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महिलाओं पर मेहरबान कोरोना वायरस

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वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (Coronavirus) के अजीबोग़रीब व्यवहार को लेकर पूरी दुनिया के लोग हैरान हैं। दरअसल, कोरोना महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ज़्यादा हमला कर रहा है। ‘क्लीनिकल इंफेक्शस डिजीजेस’ पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में कोरोना से जितने लोगों की मौत हुई है या फिर जितने लोग संक्रमित हुए हैं, उनमें महिलाओं की संख्या केवल 30 फ़ीसदी है, जबकि कोरोना 70 फ़ीसदी पुरुषों को अपना शिकार बना चुका है। भारत में भी कोरोना की चपेट में आने वालों में महिलाओं की संख्या केवल 30 फ़ीसदी है।

कोराना वायरस के संक्रमण के कारण भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में समाज का ताना-बाना बदल गया है। लोगों के आपसी संबंध नए सिरे से निर्धारित और परिभाषित किए जा रहे हैं। मास्क, सेनेटाइज़र, ग्लब्स, सोशल डिस्टेंसिंग और पीपीई किट्स मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं। कोरोना काल में जिस तरह प्रकृति के साथ वन्य जीव गुलजार हुए हैं, उसी तरह इस वैश्विक महामारी के संक्रमण काल में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि एक नहीं, बल्कि दो-दो ग्लोबल रिसर्च में पाया गया है कि कोरोना वायरस के संक्रमण का असर पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं में बहुत कम देखने को मिल रहा है।

स्त्री-पुरुष की भूमिका में अदला-बदली
कोरोना के संक्रमण को लेकर आए रिसर्च के इन नतीजों के बाद मानव समाज में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन होने की संभावना जताई जा रही है। वह परिवर्तन परिवार में स्त्री-पुरुष की भूमिका को लेकर है। समाज में स्त्री और पुरुष की भूमिका की आपस में अदला-बदली हो रही है। अब तक आमतौर पर घर का ख़र्च पुरुष चलाता था, इसलिए काम के लिए वही घर से बाहर निकला करता था और महिला घर को संभाला करती थी, लेकिन कोरोना के संक्रमण काल में यह उल्टा हो रहा है। अब पुरुष को घर में बैठना पड़ सकता है। यानी उनके ज़िम्मे रसोई संभालने का काम आ सकता है, जबकि महिलाएं काम के लिए घर से बाहर निकल सकती हैं और परिवार चलाने के लिए पैसे कमाने का दायित्व संभाल सकती हैं।

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घर में महिलाओं की हुकूमत
अगर यह संभावना सही साबित हुई तो मानव समाज जो अब तक पुरुष प्रधान रहा है, वह महिला प्रधान हो सकता है। यानी भविष्य में परिवार पर घर के पुरुष की बजाय घर की महिला की हुकूमत चल सकती है। कहने का मतलब हेड ऑफ द फैमिली गृहस्वामी नहीं, बल्कि अब गृहस्वामिनी हो सकती है। यह दुनिया भर में पूरे सामाजिक ताने-बाने को ही बदल सकता है, क्योंकि तब घर के बाहर महिलाएं उसी तरह भीड़ के रूप में नज़र आएंगी, जिस तरह अब तक हर जगह पुरुषों की भीड़ नज़र आती रही है।

कोरोना का वार पुरुषों पर अधिक
दरअसल, रिसर्च में पाया गया है कि कोरोना वायरस के निशाने पर अधिकतर पुरुष हैं। महिलाओं पर कोरोना का असर बहुत ही कम देखने को मिल रहा है। कोरोना के भय और लॉकडाउन की आपाधापी में लोगों ने कोरोना के इस व्यवहार पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन सच तो यही है, कि कोरोना वायरस परिवार की महिलाओं की बजाय पुरुषों पर प्रहार कर रहा है। अगर परिवार के बाहर से कोरोना संक्रमण आ भी रहा है तो महिलाओं की बजाय पुरुषों को अधिक पॉजिटिव कर रहा है। महिलाओं को अगर कोरोना का संक्रमण हो भी रहा है तो वह इतना माइल्ड है कि उसके सिम्टम्स ही नहीं दिख रहे हैं।

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लिंगभेद कर रहा है कोरोना
पहले लोग कह रहे थे कि कोरोना वायरस एक तरफ़ से जो मिल रहा है, उसी पर हमला बोल रहा है। यह चीनी वायरस किसी की जाति, धर्म, लिंग या संपन्नता-विपन्नता नहीं देख रहा है। लेकिन रिसर्च के बाद अब जो आंकड़े आ रहे हैं, उनके अनुसार कोरोना वायरस स्त्री और पुरुष में गंभीर पक्षपात कर रहा है। चीन के वुहान शहर से निकली यह संक्रामक बीमारी अपना शिकार बनाने में भी भारी भेदभाव कर रही है। कोविड-19 (Covid 19) की महामारी अधिकतर मर्दों को अपनी चपेट में ले रही है, जबकि औरतों की ओर नज़र भी उठाकर नहीं देख रही है। वायरस के इस तरह के व्यवहार पर जहां सामाजिक विज्ञानी हैरान हैं, तो मेडिकल फील्ड से जुड़े लोगों का कहना है कि हर तरह के वायरस महिलाओं की बजाय पुरुषों पर व्यापक असर छोड़ते हैं।

नेशनल इंस्टिट्यूट्स ऑफ़ हेल्थ की रिपोर्ट
अमेरिकी की स्वास्थ्य संबंधी अनुसंधान करने और मानव जीवन को बचाने वाली रिसर्च एजेंसी ‘यूएस डिपार्टमेंट ऑफ़ हेल्थ एंड ह्यूमन सर्विसेस’ (Department Of Health And Human Services) की ‘नेशनल इंस्टिट्यूट्स ऑफ़ हेल्थ’ National Institute Of Health) यानी एनआईएच (NIH) ने अपने हाल के रिसर्च के बाद कहा है कि कोविड 19 वैश्विक महामारी के प्रति स्त्री और पुरुष का रिस्पॉन्स एकदम अलग-अलग और आश्चर्यजनक है। एनआईएच दुनिया भर में मेडिकल क्षेत्र में रिसर्च के लिए जाना जाता है, क्योंकि इसने दुनिया को कई कई नामचीन मेडिकल साइंटिस्ट्स दिए हैं। इस अग्रणी संस्थान ने अपने रिसर्च में कहा है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर कोरोना वायरस का असर बहुत कम देखा जा रहा है। रिसर्च में दावा किया गया है कि महिलाओं का इम्यून सिस्टम पुरुषों के मुक़ाबले बहुत अधिक होता है, इसी वजह से उन पर कोरोना वायरस का संक्रमण बहुत कम हो रहा है। अमेरिका में भी महिलाओं की तुलना में पुरुष बहुत अधिक संख्या में संक्रमित हुए और मरने वालों में भी महिलाओं की तुलना में पुरुषों की संख्या कई गुनी अधिक है।

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एंजियोटेंसिन – कंवर्टिंग एंजाइम 2 जीन
एनआईएच के डायरेक्टर डॉ. फ्रांसिस कोलिन्स (Dr Francis Collins) के मार्गदर्शन में हुए रिसर्च में दावा किया गया है कि चीन से निकले कोरोना वायरस का मानव पर प्रभाव शरीर में मौजूद ‘एक्स क्रोमोसोम्स (X chromosomes)’ और सेक्स हारमोन्स (sex hormones)’ के अनुसार हो रहा है। कहा गया है कि दरअसल एक्स क्रोमोसोम्स में एंजियोटेंसिन – कंवर्टिंग एंज़ाइम (एसीई) 2 जीन पाया जाता है, जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के लिए ज़िम्मेदार होता है। बीमारियों के कारण एक्स क्रोमोसोम्स की क्षमता कम हो जाती है और आदमी की इम्यूनिटी घट जाती है। रिसर्च में कहा गया है कि महिलाओं में मौजूद एक्स क्रोमोसोम्स अधिक मज़बूत होता है, क्योंकि महिला के शरीर में दो एक्स क्रोमोसोम्स पाए जाते हैं। एनआईएच दुनिया के कई देशों में कोरोना के असर पर अध्ययन कर रहा है। दक्षिण कोरिया ने कोरोना पर शुरुआत में नियंत्रण कर लिया था, लेकिन वहां भी मरने वालों में 1.2 फ़ीसदी पुरुष थे, जबकि महिलाओं का प्रतिशत केवल 0.5 था। इस एजेंसी के पास यूरोप के नतीजे आए हैं। एजेंसी के मुताबिक जवान महिला और पुरुष के संक्रमित होने की तादाद क्रमशः 42.3 और 57.7 फ़ीसदी है। जबकि बुजुर्ग महिला और पुरुष में संक्रमण की संख्या क्रमशः 10.7 फ़ीसदी और 89.3 फ़ीसदी है।

ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी का रिसर्च
इसी तरह ब्रिटेन की मशहूर शिक्षण संस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑक्सफ़ोर्ड (University Of Oxford) में इन दिनों कोरोना वैक्सीन का मानव पर ट्रायल चल रहा है। अभी कुछ दिन पहले ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर फ़िलिप गोल्डर ने चीन और यूरोप में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों पर एक गहन अध्ययन किया था। प्रो. गोल्डर ने पाया कि यूरोप में कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाले मरीज़ क़रीब 70 फ़ीसदी पुरुष थे, जबकि कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाले मरीज़ों में महिलाओं की संख्या केवल 30 फ़ीसदी थी। कमोबेश यह प्रतिशत कोरोना वायरस से जान गंवाने वालों का पाया गया। सबसे बड़ी बात प्रो. गोल्डर ने अपने रिसर्च में कोरोना संक्रमितों और उससे जान गंवाने वालों का हूबहू यही डेटा चीन के वुहान में पाया, जहां से कोरोना वाइरस का उदय हुआ था।

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महिलाएं कोरोना वायरस से प्रोटेक्टेड
मुंबई में नायर अस्पताल (Nair Hospital) के सेवा निवृत्त डिप्टी डीन डॉ. शिवराज दास कहते हैं, “महिलाएं अपने विशेष हार्मोन के कारण दूसरे वायरस की तरह कोरोना वायरस से भी प्रोटेक्टेड हैं। यानी भारत में महिलाओं पर कोरोना वायरस का असर पुरुषों के मुक़ाबले बहुत कम हो रहा है। भारत में कुपोषित महिलाओं को छोड़ दें तो सामान्य महिला की हेल्थ हिस्ट्री पुरुषों के मुक़ाबले बेहतर होती है। इसीलिए कोरोना वायरस से देश की महिलाएं बेहतर तरीक़े से लड़ सकती हैं और वे इस वैश्विक महामारी को हरा भी सकती हैं। अगर भारत को सही मायने में कोराना वायरस को हराना है तो देश के सारे पुरुषों को घर में बंद कर देना चाहिए और महिलाओं को घर से बाहर निकलने के लिए प्रमोट करना चाहिए।” उन्होंने यहां तक कहा कि घर का खाने का सामान, दूध और सब्ज़ी लेने के लिए पुरुषों की बजाय महिलाओं को बाहर निकलना चाहिए। इससे आपके घर में कोरोना वायरस के प्रवेश करने की संभावना शून्य हो जाएगी।

महिलाओं में दो ‘एक्स क्रोमोसोम’
डॉ. शिवराज दास कहते हैं, “महिलाओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता पुरुषों की तुलना में बेहतर होती है। दरअसल, किसी भी बीमारी के वायरस के ख़िलाफ़ सक्रिय होने के लिए जिस प्रोटीन की आवश्यकता होती है वो ‘एक्स क्रोमोसोम’ में मौजूद होता है। एक्स क्रोमोसोम प्रोटीन की आवश्यकता ख़ासतौर से कोरोना वायरस से लड़ने के लिए होती है। इसी प्रोटीन को इम्यूनिटी कहते हैं। सबसे अहम यह है कि दुनिया भर में महिलाओं के शरीर में दो ‘एक्स क्रोमोसोम’ होते हैं, जबकि पुरुषों में केवल एक ‘एक्स क्रोमोसोम’ होता है। इसीलिए महिलाओं में कोरोना वायरस ही नहीं, बल्कि दूसरे किसी भी वायरस का प्रकोप झेलने और उसे हरा देने की क्षमता अधिक होती है। बशर्ते महिला कुपोषण की शिकार न हो।”

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कोरोना के शिकार 70 फ़ीसदी पुरुष
डॉ. शिवराज दास कहते हैं, “पूरे यूरोप और चीन में कोरोना वायरस से मरने वाले क़रीब 70 फ़ीसदी सिर्फ़ पुरुष हैं। अमेरिका में तो यह फीसदी 70 से भी अधिक रहा है। कोरोना वायरस का का प्रकोप झेलने वाले अन्य किसी देश में भी कमोबेश यही स्थिति है। भारत में अब तक 73 लाख लोग कोरोना से संक्रमित हुए और इनमें 1 लाख 11 हज़ार से ज़्यादा लोगों की जान चली गई। देश में कोरोना से मरने वालों में 70 फ़ीसदी पुरुष हैं, जबकि महिलाओं का फ़ीसदी केवल 30 है। यहां कोरोना से जंग हारने वालों में 53 फ़ीसदी 60 साल से ऊपर के लोग है। केवल 1 प्रतिशत मौतें 17 से 25 आयु वर्ग के लोगों की हुई। 10 प्रतिशत मौत 26 से 44 आयु वर्ग के लोगों की दर्ज की गई। 35 प्रतिशत मौत में लोग 45 से 60 आयु वर्ग के थे। आंकड़े कह रहे हैंं कि भारत, खासकर मुंबई में भी कोरोना के मरीज़ों और जान गंवाने वालों की संख्या ज़्यादातर पुरुष हैं। आप देखते होंगे घर के पुरुष कोरोना से संक्रमित हो जाते हैं, लेकिन उस पुरुष के साथ रहने वाली उसकी पत्नी, बहन, बेटी या मां कोरोना से संक्रमित नहीं होती है। इसका मतलब यह है कि महिला के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता पुरुष के मुकाबले अधिक है।”

धूम्रपान से घटती है इम्यूनिटी
डॉ. शिवराज दास आगे कहते हैं कि कोरोना वायरस के पुरुषों को ज़्यादा शिकार बनाने की एक वजह उनका गुटखा, तंबाकू या सिगरेट का सेवन करना है। कहने का मतलब पुरुषों का ज़िंदगी जीने का सलीक़ा महिलाओं से एकदम अलग होता है। लिहाज़ा, पुरुषों में किसी भी बीमारी के पनपने की संभावना ज़्यादा रहती है। सिगरेट पीने वालों के लिए तो किसी भी तरह के संक्रमण का शिकार होना बहुत ही आसान होता है। महिलाएं पुरुषों की तुलना स्मोक या ड्रिंक नहीं के बराबर या बहुत कम करती हैं। दुनिया भर में 50 फ़ीसदी से अधिक पुरुष सिगरेट पीते हैं, जबकि सिगरेट पीने वाली महिलाओं का प्रतिशत केवल पांच है। यही वजह है कि कोरोना महिलाओं की बजाय पुरुषों पर वार ज़्यादा कर रहा है।

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महिलाएं आसानी से झेल जाती हैं संक्रमण
नायर अस्पताल के पूर्व डिप्टी डीन डॉ दास कहते हैं कि यही वजह है कि भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों में भी महिलाएं कोरोना वायरस के संक्रमण को आसानी से झेल जाती हैं। अव्वल तो उनमें संक्रमण होता नहीं, और होने पर उनमें कोरोना का अमूमन लक्षण दिखता ही नहीं और वे घर पर ही जल्दी से ठीक हो जाती है। यानी उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत नहीं आती है। इसके विपरीत पुरुषों में बड़ी तादाद में कोरोना वायरस का संक्रमण हो रहा है और उसी अनुपात में पुरुषों की जान भी जा रही है।

अमिताभ का परिवार बढ़िया उदाहरण
सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का परिवार इसका बहुत बढ़िया उदाहरण है। अमिताभ के परिवार में आठ सदस्य हैं। दो पुरुष – अमिताभ और उनका बेटा अभिषेक बच्चन और छह महिलाएं – उनकी पत्नी जया बच्चन, उनकी पुत्रवधू ऐशवर्या रॉय, उनकी पोती आराध्या, उनकी बेटी श्वेता नंदा, उनकी दो नातिन अगस्त्या नंदा और नव्या नंदा। परिवार में बाहर से किसी भी माध्यम से कोरोना वायरस आ गया। परिवार के दोनों पुरुष संक्रमित हो गए और दोनों को सिम्टम्स ऐसे थे कि उन्हें अस्पताल भर्ती कराना पड़ा। दूसरी ओर परिवार की छह महिलाओं में से केवल दो कोरोना से संक्रमित हुईं। शेष चार पर कोरोना वायरस का कोई असर ही नहीं हुआ और दो पर भी कोरोना का असर इतना कम था कि लक्षण ही नहीं दिखा।

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पुरुष अस्पताल में महिलाएं घर
अमिताभ बच्चन को हल्का फीवर होने पर एहतियातन परिवार के सभी सातों सदस्यों का रैपिड एंटीजन टेस्ट कराया गया था। रैपिड एंटीजन टेस्ट का नताजा कुछ ही घंटे में आ जाता है। रैपिड एंटीजन टेस्ट का नतीजा आने पर पता चला कि अमिताभ और अभिषेक कोरोना पॉजिटिव थे, जबकि जया, ऐश्वर्या, आराध्या और श्वेता और उसकी बेटियों की कोरोना रिपोर्ट निगेटिव थी। इसके बाद एहतियातन दूसरा फिर से टेस्ट हुआ, जिसमें ऐश्वर्या और आराध्या पॉज़िटिव निकलीं, जबकि जया और श्वेता और उसकी दोनों बेटियों की रिपोर्ट निगेटिव ही रही। यही हाल मुंबई ही नहीं, संपूर्ण देश में है। पुरुष संक्रमित हो गए, लेकिन महिलाएं महफ़ूज़ हैं। हालांकि, अंततः बच्चन परिवार ने कोरोना वायरस को हरा दिया।

केवल महिलाएं बाहर निकलें
कोरोना संक्रमण काल में अधिकतर लोग घरों में  क़ैद हैं। सारा कामकाज ठप है। किसी को कुछ नहीं सूझ रहा है कि क्या किया जाए। ऐसे में केवल और केवल एक ही विकल्प बचता है, वह है, काम करने के लिए घर से बाहर महिलाएं निकलें और पुरुष घर के अंदर रहें और रसोई संभालें। डॉ. शिवराज दास कहते हैं कि सब्ज़ी लेना हो या दूसरे सामान ख़रीदना हो या फिर काम पर जाना हो, हर जगह घर से बाहर महिलाओं को निकलना चाहिए। डॉ. शिवराज दास केंद्र सरकार और राज्य सरकार को सलाह देते हुए कहते हैं कि एक साल के अंदर देश के सारे पुरुषों को घर के अंदर बंद कर उनकी जगह काम के लिए महिलाओं को घर से बाहर निकलने के लिए प्रोत्साहित करें तो कोरोना अपने आप ख़त्म हो जाएगा। इससे देश कोरोना वायरस पर आसानी से विजय श्रीप्राप्त कर लेगा। इसके अलावा कोरोना वायरस के कारण बोनस में महिलाओं का सशक्तिकरण भी हो जाएगा।

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महिलाओं का वर्चस्व कायम होगा?
डॉ. शिवराज दास कहते हैं, “किसी ने सही कहा है। प्रकृति यानी क़ुदरत अपने आपको ख़ुद ही बैलेंस कर लेती है। किसी का भी अत्याचार प्रकृति बहुत दिन तक बर्दाश्त नहीं करती है और उसे उचित समय पर सज़ा ज़रूर देती है। फिलहाल कोरोना वायरस के ज़रिए प्रकृति दुनिया भर के पुरुषों को दंडित कर रही है। कहा जा सकता है कि प्रकृति मानव सभ्यता के आरंभ से ही पुरुषों द्वारा महिलाओं पर किए गए अत्याचार का बदला ले रही है।” ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या क़ुदरत ने कोरोना वायरस को दुनिया के सामाजिक ताने-बाने में अभूतपूर्व परिवर्तन करने के लिए भेजा है? कोरोना वायरस ने जिस तरह से प्रकृति, नही और वन्यृजीवों को आबाद किया है, क्या वाक़ई यह वायरस दुनिया भर में हर समाज में पुरुषों के वर्चस्व को ख़त्म करके महिलाओं का वर्चस्व कायम कर देगा?

