन चलाने में सबसे अधिक सक्षम और सफल होंगे। चूंकि दोनों असाधारण प्रतिभाशाली थे, लिहाज़ा, प्रशासनिक तंत्र को ही नहीं, बल्कि समाज को भी इन दोनों से भविष्य में बेहतर मार्गदर्शन और मदद मिलने की उम्मीद थी।

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संपूर्ण दुनिया, ख़ासकर सभ्य और लोकतंत्र में भरोसा करने वाले देशों में यह मान्यता है और कहा भी जाता है कि प्रतिभाशाली व्यक्ति कोई भी कार्य सफलतापूर्वक कर सकता है। वह कहीं भी और किसी भी परिस्थिति में कार्य का निष्पादन कर सकता है। उसे कोई भी असाइनमेंट दे दीजिए, वह उसका निर्वहन समय से और सफलतापूर्वक कर देगा। भारत भी अपवाद नहीं, इसीलिए इस दर्शन पर अमल करते हुए संघ लोकसेवा आयोग यानी यूपीएससी देश का प्रशासन चलाने के लिए हर साल एक हज़ार से कम या उससे अधिक उम्मीदवारों का चयन करके उन्हें देश का सबसे अधिक टैलेंटेड नागरिक घोषित करता है। बेहद प्रतिभाशाली होने के कारण चयनित लोगों को विधिवत कार्य का प्रशिक्षण देने के बाद जिलाधिकारी और सचिव जैसे ज़िम्मेदार पदों पर नियुक्त किया जाता है।

भारत में ब्रिटिश शासन (British Era in India) के दौर से ही प्रतिभाशाली लोगों के चयन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य संघ लोकसेवा आयोग करता आ रहा है। यूपीएससी भारतीय प्रशासनिक सेवा में शामिल करने के लिए उन अभ्यर्थियों का चयन करता है जो सर्वाधिक प्रतिभाशाली होते हैं। इस संस्थान की छवि इतनी बेदाग़ है कि जो भी युवक या नागरिक प्रशासनिक सेवा के लिए चयनित होता है, उसे देश के सबसे प्रतिभाशाली युवक/युवती मान लिया जाता है। यूपीएससी इसी तरह दूसरे सेवाओं के लिए भी अभ्यर्थियों का चनय करता है। अमूमन हर राज्य में राज्य लोकसेवा आयोग भी हैं, जो प्रतिभाशाली व्यक्तियों का चयन राज्य स्तर पर करते हैं। सरकार किसी भी पार्टी या गठबंधन की हो, हर तरह का प्रशासनिक कार्य यही चयनित प्रतिभाशाली लोग करते हैं।

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संघ लोकसेवा आयोग या राज्य लोकसेवा आयोग (State Public  Service Commission) प्रशासनिक सेवा के लिए उम्मीदवारों का अलग-अलग तरीक़े से परीक्षण करते हैं। ख़ुद प्रतिभाशाली साबित करने के लिए हर उम्मीदवार को चयन की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है। मसलन, उम्मीदवारों की कई चरणों में परीक्षा ली जाती है। पहले प्रिमिलरी टेस्ट होता है। उसमें लाखों की संख्या में लोग सम्मिलित होते हैं। प्रिलिमिनरी टेस्ट (Preliminary Test) में मनपसंद विषय यानी स्पेशलाइज़्ड सब्जेक्ट, दूसरे विषय, जनरल नॉलेज और तार्किक एवं बुद्धि परीक्षण से संबंधित सवाल पूछे जाते हैं। ये सवाल इतने कठिन होते हैं कि मुश्किल से पांच फ़ीसदी लोग ही उत्तीर्ण हो पाते हैं। उसके बाद फिर मेन परीक्षा ली जाती है, जो प्रिलिमिनरी टेस्ट से भी कठिन होती है। उसमें भी ढेर सारे कम प्रतिभाशाली छंट जाते हैं और विशुद्ध प्रतिभाशाली ही आगे क्वालिफाई कर पाते हैं। इस तरह लाखों उम्मीदवारों के बीच से कुछ हज़ार लोग चयनित होते हैं।