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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कोरोना के चलते ‘रिस्क जोन’ में हैं अमिताभ बच्चन

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सदी के महानायक अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) के चाहने वालों के लिए यह बहुत अधिक राहत देने वाली ख़बर है कि कोरोना पॉज़िटिव पाए जाने के बाद भी बिग बी पर वायरस का संक्रमण माइल्ड है। उनका ऑक्सीजन लेवल भी 95 है, जो सामान्य बताया जा रहा है। लिहाज़ा, सब कुछ ठीक रहा तो संभावना यही है कि कुछ दिनों में ही कभी एंग्री यंगमैन रहे अमिताभ को नानावटी अस्पताल (Nanavati Hospital) से छुट्टी मिल जाएगी और वह फिर से जलसा में अपने परिवार के बीच होंगे।
स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याएं
हालांकि जब से बिग बी के कोरोना से संक्रमित होने की ख़बर आई है, तब से लाखों लोग उनकी सलामती के लिए दुआ कर रहे हैं और बिग बी ने यह कहकर सभी चाहने वालों का आभार व्यक्त किया है कि दुआओं में ज़्यादा असर होता है। अमिताभ के लिए दुआ करने वालों में आम से खास तक, हर फील्ड के सेलेब्स से लेकर उनके फैंस तक शामिल हैं। फिलहाल अमिताभ बेटे अभिषेक बच्चन के साथ मुंबई के नानावटी अस्पताल में भर्ती हैं, जहां दोनों की हालत बेहतर बताई जा रही है। चिकित्सा से जुड़े प्रोफेसनल्स का कहना है कि अगर कोरोना के माइल्ड संक्रमण काल में हिंदी सिनेमा के सबसे बेहतरीन इस कलाकार की मेडिकल हिस्ट्री पर ग़ौर करें तो उनके सेहत को लेकर अतिरिक्त चिंता होने लगती है। दरअसल, अमिताभ बच्चन को लिवर का संक्रमण अक्सर होता रहा है, जिससे वह समय-समय पर किसी न किसी अस्पताल में भर्ती होते रहे हैं। जहां दो तीन दिन बाद उन्हें छुट्टी मिल जाती रही है। इसके अलावा भी बिग बी स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं का सामना करते रहे हैं।
दो तरह के रिस्क जोन में
अमिताभ और अभिषेक दोनों में कोरोना के माइल्ड सिम्पटम्स ही नज़र आए हैं। इसके बावजूद अमिताभ बच्चन की तबीयत पर ख़ास नज़र रखी जा रही है। अमिताभ की 1982 के हादसे के बाद से ही स्वास्थ्य संबंधी समस्या से जूझते रहे हैं। लिवर संक्रमण की समस्या के चलते अमिताभ चीन के वुहान से निकाली वैश्विक महामारी कोरोना वायरस यानी कोविड 19 के रिस्क जोन में बताए जाते हैं। अमिताभ बच्चन का इलाज कर चुके एक डॉक्टर ने कहा कि कोरोना वायरस के संक्रमण काल में फिलहाल अमिताभ दो तरह से रिस्क जोन में हैं। पहला, अमिताभ बच्चन की उम्र 77 साल हो चुकी है और डॉक्टरों का मानना है कि कोरोना वायरस का बहुत त्वरित असर बुजुर्ग लोगों ख़ासकर साठ साल की उम्र पार कर चुके लोगों पर बहुत अधिक होता है। दूसरा, कोरोना वायरस उन लोगों के लिए बहुत घातक साबित हो सकता है, जिन्हें पहले से लिवर, किडनी फेफड़े की कोई बीमारी या उच्च डायबिटीज है। अमिताभ बच्चन को लिवर की गंभीर समस्या है। इस लिहाज़ से कोरोना को माइल्ड संक्रमण या लक्षण भी उनकी सेहत के लिए बहुत बड़ा ख़तरा साबित हो सकता है।

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सांस लेने में दिक्कत
11 अक्टूबर, 1942 को जन्मे अमिताभ बच्चन का इलाज कर चुके डॉक्टरों का भी कहना है कि उनके लिए कोरोना से लड़ना उतना आसान नहीं होगा, जितना समझा जा रहा है। माइल्ड कोरोना के बावजूद अमिताभ को सांस लेने में मुश्किलात का सामना करना पड़ रहा है। लिहाज़ा, उनकी उम्र और ट्यूबरक्यूलोसिस समेत पिछली बीमारियों के चलते उन्हें पूरी तरह रिकवर करने में वक़्त लग सकता है। ऐसे में जब तक कोरोना का प्रकोप ख़त्म नहीं हो जाता अमिताभ को अपने सारी शूटिंग्स और अन्य कार्यक्रम रद कर देना चाहिए। आपको जानकर हैरानी होगी कि 78 साल की उम्र में इतने सक्रिय बिग बी केवल 25 फ़ीसदी लिवर के सहारे इतना काम करते हैं, क्योंकि उनके लिवर का 75 फ़ीसदी हिस्सा काम ही नहीं करता है, क्योंकि हेपेटाइटिस इंफेक्शन के कारण लिवर खराब हो चुका है। 1982 के हादसे के बाद उनकी आंतें भी कमज़ोर हो गई हैं। इस वजह से उन्हें बार-बार अपना हेल्थ चेकअप करवाना और अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है।
माएस्थेनिया ग्रेविस की समस्या
इलाहाबाद के एक कायस्थ परिवार में जन्में अमिताभ बच्चन मांसपेशियों से संबंधी एक बीमारी माएस्थेनिया ग्रेविस से लड़ चुके हैं। इस बीमारी में कभी-कभार मांसपेशियों का नर्वस सिस्टम से कनेक्शन टूट जाता है। ‘कुली’ फ़िल्म की शूटिंग के दौरान हुए हादसे के बाद दवाइयों के भारी डोज की वजह से उन्हें माएस्थेनिया ग्रेविस बीमारी हुई थी इसकी वजह से वह मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर हो गए थे और डिप्रेशन में चले गए थे। हालांकि अब उससे उबर चुके हैं। लोगों को शायद पता नहीं कि सदी के महानायक को समय-समय पर अस्थमा की भी है शिकायत होती है। चूंकि अस्थमा फेफड़ों से जुड़ी बीमारी होती है, इसलिए कह सकते हैं कि उनका फेफड़ा अपेक्षाकृत कमज़ोर है। अस्थमा में बॉडी के एयरवेज नैरो हो जाते हैं और ऑक्सीजन सही मात्रा में फेफड़ों तक नहीं पहुंच पाती है, जिससे सांस लेने में बहुत दिक्कत होती है। इसके अलावा अमिताभ बच्चन टीबी से जंग लड़ चुके हैं। दरअसल, उन्हें 2000 में टीबी यानी ट्यूबरकुलोसिस डिटेक्ट हुआ था। हालांकि उन्होंने समय रहते दवा ली और टीबी से एकदम ठीक हो गए।
2005 में हुई एबडोमिनल सर्जरी
मशहूर कवि हरिवंशराय बच्चन और रंगकर्मी तेजी बच्चन के सुपुत्र अमिताभ बच्चन की कुछ साल पहले एबडोमिनल सर्जरी भी हुई थी। साल 2005 में उनके पेट में तेज दर्द हुआ। पहले लगा कि ये गेस्ट्रो संबंधी समस्या है, लेकिन चेकअप में सामने आया कि उन्हें इंटेस्टाइन संबंधी समस्या है। डाइवर्टिक्युलाइटिस ऑफ स्मॉल इंटेस्टाइन नाम की इस बीमारी को ठीक करने के लिए अमिताभ को सर्जरी करवानी पड़ी थी। डॉक्टरों का कहना था कि अगर इस समस्या का समय रहते उपाय न किया गया होता, तो ये घातक साबित हो सकता था। इस बीमारी में छोटी और बड़ी आंत कमजोर हो जाती है और उसमें सूजन आ जाती है। उस समय भी अमिताभ के करोड़ों प्रशंसक उनके बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य की कामना की थी।
2012 में हुई लिवर की सर्जरी
बिग बी ही ने कुछ साल पहले यह खुलासा किया था कि उन्हें लिवर सिरोसिस की समस्या भी है। हालांकि यह समस्या अत्यधिक शराब पीने वालों को होती है और अमिताभ शराब का सेवन नहीं करते, इसके बावजूद वह लिवर सिरोसिस के शिकार हो गए। इसी बीमारी के चलते 2012 में सर्जरी करके उनके लिवर का 75 फीसदी संक्रमित हिस्सा काटकर अलग कर दिया गया। लिहाजा, उनके लिवर का फंक्शन कमजोर हो गया। 1982 के हादसे ने उनके पेट के इंटरनल पोर्शन को इतना नुकसान पहुंचाया कि अभी तक उसके साइड इफेक्ट सामने आते रहते हैं। कहने का मतलब बिग-बी 25 फीसदी लिवर के साथ ज़िंदा ही नहीं हैं, बल्कि 77 साल की उम्र में भी इतना काम कर रहे हैं।

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कुली की शूटिंग में लगी चोट
दरअसल, अमिताभ की सेहत ख़राब होने का सिलसिला 1982 से शुरू हुआ, जब प्रयाग राज और मनमोहन देसाई द्वारा निर्देशित फिल्म ‘कुली’ की शूटिंग के दौरान हुए एक हादसे में उनको चोट लग गई थी। वह हादसा बैंगलोर में ज्ञान भारती विश्वविद्यालय के परिसर में हुआ था। विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के एक किनारे शूटिंग का सेट लगाया गया था। जहां अमिताभ और विलेन पुनीत इस्सर के बीच फाइट के सीन का फिल्मांकन करना था। फाइट सीन के दौरान पुनीत के प्रहार के बाद अमिताभ कलाबाजी खाकर एक टेबल पर गिर पड़े थे। लेकिन जब पुनीत ने फाइट मारी तो वह सीधे अमिताभ के पेट के निचले हिस्से में अतड़ी में लगी और जब अमिताभ लोहे की टेबल पर गिरे तब भी चोट उनकी अतड़ी में ही लगी। शूटिंग के लिहाज से वह शानदार था, लेकिन उससे उनकी ज़िंदगी ही खतरे में पड़ गई। प्रारंभ में सभी ने शॉट की सराहना की। अमिताभ ने प्रशंसा ग्रहण किया लेकिन उनके पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द होने लगा। जैसे ही वह गार्डन एरिया में आए, वहीं ज़मीन पर गिर पड़े। इसके बाद उनको बेंगलुरु के अस्पताल में भर्ती कराया गया। प्रारंभिक रिपोर्ट के बाद डॉक्टरों ने बताया कि उनकी अतड़ी में गंभीर चोट है। आनन-फानन में अमिताभ को एयर लिफ्ट करके मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में लाया गया। यहां उनकी सर्जरी हुई। इसके बाद वह कोमा में चले गए और डॉक्टरों ने उन्हें क्लीनिकली डेड घोषित कर दिया था।
डोनर से मिला हेपेटाइटिस
बताया जाता है कि काफी खून बह जाने के कारण उन्हें ख़ून की ज़रूरत थी। ब्रीच कैंडी अस्पताल के सामने खून देने वालों का तांता लग गया। 200 ब्लड डोनर्स से मिला खून उनको चढ़ाया गया था। दो महीने के इलाज के बाद वह ठीक हो गए और जनवरी 1983 में शूटिंग भी शुरू कर दी। उसी साल कुली रिलीज हुई और सुपरहिट रही। कई लोग कहते हैं कि लोग अमिताभ के घायल होने वाल शॉट देखना चाहते थे, इसीलिए सिनेमा हाल में बहुत अधिक भीड़ जुट रही थी।बहरहाल, उस हादसे के कारण उन्हें एक और बीमारी ने जकड़ लिया, जिसका पता 18 साल बाद चला। दरअसल, ब्रीच कैंडी में जिन डोनर्स का खून अमिताभ को चढ़ाया गया, उनमें से एक हेपेटाइटिस बी था। उससे हेपेटाइटस के वायरस अमिताभ के शरीर में प्रवेश कर गए। सन् 2000 तक वे ठीक रहे, मगर उसके बाद सामान्य मेडिकल चेकअप के दौरान यह पता चला कि उनका लिवर संक्रमित है।
अमिताभ गजब के लड़ाके
अमिताभ बच्चन में बीमारियों के लड़ने का इतना माद्दा कहां से आया इसकी भी एक रोचक दास्तां है। दरअसल, अमिताभ के पिता स्वतंत्रता संग्राम से प्रभावित थे। लिहाज़ा, किसी ने अमिताभ के जनम के बाद उनका नाम इंकलाब रखने का सुझाव दिया। लेकिन संयोग से उसी समय प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत आ गए और उन्होंने कहा कि यह लड़ने वाला बालक है, जगत में रोशनी करेगा, इसलिए इसका नाम ‘अमिताभ’ रखिए, ‘अमिताभ’ का अर्थ ‘शाश्वत प्रकाश’ है। पंत की बात सच साबित हुई। अमिताभ गजब के लड़ाके हैं। कई बीमारियों को मात दे चुके हैं।

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जब नाराज़ हुए थे बिग बी
दादासाहेब फाल्के पुरस्कार पा चुके अमिताभ पिछले साल अक्टूबर में भी नानावटी अस्पताल में भर्ती होने की ख़बर के वायरल होने से ख़ासे नाराज हो गए थे। इसे लेकर उन्होंने अपने ब्लॉग में अपना दर्द बयां किया था। अमिताभ ने लिखा था- प्लीज़ पेशेवर दस्तावेजों के नियम-कायदों को न तोड़ें। बीमार होना और इलाज कराना गोपनीय व्यक्तिगत अधिकार है। उसे पब्लिक करना एक तरह का शोषण है। इसका कारोबारी इस्तेमाल सामाजिक रूप से गलत है। सम्मान करें और बात को समझें। दुनिया में हर चीज बेचने के लिए नहीं होती है। हालांकि अमिताभ ने चिंता करने वालों का आभार भी जताया था। अपने ब्लॉग में बिग बी ने उन लोगों का शुक्रिया भी अदा किया था, जिन्होंने उनकी सेहत को लेकर चिंता जाहिर की थी और जल्द स्वस्थ होने की कामना की थी।
होंगे कामयाब एक दिन
पांच दशक से अधिक के करियर में सात हिंदुस्तानी से गुलाबो सिताबो तक सैकड़ों फिल्मों में तरह तरह के किरदारों में रूपहले परदे पर दिखने वाले अमिताभ की हेल्थ ने उनका साथ छोड़ा है। कई बार वह गंभीर रूप से बीमार होने पर अस्पताल में भर्ती हुए। हर बार अपने विल पावर, दुनिया भर में चाहने वालों की दुआओं और डॉक्टरों के प्रयास से वह ज़िंदगी की जंग जीतकर आते रहे हैं। बॉलीवुड के सबसे लोकप्रिय अभिनेता बिग बी की ख़ासियत यह है कि वह अक्सर अपने ब्लॉग और ट्विटर के माध्यम से अपना हेल्थ अपडेट अपने चाहने वालों के साथ शेयर करते रहते हैं। कोरोना से संक्रमित होने की सूचना दुनिया को उन्होंने ख़ुद दी। अब देश ही नहीं, विदेश में भी लोग उनके लिए दुआएं कर रहे हैं। संभवतः यह अमिताभ के चाहने वालों की दुआओं और ख़ुद अमिताभ का जुनून है कि वह इतनी बीमारियों को हराते हुए इस उम्र में इतने सक्रिय हैं। ऐसे में सब लोगों को पूरा विश्वास है कि अमिताभ जल्द ही स्वस्थ होकर सबके बीच फिर लौटेंगे।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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अमिताभ बच्चन, अभिषेक के बाद ऐश्वर्या व आराध्या भी कोरोना पॉजिटिव

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सदी के महानायक अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) और उनके परिवार के लिए बहुत मुश्किल समय है। अमिताभ बच्चन और अभिनेता बेटे अभिषेक बच्चन (Abhishek Bachchan) के शिवार को कोरोना पॉज़िटिव पाएं जाने के बाद आज बीएमसी ने कहा कि अभिनेत्री ऐश्वर्या रॉय बच्चन और बेटी आराध्या की कोरोना रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई है। इसी तरह अमिताभ बच्चन की पत्नी जया बच्चन, बेटी श्वेता नंदा, नाती अगस्त्या और नव्या नंदा की कोरोना रिपोर्ट निगेटिव आई है।

अभिनेता पिता-पुत्र को विले पार्ले पश्चिम के कोविड अस्पताल में परिवर्बतित किए गए नानावटी अस्पताल (Nanavati Hospital) में भर्ती कराया गया है। हालांकि दोनों पूरी तरह ठीक हैं और डॉक्टरों की देखरेख में हैं। दोनों में कोरोना के बहुत हल्के लक्षण पाए गए हैं। जबकि ऐश्वर्या और आराध्या अभी तक जलसा बंगले में हैं। बताया जाता है कि दोनों को कोरोना के कोई लक्षण नहीं दिख रहे हैं, लेकिन रिपोर्ट पॉजिटिव आई है।

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नानावटी अस्पताल ने रविवार की सुबह एक विशेष हेल्थ बुलेटिन (Health Bulletin) जारी करके कहा कि अमिताभ बच्चन और उनके बेटे अभिषेक बच्चन में कोरोना के हल्के लक्षण है। दोनों की तबीयत ठीक है। दोनों को डॉक्टरों के ऑब्जरवेशन में रखा गया है। अमिताभ बच्चन का ऑक्सीजन लेवल 95 है। तो चिंता की कोई बात नहीं।

जया बच्चन और ऐश्वर्या की रिपोर्ट निगेटिव

इस बीच अच्छी ख़बर यह है कि अभिनेत्री ऐशवर्या राय (Aishwarya Roy Bachchan) और उनकी बेटी आराध्या (Aradhya Bachchan) का कोरोना टेस्ट आज पॉजिटिव आई है। जबकि अभिनेत्री जया बच्चन (Jaya Bachchan) जया बच्चन, श्वेता नंदा, अगस्त्या और नव्या नंदा की कोरोना रिपोर्ट निगेटिव आई है। बीएमसी (BMC) की ओर से अमिताभ बच्चन के बंगले जलसा को रविवार को सिनेटाइज कर दिया गया है। इसके अलावा अमिताभ के सारे स्टॉफ का कोरोना टेस्ट कराया गया है।

अमिताभ बच्चन का ऑक्सीजन लेवल 95 है, जो सामान्य बताया जा रहा है। अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन को दूसरा कोरोना टेस्ट कराया जा रहा है। बताया जाता है कि आज सुबह दोनों का रैपिड एंटिजन टेस्ट हुआ था, जिसमें दोनों का कोरोना पॉजिटिव टेस्ट पाए गए। इसीलिए नानावटी में दोनों का दूसरा कोरोना टेस्ट कराया गया है।

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महाराष्ट्र के स्वास्थ मंत्री राजेश टोपे ने बताया कि अमिताभ बच्चन और उनके बेटे अभिषेक बच्चन को दो दिन से हल्का बुखार था। कोरोना का और कोई लक्षण नहीं था। इसके बावजूद आज दोनों का एहतियातन कोरोना टेस्ट कराया गया। शाम को आई रिपोर्ट में बताया गया कि दोनों को कोरोना पॉजिटिव संक्रमित हैं। इसके बाद शनिवार की रात दस बजे दोनों नानावटी अस्पताल में भर्ती हो गए।

रेखा का बंगला सील

इस बीच बीएमसी ने एक सिक्योरिटी गार्ड के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद मशहूर अभिनेत्री रेखा (Rekha) के बांद्रा पश्चिम के बैंड स्टैंड सी फेस पर स्थित बंगले को सील कर दिया है। कुछ दिन पहले गार्ड को खासी-सर्दी के बाद कोरोना टेस्ट हुआ था। कल शाम आई रिपोर्ट में उसे कोरोना पॉजिटिव पाया गया। इसके बाद बीएमसी की ओर से एहतियातन रेखा के बंगले को सील कर दिया गया है।

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अमिताभ बच्चन ने खुद ट्विट करके लोगों को आगाह किया है कि जो लोग उनके संपर्क में आए हैं, वे लोग कृपया अपना कोरोना टेस्ट करवा लें। अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन को कोरोना के हल्के लक्षण हैं। लिहाजा, डॉक्टरों ने कहा कि एक दो दिन में दोनों बच्चन को असप्ताल से छुट्टी दे दी जाएगी।

नानावटी अस्पताल के सूत्रों ने बताया कि पिता-पुत्र दोनों को दो दिन से वायरल फीवर की शिकायत थी। एहतियातन उन्होंने दोनों ने आज सुबह ही अपना कोरोना टेस्ट करवाया। आज शाम को ही रिपोर्ट आ गई जिसमें दोनों को कोरोना पॉजिटिव बताया गया। इसके बाद डॉक्टरों ने अमिताभ-अभिषेक को भर्ती होने की सलाह दी और इसे गोपनीय रखने की भी सलाह दी।

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लेकिन अमिताभ बच्चन कई लोगों के संपर्क में थे, इसलिए उन्होंने खुद ट्विव करके लोगों को जानाकारी दी कि वह कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं, लिहाजा जो लोग उनके संपर्क में आए हैं, वे अपना कोरोना टेस्ट करवा लें। अमिताभ ने कहा, “पिछले 10 दिनों में जो लोग मेरे संपर्क में आए हैं, उनसे गुजारिश है कि वे भी अपना कोरोना टेस्‍ट करा लें।”

उधर अभिषेक बच्चन ने भी ट्विट करके अपने कोरोना पॉजिटिव होने की जानकारी अपने चाहने वालों को दी। उन्होंने कहा, “आज हम लोगों ने कोरोना को टेस्ट करवाया, जिसमें मुझे और डैड का कोरोना पॉजिटिव आया है। हालांकि कोरोना का लक्षण हल्का है। इसलिए चिंता करने की कोई वजह नहीं है।”

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अभी 10 जुलाई को अभिषेक बच्चन की बेव सीरीज ब्रीथ इनटू द शैडो प्राइम विडियो पर रिलीज हुई है। इस थ्रीलर सीरीज को दर्शकों से बहुत अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। इसी बीच पता चला है कि पूरे बच्चन परिवार यानी पत्नी जया बच्चन, पुत्रवधू ऐश्वर्या राय बच्चन, पोती आराध्या बच्चन का भी कोरोना टेस्ट कराया गया है, बाकी सबकी रिपोर्ट निगेटिव आई है। अब पूरा बच्चन परिवार सेल्फ आइसोलेशन में है।

77 वर्षीय अमिताभ बच्चन बहुत सक्रिय अभिनेता रहे हैं। फिलहाल वह अपने बेहद लोकप्रिय शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के 12 वें सस्करण पर काम कर रहे हैं। अभी अमेजन प्राइम विडियो पर उनकी फिल्म गुलाबो-सिताबो आई थी, जो बहुत अधिक चर्चा में रही है। इस फिल्म में अमिताभ ने चुन्नन मिर्जा नवाब का किरदार निभाया है। इस फिल्म में आयुष्मान खुराना भी उनके साथ हैं।

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महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और विधान सभा में विपक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस ने अमिताभ बच्चन के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से भी उनके स्वस्थ होने की कामना की है। बोमन ईरानी ने लिखा है, आप योद्धा हैं सर, कोपोना को हराकर जल्द ही घर आएंगे।

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रवीना टंडन ने भी ट्विट करके उनके ठीक होने की कामना की है। परेश रावल ने कामना की है, कि आप जल्द स्वस्थ हो जाइए सर। सोशल मीडिया पर अमिताभ बच्चन के चाहने उनके बारे में जानने के लिए बेताब बताए जाते हैं। अमिताभ की आने वाली फिल्म है ब्रम्हास्त्र। नानाटवटी अस्पताल की ओर से जारी हेल्थ बुलेटिन के बाद लोगों ने राहत की सांस ली है।

इस बीच नानावटी अस्पताल को पुलिस ने कोर्डनऑफ कर दिया है, ताकि अनावश्यक भीड़ न जुट सके, क्योकि नानावटी खुद कोविड अस्पताल है। हालांकि वह लोगों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई है। नानावटी अस्पताल के कोविड अस्पताल होने के कारण किसी को अंदर जाने की अनुमति नहीं है।  इस बीच अमिताभ बच्चन के स्वस्थ होने की कामना करते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किए जा रहे हैं।

अमिताभ बच्चन का विडियो

इस विडियो को देखें, अमिताभ का नानावटी अस्पताल के डॉक्टरों-नर्सों के लिए

अमिताभ बच्चन ने विडियो में कहा, डॉक्टर भगवान का रूप बन गए हैं।

क्षमा बड़न को चाहिए…

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फॉरगिवनेस थेरेपी…

क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।
का रहीम हरी का घट्यो, जो भृगु मारी लात।।

ग़ुस्सा या उद्दंडता करने वाले व्यक्ति हमेशा छोटे कहे जाते हैं और क्षमा करने वाले लोग ही बड़े बनते हैं। महाकवि रहीम ने अपने इस दोहे में इसी भावना की व्याख्या की है। इसीलिए हिंदी में क्षमा के लिए अनगिनत शब्द और संबोधन गढ़े गए हैं। कहीं क्षमा को मानवता का मोती कहा गया है तो कहीं बड़प्पन। दुनिया के हर धर्म-संप्रदाय में क्षमा की महिमा बतलाई गई है। आधुनिक मेडिकल युग में क्षमा चिकित्सा थेरेपी के रूप में उभर चुका है। इसे कहते हैं, फॉरगिवनेस थेरेपी। इससे कई मानसिक रोगों का उपचार हो रहा है और लोग दर्द से छुटकारा पा रहे हैं। कहने का मतलब, इन दिनों क्षमा मेडिकल जगत में भी एक बहुत बड़े हथियार के रूप में सामने आ रहा है।

बड़प्पन है क्षमा

अगर आप किसी को उसकी हरकतों के बदले माफ़ कर देते हैं तो यह आपका बड़प्पन और भलमनसाहत माना जाता है। इससे आपको भी मानसिक सुकून मिलता है। हलकापन महसूस होता है। ऐसा लगता है, कोई बड़ा भार अचानक मन से उतर गया है। जैसे किसी बीमार को बीमारी से मुक्ति मिल जाए तो वह बहुत राहत महसूस करता है। ठीक उसी तरह क्षमा से क्षमा करने वाले को राहत मिलती है। इसीलिए इसे चिकित्सीय थैरेपी की प्रक्रिया के रूप में देखा गया है। तकनीकी बिंदु यह हैं कि क्षमा करने के बाद आप बहुत ख़ुश होते हैं। इससे आपके शरीर में रक्त प्रवाह तेज़ होता है, जिसका मेडिकल इंपैक्ट ह्यूमन बॉडी पर पड़ता है और दर्द या बीमारी से छुटकारा मिल जाता है।

सुकून की अनुभूति

2015 में मायो क्लिनिक में प्रकाशित रिसर्च में कहा गया है कि क्षमा यानी फ़ॉरगिवनेस सेहत के लिए फ़ायदेमंद तो होता ही है, इससे कई बीमारियों का सफल इलाज भी संभव है। रिसर्च में साबित हुआ है कि किसी के प्रति पूर्वाग्रह या द्वेष रखने का असर कार्डीओवैस्क्यलर यानी दिल की नलियों और नर्वस सिस्टम पर दिखता है। दरअसल, परसनल ग्रजेज़ यानी व्यक्तिगत पूर्वाग्रह रखने वालों का ब्लड प्रेशर और हार्ट रेट्स तो बढ़ता ही है, इससे मस्कल टेंशन, अपने पर अंकुश रखने की भावना भी कम हो जाती है। जब हम आहत करने वाले को माफ़ करने की कल्पना करते हैं, तो सुकून भरी अनुभूति होती है और मन में पॉज़िटिविटी बढ़ती है। इससे मन तो बदलता ही है, मन का अवसाद भी ख़तम हो जाता है। एक दूसरे रिसर्च में भी कहा गया है कि माफ़ करने का मानव मन पर सकारात्मक असर पड़ता है जो सेहत के लिए रामबाण जैसा काम करता है।

स्वचिकित्सा पद्धति

माफ़ करने का यह मतलब नहीं कि जो कुछ हुआ है उसे भूल जाना, जाने देना या छोड़ देना। दरअसल, माफ़ करने का मतलब जो कुछ हुआ उसे स्वीकार करते हुए मन पर जो बोझ है, उसे हल्का करने की कोशिश करना। यह प्रक्रिया थोड़ी धीमी ज़रूर है, लेकिन वाकई है बेहद कारगर। यह महसूस करके निजात पाना है यानी खुद से ख़ुद का इलाज करके उबरना है। यह एक स्वचिकित्सा पद्धति भी है।

ग़ुस्सा एक मनोरोग

दरअसल, ज़िदगी के सफ़र में कई बार कुछ ऐसी घटनाएं हो जाती हैं, जो दिलोदिमाग़ पर गहरे पैठ कर जाती हैं। जब भी उस घटना की याद आती है, व्यक्ति आग-बबूला हो उठता है। उस घटना विशेष के लिए ज़िम्मेदार व्यक्ति के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा और मुखर हो उठता है। ऐसी हालत में ग़ुस्सा करने वाला व्यक्ति की हालत मनोरोगी जैसी हो जाती है। वह ख़ुशी के समय भी वहीं कटुता भरी घटना को याद करके अंदर ही अंदर दुखी होने लगता है। दरअसल, जब क्रोध आपके जीवन पर असर डालने लगे तो उससे मुक्त होना ज़रूरी है। मन की इस पीड़ा को मिटाने के लिए उस व्यक्ति को माफ़ कर देना सब्से अच्छी पॉलिसी है। इससे क्रोध से होने वाले मानसिक और दूसरे नुक़सान से बचा जा सकता है।

जॉन क्रिस्टॉफ अर्नोल्ड

मशहूर दार्शनिक लेखक जॉन क्रिस्टॉफ अर्नोल्ड ने अपनी चर्चित पुस्तक “व्हाई फॉरगिव” माफी के बारे में विस्तार से लिखा है। अर्नोल्ड भी क्रोध या बदले की भावना को धो डालने की नसीहत देते हैं। वह दावा भी करते हैं कि यह थेरेपी जब भी अपनाई जाती है, बहुत ज़्यादा कारगर साबित होती है। विशेषज्ञों के अनुसार माफ़ करने का तरीक़ा यह है कि अमुक आदमी की निजी, पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों में ख़ुद को रखकर देखा जाए। उस हालत को जीकर देखें। इससे सब स्वाभाविक लगेगा। बेशक सामने वाले ने जो कष्ट दिए थे, वे कुछ हल्के लगेंगे। क्षमा का अर्थ है किसी के अपराध या ग़लती पर स्वेच्छा से उसके प्रति भेदभाव और क्रोध को समाप्त कर देना।

महात्मा गांधी क्षमा के पक्षधर

पिछली सदी में महात्मा गांधी देश को एक अलग राह दिखाने का प्रयास कर रहे थे- वह थी अहिंसा और क्षमा की राह। गांधीजी ने कहा था, “कमज़ोर लोग कभी क्षमा नहीं करते, क्षमा करना या भूलना मज़बूत लोगों की विशेषता है.” गांधीजी को जेल में डाला गया, सड़कों पर पीटा गया, कई लोगों ने उन्हें मारने की साज़िश रची, लेकिन उन्होंने सबको माफ़ कर दिया। जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद ब्रिगेडियर जनरल डायर घृणा का पात्र था, लेकिन गांधीजी ने न सिर्फ़ उसे क्षमा किया, बल्कि ‘डायरवाद’ के ख़िलाफ़ आगाह भी किया था। गांधी का कहना था, ‘जनरल डायर के काम आना और निर्दोष लोगों को मारने में उसकी मदद करना मेरे लिए पाप समान होगा। पर, यदि वह किसी रोग का शिकार है तो उसे वापस जीवन देना मेरे लिए क्षमा और प्यार का अभ्यास होगा।’ गांधी ने यहां तक लिखा कि डायर ने ‘मात्र कुछ शरीरों को नष्ट किया, पर कई लोगों ने एक राष्ट्र की आत्मा को मारने का प्रयास किया।’ उन्होंने कहा कि ‘जनरल डायर के लिए जो ग़ुस्सा जताया जा रहा है, मैं समझता हूं, काफी हद तक उसका लक्ष्य ग़लत है।’

कमरदर्द से भी राहत

शायद आपको यक़ीन न हो लेकिन यह सच है कि किसी को उसकी ग़लती के बदले माफ़ कर देने से बड़ी संख्या में लोगों को कमरदर्द, क्रोध और डिप्रेशन से राहत मिली है। ड्यूक यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर की स्टडी के मुताबिक जिनकों लंबे समय से कमर दर्द था, उनमें से बड़ी संख्या में लोगों से कहा गया कि अगर किसी ने उनके साथ बुरा किया है तो उसे माफ़ कर दें। स्टडी के सूत्राधार ड्यूक यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के डिपार्टमेंट ऑफ़ सायकियाट्री के प्रोफेसर डॉ. कैरसन के मुताबिक ऐसा करने पर ढेर सारे लोगों के बताया कि उनका कमर दर्द तो कम हुआ ही है, उन्हें क्रोध और डिप्रेशन जैसी बीमारियों से भी मुक्त महसूस कर रहे हैं। इस स्टडी रिपोर्च को बाद में अटलांटा में क्षमा सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