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लिखित परीक्षा को उत्तीर्ण करने वाले उम्मीदवारों का इंटरव्यू होता है। इंटरव्यू में उम्मीदवार के बौद्धित स्तर, उसके व्यक्तित्व, उसके हाव-भाव, प्रजेंस ऑफ़ माइंड, त्वरित निर्णय लेने की क्षमता और लोगों का सामना करने के हुनर को परखने के लिए हर क्षेत्र के विशेषज्ञों का पैनल बनाया जाता है। यह पैनल ठोक-बजा कर जिस प्रत्यासी के नाम पर मुहर लगाता है, उसका चयन अंततः भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए हो जाता है। इसीलिए इस सेवा में समाजशास्त्री, वैज्ञानिक, इंजीनियर, गणितज्ञ, अर्थशास्त्री, आईटी एक्सपर्ट और कला एक्सपर्ट समेत हर क्षेत्र के प्रतिभाशाली विशेषज्ञ चुने जाते हैं, ताकि देश का प्रशासन तंत्र चलाने में वे हर विषय में उचित योगदान दे सकें और उचित समय पर उचित निर्णय ले सकें।

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चयन के बाद भी प्रतिभाशाली उम्मीदवारों को लाल बहादुर शास्त्री नेशनल अकेडमी ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन (Lal Bahadur Shastri National Academy of Administration) मसूरी में एक साल के सघन प्रशिक्षण से गुज़रना होता है। प्रशिक्षण के दौरान उनको प्रशासन तंत्र चलाने, लोगों को परखने और त्वरित एवं जनहित में निर्णय लेने का कड़ा प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण के दौरान उनके अंदर की प्रतिभा तपकर और खरी हो जाती है। तब उम्मीदवार हर निर्णय बहुत विचार मंथन के बाद लेता है और वह निर्णय केवल उनके ही नहीं, बल्कि व्यापक रूप से समाज और देश के लिए हितकर होता है। लेकिन दो सर्वोच्च प्रतिभाशाली अफसरों ने अपनी ही ज़िंदगी के बारे में 2018 में जो पहला अहम फ़ैसला लिया, वह ग़लत साबित हुआ। तो क्या उनके अंदर की प्रतिभा परीक्षा, साक्षात्कार और प्रशिक्षण की कसौटी से गुज़रने के बावजूद निखर नहीं पाई और दोनों ने जीवनसाथी ही ग़लत चुन लिया? इतना ग़लत कि दोनों साथ नहीं रह सकते है, इसलिए दोनों ने अलग होने का फ़ैसला किया।

किसी से प्रेम करना, शादी करना या किसी के साथ लिव-इन में रहना हर नागरिक का बेहद निजी फ़ैसला होता है। उस पर किसी भी तरह की टिप्पणी प्राइमा-फेसाई मर्यादाओं का हनन मानी जाती है। चूंकि यहां दो ऐसे लोगों की शादी और तलाक़ का मुआमला है जो भविष्य में समाज और देश के व्यापक हित में अनगिनत फ़ैसले लेने वाले हैं, इसलिए उनके फ़ैसले का विश्लेषण करना बहुत ज़रूरी है। टीना और अतहर की पहली मुलाकात 2015 में यूपीएससी का परीक्षाफल आने के बाद टीना डाबी के सम्मान समारोह में हुई, जहां अतहर भी बुलाए गए थे। आईएएस अकादमी मसूरी में प्रशिक्षण के दौरान उनकी जान-पहचान बढ़ी और इतनी प्रगाढ़ और अंतरंग हुई कि दोनों ने 2018 में शादी कर ली। इसका मतलब दोनों ने क़रीब तीन साल का समय एक दूसरे को समझने-बूझने में लगाया। दो सबसे प्रतिभाशाली अधिकारियों ने तीन साल तक परखने के बाद जो फ़ैसला लिया, वह फ़ैसला ढाई साल में ही ग़लत लगने लगा और इतना अपरिपक्व निर्णय साबित हुआ कि दोनों का पति-पत्नी के रूप में एक छत के नीचे रहना ही मुमकिन नहीं है।