गुरुदत्तः व्यक्तित्व पर हावी हो गई थी निराशा व अवसाद…

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मानव का स्वभाव एक अजीब पहेली रही है। कभी-कभी कोई इतना अच्छा लगने लगता है, इतना सुकून देने लगता है कि उसे पाने का बरबस मन करने लगता है। तमाम कोशिशों के बाद भी जब वह नहीं मिलता है तो लगता है कि वह नहीं तो कुछ भी नहीं। इसके बाद जीवन ही अर्थहीन और शरीर नश्वर लगने लगता है। तमाम उपलब्धियां, शोहरत या धन-दौलत निरर्थक हो जाते हैं, क्योंकि ये तमाम साधन मानव मन को संतुष्टि प्रदान नहीं कर पाते। यह असंतुष्टि एक बेचैनी पैदा करती है। उसी असंतुष्टि और बेचैनी ने गुरुदत्त की फिल्मों को अमरता प्रदान की, लेकिन उसी असंतुष्टि ने उनसे उनके ही जीवन को छीन लिया।

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ईश्वर ने उन्हें संतुष्टि नहीं दी
कभी गुरुदत्त के दिल की धड़कन रहीं अभिनेत्री वहीदा रहमान ने एक डॉक्यूमेंटरी में गुरुदत्त का ज़िक्र करने पर कहा, “मरना ही शायद उनकी नियति थी। उनके अंदर अपने आपको ही सज़ा देने की प्रवृत्ति थी। सच पूछिए तो उनको कोई नहीं बचा सकता था, ऊपर वाले ने उन्हें सब कुछ दिया था। कामयाबी दी थी, शोहरत दी थी, वैभव दिया था और शानदार घर परिवार दिया था। परंतु ईश्वर ने उनको संतुष्टि नहीं दी। यदि वह असंतुष्टि गुरुदत्त की बेमिसाल क्रिएटिविटी की वजह थी, तो वही असंतुष्टि उनकी बेचैनी की भी वजह थी। गुरुदत्त जैसे लोग कभी भी संतुष्ट नहीं रह सकते, जो चीज़ उन्हें ज़िंदगी में नहीं मिल सकती, वे उसी की तलाश करते हैं और तलाशते-तलाशते मौत को गले लगा लेते हैं, क्योंकि वे उस संतुष्टि की तलाश मौत में करने लगते हैं।”

न मिलने वाली चीज़ की तलाश थी
वहीदा रहमान ने आगे कहा, “गुरुदत्त में जीने या बचने की चाह ही नहीं बची थी। उनका मन उचट गया था। मैंने कई बार उन्हें समझाने की कोशिश की कि इस एक छोटी सी ज़िंदगी में तुम्हें सब कुछ नहीं मिल सकता और मौत हर सवाल का जवाब नहीं होती है। लेकिन इसके बाद भी वे संतुष्ट नहीं हुए। उन्हें उस चीज़ की तलाश थी, जो उन्हें उस जीवन में मिल ही नहीं सकती थी। इसी कारण निराशा और अवसाद उनके समूचे व्यक्तित्व पर हावी हो गया। उनकी ज़िंदगी शराब और उनकी नींद सोने की गोली की ग़ुलाम बन कर रह गई। उनकी असंतुष्टि ने हिंदी सिनेमा को कुछ कालजयी फिल्मों से समृद्ध बनाया तो उसने हिंदी सिनेमा से उसका बेहद संवेदनशील और जीनियस फिल्मकार छीन भी लिया।”

वहीदा से बेइंतहा मोहब्बत थी
गुरुदत्त की ज़िंदगी का एक सच यह भी था कि वह अपनी हिरोइन वहीदा रहमान से बेइंतहा मोहब्बत भी करने लगे थे। वहीदा भी उन्हें टूटकर चाहती थीं। लेकिन वहीदा यह देखकर बहुत अधिक परेशान रहने लगीं, कि उनकी वजह से गुरुदत्त-गीता के रिश्ते बिगड़ते जा रहे हैं। वह नहीं चाहती थीं कि उनकी वजह से गुरुदत्त का परिवार टूटे। जब उनको पता चला कि उनके कारण गुरुदत्त और गीता एक दूसरे से अलग हो गए तो उन्होंने गुरुदत्त से अचानक से दूरियां बना लीं। कहना न होगा कि उस समय के हालात और गीता दत्त की वजह से गुरुदत्त वहीदा को प्रेमिका के रूप में अपना नहीं पाए।

चाहते थे गीता जीवन में लौट आए
गुरुदत्त के जीवन से जब वहीदा दूर चली गईं, तो वह अपने परिवार में अपनी ख़ुशी तलाशना चाहते थे। मगर गीता दत्त घर वापस लौट आने की उनकी पुकार अनसुना करती रहीं। कहा जाता है कि तब गुरुदत्त को याद आने लगा, एक दशक पुराना वह दौर जब वह और गीता एक दूसरे को प्रेमपत्र लिखा करते थे। अचानक से गुरुदत्त के अंदर फिर से अपनी गीता को पाने की लालसा तीव्र हुई, लेकिन गीता का दिल टूट चुका था, लिहाज़ा वह उनकी ज़िंदगी में वापस नहीं लौटीं। गीता और वहीदा दोनों को खो देने के बाद उनकी खाली ज़िंदगी को शराब और नींद की गोलियों ने आबाद किया।

तन्हाई ले गई गहरे डिप्रेशन में
दरअसल, गुरुदत्त गीता के साथ-साथ तीनों बच्चों से बेइंतहां प्यार करते थे। निधन से एक दिन पहले उन्होंने गीता से आग्रह किया था कि उनसे और बच्चों से मिलना चाहते हैं। गीता ख़ुद तो मिलने के लिए तैयार नहीं हुईं, परंतु बच्चों को शूटिंग लोकेशन पर भेजने के लिए राजी हो गईं। सुबह गुरुदत्त ने कार भेजी और बच्चे आ गए। पूरा दिन उन्होंने बच्चों के साथ गुजारा। बच्चे भी पापा से मिलकर बहुत ख़ुश हुए। शाम को गुरुदत्त ने उन्हें गीता के पास ड्रॉप कर दिया। दिन भर बच्चों के साथ गुज़ारने के बाद वह चाहते थे, सब कुछ पहले जैसा हो जाए और गीता वापस लौट आए। पर ऐसा नहीं हुआ, लिहाज़ा, गुरुदत्त डिप्रेशन में चले गए, बिल्कुल अकेले हो गए। उनके अकेले पड़ जाने की एक वजह यह भी थी कि वे अति की सीमा तक ‘पज़ेसिव’ थे।

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आख़िरी बार आशा भोसले से बात
कुछ साल पहले गुरुदत्त पर बनी एक डॉक्यूमेट्री में गुरुदत्त की फिल्म ‘साहब, बीवी और ग़ुलाम का एक मशहूर गाना ‘भंवरा बड़ा नादान हाय, बगियन का मेहमान हाय’ गाने वाली कालजयी गायिका आशा भोसले ने उनके अंतिम दिन के बारे में कहा, “दुख की बात है, कि जब जिस रात को गुरुदत्त साहब गए, सबसे आख़िरी बार उनकी बात सिर्फ़ मुझसे हुई थी, रात 12 बजे उन्होंने फोन करके मुझसे पूछा था, कि तुम्हारे पास गीता है क्या? मैंने कहा, नहीं, गीता जी चली गई हैं, अब यहां नहीं है, यहां से चली गईं। फिर उन्होंने मुझसे पूछा, कहां मिलेगी वह मुझे? मैंने कहा, शायद घऱ गई होंगी। इसके बाद उन्होंने धीरे से फोन रख दिया और सुबह वह ख़बर मिली जिसकी किसी को कल्पना भी नहीं थी।”

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तलाश में भटकते रहे ज़िंदगी भर
मतलब गीता दत्त को फिर से पाने और पुराने दिन जीने की गुरुदत्त की हर कोशिश असफल हो रही थी। वह एक अजीब सी बेचैनी में जी रहे थे। वह जिंदगी भर किसी न किसी की तलाश में ही भटकते रहे। जीवन के अंतिम समय में वह अपनी प्रियतमा गीता को तलाश रहे थे। गीता की कमी उन्हें लगातार बेचैन किए जा रही थी। गुरुदत्त ने इसी बेचैनी और संवेदनशीलता के माध्यम से लगातार अद्भुत और अद्वितीय फिल्में बनाई थीं। अब गुरुदत्त को गीता और बच्चों की याद फिर से बेचैन किए जा रही थी। उन्हें लग गया था कि इस बार बेचैनी उनको ही अपने साथ लेकर जाने वाली है, लेकिन वह जाना नहीं चाहते थे।

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तो मेरा मरा हुआ मुंह देखोगी
लिहाज़ा, अंत में उन्होंने ख़ुद गीता दत्त को फोन लगाया और उनसे और बच्चों से मिलने की इच्छा जताई, लेकिन गीता ने आने से साफ़ इंकार कर दिया। बच्चों को भी भेजने से मना कर दिया। गुरुदत्त ने गीता से कहा कि कम से कम बेटी को ही भेज दो। लेकिन नाराज़ गीता ने उनके उस आग्रह को भी ठुकरा दिया। फिर गुरुदत्त ने कहा भी कि अगर आज बच्चों को नहीं भेजा तो मेरा मरा हुआ मुंह देखोगी, पर गीता ने उनकी बात नहीं मानी। गीता को नहीं मालूम था, कि इस बार वह धमकी नहीं दे रहे हैं बल्कि हक़ीक़त बयां कर रहे हैं।

जब गीता रॉय से हुआ प्यार
दरअसल, गुरुदत्त का पूरा जीवन ही उनकी असंतुष्टि को बयां करता है। जब वह फिल्म ‘बाज़ी’ बना रहे थे, तो एक दिन फ़िल्म का एक गाना रिकार्ड हो रहा था। उस रिकार्डिंग के दौरान गायिका के रूप में मशहूर हो चुकी गीता घोष रॉय चौधरी से उनकी पहली बार मुलाकात हुई। पहली नज़र में ही उनको गीता से प्यार हो गया। हालांकि उन्होंने उस समय अपने दिल की बात को होंठों तक आने नहीं दिया। मुलाकात का सिलसिला चलता रहा। उनकी दोस्ती इतनी आगे बढ़ती रही। उसी दौरान गीता रॉय ने भी महसूस किया कि वह गुरुदत्त को चाहने लगी हैं। उस समय गुरुदत्त माटुंगा में रहते थे, जबकि गीता दादर में। गीता अपनी कार लेकर उनसे मिलने माटुंगा चली आया करती थीं। घर में बहाना कर देती थीं कि लल्ली यानी ललिता लाज़मी से मिलने जा रही हैं।

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बहुत ही सरल स्वभाव की थीं गीता
गीता रॉय तब तक गायिका के रूप में बहुत मशहूर हो चुकी थीं। इसके बावजूद वह इतनी सरल थीं कि गुरुदत्त के घर रसोई में सब्ज़ी काटने बैठ जाती थीं। गुरुदत्त के असिस्टेंट राज खोसला गाने का बहुत शौक था। गुरुदत्त के यहां होने वाली बैठकों में राज और गीता डुएट गाया करते थे। पूरा परिवार बैठकर उनके गाने सुनता था। गुरु दत्त और गीता एक दूसरे को प्रेमपत्र लिखने लगे। गुरुदत्त की छोटी बहन ललिता लाजमी उन दोनों के पत्रों को एक दूसरे तक पहुंचाती थीं। तीन साल तक प्यार करने के बाद आखिरकार 26 मई 1953 को गुरुदत्त और गीता रॉय विवाह बंधन में बंध गए। गीता रॉय गीता दत्त बन गईं।

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गुरुदत्त ने मां के साथ पास किया मैट्रिक
गुरुदत्त का बचपन का नाम वसंत पादुकोणे था। उनका जन्म 9 जुलाई 1925 को बेंगलुरु में कोंकण के चित्रपुर सारस्वत ब्राह्मण शिवशंकर पादुकोणे और वसंती के यहां हुआ। पिता बैंक में मुलाजिम थे। वह कुछ साल विद्यालय के हेडमास्टर भी थे। मां गृहिणी थीं। मां और वसंत ने मैट्रिक साथ-साथ एक ही साल पास किया और स्कूल अध्यापिका हो गईं। वह लघुकथाएं भी लिखती थीं और बंगाली उपन्यासों का कन्नड़ भाषा में अनुवाद भी करती थीं। बाद में पिता को बर्मा सेल कंपनी में नौकरी मिल गई और परिवार कलकत्ता चला गया। गुरुदत्त का बचपन कलकत्ता के भवानीपुर इलाके में गुजरा। उनकी मातृभाषा कोंकणी थी, लेकिन बंगाल का बौद्धिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव उन पर काफी पड़ा। वह बंगालियों की तरह ही बंगाली बोलते थे।

जब वह वसंत से गुरुदत्त हो गए
गुरुदत्त की बहन ललिता लाजमी बताती हैं, “जब वह 18 महीने के थे तो कुएं में गिर गए। तब दादी ने उनकी जान बचाई। तब स्वामी रामदास ने उनकी जन्मकुंडली देखकर बताया कि वसंत नाम अशुभ है तो दादी ने उनका नाम गुरुदत्त रख दिया, क्योंकि वह गुरुवार को पैदा हुए थे और वह वसंत पादुकोणे से गुरुदत्त पादुकोणे हो गए। जब वह फिल्मों में आए तो ज्ञान मुखर्जी ने 1950 में उनसे उनके नाम से सरनेम हटाने को कहा, तो वह केवल गुरुदत्त हो गए। यह नाम उनके लिए बहुत लकी साबित हुआ। अगले साल उनके निर्देशन में रिलीज़ हुई ‘बाज़ी’ सुपरहिट रही।”

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पं. उदय शंकर से सीखा नृत्य
ललिता आगे बताती हैं, “वह बचपन से ही बहुत नटखट और जिद्दी थे। सवाल पूछते रहना उनकी आदत थी। कभी-कभी उनके सवालों का जवाब देते-देते मां परेशान हो जाती थीं। उन्हें पतंग उड़ाने का बहुत शौक था और अपनी पतंगें ख़ुद बनाते थे। उन्हें बचपन से ही नाचने का भी शौक था। बचपन में ही उन्होंने संपेरा डांस बनाया और उस पर नृत्य किया। उसके लिए उन्हें तब पांच रुपए का इनाम मिला था। 1941 में प्रसिद्ध नर्तक और सितार वादक पं. रवि शंकर के बड़े भाई पं उदय शंकर से नृत्य सीखने अल्मोड़ा चले गए। वहां उदय शंकर उनके हुनर से इतने प्रभावित हुए कि अपनी नृत्य अकादमी से उन्हें पांच साल के लिए 75 रुपए वार्षिक छात्रवृत्ति दिलवा दी। गुरुदत्त नृत्य अकादमी में नृत्य, नाटक एवं संगीत की तालीम लेने लगे। 1944 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण उदय शंकर इंडिया कल्चर सेंटर बंद हो गया तो गुरुदत्त वापस अपने घर लौट आए।”

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टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी की
ललिता ने आगे कहा, “सोलह साल की उम्र में उन्हें लीवर ब्रदर्स फैक्ट्री में चालीस रुपए माह की टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी मिल गई। जब उन्हें पहली तनख़्वाह मिली तो उन्होंने अपने टीचर के लिए भगवत् गीता, मां के लिए साड़ी, पिता के लिए कोट और मेरे फ़्रॉक ख़रीदी। बड़े होने पर जब भी वे गीता के लिए कोई उपहार खरीदते थे तो मेरे लिए भी कुछ न कुछ ज़रूर लाते थे। वह हम भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। जब मेरी आत्मा राम में लड़ाई होती थी तो वह आकर मुझे बचाते थे।”

‘चांद’ में की श्रीकृष्ण की भूमिका
1944 में उन्होंने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया और अपने माता पिता के पास बंबई लौट आए। उनके चाचा ने उनकी नौकरी पुणे की प्रभात फ़िल्म कंपनी में लगवा दी। पुणे में सबसे पहले 1944 में उन्हें ‘चांद’ नामक फ़िल्म में श्रीकृष्ण की छोटी सी भूमिका निभाने को मिली। 1945 में अभिनय के साथ ही निर्देशक विश्राम बेडेकर के सहायक का काम भी देखते थे। 1946 में उन्होंने अन्य सहायक निर्देशक पीएल संतोषी की फ़िल्म ‘हम एक हैं’ का नृत्य निर्देशन किया। वहीं फिल्मकार वी शांताराम ने कला मंदिर के नाम स्टूडियो खोला था। पुणे में ही उनकी मुलाकात अभिनेता रहमान और देव आनंद से हुई। उनके परिचय को लेकर एक रोचक प्रसंग है।

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जब देव आनंद की शर्ट पहन लिए
गुरुदत्त और देव आनंद कपड़े एक ही धोबी से धुलवाते थे। धोबी ने ग़लती से शर्ट की अदला-बदली कर दी। दोनों ने एक दूसरे की शर्ट पहन भी ली। जब देव स्टूडियो में घुस रहे थे तो गुरुदत्त ने हाथ मिलाते हुए कहा, “मैं निर्देशक बेडेकर का असिस्टेंट हूँ।” उनकी नज़र देव की शर्ट पर पड़ी और पूछा, “शर्ट आपने कहां से ख़रीदी?” देव सकपकाए पर बोले, “मेरे धोबी ने मुझे किसी की सालगिरह पर पहनने के लिए दी है। लेकिन आपने शर्ट कहां से ख़रीदी?” गुरुदत्त ने शरारती अंदाज़ में कहा, “मैने तो शर्ट कहीं से चुराई है।” उन्होंने ज़ोर का ठहाका लगाया, एक दूसरे से गले मिले और हमेशा के लिए एक दूसरे के दोस्त हो गए। एक दिन अपने बियर के गिलास लड़ाते हुए गुरुदत्त ने कहा, “देव अगर कभी मैं निर्देशक बना तो तुम मेरे पहले हीरो होगे।” देव ने भी उतनी ही गहनता से जवाब दिया, “और मैंने अगर फिल्म बनाई तो तुम मेरे पहले निर्देशक होगे।”

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इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया में लिखा
प्रभात फ़िल्म कंपनी से उनका अनुबंध 1947 में ख़त्म हो गया। बाद में प्रभात के सीईओ बाबूराव पै के सहायक के रूप में फिर से नौकरी मिल गई। कुछ समय बाद वह नौकरी भी छूट गई तो क़रीब दस महीने गुरुदत्त बेरोज़गारी में माटुंगा में परिवार के साथ रहे। इसी दौरान, उन्होंने अंग्रेज़ी में लिखने की क्षमता विकसित की और इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया नामक अंग्रेजी साप्ताहिक के लिए लघु कथाएं लिखने लगे। इसी दौरान उन्होंने लगभग आत्मकथात्मक शैली में एक फ़िल्म की पटकथा लिख डाली। मूल रूप से यह पटकथा कशमकश के नाम से लिखी गयी थी। बाद में इसी पटकथा को उन्होंने ‘प्यासा’ के नाम में बदल दिया। 1947 में गुरुदत्त ने बंबई में अपने समय के दो अग्रणी निर्देशकों अमिय चक्रवर्ती और ज्ञान मुखर्जी के साथ काम किया। अमिय चक्रवर्ती की फ़िल्म ‘गर्ल्स स्कूल’ और ज्ञान मुखर्जी के साथ बॉम्बे टॉकीज की फ़िल्म ‘संग्राम’ में काम किया।

सुपरहिट ‘बाज़ी’ का निर्देशक किया
बहरहाल देव आनंद को पुणे में किया गया वादा याद था। उन्होंने अपनी कंपनी नवकेतन के बैनर तले बनी पहली फ़िल्म ‘बाज़ी’ में निर्देशक के रूप में गुरुदत्त को अवसर दिया। फ़िल्म निर्माण के दौरान बलराज साहनी ने उन्हें इंदौर के बदरुद्दीन जमालउद्दीन काज़ी से मिलवाया, जो बाद में जॉनी वाकर नाम से मशहूर हुए। वो बस कंडक्टर की नौकरी करते थे और फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल किया करते थे। गुरुदत्त जॉनी वाकर से इतने प्रभावित हुए कि उनके लिए ख़ास तौर से एक रोल लिखवाया हालांकि, तब तक ‘बाज़ी’ आधी बन चुकी थी। बहरहाल, 1951 में रिलीज ‘बाज़ी’ फ़िल्म सुपरहिट साबित हुई और उसने गुरुदत्त के जीवन को ही बदल दिया। उन्होंने अपने परिवार के लिए पहला सीलिंग फ़ैन ख़रीदा।

गुरुदत्त का फिल्म में स्वर्णिम दौर
हिंदी फिल्मों का सुनहरा दौर गुरुदत्त के साथ शुरू हुआ। वह समर्थ अभिनेता और बेमिसाल निर्देशक थे। वह 1950 के दशक के लोकप्रिय सिनेमा के प्रसंग में काव्यात्मक और कलात्मक फ़िल्मों के व्यावसायिक चलन को विकसित करने के लिए भी जाने जाते हैं। उन्होंने 1950 और 1960 के दशक में जाल (1952), बाज़ (1953) आर पार (1954), मिस्टर एंड मिसेज 55, (1955), सीआईडी (1956)), सैलाब (1956), प्यासा (1957), 12 ओ’ क्लॉक (1958), काग़ज़ के फूल (1959), चौदहवीं का चांद (1960), सौतेला भाई (1962), साहिब बीबी और ग़ुलाम (1962), भरोसा (1963), बहूरानी (1963), सुहागन (1964) और सांझ और सवेरा (1964) जैसी कई उत्कृष्ट फ़िल्में बनाईं। काग़ज़ के फूल को छोड़कर उनकी प्रायः सभी फिल्में हिट हुईं और सराही गईं। उनकी फ़िल्मों को जर्मनी, फ्रांस और जापान में अब भी सराहा जाता है।

फिल्म की बारीक़ियों से रूबरू कराया
गुरुदत्त पहले ऐसे निर्देशक थे, जिन्होंने दर्शकों को फिल्मों की बारीक़ियों से रूबरू करवाया। उनकी स्टोरी टेलिंग की क्षमता अद्वितीय थी। क्राइम थ्रिलर फिल्मों के निर्माण में उन्होंने एक मानक तय किया। उनकी फिल्मों में कहानी की कई तहें दिखाई देती हैं। वो सामाजिक राजनीतिक परिदृश्य को समझकर फिल्म बनाने वालों में से थे। उनकी फिल्मों में कोई चीज बेवजह नहीं मिलती थी। इसीलिए प्यासा और काग़ज़ के फूल को टाइम पत्रिका की 100 सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में शामिल किया गया। साइट एंड साउंड आलोचकों और निर्देशकों के सर्वेक्षण में गुरुदत्त सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म निर्देशकों की सूची में शामिल किए गए। उन्हें “भारत का ऑर्सन वेल्स” कहा जाता है। 2010 में उनका नाम सीएनएन की ‘सर्वश्रेष्ठ 25 एशियाई अभिनेताओं’ के सूची में भी सम्मिलित किया गया।

पहली बार गए कोठे पर
फिल्म ‘प्यासा’ (Pyasa) के निर्माण के समय फैसला लिया गया था कि फिल्म की कहानी चकले पर आधारित होगी, लेकिन इसमें एक दिक्क़त थी, गुरुदत्त कभी कोठे पर नहीं गए थे। फिल्म के लिए वह जब कोठे पर गए तो वहां का नज़ारा देखकर हैरान रह गए। वहां नर्तकी तक़रीबन सात महीने के गर्भ से थी थी। यह मंजर देख गुरुदत्त ने दोस्तों से कहा, “चलों यहां से।” वह नोटों की गड्डी वहीं रखकर बाहर निकल आए। उन्होंने साहिर लुधियानवी से ‘जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां है’ गाना लिखवाया।

‘कागज के फूल’ वक़्त से पहले बनी फिल्म
गुरुदत्त की आइकॉनिक फिल्म ‘कागज के फूल’ का ज़िक्र करते हुए एक बार शोमैन राज कपूर ने कहा था,”यह फिल्म समय से पहले बन गई, आज लोग इसे नहीं समझ पाएंगे, आने वाली नस्ले इस पर नाज़ करेंगी।” राजकपूर की बात वाक़ई सच निकली। काग़ज़ और फूल की बड़ी असफलता से गुरदत्त को बहुत धक्का लगा था। लेकिन जो फिल्म उस समय सिनेमा हॉल में एक हफ्ते भी नहीं चल सकी, आज वह दुनिया की 11 बड़ी यूनिवर्सिटीज़ के फिल्म कोर्सेस में पढ़ाई जाती है।

जीवन में वहीदा रहमान की इंट्री
गुरुदत्त के जीवन में वहीदा रहमान की इंट्री 1956 में ‘प्यासा’ फिल्म की शूटिंग के दौरान हुई। उसी समय से गुरुदत्त का नाम वहीदा से जुड़ने लगा। दोनों के केमिस्ट्री बहुत मिलती थी। संयोग से प्यासा 1950 के दशक से सुपरहिट फिल्म साबित हुई और गुरुदत्त-वहीदा रहमान की जोड़ी रूपहले पर ख़ूब पसंद की जाने लगी। 1958 में रिलीज ‘12 ओ’ क्लॉक’ ने इस जोड़ी को स्थापित कर दिया। हालांकि काग़ज़ के फूल हालांकि बॉक्स आफिस पर एक हफ्ते नहीं चली लेकिन फिल्म में गुरुदत्त और वहीदा के अभिनय की जम कर तारीफ़ हुई। स्वाभाविक रुप से दोनों के बीच आत्मीय रिश्ता बन गया। इसके बाद दोनों की चौदहवीं का चांद और साहिब बीबी और ग़ुलाम के रूप में दो और सुपरहिट फिल्में आईं। चौदहवीं का चांद हो, या आफताब हो, गाने को सुनकर यही लगता है कि शायद शकील बदायूंनी से गुरुदत्त ने वहीदा के लिए ही इसे लिखवाया था। इसीलिए यह गाना जब कानों के परदे से टकराता है तो मानस पटल पर सीधे हुस्न की मलिका वहीदा की तस्वीर उभर करती है।

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गुरुदत्त और गीता दत्त के रिश्ते में दरार
1953 में परिणय सूत्र में बंधने के बाद गुरुदत्त और गीता के जीवन की गाड़ी शानदार ढंग से चल रही थी। इस दौरान उनके दो बेटे तरुण और अरुण भी हुए। गुरुदत्त गीता से बेइंतहां प्यार करते थे पर वह इमोशनल होने के साथ ओवर पजेसिव थे। कहा जाता है कि शादी के बाद उन्होंने गीता को बाहर की फिल्मों में गाने को मना कर दिया। हालांकि चोरी-चोरी गीता दूसरे बैनर्स के लिए गाती रहीं। दरअसल, गड़बड़ी हुई वहीदा की फिल्मों में इंट्री और गुरुदत्त और वहीदा के जोड़ी के हिट होने से। जैसे-जैसे गुरुदत्त और वहीदा की जोड़ी हिट होती गई। वैसे-वैसे गीता दत्त के अंदर असुरक्षा की भावना और ग़लतफ़हमी बढ़ती गई। गुरुदत्त और गीता के रिश्तों में बनी दरार भी उसी अनुपात में बढ़ती गई।

गीता गुरुदत्त पर नज़र रखने लगीं
गीता के साथ मतभेद होने पर गुरुदत्त ज़्यादा समय स्टूडियो में ही बिताने लगे थे। इससे गीता का शक और गहरा हो गया। वह उन पर नज़र रखने लगीं। एक बार तो गीता नर्वस होकर रोती हुई दोस्त अबरार अल्वी के घर पहुंच गईं और उनसे गुरुदत्त-वहीदा के रिश्ते के बारे में पूछने लगीं। अल्वी ने समझाया कि ऐसी कोई बात नहीं है। आप बेफ़िक्र रहिए, लेकिन गीता समझ नहीं पाईं। एक दिन गुरुदत्त को चिट्ठी मिली, लिखा था, “मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती। अगर तुम मुझे चाहते हो तो आज शाम साढ़े छह बजे मुझसे मिलने नरीमन पॉइंट आ जाओ। तुम्हारी वहीदा।” गुरुदत्त ने चिट्ठी अल्वी को दिखाई। उन्हें पत्र फर्जी लगा। सच जानने के लिए गुरुदत्त अल्वी की कार से नरीमन पॉइंट पहुंचे, तो देखा कि गीता अपनी सहेली के साथ एक कार की पिछली सीट पर बैठी हैं। घर पहुंच कर दोनों में ज़बरदस्त झगड़ा हुआ और बातचीत बंद हो गई। दोनों में दूरियां बढ़ने लगीं और विवाद इतना बढ़ा कि गीता अपने बच्चों को लेकर मायके चली गईं।

वहीदा के साथ गुरुदत्त का निकाह
गुरुदत्त की गीता से पहले भी दो बार शादी हुई। पहली बार पुणे की विजया नाम की डांसर से शादी किए, जिसे वे पूणे से लाए थे। बाद में वह उन्हें छोड़कर चली गई तो दूसरी बार अपने माता पिता के कहने पर हैदराबाद की रहने वाली अपने ही रिश्ते की भानजी सुवर्णा से विवाह किया था। बहरहाल, वह रिश्ता भी टूट गया। गुरुदत्त पर कई किताबें लिखी गईं, उनमें हिंदी में तीन सत्य शरण के साथ अबरार अल्वी की लिखी किताब ‘टेन ईयर्स विद गुरुदत्तः अबरार अल्वी जर्नी’, नसरीन मुन्नी कबीर की ‘गुरुदत्तः अ लाइफ़ इन सिनेमा’ और अरुण खोपकर की ‘गुरुदत्तः ए ट्रेजडी इन थ्री एक्ट्स प्रमुख हैं।’ अबरार ने अपनी किताब में दावा किया है कि वहीदा उन्हें भाई मानती थीं उन्हें उस घटना के बारे में बताया जब गुरु दत्त वहीदा के साथ निकाह करने के लिए तैयार हो गए थे। वहीदा की बहन सईदा के पति रऊफ ने तो बंबई की जामा मस्जिद में जुमे की नमाज के बाद एलान कर दिया, “सुनो दोस्तों, मैं एक गुड न्यूज लेकर आया हूं। मशहूर डायरेक्टर गुरुदत्त इस्माल धर्म अपनाकर मेरी साली वहीदा रहमान से शादी करने जा रहे हैं।” फिल्म जगत में इसके बाद गुरु दत्त-वहीदा के निकाह की चर्चा होने लगी, जो कभी हुई ही नहीं।

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दो बार आत्महत्या की कोशिश की
गीता के बच्चों को लेकर चले जाने के बाद गुरुदत्त डिप्रेशन में चले गए। वह हमेशा आत्महत्या के बारे में सोचने लगे। दो बार खुदकुशी की कोशिश भी की। पहली बार कोशिश में तो बिल्कुल सुरक्षित बच गए, लेकिन जब दूसरी बार कोशिश की थी तो तीन दिन के लिए कोमा में रहे। जब कोमा से बाहर आए थे तो कहते हैं उन्होंने सबसे पहले ‘गीता’ का नाम लिया था। अबरार अल्वी के अनुसार गुरुदत्त अक्सर मरने के तरीकों के बारे में बातें करते थे। एक बार कहा था, “नींद की गोलियों को उस तरह लेना चाहिए जैसे मां बच्चे को गोलियां खिलाती है। पीसकर उसे पानी में घोल कर पी लो।” अबरार को उस समय लगा मज़ाक है। लेकिन गुरुदत्त तो उसका परीक्षण अपने ही ऊपर कर लिया।

गुरुदत्त की अंतिम रात
9 अक्तूबर को दिन भर काम किया। ‘बहारें फिर भी आएगी’ के सेट पर थे और गुरुदत्त सामान्य लग रहे थे। उस दिन सेट पर उनके बच्चे भी आए थे। हालांकि, बाद में एक लीड स्टार ने शूट कैंसिल कर दी, इससे वह नाराज थे। उन्हें अगले दिन का प्लान बदलना पड़ा था। वह शाम भाई देवी दत्त के साथ कोलाबा शॉपिंग करने गए। जहां तरुण और अरुण के लिए सामान खरीदे। इसके बाद घर वापस आए। बाद में गुरुदत्त ने देवी को घर जाने को कहा क्योंकि अबरार अल्वी आने वाले थे। दोनों का ड्रिंक करते हुए काम करने का इरादा था। लिहाजा देवी चले गए। अल्वी उनके घर पहुंचे तो गुरुदत्त बहुत अधिक पी चुके थे। दोनों ने साथ ड्रिंक किया। एक बजे रात को खाना खाने के अल्वी भी चले गए। लेकिन गुरुदत्त पीते ही रहे। रात 3 बजे गुरुदत्त कमरे से बाहर आए और शराब मांगने लगे। जब नौकर रतन ने शराब देने से मना किया तो उन्होंने खुद बोतल उठाई और कमरे में चले गए। इसके बाद क्या हुआ कोई नहीं जानता। अपने ही गाने ‘महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया, ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’, को गुनगुनाते वह चिर निद्रा में सो गए। आज ये गाना हर किसी की ज़ुबान पर गाहे बगाहे आ ही जाता है। इतने दर्द भरे गीत के पीछे एक आदमी का दर्द था, वह था गुरुदत्त का असहनीय दर्द।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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सूरमा भोपाली के रूप में सदैव जिंदा रहेंगे जगदीप

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हास्य अभिनय में नई-नई इबारतें लिखकर भारतीय सिनेमा प्रेमियों को बरबस हंसाने वाले सहाबहार अभिनेता जगदीप ने इस नश्वर शरीर को भले अलविदा कह दिया हो, लेकिन भारतीय सिनेमा इतिहास की सबसे सफल फिल्म ‘शोले’ में निभाए गए सूरमा भोपाली के किरदार के रूप में वह सिनेमा प्रेमियों के मानस-पटल पर सदैव जीवित रहेंगे और उसी अंदाज़ में हंसाते रहेंगे।

बॉलीवुड​ के सबसे बेहतरीन कॉमेडी कलाकारों में गिने जाने वाले जगदीप की कॉमेडी के आज भी लोग कायल हैं। उन्होंने हिंदी सिनेमा में कॉमेडी जोनर को एक अलग ही मुकाम पर पहुंचाया। अपने करियर में जगदीप ने अनगिनत फिल्मों में कॉमेडी कर दर्शकों को हंसाया ही नहीं बल्कि लोटपोट कर दिया। जगदीप ने खुद को उस दौर में स्थापित किया, जब जॉनी वॉकर और महमूद की तूती बोलती थी। इसीलिए उन्हें कॉमेडी का जीनियस कहा जाता है।

सात दशक लंबे करियर में 400 से अधिक फिल्मों में अभिनय करने वाले जयदीप का असली नाम नाम सैयद इश्तियाक अहमद जाफरी था। मध्य प्रदेश के दतिया में 29 मार्च 1939 को जन्मे जगदीप के पिता सैयद यावर हुसैन जाफरी का इंतकाल जब वह बहुत छोटे थे तभी हो गया। उनकी मां कनीज़ हैदर जाफरी आर्थिक तंगी से जूझती हुई मुंबई पहुंची और एक अनाथालय में कुक का काम करने लगीं।

जगदीप को बचपन से ही अभिनय का शौक था। उन्होंने 12 साल की उम्र में 1951 रिलीज फिल्म ‘अफसाना’ में बाल कलाकार के रूप में ‘मास्टर मुन्ना’ का किरदार निभाकर अभिनय का श्रीगणेश किया। जहां उन्हें फिल्म के निर्माता बीआर चोपड़ा से पारिश्रमिक के रूप में तीन रुपए मिले थे। इसके बाद भी उन्होंने कई फिल्मों में बतौर बाल कलाकार काम किया जिनमें गुरु दत्त की आर पार, बिमल रॉय की ‘दो बीघा जमीन’ जैसी बेहतरीन फिल्में शामिल हैं। दो बीघा ज़मीन में पहली बार उनके अंदर के हास्य कलाकार की झलक देखी गई।