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ग़ौर करने वाली बात यह है कि यह अरेंज्ड-मैरिज नहीं था, जिसे माता-पिता या परिवार वालों ने अचानक से थोप दिया हो। यह इंटर-रिलिजन लव-मैरिज था। कुछ लोग लव-मैरिज की इसलिए भी पैरवी करते हैं क्योंकि इसमें अपने जीवन साथी का चयन ख़ुद वही व्यक्ति करता है जिसे भविष्य में चयनित व्यक्ति के साथ ही रहना है। यहां भावी जीवनसाथी कैसा है, उसकी सोच कैसी है, या वह किस विचारधारा का है, यह सब समझने के लिए देश के दो सबसे क़ाबिल अफसरों को तीन साल का समय मिला। माता-पिता से पूरी आज़ादी मिली। इसके बावजूद वह फैसला महज़ ढाई साल में ही अर्थहीन फ़ैसला लगने लगा और दोनों भूल-सुधार के लिए जयपुर के पारिवारिक अदालत की शरण में पहुंच गए, क्योंकि उनका अपना फ़ैसला इतना बुरा साबित हुआ कि दोनों पति-पत्नी के रूप में एक दूसरे को अब और नहीं झेल सकते।

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लिव-इन रिलेशन के प्रचलन के बावजूद आम भारतीय समाज अभी इतना एडवांस नहीं हो सका है कि आम आदमी बिना शादी के अपने साथी के साथ एक छत के नीचे रहे और बच्चे पैदा करे। इसी तरह के समाज में जीवनचक्र को बनाए रखने के लिए सदियों पहले शादी जैसी अवधरणा सामने आई। यह अवधारणा बेशक बहुत पुरानी हो चुकी है, इसके बावजूद अभी तक शादी का इतना ही भरोसेमंद विकल्प सामने नहीं आ पाया है। अपनी कमज़ोरियों के चलते लिव-इन रिलेशन शादी का विकल्प बनने में एकदम से नाकाम रहा। इसीलिए शादी आज भी अपरिहार्य मानी जाती है, चाहे वह अरेंज्ड हो या फिर लव मैरिज।

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अगर दोनों बिना किसी गंभीर परिस्थिति के तलाक़ लेकर एक दूसरे से अलग हो रहे हैं, तब तो यह और भी गंभीर मसला है। तो इसका मतलब यह भी है कि शादी उनके लिए मज़ाक़ की तरह है। दरअसल, कोई छह महीने पहले टीना डाबी खान ने अपने नाम से ख़ान हटा दिया। इसके जवाब में अतहर ने टीना को इन्साग्राम पर अनफॉलो कर दिया। इसके बाद ख़बर आने लगी थी कि दोनों के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। अगर दोनों का एक दूसरे से मन बिना किसी ठोस वजह के भर गया और वे अपना-अपना अलग रास्ता तलाशने लगे तो यह शुभ संकेत नहीं है। अगर उनका अपने जीवनसाथी से इसी तरह ढाई-तीन साल में मन भरता रहा तो वे भविष्य में कितनी बार शादियां करेंगे। ऐसे प्रतिभाशाली लोग समाज में किस तरह की मिसाल पेश करेंगे, क्योंकि प्रतिभाशाली लोग समाज के लिए आदर्श और मिसाल माने जाते हैं। वे जो करते हैं, उसे आम लोग सही मानते हैं।

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यहां ग़लत साथी किसी आम आदमी ने नहीं चुना, बल्कि गलत साथी देश के दो सबसे प्रतिभाशाली प्रशासनिक अधिकारियों ने चुना, वह भी तीन साल तक जांचने-परखने के बाद। यहां सवाल यह है कि जो अधिकारीगण अपने जीवन के बारे में सही फ़ैसला नहीं ले सके, क्या वे जनहित के बारे में सही फ़ैसला ले पाएंगे। टीना डाबी जानती थी कि उसका जीवनसाथी उसके धर्म का नहीं है। वह मुसलमान है। परिचय होने और शादी के बीच के तीन साल के दौरान वह मानसिक रूप तैयार हुई होगी। वह बेशक यह भी जान रही होगी कि इस्लाम में अतंरधार्मिक विवाह के बाद दुल्हन को ससुराल में किस तरह के हालात का सामना करना पड़ता है, उसे अपने धर्म को मानने की आज़ादी होगी या उसे इस्लाम को स्वीकार करना पड़ेगा। इसके बाद उसने शादी का फ़ैसला किया, क्योंकि कहा जाता है कि शादी के बाद टीना डाबी टीना खान बन गई थीं।