जगदीप ने यूं तो अपनी हर फिल्म में अपने किरदार को कमाल शानदार ढंग से निभाया। 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘हम पंछी एक डाल के’ में उनके उनके किरदार लालू उस्ताद को लोगों ने काफी सराहा गया था और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी जगदीप की तारीफ़ की थी। ‘हम पंछी एक डाल के’ को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उन्होंने भाभी (1957) समेत कई फिल्मों में लीड रोल भी निभाया, लेकिन कालांतर में अपने आपको कॉमेडी अभिनेता के रूप में स्थापित कर लिया।

जगदीप ने अपने अभिनय का जलवा सुपहिट फिल्म शोले में शूरमा भोपाली के किरदार में दिखाया। क्या कमाल का अभिनय किया था उन्होंने। साल 1975 में रमेश सिप्पी के निर्देशन में बनी शोले में सूरमा भोपाली के रूप में वह हर सिनमा प्रेमी की जबान पर आ गए। उस किरदार से वह बहुत अधिक चर्चा में आ गए। हालांकि उनके सूरमा बोपाली बनने का किस्सा भी बेहद दिलचस्प है। एक इंटरव्यू के दौरान इस प्रसंग को विस्तार से उन्होंने खुद ही बताया था।

एक सवाल के जवाब में जगदीप ने कहा, “सूरमा भोपाली का किस्सा बड़ा लंबा और दिलचस्प है। दरअसल, सलीम-जावेद की फिल्म ‘सरहदी लुटेरा’, मैं कॉमेडियन था। मेरे डायलॉग बहुत लंबे थे। फिल्म डायरेक्टर सलीम के पास गया और उन्हें बताया कि डायलॉग बहुत लंबे हैं। तो उन्होंने जावेद के पास जाने को कहा। मैं जावेद के पास गया तो उन्होंने बड़ी ही फुर्ती से डायलॉग को पांच लाइन में समेट दिया। मैंने कहा कमाल है यार, तुम तो बड़े ही अच्छे राइटर हो। बहरहाल, हम शाम को साथ बैठे। किस्से कहानी और शायरियों का दौर चल रहा था। उसी बीच जावेद ने एक लहजा बोला ‘क्या जाने, किधर कहां-कहां से आ जाते हैं।‘ मैंने पूछा कि अरे ये क्या कहां से लाए हो। तो वह बोले कि भोपाल का लहजा है।”

अगर निजी ज़िंदगी की बात करें तो जयदीप ने तीन शादियां की। पहली पत्नी नसीम बेगम से तीन संतान पुत्र हुसैन जाफरी और दो बेटियां शकीरा शफी और सुरैया जाफरी, दूसरी पत्नी सुघरा बेगम से दो बेटे अभिनेता जावेद जाफरी और नावेद जाफरी और तीसरी बीवी नाज़िमा से बेटी मुस्कान है। जगदीप के दोनों बेटे जावेद जाफरी और नावेद जाफरी भी मशहूर अभिनेता हैं।

जगदीप ने आगे कहा, “मैंने कहा भोपाल से यहां कौन है, मैंने तो कभी नहीं सुना। इस पर उन्होंने कहा कि भोपाल की औरतों का लहजा है भाई यह। वे इसी तरह बात करती हैं। तो मैंने कहा मुझे भी सिखाओ यार। इस घटना के 20 वर्ष बीत जाने के बाद ‘शोले’ शुरू हुई। मुझे लगा मुझे भी बुलाएंगे, ऐसा नहीं हुआ। फिर एक दिन रमेश सिप्पी का फोन आया। वह बोले, तुमको शोले में काम करना है। मैंने कहा, क्या मज़ाक कर रहो भाई। उसकी तो शूटिंग भी खत्म हो गई। तब उन्होंने कहा कि नहीं, तुम्हारे किरदार की सीन असली है इसकी शूटिंग अभी बाकी है। तो जल्दी से आ जाओं और यही से शुरू हुआ सूरमा भोपाली का किरदार। सूरमा भोपाली के रूप में उन्होंने पहचान तो बनाई ही, साथ में भोपाल शहर की उस बोली को भी देश भर में मशहूर कर दिया।”

बहरहाल, जगदीप ने ‘पुराना मंदिर’ में मच्छर का किरदार और ‘अंदाज अपना अपना’ में सलमान खान के पिता का किरदार निभाकर दर्शकों का जबरदस्त मनोरंजन किया। उन्होंने सूरमा भोपाली फिल्म का निर्देशन भी किया। 2012 में प्रदर्शित फिल्म ‘गली गली चोर’ में वह आखिरी बार अभिनय करते नज़र आए। इस फिल्म में वह पुलिस कांस्टेबल की भूमिका में नजर आए थे। मशहूर पटकथा लेखक संजय मासूम के शब्दों में अलविदा सूरमा भोपाली! एक और अद्भुत अदाकार को आखिरी नमस्कार!

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

कुलभूषण जाधव को फांसी पर लटकाने के लिए पाकिस्तान की नई चाल, भारत का तगड़ा विरोध

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पाकिस्तान का झूठा दावा

इंडियन नेवी के पूर्व ऑफिसर कुलभूषण जाधव को फांसी के फंदे पर पर लटकाने के लिए तुले पाकिस्तान ने अब नई चाल चली है। इस्लामाबाद ने कहा कि कुलभूषण जाधव ने खुद उसे दी गई फांसी की सज़ा के ख़िलाफ़ रिव्यू पिटिशन दाखिल करने से मना कर दिया है। भारत ने एक बयान जारी करके पाकिस्तान के इस दावे को सिरे से ख़ारिज़ करते हुए कहा है कि कुलभूषण जाधव को फ़ांसी की सज़ा सुनाना है न्याय प्रक्रिया का मज़ाक़ है। पाकिस्तान सरकार खुलभूषण जाधव पर दबाव डाल कर उनसे रिव्यू पिटिशन दायर करने से मना करवाया है। पाकिस्तान दबाव डालकर कुलभूषण को न्याय पाने के उनके अधिकार से वंचित कर रहा है। यह अंतरराष्ट्रीय अदालत के फ़ैसले की अवमानना है।

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पाकिस्तान ने दावा किया है कि कुलभूषण जाधव ने उसे दी गई फांसी की सज़ा पर पुनर्विचार करने के लिए पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटिशन) दायर करने से इनकार कर दिया। दावा किया गया है कि पुनर्विचार याचिका की बजाय जाधव दया याचिका के साथ आगे बढ़ना चाहता है। इस्लामाबाद ने हालांकि अब भारत को अपने नगारिक के लिए दूसरे कांसुलर एक्सेस के लिए प्रस्ताव दिया है।

दया याचिका पर जोर

पाकिस्तान के एडिशनल अटॉर्नी जनरल इरफान अहमद ने दावा किया है कि 17 जून, 2020 को कुलभूषण को अपनी मौत की सज़ा के ख़िलाफ़ रिव्यू पिटिशन दाख़िल करने और सजा पर पुनर्विचार याचिका दायर करने के लिए कहा गया। लेकिन जाधव ने पुनर्विचार याचिका करने से मना कर दिया और उस दिन उसने 17 अप्रैल 2020 को दायर की गई अपनी दया याचिका पर जोर दिया। पाकिस्तान ने अब भारत को कुलभूषण जाधव के लिए दूसरे कांसुलर एक्सेस के लिए आमंत्रित किया है।

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49 वर्षीय सेवानिवृत्त भारतीय नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव को अप्रैल 2017 में एक पाकिस्तानी सैन्य अदालत ने जासूसी और आतंकवाद के आरोप में मौत की सजा सुनाई थी। बाद में भारत जाधव तक राजनयिक पहुंच प्रदान करने से इनकार करने और मौत की सज़ा को चुनौती देते हुए पाकिस्तान के ख़िलाफ़ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस यानी आईसीजे का दरवाज़ा खटखटाया था, जहां पर जाधव के पक्ष में फैसला आया। आईसीजे ने पाकिस्तान से जाधव की दी गई सज़ी की समीक्षा करने और उन्हें जल्द से जल्द काउंसुलर एक्सेस देने का आदेश दिया था। तबसे भारत इस आदेश को लागू कराने की कोशिश में पाकिस्तान पर दबाव डाल रहा है।

सकुशल स्वदेश आ पाएंगे

अब पाकिस्तान ने पैंतरेबाज़ी करते हुए दावा कर दिया कि जाधव ने खुद फांसी की सज़ा के ख़िलाफ़ रिव्यू पिटिशन दाखिल करने से मना कर दिया है। भारतीय नौसेना अधिकारी फिलहाल वहां की जेल में बंद है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत पूर्व इंडियन नेवी ऑफ़िसर कुलभूषण जाधव को सकुशल स्वदेश लाने में सफल हो सकेगा या इस भारतीय सपूत का हश्र सरबजीत सिंह की तरह ही होगा?

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दुनिया देख चुकी है कि पाकिस्तान के लाहौर की सेंट्रल जेल में कैसे सरबजीत को पीट पीटकर मार डाला गया था। सरबजीत के बारे में पाकिस्तान की बताई कहानी के अनुसार, 26 अप्रैल 2013 को सेंट्रल जेल, लाहौर में कुछ कैदियों ने ईंट, लोहे की सलाखों और रॉड से सरबजीत पर हमला कर दिया था। नाजुक हालत में सरबजीत को लाहौर के जिन्ना अस्पताल में भर्ती करवाया गया। इलाज के दौरान वह कोमा में चले गए और 1 मई 2013 को जिन्ना हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने सरबजीत को ब्रेनडेड घोषित कर दिया। लिहाज़ा उनका शव भारत वापस आया था।

बलूचिस्तान से गिरफ़्तारी का दावा

पाकिस्तान का आरोप है कि कुलभूषण जाधव भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के लिए काम करते थे। वह ईरान से इलियास हुसैन मुबारक़ पटेल के नकली नाम पर पाकिस्तान आया जाया करते थे। इस्लामाबाद का कहना है कि 29 मार्च 2016 को उन्हें बलूचिस्तान प्रांत के किसी जगह से गिरफ़्तार किया गया। पाकिस्तान का दावा है कि कुलभूषण बलूचिस्तान में विध्वंसक गतिविधियों में शामिल रहे हैं। इसी आरोप के लिए 11 अप्रैल 2017 को पाकिस्तान के मिलिट्री कोर्ट ने कुलभूषण को मौत की सजा सुनाई, जिसका भारत सरकार व भारतीय जनता ने भारी विरोध किया।

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भारत सारे आरोपों से इनकार करता आया है। उसका कहना है कि कुलभूषण को ईरान से किडनैप कर लिया गया। भारत हमेशा उन्हें इंडियन नेवी से रिटायर्ड ऑफ़िसर ही कहता रहा है जो ईरान में अपना बिज़नेस कर रहे थे। भारत ने साफ़ कर दिया है कि कुलभूषण जाधव का देश की सरकार से कोई लेना-देना नहीं है।भारत का दावा है कि कुलभूषण को ईरान से किडनैप किया गया। सन् 1970 में महाराष्ट्र के सांगली में जन्मे कुलभूषण के पिता सुधीर जाधव मुंबई पुलिस में वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं। उनका बचपन दक्षिण मुंबई में गुजरा था। उम्र में बड़े उन्हें भूषण और छोटे उन्हें “भूषण दादा” कहते थे। फुटबॉल के शौक़ीन कुलभूषण ने 1987 में नेशनल डिफेन्स अकादमी में प्रवेश लिया। 1991 में नौसेना में शामिल हुए। सेवा-निवृति के बाद ईरान में व्यापार शुरू किया था। उसी सिलसिले में वह ईरान में थे, जहां से अपहृत करके उन्हें पाकिस्तान ले जाया गया था।

भारतीय जनता बेचैन

भारत में लोग कुलभूषण की गिरफ़्तारी की ख़बर आने के बाद से ही ख़ासे परेशान हैं। वॉट्सअप, फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्किंग पर कुलभूषण को बचाने के लिए कई साल से मुहिम चल रही है और उन्हें किसी भी क़ीमत पर सकुशल देश में लाने की अपील प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से की जा रही है। भारत में लोगों का मानना है कि सरकार को अपनी पूरी ताकत झोंक देनी चाहिए ताकि कुलभूषण को सही सलामत वापस स्वदेश वापस लाया जा सके।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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ठुमरी – तू आया नहीं चितचोर

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ठुमरी
 
तू आया नहीं चितचोर
मनवा लागे नाहीं मोर
रहिया ताके मोरा मन
अंखियां बनी हैं चकोर
बैरन बनी रात चांदनी
काहे रे होत नहि भोर
सबके सजन आए घर
न आयल बलमा मोर
तड़पन है तन मन में
चलत नाहीं मोरा ज़ोर
-हरिगोविंद विश्वकर्मा

क्यों हैं दलाई लामा चीन की आंख की किरकिरी?

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85 वर्षीय तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा का पूरी दुनिया सम्मान करती है। शांति पहल और तिब्बत की मुक्ति के लिए अहिंसक संघर्ष जारी रखने के लिए उन्हें 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। विस्तारवादी चीन को दलाई लामा हमेशा से खटकते रहे हैं। बीजिंग इस बुजुर्ग से बहुत बुरी तरह चिढ़ता रहा है। यह कम्युनिस्ट देश संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ब्लैकलिस्टेड आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर को तो आतंदीवादी नहीं मानता, लेकिन दलाई लामा को आतंकवादी और अलगाववादी ज़रूर मानता रहा है। इसी बिना पर वह जिस देश में भी जाते हैं, चीन वहां की सरकार से आपत्ति जताता है। चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार को लगता है कि दलाई लामा उसके लिए समस्या हैं।

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तिब्बत को कई सदियों से अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। 1630 के दशक में तिब्बत के एकीकरण के वक़्त बौद्धों और तिब्बती नेतृत्व के बीच लड़ाई हुई थी। यह लड़ाई सत्ता के लिए मान्चु, मंगोल और ओइरात के गुटों के बीच हुई थी। अंततः पांचवें दलाई लामा तिब्बत को एक करने में कामयाब रहे। 13वें दलाई लामा ने 1912 में तिब्बत को स्वतंत्र देश घोषित कर दिया था। इसके बाद हिमालयी अंचल में तिब्बत सांस्कृतिक रूप से संपन्न देश के रूप में उभरा था। तिब्बत के एकीकरण के बाद यहां बौद्ध धर्म के अनुयायियों की कड़ी मेहनत से इस देश में संपन्नता वापस आ गई। जेलग बौद्धों ने 14वें दलाई लामा को भी मान्यता दी। हालांकि चीन की गिद्ध दृष्टि शुरू से तिब्बत पर थी।

क़रीब 40 साल बाद चीनी सेना ने 1949 में तिब्बत पर अचानक हमला बोल दिया और हज़ारों की संख्या में सैनिक भेज दिए। सबसे अहम चीन ने यह आक्रमण तब किया, जब तिब्बत में 14वें दलाई लामा को चुनने की प्रक्रिया चल रही थी। तिब्बत को लड़ाई में हार का सामना करना पड़ा और वहां चीनी सेना तैनात कर दी गईं। इस तरह चीन ने हिमालय की गोद में बसे इस ख़ूबसूरत देश पर क़ब्ज़ा करके उसे बाहरी दुनिया से बिल्कुल काट दिया। तिब्बत के कुछ इलाक़ों को स्वायत्तशासी क्षेत्र में बदल दिया गया और बाक़ी इलाक़ों को इससे लगने वाले चीनी प्रांतों में मिला दिया गया। तिब्बत पर चीन के हमले के बाद दलाई लामा से कहा गया कि वह पूर्ण राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में ले लें। इसके लिए 1954 में वह माओ जेडांग, डेंग जियोपिंग जैसे कई चीनी नेताओं से बातचीत करने के लिए बीजिंग भी गए, लेकिन बात नहीं बनी।

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तिब्बत दरअसल, नेपाल की तरह तिब्बत भी भारत और चीन के बीच ‘बफर स्टेट’ था। भारत के साथ तो तिब्बत के संबंध सदियों पुराने रहे हैं। अंग्रेज़ी शान में वहां भारतीय रेल चलती थी। भारतीय डाकघर था। भारतीय पुलिस और सेना की एक छोटी सी टुकड़ी भी देश की रक्षा के लिए तैनात थी। तिब्बत में भारतीय मुद्रा का चलन था। भूटान की तरह तिब्बत भी वैदेशिक और सुरक्षा के मामले में भारत पर निर्भर था। 1949 में तिब्बत पर चीनी क़ब्ज़े के बाद सब कुछ बदल गया। बहरहाल, कुछ साल बाद तिब्बती जनता ने संप्रभुता की मांग की और ल्हासा में चीनी के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया, लेकिन विद्रोहियों को सफलता नहीं मिली। तिब्बत के राष्ट्रीय आंदोलन को बेरहमी से कुचल दिए जाने के बाद वह निर्वासन में जाने को मजबूर हो गए। उन्हें लगा कि वह बुरी तरह से चीनी चंगुल में फंस जाएंगे।

लिहाज़ा, 17 मार्च, 1959 को दलाई लामा राजधानी ल्हासा से पैदल ही निकल पड़े। हिमालय के पहाड़ों को पैदल पार करते हुए 15 दिनों की यात्रा के बाद वह 31 मार्च को सकुशल भारतीय सीमा में दाखिल होने में कामयाब रहे। कहा जाता है कि यात्रा के दौरान उनकी और उनके सहयोगियों की कोई ख़बर नहीं आने पर कई लोग आशंका जताने लगे थे कि शायद उनकी मौत हो गई। चीनी सेना की नज़रों से बचने के लिए सभी लोग केवल रात में यात्रा करते थे। टाइम मैगज़ीन ने बाद में इस पर बहुत बड़ी रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उसके मुताबिक बाद में ऐसी अफ़वाहे भी फैलीं कि बौद्ध धर्म के लोगों की प्रार्थनाओं के कारण एक धुंध-सी बन गई और उसी धुंध ने उन्हें चीनी विमानों की नज़र से बचाए रखा। सुरक्षा की गरज से उन्होंने भारत का रुख़ किया था। इसके बाद से ही वह धर्मशाला में रह रहे हैं। फ़िलहाल, तिब्बत की निर्वासित सरकार, हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला से संचालित होती है। भारत में लगभग 1,60,000 तिब्बती नागरिक रहते हैं।

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तिब्बत पर चीन के हमले के बाद दलाई लामा ने संयुक्त राष्ट्र से तिब्बत मुद्दे को सुलझाने की अपील की थी। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस संबंध में 1959, 1961 और 1965 में तीन प्रस्ताव पारित किए जा चुके हैं। चूंकि दलाई लामा और अन्य तिब्बती नागरिक अपने स्वतंत्र देश की बात करते हैं, इसलिए वे चीन की आंख की किरकिरी बने हुए हैं। अमेरिका समेत पूरी दुनिया तिब्बती धर्मगुरु को 1959 से शरण देने के लिए भारत को धन्यवाद देती है। माना जाता है कि दलाई लामा को शरण देकर भारत ने महान कार्य किया है।

दलाई लामा अमेरिका जाते हैं तो चीन के कान खड़े हो जाते हैं। हालांकि 2010 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बरॉक ओबामा ने चीन के भारी विरोध को नज़रआंदजा करते हुए दलाई लामा से मुलाक़ात की थी। अमेरिकी मानता है कि दलाई लामा ने तिब्बती लोगों और उनकी धरोहर के प्रतीक के रूप में दुनिया को शांति और करुणा की प्रेरणा दी है। दलाई लामा और लाखों तिब्बतियों को शरण देने के लिए भारत को धन्यवाद देता है। अमेरिकी संसद की प्रतिनिधि सभा की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी कहती हैं, ”दलाई लामा आशा और शांति के दूत हैं। दया, धार्मिक सद्भाव, मानवाधिकार, तिब्बती लोगों की संस्कृति और भाषा की रक्षा करने में उनके आध्यात्मिक मार्गदर्शन की अहम भूमिका है। यह दुखद है कि दलाई लामा और तिब्बती लोगों की इच्छाएं पूरी नहीं हो सकीं, क्योंकि दमनकारी चीन ने तिब्बत में नागरिकों को प्रताड़ित करने का अपना अभियान जारी रखा है। तिब्बतियों के पक्ष में अमेरिकी संसद ने हमेशा एक स्वर से आवाज़ उठाता रहा है और हमेशा उठाते रहेंगे। सीनेट को कानून पास कर अमेरिका और तिब्बती जनता के बीच दोस्ती के रिश्ते का समर्थन करना चाहिए।”

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अप्रैल 2017 में जब दलाई लामा भारत के उत्तर पूर्व राज्यों के दौरे पर गए तो चीन ने इस पर अपना विरोध दर्ज़ कराया। चीन ने धमकी भरे लहज़े में कहा कि भारत उसकी भावनाओं की अनदेखी करता है तो उसे भारी खामियाज़ा भुगतना पड़ेगा। हालांकि भारत ने साफ़ कर दिया था कि दलाई लामा का किसी भी राजनीतिक उद्देश्य से कोई लेना देना नहीं है। भारत ने तिब्बती धर्म गुरू को धर्म के प्रचार प्रसार का हमेशा स्वागत किया। चीन सबसे ज़्यादा अरुणाचल प्रदेश में दलाई लामा के दौरे को लेकर भारत से नाराज़ रहा। यह विरोध मुख्य रूप से अरुणाचल के तवांग को लेकर था, जहां दलाई लामा दो दिन ठहरे थे।

दलाई लामा का जन्म 6 जुलाई 1935 को पूर्वोत्तर तिब्बत के तक्तेसेर क्षेत्र में रहने वाले साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम ल्हामो थोंडुप था जिसका अर्थ है मनोकामना पूरी करने वाली देवी। बाद में उनका नाम तेंजिन ग्यात्सो रखा गया। उन्हें मात्र दो साल की उम्र में 13वें दलाई लामा थुबटेन ज्ञायात्सो का अवतार बताया गया। छह साल की उम्र में ही मठ के अंदर उन्हें दीक्षा दी जाने लगी। दलाई लामा दरअसल एक मंगोलियाई पदवी है, जिसका मतलब होता है- ज्ञान का महासागर। इसीलिए दलाई लामा के वंशज करुणा के प्रकट रूप माने जाते हैं।

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दरअसल, दलाई लामा को भारत में शरण मिलना चीन को अच्छा नहीं लगा। तब चीन में माओत्से तुंग का शासन था। चीन सरकार ने विरोध भी जताया, लेकिन भारत ने उसके विरोध को अनसुना कर दिया। दलाई लामा के 1950 के दशक से भारत में रहने से ही भारत और चीन के बीच विवाद शुरू हुआ। दिल्ली और बीजिंग के रिश्ते अक्सर ख़राब रहते हैं। दलाई लामा को दुनिया भर से सहानुभूति मिलती है, जो चीन को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। बहरहाल, 1959 से ही दलाई लामा और तिब्बती लोग निर्वासन की ज़िंदगी जी रहे हैं। हालांकि अब दलाई लामा का दृष्टिकोण बदल गया है। उनका कहना है कि वह चीन से आज़ादी नहीं चाहते हैं। वह बस रहने की स्वतंत्रता और स्वायतता चाहते हैं। विस्तावादी चीन को यह भी मंजूर नहीं है।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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कहानी विकास दुबे की – जैसी करनी वैसी भरनी

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अतंतः हिंसक जीवन का हिंसक अंत

विधि का विधान है। जैसा करोगे, वैसा ही भरोगे। गैंगस्टर विकास दुबे (Mostwanted Criminal Vikas Dubey) के साथ यही हुआ। आठ दिन तक समाचार की सुर्खियों में रहने वाली ख़बर का 10 जुलाई 2020 को अंत हो गया। अनगिनत लोगों की हत्या करने वाले कानपुर के मोस्टवांटेड अपराधी विकास दुबे को उत्तर प्रदेश की एसटीएफ ने अंततः मार ही डाला। हालांकि यह कोल्ड ब्लडेड मर्डर है, लेकिन प्रतिहिंसा की आग में जल रही उप्र पुलिस ने जो कुछ किया, ठीक ही किया। जिस अपराधी के ख़िलाफ़ पुलिस वाले तक गवाही देने से डरते हैं, उसे मार डालना सही था। हालांकि पुलिस कह रही है कि विकास को उज्जैन लाते समय कानपुर में प्रवेश करते ही भवती कस्बे के पास पुलिस की कार पलट गई। इसके बाद विकास दुबे ने एक पुलिस वाले की रिवॉल्वर छीन कर भागने की कोशिश की और पुलिस ने आत्मरक्षा में गोली चलाई, जिसमें विकास दुबे को सीने और कमर में गोली लगी। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

नहीं उतरी गले पुलिस की थ्यौरी

पहली बात दुर्धटनाग्रस्त वाहन को देखकर लगता ही नहीं कि वह हादसे का शिकार हुई है, क्योंकि कोई गाड़ी चलते हुए ऐसे कैसे पलटी हो गई, जो तनिक भी क्षतिग्रस्त नहीं हुई। फिर जो गाड़ी पलट गई, उसमें बैठा हुआ विकास घायल क्यों नहीं हुआ। फिर पुलिस कह रही है, चार पुलिस वाले घायल हुए हैं। विकास दुबे, जिसके पांव में सरिया डाली गई है, इसलिए वह भाग नहीं सकता, तो वह भागने कैसे लगा। बहरहाल, यह बहस का विषय नहीं है। क्योंकि पुलिस ने अगर विकास को गोली मार दी, जो लब्बोलुआब ठीक ही किया। पुलिस ने अपनी कार्रवाई से इस ख़तरनाक अपराधी को मुख्तार अंसारी या अतीक अहमद की तरह विधायक या सांसद बनने से पहले ही ख़त्म कर दिया।

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महाकाल मंदिर में किया था नाटकीय आत्मसमर्पण

विकास दुबे की गिरफ़्तारी के बारे में बताया जाता है कि वह 9 जुलाई को सुबह सात बजे महाकालेश्वर मंदिर पहुंचा। वह मास्‍क लगाए हुए था। उसने महाकाल के दर्शन की पर्ची खुद कटाई थी। मंदिर में जाकर बाकायदा महाकाल की पूजा की। मौके पर स्थानीय मीडिया को भी बुला लिया था। मीडिया के सामने विकास चिल्लाने लगा, ‘मैं विकास दुबे हूं… कानपुर वाला।’ तब मंदिर के चौकीदारों ने उसे पकड़ लिया। फिर पुलिस को सूचित किया गया। कहा जा रहा है कि इनकाउंटर से बचने के लिए विकास ने पूरी योजना के साथ उज्जैन पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था।

पुलिस महकमे में विकास की भारी पैठ थी

विकास दुबे की पुलिस महकमे में पैठ कितनी गहरी थी, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कानपुर के एसएसपी ऑफ़िस से विकास दुबे की सहायता करने वाले नेताओं, शीर्ष पुलिस अफ़सरों और दूसरे प्रभावशाली लोगों की नामों की सूची वाली फ़ाइल और शहीद सीओ देवेंद्र मिश्रा की चौबेपुर थानाध्यक्ष विनय तिवारी की शिकायत वाली चिट्ठी अचानक रहस्यमय ग़ायब हो गई। इस साल मार्च में लिखी गई इस चिट्ठी में देवेंद्र मिश्रा ने विनय तिवारी पर विकास दुबे की खुली मदद करने का आरोप लगाया था। मज़ेदार बात यह है कि वह चिट्ठी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और उत्तर प्रदेश ही नहीं देश के हर नागरिक के वॉट्सअप पर आ गई। विकास को पकड़ने में जुटी पुलिस विकास के सिर पर इनाम बढ़ाती रही और इनामी राशि 50 हज़ार से पांच लाख रुपए तक पहुंच गई।

विकास दुबे कैसे बना ख़तरनाक अपराधी?

कानपुर में जब से सीओ देवेंद्र कुमार मिश्रा समेत आठ पुलिसवालों की हत्या हुई, तब से हर किसी के जुबान पर विकास दुबे का नाम आया। हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, रंगदारी वसूलना, डकैती, लूटपाट और अवैध रूप से दूसरों की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने जैसे एक दो नहीं, बल्कि पांच-पांच दर्जन गंभीर अपराधों में लिप्त विकास दुबे के बारे में 3 जुलाई से पहले क्राइम रिपोर्टरों के अलावा कोई जानता ही नहीं था। विकास दुबे ने वह दुस्साहस किया, जो अपराधी तो दूर नक्सली और आतंकवादी भी नहीं कर पाते?

तीन दशक से अपराध जगत में सक्रिय विकास

पिछले तीन दशक से अपराध और राजनीति की दुनिया का बेताज़ बादशाह कहे जाने वाले मोस्टवांटेड अपराधी विकास दुबे को नब्बे के दशक से ही राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था। राजनीतिक संरक्षण में वह फला-फूला और आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देते हुए ख़ूब पैसे भी बनाए। नेताओं के लिए उसे संरक्षण देना इसलिए ज़रूरी था, क्योंकि बिल्हौर सर्कल के शिवराजपुर, चौबेपुर, शिवली और बिठूर थानों में उसकी बड़ी धमक थी। इन थानों के तहत आने वाले लगभग पांच सौ गांवों के लोग उसके फ़तवे पर वोट देते थे। लिहाज़ा, विधायक या सांसद बनने के लिए विकास का खुला समर्थन ज़रूरी होता है।

सीएम बदलते रहे, पर अपराधी पाता रहा संरक्षण

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि नब्बे के दशक से ही विकास दुबे के हर पार्टी के नेता, चाहे वह विधायक हों या लोक सभा सदस्य, से बड़े मधुर संबंध थे। कई नेताओं का तो वह पूरा चुनावी ख़र्च वहन करता था। इसीलिए उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बदलते रहे, लेकिन विकास दुबे को बराबर संरक्षण मिलता रहा। चाहे मुलायम सिंह यादव हों, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, रामप्रकाश गुप्ता, मायावती, अखिलेश यादव या योगी आदित्यनाथ हों, विकास का रुतबा जस का तस ही रहा। क्या मजाल कि स्थानीय पुलिस उस पर हाथ डाल दे। गांव में उसने अपना घर क़िले जैसा बना रखा है। बिना उनकी मर्ज़ी के घर के भीतर कोई जा नहीं सकता था।

मंत्री ब्रजेश पाठक के साथ विकास की फोटो वायरल

कानपुर एनकाउंटर में विकास दुबे का नाम आने के बाद से ही योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल में विधि मंत्री ब्रजेश पाठक के साथ उसकी फोटो वायरल हुई। अखिलेश यादव के कार्यकाल में मुलायम सिंह का अपने आपको धमकाने वाला ऑडियो टेप जारी करके चर्चा में आए प्रदेश के सीनियर आईपीएस अफ़सर अमिताभ ठाकुर ने तो सीधे तौर पर ब्रजेश पाठक पर विकास को संरक्षण देने का आरोप लगाया था। कहा जाता है कि ब्रजेश पाठक से विकास दुबे का संबंध तब से है, जब ब्रजेश पाठक बसपा के सांसद हुआ करते थे। आरोप है कि विकास को भाजपा सरकार में मंत्री रही प्रेमलता कटियार का भी वरदहस्त मिला हुआ था। इतना ही नहीं, विरोधी आरोप लगाते हैं कि विकास को बिठूर के भाजपा विधायक अभिजीत सांगा का भी संरक्षण प्राप्त था। बसपा के कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर भी विकास को पनाह देने के आरोप लगे थे। समाजवादी पार्टी के एमएलसी कमलेश पाठक का वरदहस्त विकास को मिला हुआ था। कमलेश कानपुर में इसी साल मार्च में अधिवक्ता मंजुल चौबे और उनकी बहन की पुलिस के सामने गोली मारकर हत्या करने के आरोपी हैं और इन दिनों आगरा जेल में बंद हैं।

1990 में रखा अपराध की दुनिया में कदम

मूल रूप से कानपुर में शिवली थाना क्षेत्र के बिकरू गांव के रहने वाले 48 वर्षीय अपराधी विकास दुबे पुत्र राम कुमार दुबे बचपन से ही जुर्म की दुनिया का बादशाह बनना चाहता था। उसने अपराध की दुनिया में 1990 में तब कदम रखा, जब पिता के अपमान का बदला लेने के लिए उसने नवादा गांव के किसानों को जम कर पीटा था। विकास के ख़िलाफ़ शिवली थाने में पहला मामला दर्ज़ हुआ था। ब्राह्मण बाहुल्य क्षेत्र में पिछड़ों की हनक को कम करने के लिए विकास को लगातार राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा। सबसे पहले पूर्व विधायक नेकचंद्र पांडे ने उसे संरक्षण दिया। वह क्षेत्र में दबंगई के साथ मारपीट करता रहा, थाने पहुंचते ही नेताओं के फोन आने शुरू हो जाते थे। कुछ दिनों बाद तो पुलिस ने भी उस पर नज़र टेढ़ी करनी छोड़ दी थी।

गांव के ही एक युवक की हत्या

अगले साल यानी 1991 में विकास दुबे ने एक दलित युवक की हत्या कर दी। चौबेपुर थाने में उसके ख़िलाफ़ हत्या का मुक़दमा दर्ज़ हुआ। कहा जाता है कि इस अपराध से बचने के लिए विकास दुबे बिल्हौर से जनता दल विधायक और मुलायम के खास मोतीलाल देहलवी के संपर्क में आया। बाद में मोतीलाल जब उसकी मदद करने में आनाकानी करने लगे तो विकास ने जनता पार्टी के नेता शिव कुमार बेरिया का दामन थामा। बिल्हौर विधानसभा चुनाव में उसने उनकी मदद की। हालांकि सूबे में कल्याण सिंह की अगुआई में भाजपा की सरकार बन गई थी, मगर समाजवादी पार्टी के ज़रिए भाजपा शासन में भी उसे संरक्षण मिलता रहा। 1992 में विकास ने एक दलित की हत्या कर दी, लेकिन नेताओं के सरंक्षण की वजह से उसका बाल भी बांका नहीं हुआ।

गेस्ट-हाउस कांड के बाद बसपा में आया

बताया जाता है कि तीन चार साल तक विकास दुबे शिव कुमार बेरिया का अनुयायी बना रहा, लेकिन सूबे में बनते-बिगड़ते राजनीतिक समीकरण के बीच जब लखनऊ गेस्ट-हाउस कांड के बाद मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो उसने मायावती को देवी की तरह पूजने वाले भगवती प्रसाद सागर का दामन थाम लिया और 1996 में उनकी खूब मदद की। लिहाज़ा, सागर बसपा के टिकट पर विधायक बन गए। जब मायावती मुख्यमंत्री थीं, तब विकास का सिक्का बिल्हौर, शिवराजपुर, बिठूर, चौबेपुर के साथ ही कानपुर शहर में भी चलने लगा। इस दौरान विकास ने ज़मीनों पर अवैध कब्जे के साथ और गैर कानूनी तरीकों से संपत्ति बनाई। विकास ने भी राजनीति के दाव पेंच सीखे और जेल में रहते हुए उसने शिवराजपुर से नगर पंचायत का चुनाव जीत लिया।