इसी तरह अतहर आमिर ख़ान भी जानता था कि वह किसी मुस्लिम लड़की नहीं, बल्कि एक प्रतिभाशाली हिंदू लड़की को दुल्हन बनाकर अपने घर में ला रहा है। ऐसे में उसके परिवार वाले उस हिंदू लड़की को हिंदू बहू के रूप में स्वीकार कर लेंगे या उसका धर्म परिवर्तन करावा कर उसे हिंदू बहू से मुसलमान बहू बनाना पड़ेगा। इसके बावजूद तीन साल के अफेयर के बाद दोनों ने एक दूसरे का जीवनसाथी बनने का फ़ैसला किया। अब वह फ़ैसला महज ढाई साल में ही ग़लत लगने लगा तो इसका सीधा सा यही मतलब है कि दोनों ने सही फ़ैसला नहीं लिया। ऐसे में वे दूसरे यानी जनता के बारे में कोई सही फ़ैसला ले पाएंगे, इसमें भारी संदेह है।

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यहां यह भी कहना पड़ेगा कि जो आदमी अपने बारे में ठीक फ़ैसला न ले सका हो वह दूसरे के बारे में शत-प्रतिशत सही फ़ैसला नहीं ले सकता। इस आधार पर यह भी कहा जाना चाहिए कि प्रतिभाशाली होने के बावजूद दोनों को ऐसा दायित्व सौपने से पहले ज़रूर सोचना पड़ेगा कि वे जो फैसला लेंगे उसके असफल होने की गुंजाइश ज़्यादा रहेगी, क्योंकि जीवनसाथी चुनने की तरह उन्होंने जनहित कोई ऐसा फ़ैसला ले लिया जो ग़लत हो, तब बड़ी गड़बड़ी होने की आशंका रहेगी। इस घटना से यह बात भी सामने आई है कि किताबी ज्ञान के आधार पर यूपीएससी ऐसे लोगों को भी प्रतिभाशाली मान कर चुन रहा है, जो आम जीवन में न तो व्यवहारिक है न ही सही निर्णय लेने में सक्षम हैं।

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यही वजह है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा में ज़्यादा ऐसे लोगों का चयन हो जाता है। जो प्रतिभा की कसौटी पर तो खरे उतरते हैं, लेकिन व्यवहारिकता की कसौटी पर फेल हो जाते हैं। ऐसे लोग जिस दिन उनका चयन होता है, उसी दिन से एक तरह के गुरूर से भर जाते हैं और जनता से दूर हो जाते हैं। ऐसे लोग बाद में गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप से घिर जाते हैं। जो प्रतिभा का हवाला देकर आरक्षण का विरोध करते हैं, और दावा करते हैं कि आरक्षण के कारण प्रतिभाशाली लोगों की बजाय गैरप्रतिभाशाली लोगों का चयन हो जाता है। उन्हें भी इस घटना के बाद अपनी सोच बदलने की ज़रूरत है। ऐसी प्रतिभा का क्या मतलब जो अपने ज़िंदगी के बारे में ही सही फैसला न ले सका।

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यहां यूपीएससी की चयन प्रणाली भी गंभीर संदेह के घेरे में है कि उसकी कसौटी को दो ऐसे लोग पार कर गए, जो अपने बारे में ही फ़ैसले लेने में फिसड्डी साबित हुए। जब यूपीएससी से चयनित लोग इस तरह के हैं, तो दूसरी भर्ती एजेंसियों से कित तरह के प्रतिभाशाली लोग चयनित हो रहे होंगे, यह सहज कल्पना की जा सकती है। होना तो यह चाहिए कि यूपीएससी ऐसे लोगों को प्रतिभाशाली माने और उनका चयन करे, जो व्यवहारिक हो, इंसान हों, ईमानदार और संवेदनशील हों, जिनके लिए ज़िंदगी का मतलब ज़िंदगी ही हो और जिसके लिए ज़िंदगी का मतलब ज़िंदगी होगा, वह दूसरों की ज़िंदगी को भी उतनी ही अहमियत देगा, जितनी वह अपनी ज़िंदगी को देता है। तब जो लोग यूपीएससी की परीक्ष क्रैक करेंगे, उन्हें लोग दिल से प्यार करेंगे और सम्मान देंगे।

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