हरिकिशन श्रीवास्तव पहले राजनीतिक गुरु

नब्बे के दशक के अंतिम दौर में विकास दुबे ने ख़ुद राजनीति में उतरने का मन बना लिया। उसे राजनीति में लाने का श्रेय चौबेपुर विधानसभा के पूर्व बसपा विधायक और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष हरिकिशन श्रीवास्तव को जाता है। हरिकिशन श्रीवास्तव की गिनती बसपा के बड़े नेताओं में होती है। कहा जाता है कि पूर्व विधायक जो काम नहीं कर पाते थे उनके लिए उनका काम विकास करता था। विकास खुद कहता था कि उस राजनीति में लाने का श्रेय हरिकिशन का ता। वहीं, उसके राजनीतिक गुरु रहे। कहा जाता है कि हरिकिशन श्रीवास्तव ने विकास दुबे को बहन मायावती से मिलवाया और उससे बसपा टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहने को कहा था।

भाजपा नेता शिवली थाने में घुस कर हत्या

बहरहाल, इस दौरान विकास दुबे की नज़र प्रदेश में राजनीतिक समीकरण पर बराबर रही और इसीलिए 2002 में फिर से समाजवादी पार्टी के शिवकुमार बेरिया का भक्त बन गया और विधायक बनने में उनकी हर संभव मदद की, लेकिन उसने बसपा के भगवती सागर से संबंध बनाकर रखा। अक्टूबर 2001 में विकास ने राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त भाजपा के संतोष शुक्ला की शिवली थाने में घुस कर हत्या कर दी। इस गोलीबारी में दो पुलिस वाले भी मारे गए। इस हत्याकांड के बाद विकास पूरे प्रदेश में छा गया। उसका ख़ौफ़ इतना बढ़ा कि उसकी तूती बोलने लगी। ज़मीन की ख़रीद-फ़रोख़्त, अवैध क़ब्ज़ा या सुपारी मर्डर, जैसे कार्य वह आसानी से करता गया और सबूत के अभाव में बचता गया। लोग डर के मारे उसके ख़िलाफ़ बयान ही नहीं देते थे। उसके ख़ौफ़ का आलम ऐसा था कि लोग अपने छोटे-बड़े झगड़े को सुलझाने के लिए पुलिस की बजाय विकास के पास जाते थे।

मुलायम ने नहीं दी रिहाई के फैसले को चुनौती

उत्तर प्रदेश की राजनीति में विकास दुबे कितना प्रभावशाली था, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि शिवली थाना गोलीबारी में दो पुलिस वालों के मारे जाने के बावजूद उस केस में पुलिस ने कमज़ोर चार्जशीट बनाया। मुक़दमे की सुनवाई के दौरान सभी 19 पुलिस वाले ही अदालत में अपने बयान से ही मुकर गए। किसी पुलिस वाले ने विकास के ख़िलाफ़ गवाही देने की हिम्मत नहीं जुटाई। लिहाज़ा, अदालत ने उसे 2005 में बरी कर दिया। मज़ेदार बात यह है कि विकास को बाइज़्ज़त बरी करने वाले जज एचएम अंसारी अगले ही दिन सेवानिवृत्त हो गए। तब मुलायम सिंह यादव सूबे के मुखिया थे, लेकिन सबसे अहम यह कि उनकी सरकार की ओर से भी विकास को बरी करने के अदालत के फ़ैसले को हाईकोर्ट में चुनौती नहीं दी गई।

सीओ अब्दुल समद को बंधक बनाकर पीटा था

दिन-दहाड़े भाजपा नेता और दो पुलिस वालों की हत्या करने के बावजूद बाइज़्जत बरी होने और उस फैसले को मुलायम सरकार द्वारा हाईकोर्ट में चुनौती न देने से विकास दुबे का दबदबा कानपुर में पूरे पुलिस महकमे में भी बढ़ गया। पुलिस वाले भी उससे डरने लगे। यही वजह है कि 2005 में झगड़ा होने पर विकास और उसके आदमियों ने बिल्हौर के सर्कल अफ़सर (सीओ) अब्दुल समद को ही बंधक बना लिया था और कमरे में बंद करके अब्दुल समद को बुरी तरह पीटा था। इसके बावजूद कानपुर पुलिस ने उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की। इससे उसका दुस्साहस और बढ़ गया।

पूरे कानपुर में स्थापित किया दबदबा

सन् 2006 के आसपास बसपा में कमलेश कुमार दिवाकर काफी प्रभावशाली हो गए थे। कानपुर के होने के कारण उनका दावा बिल्हौर और भोगनीपुर विधानसभा सीटों पर था। लिहाज़ा, बसपा ने 1993 में भोगनीपुर सीट से विधायक का चुनाव जीत चुके भगवती प्रसाद सागर को झांसी के मऊरानीपुर विधानसभा से चुनाव लड़वाया। उन्होंने न केवल वहां जीत हासिल की, बल्कि तीसरी बार विधायक बनने पर मायावती सरकार में राज्यमंत्री भी बनाए गए। स्थानीय लोगों का कहना है कि इसका लाभ विकास को भी मिला। इधर 2007 विधानसभा चुनाव में कमलेश कुमार दिवाकर बिल्हौर से बसपा का टिकट मिला तो, विकास ने उन्हें विजयश्री दिलाने में भरपूर सहयोग दिया। प्रदेश में बसपा को बहुमत मिला और विकास के कारोबार का दायरा बढ़ता गया। बसपा से मिल रहे संरक्षण के बाद उसने अपना दबदबा पूरे कानपुर में स्थापित कर लिया।

सपा मंत्री करती थीं चरण-वंदना

2012 में विकास दुबे ने देखा कि मायावती की इमेज ख़राब हो रही है। विकास के संरक्षक भगवती सागर को भी मायावती ने बसपा से हकाल दिया था। उस समय अखिलेश यादव अपनी साइकल यात्रा से जनता का जबरदस्त समर्थन हासिल कर रहे थे। बस क्या था, विकास ने अपनी वफ़ादारी की कार समाजवादी पार्टी की ओर मोड़ दी और 2012 के विधान सभा चुनाव में बिल्हौर से सपा प्रत्याशी अरुणा कुमारी कोरी का खुला समर्थन किया। लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार राधेकृष्ण कहते हैं कि विकास दुबे के समर्थन से विधायक और अखिलेश सरकार में महिला कल्याण और सांस्कृतिक मंत्री बनी अरुणा कुमारी कोरी जब भी उस अपराधी से मिलती थीं तो उसकी चरण-वंदना करती थीं। हालांकि इसके लिए अरुणा कुमारी कोरी बोलती थीं, कि वह ब्राह्मण देवता हैं, वह उनका चरण छूकर उनसे आशीर्वाद लेती हैं।

शिवपाल ने की मदद जिला परिषद चुनाव में

वरिष्ठ पत्रकार राधेकृष्ण कहते हैं कि “अरुणा कुमारी कोरी की बहुत ख़ास हैं। इसीलिए जब अखिलेश सिंह यादव के साथ मतभेद होने पर शिवपाल सिंह यादव के समाजवादी पार्टी छोड़ी तो अरुणा कुमारी कोरी ने भी सपा छोड़ दी थी। अरुणा कुमारी कोरी के जरिए विकास दुबे ने शिवपाल यादव तक पहुंच बना ली थी। कहा तो यहां तक जाता है कि जिला परिषद चुनाव में शिवपाल सिंह ने विकास की जीतने में मदद की थी। यही वजह है कि पुलिस कभी उसे ग्रिल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।” 2014 में देश में नरेंद्र मोदी की लहर के बाद राज्य में भाजपा को उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 73 पर जीत प्राप्त हुई। विकास को अपना भविष्य भाजपा में दिखने लगा। इसी दौरान उसके संरक्षक रहे भगवती प्रसाद सागर ने भी भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा ने 2017 के विधान सभा भगवती सागर को बिल्हौर से टिकट दिया और वह विकास के सहयोग से बड़े अंतर से चुनाव जीत गए।

विकास के डर से प्रधान ने गांव दी छोड़ दिया

कानपुर के जिला पंचायतराज अधिकारी सर्वेश कुमार पांडेय के मुताबिक शिवराजपुर ब्लॉक की ग्राम पंचायत बिकरू में 2005 में हुए प्रधानी के चुनाव में विकास दुबे के छोटे भाई दीप प्रकाश की पत्नी अंजलि दुबे ने जीत हासिल की थी। 2010 के चुनाव में रजनीकांत कुशवाहा ने बाजी मारी, लेकिन विकास का ख़ौफ़ इस कदर था कि चुनाव जीतने का बाद  रजनीकांत कुशवाहा वापस गांव नहीं गए। इसके बाद जिलाधिकारी ने 3 सितंबर 2010 को तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया। इस 3 सदस्य कमेटी में विशुना देवी ने अध्यक्ष के रूप में काम किया था। 2015 के चुनाव में एक बार फिर विकास के भाई की पत्नी अंजलि दुबे ने जीत हासिल की।

15 साल में निर्विरोध जिला पंचायत सदस्य

बहरहाल, 1990 के दशक में विकास दुबे लगातार अपराध करता रहा। संतोष शुक्ला के भाई मनोज शुक्ला कहते हैं, “पुलिस की गिरफ़्त से अपने आपको बचाने के लिए विकास 1995 में बीएसपी से जुड़ गया और जिला पंचायत का सदस्य बन गया। इसके बाद उसकी पत्नी समाजवादी पार्टी के सहयोग से पंचायत का चुनाव जीती। मनोज शुक्ला ने बेहद निराशा से कहा कि 20 साल में विकास हमेशा अपने राजनीतिक कनेक्शन की वजह से छूटता रहा। विकास के परिवार से पिछले 15 साल में लगातार जिला पंचायत सदस्य निर्विरोध निर्वाचित हो रहे। वह गांव के 15 साल से प्रधान भी नियुक्त होते आ रहे हैं।”

जारी रहा हत्या करने का सिलसिला

विकास दुबे ने एक विवाद के बाद वर्ष 2000 में शिवली थाना क्षेत्र स्थित ताराचंद इंटर कॉलेज के सहायक प्रबंधक सिद्धेश्वर पांडेय की हत्या कर दी थी। इस घटना ने विकास को रातों-रात सबकी नजर में ला दिया। इसके बाद तो जैसे विकास कानपुर में अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह बन गया। उसने उसी साल जेल में रहते हुए ही रामबाबू यादव नामक शख्स की हत्या करवा दी। जेल से बाहर आने पर वर्ष 2001 में उसने थाने में संतोष शुक्ला और दो पुलिसकर्मियों को मार डाला। वर्ष 2004 में विकास ने केबल व्यवसाई दिनेश दुबे की हत्या कर दी।

एक हत्याकांड में आजीवन कारावास

सन् 2002 में ही विकास ने जेल में रहते हुए शिवली के पूर्व जिला पंचायत सदस्य लल्लन बाजपेयी पर जानलेवा हमला करवाया जिसमे वाजपेयी घायल हुए और उनके 3 साथी मौक़े पर ही मारे गए। विकास के नाम एफ़आईआर दर्ज़ करवाई गई लेकिन पुलिस ने उसका नाम चार्जशीट से हटा दिया। लल्लन वाजपेयी बताते हैं, “मेरे ऊपर हुए हमले में पुलिस ने विकास का नाम ही आरोप पत्र से हटा दिया।” बहरहाल, ताराचंद इंटर कॉलेज के सहायक प्रबंधक सिद्धेश्वर पांडेय की हत्या में उसे आजीवन कारावास की सज़ा हो गई। लेकिन वह फ़रार हो गया था। लिहाज़ा, उसके ख़िलाफ़ गुंडा एक्ट और गैंगस्टर की कार्रवाई की गई। वर्ष 2017 में उसे यूपी एसटीएफ़ ने पकड़ लिया और पूछताछ में उसने भाजपा के भगवती सागर और अभिजीत सांगा का नाम लिया। इसके बाद वह जेल में था। बहरहाल, आम चुनाव से पहले एक सत्तारूढ़ दल के नेता ने उसे जेल से बाहर निकलवाने में मदद की और वह जेल से बाहर आ गया।

राहुल तिवारी की एफआईआर निर्णायक

वस्तुतः, अपराधी विकास दुबे के लिए बुरे समय की शुरुआत तब हुई, जब उसने और उसके लोगों ने बिकरू गांव के ही निवासी राहुल तिवारी पर कातिलाना हमला कर दिया। राहुल तिवारी ने विकास दुबे के ख़िलाफ़ इंडियन पैनल कोड की धारा 307 के तहत हत्या के प्रयास का मुक़दमा दर्ज कराया। इसके बाद चौबेपुर का थाना इंचार्ज विनय तिवारी, जिसे विकास दुबे को पुलिस कार्रवाई की सूचना देने के आरोप में निलंबित करके गिरफ़्तार कर लिया गया, राहुल को लेकर विकास के घर गया। विकास दुबे ने राहुल को थाना प्रभारी के सामने ही धक्का देकर घर से बाहर निकाल दिया और विनय तिवारी पर ही राइफल तान दी। इसके बाद शिवराजपुर थाने के एसओ महेश कुमार यादव विकास को पकड़ने बिकरू गांव में उसके घर गए।

सीओ, एसओ समेत आठ पुलिस वाले शहीद

बताया जाता है कि विकास के आदमियों ने महेश यादव और उनके सहयोगियों को घेर लिया। इस पर महेश यादव ने थाने में फोन किया और बताया, “बदमाशों ने उन लोगों को घेर लिया है। गोलियां चल रही हैं। बचना मुश्किल है। लिहाज़ा, जल्दी से अतिरिक्त फ़ोर्स भेजी जाए।” जैसे ही बात की जानकारी थाने में पहुंची, बड़ी संख्या में पुलिस मौक़े पर पहुंची। जब अतिरिक्त बल वहां पहुंची, तब तक थानाध्यक्ष विनय तिवारी से गुप्त सूचना पाकर विकास दुबे ने पूरी तरह से मोर्चेबंदी कर ली थी और पुलिस दल पर एके 47 से गोलियां चलाई जिनमें महेश यादव के अलावा सीओ देवेंद्र मिश्रा और चौकी इंचार्ज अनूप कुमार समेत आठ पुलिस वाले शहीद हो गए। बताया जाता है विकास ने मुठभेड़ के बाद कई पुलिस वालों को पकड़ लिया था और उन्हें बड़ी बर्बर मौत दी। सीओ को मारने से पहले उनके दोनों पांव कुल्हाड़ी से काट दिया था।

विकास के मामा व चचेरा भाई मारे गए

कहा जाता है कि बाद में पुलिस ने विकास दुबे के मामा प्रेमप्रकाश उर्फ प्रेमकुमार पांडेय और चचेरे भाई अतुल दुबे को पकड़ लिया और कुछ दूर एक बगीचे में ले जाकर दोनों को गोली मार दी। हालांकि पुलिस ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि विकास के दोनों रिश्तेदार मुठभेड़ में शामिल थे और पुलिस की जवाबी कार्रवाई में मारे गए। पुलिस ने दोनों के शवों का पोस्टमार्टम कराया और परिजनों को सूचना दी, लेकिन शव लेने के लिए कोई भी नहीं आया। इसके चलते पुलिसकर्मियों ने ही भैरोघाट स्थित विद्युत शवदाह गृह में अंतिम संस्कार करा दिया।

हर विभाग विकास दुबे के आदमी

कानपुर में एक स्थानीय पत्रकार सुरक्षा कारणों से नाम न छापने की शर्त पर कह, “विकास दुबे के पास बहुत अधिक मुखबिर थे। ये लोग इतनी बड़ी संख्या में थे कि उससे जुड़ी कोई भी सूचना उस तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता। पुलिस, प्रशासन, पीडब्ल्यूडी, नगर निगम हो या अन्य कोई भी सरकारी विभाग, हर जगह उसके आदमी बैठे थे। दूसरी ओर राज्य पुलिस सर्विलांस और आधुनिक संसाधनों पर निर्भर था। पुलिस का मुखबिर तंत्र ख़त्म हो चुका। विकास ने प्रशासन और पुलिस में सबका कमीशन फ़िक्स कर रखा था। अपराध की दुनिया का नेटवर्क उसने अलग से तैयार किया था। उसके लोग उसे शहर से लेकर गांव देहात तक की जानकारियां देते थे।

माता-पिता ने पूछा, हमें बेघर क्यों कर दिया?

इस घटना के बाद पुलिस ने विकास दुबे और उसके मामा का घर ज़मीदोज़ कर दिया। विकास के बारे में जब उसकी मां सरला देवी से पूछा गया तो उन्‍होंने माना कि उसने ग़लत किया जिसकी सज़ा उसे मिलनी चाहिए। मां सरला ने कहा, “मेरे बेटे को नेता-नगरी ने अपराधी बना दिया। हरिकिशन जो कहते रहे, उसने वही किया। अब यही नेता उसकी जान लेने पर तुली है। पर, सरकार को सोचना चाहिए कि गलती विकास ने की है तो उसे सज़ा दे। हमारा घर क्यों तोड़ डाला? अब हम बुजुर्ग कहां रहेंगे?” स्थानीय लोगों ने बताया कि विकास के पिता एक किसान हैं। विकास तीन भाइयों में सबसे बड़ा है। एक भाई की मृत्यु हो चुकी है। विकास के दो बेटे हैं जिनमें से बड़ा इंग्लैंड में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा है तो दूसरा कानपुर में ही रहकर ग्रेजुएशन कर रहा है।

अब नहीं खुलेगा पनाहगारों का राज़

विकास दुबे के मारे जाने के बाद वे राजनेता, पुलिस अफसर और दूसरे लोग निश्चित रूप में प्रसन्न हो रहे होंगे, क्योंकि पुलिस ने विकास को मार कर उन्हें बचा लिया। विकास दुबे के खात्मे के साथ वह राज़ भी दफ़न हो गया कि विकास को किस नेता और किस पुलिस अधिकारी का संरक्षण मिला। अब कोई राज़ नहीं खुलेगा। कहने का मतलब राजनीति की दुकान वैसे ही चलती रहेगी, जैसा अब तक चलता रहा है। हां, विकास की जगह कोई और अपराधी ले लेगा। कुछ दिन वह भी नेताओं, पुलिस और कारोबारियों की मदद करता रहेगा फिर दुर्दांत होने पर उसे भी एनकाउंटर में मार दिया जाएगा।

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लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा